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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३०६

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३०६
मदनं पिप्पलीभिर्वा कलिङ्गैर्मधुकेन वा ॥ २२८ ॥
युक्तमुष्णाम्बुना पेय वमनं ज्वरशान्तये ।
क्षौद्राम्बुना रसेनेक्षोरथवा लवणाम्बुना ॥ २२६ ॥
ज्वरे प्रच्छर्दनं शस्तं मद्यैर्वा तर्पणेन वा ।
वमन के योग—(१) मैनफल को पिप्पली के साथ, (२) मैनफल को
इन्द्रजौ के साथ, (३) मैनफल को मुलहठी के साथ, गरम जल के अनुपान
से ज्वर-रोगी को वमन देना चाहिये । अथवा पानी के स्थान पर शहद मिला
पानी, गन्ने का रस, नमक मिला पानी या मद्य वा लाजा सत्तूओ से तर्पण,
दोष और रोगी के बलाबलानुसार प्रयोग करे ॥ २२८-२२६ ॥
मृद्वीकामलकाना वा रस प्रस्कन्दनं पिबेत् ॥ २३० ॥
रसमामलकानां वा घृतभृष्टं ज्वरापहम् ।
लिह्याद्वा त्रिवृत चूर्णं संयुक्तं मधुसर्पिषा ॥ २३१ ॥
पिबेद्वा क्षौद्रमासाद्य सघृत त्रिफलारसम् ।
आरग्वध वा पयसा मृद्वीकाना रसेन वा ॥ २३२ ॥
त्रिवृता त्रायमाणा वा पयसा ज्वरितः पिबेत् ।
ज्वराद्विमुच्यते पीत्वा मृद्वीकाभिः सहाभयाम् ॥ २३३ ॥
पयोऽनुपानमुष्णं वा पीत्वा द्राक्षारसं नरः ।
कासाच्छ्वासाच्छिरःशूलात्पार्श्वशूलाच्चिरज्वरात् ॥ २३४ ॥
मुच्यते ज्वरितः पीत्वा पञ्चमूलशृतं पयः ।
विरेचन के योग—अंगूरों का रस (द्राक्षा का क्वाथ) और आवले का
रस मिलाकर विरेचन के लिये पीना चाहिये, या आवलों के रस को घी मे भून
कर पीना चाहिये । इससे ज्वर नष्ट होता है । अथवा निशोथ के चूर्ण को घी
और शहद के साथ चाटना चाहिये । अथवा त्रिफला के क्वाथ (रस) मे घी
ओर मधु मिलाकर पीना चाहिये । अथवा अमलतास के गुदे को दूध के साथ
खाना चाहिये । निशोथ या त्रायमाण के चूर्ण को दूध के साथ पीना चाहिये ।
हरड के साथ ३ गूरों को या द्राक्षाओ को देना चाहिये । अथवा द्राक्षा रस को
पीकर पीछे से गरम पानी पीना चाहिये, इससे ज्वर छूट जाता है ।
पञ्चमूल (कटेरी, बडी कटेरी, शालिपर्णी पृश्निपर्णी और गोखरू अथवा
बृहत्पञ्चमूल) के क्वाथ के साथ सिद्ध किया हुआ दूध, कास, श्वास, शिरो-
वेदना, पार्श्वशूल और पुरातन ज्वर को नष्ट करता है१ ॥ २३०-२३४ ॥
१ पञ्चमूल २ तोले, दूध १६ तोले, पानी ६४ तोले इसमे से दूध बचाना
चाहिये ।

३१० चरकसंहिता [ अ० ३

एरण्डमूलोत्कथितं ज्वरात्सपरिकर्तिकात् ॥ २३५ ॥
पयो विमुच्यते पीत्वा तद्वद्विल्वशलाटुभिः ।
ज्वर में परिकर्तिका साथ हो तो एरण्ड-मूल के क्वाथ से साधित दूध अथवा
बेलगिरी (कच्ची) से साधित दूध पीवे । मल त्याग से पीडा होती हो तो इनका
क्वाथ देवे ॥ २३५-॥
त्रिकण्टकवलाव्याघ्रीगुडनागरसाधितम् ॥ २३६ ॥
वर्चोमूत्रविवन्धघ्नं शोफज्वरहरं पयः ।
त्रिकण्टकाद्य दूध—गोखरू, खरैंटी, छोटी कटेरी, गुड, सोंठ इनसे साधित
गाय का दूध मल मूत्र के अवरोध का, सूजन का ओर ज्वर को नष्ट करता है ॥२३६॥
सनागरं समृद्वीकं सघृतक्षौद्रशर्करम् ॥ २३७ ॥
शृतं पयः सखर्जूरं पिपासाज्वरनाशनम् ।
चतुर्गुणेनाम्भसा वा शृतं ज्वरहरं पयः ॥ २३८ ॥
धारोष्णं वा पयः सद्यो वातपित्तज्वरं जयेत् ।
सोंठ, मुनक्का और खजूर इनके कल्क से यथाविधि साधित दूध में गाय
का घी, शर्करा और मधु (ठण्डा होने पर) मिला कर पीने से प्यास तथा
ज्वर नष्ट होता है । चौगुने जल में सिद्ध किया दूध अथवा धारोष्ण दूध शीघ्र
ही वात-पित्त ज्वर को नष्ट करता है ॥ २३७-२३८ ॥
जीर्णज्वराणां सर्वेषां पयः प्रशमनं परम् ॥ २३६ ॥
पेयं तदुष्णं शीतं वा यथास्वं भेषजैः शृतम् ।
सब प्रकार के पुरातन ज्वरों में दूध का प्रयोग करना उत्तम है। दूध को
गरम या ठण्डा करके और यथादोष ओषधियो से सिद्ध करके देवे ॥ २३६ ॥
प्रयोजयेज्ज्वरहरान्निरूहान् सानुवासनान् ॥ २४० ॥
पक्वाशयगते दोषे वक्ष्यन्ते ये च सिद्धिषु ।
पक्वाशय (बृहदन्त्र) में स्थित दोषों को निकालने के लिये सिद्धिस्थान
में कहे ज्वरनाशक निरूह और अनुवासन बस्तियों का प्रयोग करे ॥ २४० ॥
पटोलारिष्टपत्राणि सोशीरंश्वतुरङ्गुलः ॥ २४१ ॥
ह्रीबेरं रोहिणी तिक्ता श्वदंष्ट्रा मदनानि च ।
स्थिरा बला च तत्सर्वं पयस्यर्धोदके शृतम् ॥ २४२ ॥
क्षीरावशेषं निर्यूहं सयुक्तं मधुसर्पिषा ।
कल्कैर्मदनमुस्तानां पिप्पल्या मधुकस्य च ॥ २४३ ॥
वत्सकस्य च संयुक्तं बस्तिं दद्याज्ज्वरापहम् ।

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३११

शुद्धे मार्गे हृते दोषे विप्रसन्नेषु धातुषु ॥ २४४ ॥
गताङ्गशूलो लघ्वङ्गः सद्यो भवति विज्वरः ।
पटोलाद्य बस्ति—परवल, नीम के पत्ते, खस, अमलतास, हीवेर ( नेत्र-
वाला ), कुटकी, गोखरू, मैनफल, शालिपर्णी और बला इनको आधे जलमि-
श्रित दूध मे डाल कर पकाना चाहिये । जब केवल दूध शेष रह जाये तब इस
क्वाथ मे घी और मधु, मैनफल, नागरमोथा, पिप्पली, मुलहठी, इन्द्रजौ इनके
कल्क से बस्ति सिद्ध करनी चाहिये । यह ज्वर को नष्ट करती है । मार्ग के शुद्ध
होने पर और दोषो के निकल जाने पर, धातुओ के निर्मल होने पर मनुष्य
ज्वररहित हो जाता है । अगो की वेदना नष्ट हो जाती है, अग लघु हो जाते
है, ज्वर शीघ्र नष्ट होता है । [इस क्वाथ मे दूध के बराबर पानी मिलाना चाहिये।
क्वाथ द्रव्यो से आठ गुणा जल उतना ही दूध मिलाना चाहिये।] ॥२४१-२४४॥
आरग्वधमुशीराणि मदनस्य फलानि च ॥ २४५ ॥
चतस्रः पर्णिनीश्चैव निर्यूहमुपकल्पयेत् ।
प्रियङ्गुर्मदनं मुस्तं अताह्वा मधुयष्टिका ॥ २४६ ॥
कल्कः सर्पिर्गुडः क्षौद्रं ज्वरघ्नो बस्तिरुत्तमः ।
आरग्वधादि बस्ति—अमलतास, खस, मैनफल, चारो पर्णिया ( माष-
पर्णी, मूगपर्णी, शालपर्णी और पृश्निपर्णी ) इनके क्वाथ बनावे । इस क्वाथ मे
फूल प्रियगु, मैनफल, नागरमाथा, सौफ, मुलहठी इनका कल्क डाले । घी और
गुड तथा शहद मिलावे यह ज्वर नाशक उत्तम बस्ति है ॥ २४५-२४६ ॥
गुडूचीं त्रायमाणा च चन्दनं मधुक वृषम् ॥ २४७ ॥
स्थिरा बला पृश्निपर्णी मदनं चेति साधयेत् ।
रसं जाङ्गलमांसस्य रसेन सहितं भिषक् ॥ २४८ ॥
पिप्पलीफलमुस्तानां कल्केन मधुकस्य च ।
ईषत्सलवणं युक्त्या निरूहं मधुसर्पिषा ॥ २४९ ॥
ज्वरप्रशमनं दद्याद्बलस्वेदरुचिप्रदम् ।
गुडूच्यादि निरूह—गिलोय, त्रायमाणा, लाल चन्दन, मुलहठी, बासे की
मूल की छाल, स्थिरा ( शालपर्णी ), खरैंटी, पृश्निपर्णी, मैनफल इनका क्वाथ
सिद्ध करे । इस क्वाथ मे जगल मास का रस और पिप्पली, मैनफल, नागर-
मोथा, मुलहठी इनका कल्क डाले । इसमे युक्तिपूर्वक थोडा नमक, घी और
मधु भी मिलावे । यह बस्ति ज्वरनाशक, बल, स्वेद को बढाने वाला और
रुचिकर है । [ अष्टाग-संग्रह के अनुसार गिलोय आदि क्वाथ द्रव्यो के साथ ही
मास का पाक करे । पृथक् मासरस सिद्ध नही करे ] ॥ २४७-२४९ ॥

३१२ चरकसंहिता [ अ० ३
जीवन्ती मधुकं मेदां पिप्पली मरिचं वचाम् ॥ २५० ॥
ऋद्धि रास्ना बलां विश्व शतपुष्पा शतावरीम् ।
पिष्ट्वा क्षीर जल सर्पिस्तैल च विपचेद्विपक् ॥ २५१ ॥
आनुवासनिकं स्नेहमेतद्विद्याज्ज्वरापहम् ।
जीवन्त्याद्यनुवासन—जीवन्ती, मुल्हठी, मेदा, पिप्पली, मरिच, वच,
ऋद्धि, रास्ना, खरैटी, सोंठ, सौंफ, शतावरी, इनके कल्क के साथ दूध, घी,
जल और तैल पकावे । यह अनुवासन वस्ति ज्वर का नष्ट करती है ॥२५१-॥
पटोलपिचुमर्दाभ्या गुडूच्या मधुकेन च ॥ २५२ ॥
मदनैश्च शृतः स्नेहो ज्वरङ्गमनुवासनम् ।
पटोल पत्र, नीम की छाल, गिलोय, मुल्हटी, मैनफल इनसे साधित स्नेह
अनुवासन रूप मे प्रयोग करने से ज्वर को नष्ट करता है ॥ २५२ ॥
चन्दनागुरुकान्मर्यपटोलमधुकोत्पलैः ॥ २५३ ॥
सिद्धः स्नेहो ज्वरहरः स्नेहवरितः प्रयुज्यते ।
लाल चन्दन, अगर, गम्भारी, परवल, मुल्हठी, नीला कमल, इनसे सिद्ध
स्नेह अनुवासन-रूप मे प्रयोग करने से ज्वर को नष्ट करता है ॥ २५३ ॥
यदुक्तं भेषजाध्याये विमाने रोगभेषजे ॥ २५४ ॥
शिरोविरेचनं कुर्याद् युक्तिज्ञस्तज्ज्वरापहम् ।
यच्च नावनिकं तैलं याश्च प्राग्घूमवर्त्तयः ॥ २५५ ॥
मात्राशितीये निर्दिष्टाः प्रयोज्यास्ता ज्वरेष्वपि ।
भेषज-चतुष्क अध्यायो मे और विमानस्थान के रोगभेषज प्रकरण मे
जो शिरोविरेचन कहे है, उन ज्वरनाशक शिरोविरेचनो का भी युक्ति को समझने
वाला वैद्य ही प्रयोग करे । मात्राशितीय अध्याय मे जो नावनिक तैल ( अणु
तैल ) और शिरोविरेचन के लिये धूम-वर्त्तिया कही है, उनका भी ज्वर मे
प्रयोग करे ॥ २५४-२५५ ॥
अभ्यङ्गाश्च प्रदेहाश्च परिषेकाश्च कारयेत् ॥ २५६ ॥
यथाभिलापं शीतोष्ण विभज्य द्विविधं ज्वरम् ।
१ कविराज गगाधर सेन मरिच के स्थान पर 'मदन' पढते है । अष्टाग-
सग्रह मे भी यही पाठ है । अष्टाग-सग्रह के टीकाकार इन्दु के अनुसार दूध,
जल, घी और तिल-तैल चारो समान चाहिये । चक्रपाणि के अनुसार दूध, घी
और तेल समान, जल तीन गुना और कल्क चतुर्थाश होना चाहिये । इस
प्रकार से जल और दूध स्नेह से चौगुना हो जाते है । तैल और घी बराबर-
बराबर या दोष की अपेक्षा से कम अधिक ले सकते है ।