चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ५ ] इन्द्रियस्थानम् १५७
अ० ५ ] इन्द्रियस्थानम् १५७
कलुषेऽम्भसि पङ्के वा कूपे वा तमसाऽऽवृते ।
स्वप्ने मज्जति शीघ्रेण स्रोतसा ह्रियते च यः ॥ ३२ ॥
स्नेहपानं तथाऽभ्यङ्गः स्वप्ने बन्धपराजयौ ।
हिरण्यलाभः कलहः प्रच्छर्दनविरेचने ॥ ३३ ॥
उपानद्युगनाशश्च प्रपातः पांशुचर्मणोः ।
हर्षः स्वप्ने प्रकुपितैः पितृभिश्चावभर्त्सनम् ॥ ३४ ॥
दन्त-चन्द्रार्क-नक्षत्र-देवता-दीप-चक्षुषाम् ।
पतनं वा विनाशो वा स्वप्ने भेदो नगस्य वा ॥ ३५ ॥
रक्तपुष्प वनं भूमिं पापकर्मोलया चिताम् ।
गुहान्धकारसबाधं स्वप्ने यः प्रविशत्यपि ॥ ३६ ॥
रक्तमाली हसन्नुच्चैर्दिग्वासा दक्षिणा दिशम् ।
दारुणामटवी स्वप्ने कपियुक्त १ प्रयाति वा ॥ ३७ ॥
कषायिणामसौम्यानां नग्नाना दण्डधारिणाम् ।
कृष्णानां रक्तनेत्राणां स्वप्ने नेच्छन्ति दर्शनम् ॥ ३८ ॥
कृष्णा पापा निराचारा दीर्घकेशनखस्तनी ।
विरागमाल्यवसना स्वप्ने कालनिशा मता ॥ ३९ ॥
इत्येते दारुणाः स्वप्ना रोगी यैर्य्याति पञ्चताम् ।
अरोगः संशय गत्वा कश्चिदेव विमुच्यते ॥ ४० ॥
नीचे कहे जाने वाले दूसरे भयकर स्वप्न जो रोगियों को दिखाई देते हैं,
वे स्वप्न मृत्यु अथवा बहुत कष्ट देने के लिये होते हैं ।
( १ ) जिस रोगी के सिर पर स्वप्न में बास, पौधे, बेल आदि उत्पन्न हो
जाते हैं, स्वप्न मे जिसके शरीर में पक्षी प्रवेश करते हैं, स्वप्न में जिसका सिर
मुड जाये, स्वप्न में जिसको गीध, उल्लू, कुत्ते, कौवे आदि घेर लेते हैं, राक्षस,
प्रेत, पिशाच, स्त्री, चाण्डाल, अन्धे आदि जिसको रोक लेते हैं, स्वप्न में जो
बास, बेंत, लता जाल, तृण, काटे आदि में फस जाता है, जो स्वप्न में जाता
जाता रेत, धूल से युक्त भूमि पर, बलमीक या राख में गिर पड़ता है, जो स्वप्न
मे श्मशान, देवालय, या गड्ढे मे घुसता है, जो दूषित पानी में, कीचड़ में,
अन्धकार से भरे कुएं मे, जो स्वप्न में डूबता है (या स्नान करता है), अथवा —
जो स्वप्न में धार में बह जाता है, स्वप्नावस्था मे जो स्नेह पान करे, मालिश
करे, वमन करे, विरेचन करे, स्वर्णलाभ हो, झगड़ा हो, स्वप्न में बन्धन और
१. 'कपियुक्तेन याति यः' इति च पाठः ।
१५८ चरकसंहिता [ अ० ५
पराजय हो, दोनों जूतों को खो देवे, या धूल या चमड़े पर गिरे, स्वप्न में हर्ष
हो, क्रोधित पितरों से धिक्कारा जावे, दात, चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र, देवता, दिया
या आख अथवा पर्वत को गिरता देखे, या उनका नष्ट होना अथवा फटना
आदि स्वप्न में देखे, लाल फूलों से भरा जगल देखे, वध करने अथवा अन्य
पाप कर्म के स्थान या चिता मे या गाढे अन्धकार मे घुसे, नीद में लाल माला
पहिन कर, जोर से हंसता हुआ, नगा होकर दक्षिण दिशा में जावे, बन्दरों से
युक्त घने जंगल मे जावे तो ये स्वप्न रोगियो को विनाश या भारी कष्ट के
लिये होते है ।
कषाय, भगर्वे वस्त्र पहिने, उग्र, नगे, दण्ड धारण किये, काले लाल आँखों
वाले ऐसे अशुभ मनुष्यों का दर्शन, काली, पापी, अनाचारी, लम्बे बाल, नख
और स्तनों वाली, लाल माला तथा लाल वस्त्र पहिने हुई ऐसी स्त्री का दर्शन
कालनिंशा के समान है ( ये सब दारुण, भयकर स्वप्न है, जिनको देख कर
रोगी मर जाता है। नीरोग मनुष्य यदि इस प्रकार के स्वप्न देखे तो उसका
जीवन सन्देह में पड़ जाता है। इस प्रकार के अशुभ स्वप्नों को देख कर कोई
विरला ही बचता है) ॥२७-४०॥
मनोवहानां पूर्णत्वादोषैस्तैर्बलवत्तरैः ।
स्रोतसा दारुणान् स्वप्नान् काले पश्यति दारुणे ॥ ४१ ॥
नातिप्रसुप्तः पुरुषः सफलानफलानपि ।
इन्द्रियेशेन मनसा स्वप्नान् पश्यत्यनेकधा ॥ ४२ ॥
स्वप्न दर्शन का कारण- जिस समय कुपित हुए तीनों वात आदि दोष
शरीर के मनोवह स्रोतों को भर देते हैं, उस समय मनुष्य को शुभ या
अशुभ स्वप्नों का दर्शन होता है। जिस समय मनुष्य पूर्ण गहरी नींद में नहीं
होता है, उस समय सफल या निष्फल होने वाले अनेक स्वप्नों को इन्द्रियों के
स्वामी चित्त के द्वारा देखा करता है ॥ ४१-४२ ॥
दृष्टं श्रुतानुभूतं च प्रार्थितं कल्पितं तथा ।
भाविकं दोषजं चैव स्वप्नं सप्तविध विदु ॥ ४३ ॥
स्वप्न के भेद-स्वप्न सात प्रकार के हैं। जैसे- (१) दृष्ट, आख से
देखा, (२) श्रुत, कान से सुना, (३) अनुभूत, शेष इन्द्रियों से जाना, (४)
प्रार्थित, देवता से मागा या चाहा हुआ (५) कल्पित, मन से कल्पना किया,
(६) भाविक, भावी शुभ अशुभ फल का सूचक, (७) दोषज, तीव्र वात
आदि दोष से उत्पन्न ये सात प्रकार के स्वप्न हैं ॥ ४३ ॥