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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 616 में से

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पृष्ठ 171

अ० ५ ] इन्द्रियस्थानम् १५७
कलुषेऽम्भसि पङ्के वा कूपे वा तमसाऽऽवृते ।
स्वप्ने मज्जति शीघ्रेण स्रोतसा ह्रियते च यः ॥ ३२ ॥
स्नेहपानं तथाऽभ्यङ्गः स्वप्ने बन्धपराजयौ ।
हिरण्यलाभः कलहः प्रच्छर्दनविरेचने ॥ ३३ ॥
उपानद्युगनाशश्च प्रपातः पांशुचर्मणोः ।
हर्षः स्वप्ने प्रकुपितैः पितृभिश्चावभर्त्सनम् ॥ ३४ ॥
दन्त-चन्द्रार्क-नक्षत्र-देवता-दीप-चक्षुषाम् ।
पतनं वा विनाशो वा स्वप्ने भेदो नगस्य वा ॥ ३५ ॥
रक्तपुष्प वनं भूमिं पापकर्मोलया चिताम् ।
गुहान्धकारसबाधं स्वप्ने यः प्रविशत्यपि ॥ ३६ ॥
रक्तमाली हसन्नुच्चैर्दिग्वासा दक्षिणा दिशम् ।
दारुणामटवी स्वप्ने कपियुक्त १ प्रयाति वा ॥ ३७ ॥
कषायिणामसौम्यानां नग्नाना दण्डधारिणाम् ।
कृष्णानां रक्तनेत्राणां स्वप्ने नेच्छन्ति दर्शनम् ॥ ३८ ॥
कृष्णा पापा निराचारा दीर्घकेशनखस्तनी ।
विरागमाल्यवसना स्वप्ने कालनिशा मता ॥ ३९ ॥
इत्येते दारुणाः स्वप्ना रोगी यैर्य्याति पञ्चताम् ।
अरोगः संशय गत्वा कश्चिदेव विमुच्यते ॥ ४० ॥
नीचे कहे जाने वाले दूसरे भयकर स्वप्न जो रोगियों को दिखाई देते हैं,
वे स्वप्न मृत्यु अथवा बहुत कष्ट देने के लिये होते हैं ।
( १ ) जिस रोगी के सिर पर स्वप्न में बास, पौधे, बेल आदि उत्पन्न हो
जाते हैं, स्वप्न मे जिसके शरीर में पक्षी प्रवेश करते हैं, स्वप्न में जिसका सिर
मुड जाये, स्वप्न में जिसको गीध, उल्लू, कुत्ते, कौवे आदि घेर लेते हैं, राक्षस,
प्रेत, पिशाच, स्त्री, चाण्डाल, अन्धे आदि जिसको रोक लेते हैं, स्वप्न में जो
बास, बेंत, लता जाल, तृण, काटे आदि में फस जाता है, जो स्वप्न में जाता
जाता रेत, धूल से युक्त भूमि पर, बलमीक या राख में गिर पड़ता है, जो स्वप्न
मे श्मशान, देवालय, या गड्ढे मे घुसता है, जो दूषित पानी में, कीचड़ में,
अन्धकार से भरे कुएं मे, जो स्वप्न में डूबता है (या स्नान करता है), अथवा —
जो स्वप्न में धार में बह जाता है, स्वप्नावस्था मे जो स्नेह पान करे, मालिश
करे, वमन करे, विरेचन करे, स्वर्णलाभ हो, झगड़ा हो, स्वप्न में बन्धन और
१. 'कपियुक्तेन याति यः' इति च पाठः ।