चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३६७
अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३६७
वमनार्हाय वमनं प्रदद्यात्कफगुल्मिने ॥ १३७ ॥
स्निग्धस्विन्नशरीराय ल्मे शैथिल्यमागते ।
परिवेष्ट्य प्रदीप्तांस्तु बल्वजानथवा कुशान् ॥ १३८ ॥
भिषक्कुम्भे समावाप्य गुल्मं घटमुखे क्षिपेत् ।
सगृहीतो यदा गुल्मस्तदा घटमथोद्धरेत् ॥ १३६ ॥
वस्त्रान्तरं ततः कृत्वा भिन्द्याद् गुल्मं प्रमाणवित् ।
विमार्गार्जं यदा पश्येद्यथालाभं प्रपीडयेत् ॥ १४० ॥
मृद्नीयाद् गुल्ममेवैकं न त्वत्र हृदयं स्पृशेत् ।
कफ-गुल्म की चिकित्सा— ( १ ) कफ-गुल्म का रोगी यदि वमन के
योग्य हो तो उसको वमन देवे । स्नेहन और स्वेदन क्रिया से गुल्म को शिथिल
बना कर इसको वस्त्र से लपेट देवे । फिर एक घड़े ( घटीयन्त्र) में जलते हुए
बल्वज ( तृणविशेष ) और कुशाओं को डाल देवे और घड़े के मुख को गुल्म
पर लगा देवे, उससे गुल्म घड़े के मुख की ओर खींचा जाकर पकड़ा जाता है
[ वायु के निकल जाने से शून्य स्थान बनने से यन्त्र गुल्म को खींच लेता है,
यन्त्र में से वायु निकालने के लिये जलती घास यन्त्र में रक्खी जाती है । आग के
बुझने पर परन्तु गरम रहने पर यन्त्र को लगावे ] । जिस समय गुल्म पकड़ा
जाये, उस समय घटीयन्त्र को उतार ले । इस गुल्म को वस्त्र से दाबकर प्रमाण
का समझने वाला वैद्य चीर देवे, अब विमार्ग, अजपद और आदर्श इनमें से
जो भी मिले उस से इसको दबावे जिससे दोष निकल जाय, गुल्म का ही मर्दन
पीड़न करे । हृदय पर किसी प्रकार का आघात ( रक्तक्षय से या भय से ) नहीं
आने देवे । [ आज कल यह कार्य कपिंग से किया जाता है । घास के
स्थान पर स्पिरिट का उपयोग किया जाता है 'विमार्ग' चमारों का यन्त्र है ।
इसमें वे चमडे को सीधा काटते हैं । इसको राफडी कहते हैं । 'अजपद'
बकरी के पैर के समान लकडी का बना यन्त्र होता है । ] ॥ १३७-१४०-॥
तिलैरण्डातसीबीजसर्षपैः परिलिप्य च ॥ १४१ ॥
श्लेष्मगुल्ममयःपात्रैः सुखोष्णैः स्वेदयेद्भिषक् ।
( २ ) कफज गुल्म पर तिल, एरण्डबीज, अलसी, सरसो इन का लेप करके
सुहाते हुए गरम लोहे के पात्रों से सेक करे ॥ १४१ ॥
सव्योषक्षारलवणं दशमूलीशृतं घृतम् ॥ १४२ ॥
कफगुल्मं जयत्याशु सहिङ्गुबिडदाडिमम् ।
इति दशमूलीघृतम् ।
३६८ चरकसंहिता [ अ० ५
( ३ ) दशमूली घृत—दशमूली के क्वाथ से और त्रिकटु, यवक्षार, सैन्धा
नमक, हींग, बिड नमक, और अनारदाना इनके कल्क से साधित घी के प्रयोग
से कफगुल्म शान्त होता है । कोई २ वैद्य दशमूल का कल्क भी डालते हे ।
[ श्री गगाधर सेन ने अनार का छिलका डालना लिखा है । ] ॥ १४२- ॥
भल्लातकाना द्विपलं पञ्चमूलं पलोन्मितम् ॥ १४३ ॥
साध्यं विदारिगन्धाद्यमापोथ्य सलिलाढके ।
पादशेषे रसे तस्मिन् पिप्पली नागरं वचाम् ॥ १४४ ॥
विडङ्ग सैन्धवं हिङ्गु यावशूकं बिड यटीम् ।
चित्रक मधुकं रास्त्रा पिष्ट्वा कर्षसम भिषक् ॥ १४५ ॥
प्रस्थ च पयसः कृत्वा घृतप्रस्थ विपाचयेत् ।
एतद्भल्लातकघृत कफगुल्महर परम् ॥ १४६ ॥
प्लीहापाण्ड्वामयश्वासग्रहणीरोगकासनुत् ।
इतिभल्लातकाद्यं घृतम् ।
( ४ ) भल्लातकाद्यघृत—भिलावा १ पल, विदारीगन्धादि स्वल्प पचमूल
( शालिपर्णी, पृश्निपर्णी गोखरू, कटेरी, बडी कटेरी ), एक पल, पानी दो
आढक, हींग, यवक्षार बिड नमक, कचूर, चीता, मुलहठी, रास्त्रा प्रत्येक एक
कर्ष लेकर इनका कल्क बनाये, घी २ प्रस्थ मिलाकर घृत-पाक करे । यह भल्ला-
तक घृत कफ-गुल्म नाशक, प्लीहा, पाण्डुरोग, श्वासरोग, ग्रहणी राग, और का ·
को नष्ट करता है । [ मात्रा २ मासे से ४ मासा । ] ॥ १४३-१४६ ॥
पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः ॥ १४७ ॥
पलिकैः सयवक्षारैर्घृतप्रस्थं विपाचयेत् ।
क्षारप्रस्थेन १ तत्सर्पिर्हन्ति गुल्म कफात्मकम् ॥ १४८ ॥
ग्रहणीपाण्डुरोगघ्न प्लीहकासज्वरापहम् ।
इति पञ्चकोलघृतम् ।
( ५ ) पञ्चकाल घृत—पिप्पली, पिप्पलीमूल, चविका, चित्रक, सोठ ओर
यवक्षार प्रत्येक एक पल, घी २ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ इनसे यथाविवि घृत पाक
करे । यह घृत कफ-गुल्म ग्रहणी रोग, पाण्डु रोग, प्लीहा, कास, और ज्वर को
नष्ट करता ह । [ इसका 'क्षीरषट्पल घृत' भी कहते हे । ] ॥१४७-१४८॥
त्रिवृता त्रिफला दन्ती दशमूलं पलोन्मितम् ॥ १४६ ॥
जले चतुर्गुणे पक्त्वा चतुर्भांगस्थितं रसम् ।
१ 'क्षीरप्रस्थ च' इति वा पाठः ।