चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 397, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें३८२ चरकसंहिता [ अ० ६
त्रिकण्टकाश्मन्तकसोमवल्कैर्भल्लातकैः सातिविषैः सलोध्रैः ।
वचापटोलार्जुननिम्बमुस्तैर्हरिद्रया पद्मकदीप्यकैश्च ॥ ३८ ॥
मञ्जिष्ठया वाऽगुरुचन्दनैश्च सर्वैः समुस्तैः कफवातजेषु ।
मेहेषु तैलं, विपचेद् घृतं तु पैत्तेषु, मिश्रं त्रिषु लक्षणेषु ॥ ३६ ॥
( ५ ) त्रिकण्टकाद्य तैल, घृत और यमक—( १ ) गोखरू, अश्मन्तक,
सोमवल्क ( श्वेत खदिर ) । ( २ ) भिलावा अतीस, लोध । ( ३ ) वच, पर-
वल, अर्जुन, नीम की छाल, नागरमोथा । ( ४ ) हल्दी, पद्माख, अजवायन ।
( ५ ) मजीठ, अगर और लाल चन्दन इन पाच योगो को मोथे के साथ मिला
कर कफ-वातजन्य प्रमेहो ( कफमेह मे वायु का योग हो ) मे, तैल का पाक
करे । तैल से चतुर्थाश कल्क और चौगुने जल मे धीरे २ तैल पकावे । पित्त-
जन्य प्रमेह मे वायु का अनुबन्ध हा तो इनके कल्क से घृत पाक करे । तीनो
दोषो के लक्षण हो तो इन्ही द्रव्यो के कल्क से घी और तैल के यमक को यथा-
विधि सिद्ध करके प्रयोग करे१ । ॥३८-३६॥
फलत्रिकं दारुनिशा विशालां मुस्ता च निःक्वाथ्य निशा सकल्काः ।
पिवेत्कषाय मधुसंप्रयुक्तं सर्वप्रमेहेषु समुद्धृतेषु ॥ ४० ॥
( ६ ) फल त्रिकादि क्वाथ—त्रिफला, दारुहल्दी, विशाला ( इन्द्रायण ),
मोथा इनका क्वाथ करके हल्दी के कल्क का प्रक्षेप मिला कर मधु के साथ
प्रवृद्ध प्रमेहो मे पीवे ॥४०॥
लोध्रं शटी पुष्करमूलमेलां मूर्वा विडङ्गं त्रिफलां यवानीम् ।
चव्यं प्रियंगुं क्रमुक विशाला किराततिक्तं कटुरोहिणीं च ॥ ४१ ॥
भाङ्गीनतं चित्रकपिप्पलीना मूलं सकुष्ठातिविष सपाठम् ।
कलिङ्गकान्केशरमिन्द्रसाह्वा नख सपत्रं मरिचं सर्वं च ॥ ४२ ॥
द्रोणेऽम्भसः कर्षसमानि पक्त्वा पूते चतुर्थागजलावशेषे ।
रसेऽर्धभागं मधुनः प्रदाय पक्षं निधेयो घृतभाजनस्थः ॥ ४३ ॥
लोध्रासवोऽय कफपित्तमेहान् क्षिप्रं निहन्याद् द्विपलप्रयोगात् ।
पाण्ड्वामयार्शांस्यरुचि ग्रहण्या दोष किलासं विविधं च कुष्ठम् ॥४४॥
इति लोध्रासवः२ ।
१ यहा पर पाच योग है । सब के साथ मोथा मिलाना चाहिये । कई
आचार्य ‘समुस्तैः’ के स्थान पर ‘समस्तै ’ पढते है । उनके लिये एक ही योग
है । अष्टाग-सग्रह मे इसको एक ही योग पढा है । वहा पर चतुर्जातक का
प्रयोग करने के लिये लिखा है । २ ‘मध्वासव’ इति च पाठः ।