चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६०३
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६०३
लक्षण—वातजन्य ग्रहणी मे अन्न का परिपाक बहुत कठिनता से होता है ।
पकने पर अन्न शुक्त (अम्लीभाव) हो जाता है। अगों मे रूक्षता, कर्कशता आ
जाती है । गला और मुख सूखा रहता है, भूख और प्यास बढ जाती है,
आखो के सामने अन्धेरा आता या दृष्टि मन्द हो जाती है, कानो मे गुजार
रहती है, पासो मे, जघाओ मे, वक्षण और ग्रीवा मे दर्द रहती है बार बार
विसूचिका अर्थात् पतला मल तथा वमन आने की शिकायत रहती है । हृदय
मे ( आमाशय के कौड़ी भाग पर ) वेदना, दुर्बलता, कृशता मुख मे विरसता
और कोष्ठ मे कर्तन के समान वदना होती ह । मधुर आदि सब रसो की खान
का वाह रोगी करता है, मानसिक शिथिलता आ जाती है । भोजनके जीर्ण होजाने
पर या जीर्णावस्था मे आध्मान (अफरा) होता है । भोजनके करने पर रोगी को
स्वास्थ्य का अनुभव होता है । रोगी को वातगुल्म, हृदयरोग और प्लीहा-रोग
कॊ आशका नीं रहती है ।
रोगी बड़ी कठिनाई से बहुत देर मे पतला, शुष्क, पानी के समान, कच्चा,
शब्द और झाग मिले मल का बार-बार त्याग करता है । रोगी को खासी और
श्वास की शिकायत रहती है ॥ ६०–६४ ॥
कट्वजीर्णाविदाह्यम्लक्षाराद्यैः पित्तमुल्बणम् ।
अभिमालावयदन्ति जलं तप्तमिवानलम् ॥ ६५ ॥
(२) पैत्तिक-ग्रहणी—कटु, अजीर्ण, विदाही, अम्ल तथा क्षार आदि के सेवन
बढा हुआ पित्त अग्नि को आप्लावित करके उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे
गरम पानी अग्नि को शान्त कर देता ह । पित्त-प्रकोपक वस्तुओ से पित्त मे
उष्णिमा और द्रवाश दोनो बढते है । द्रवाश के कारण अग्नि बुझ जाती है ॥६५॥
सोऽजीर्णं नीलपीताभं पीताभः सार्यते द्रवम् ।
पूत्यम्लोद्गारहृत्कण्ठदाहारुचितृडर्दितः ॥ ६६ ॥
लक्षण—रोगी का वर्ण पीला या नीला सा हो जाता है उसका मल पीला
तथा पानी जैसा पतला होता है । रोगी का उद्गार ( डकार ) दुर्गन्धयुक्त और
खट्टा होता है, हृदय और गले मे जलन होती है । रोगी का अरुचि और प्यास
सताती है ॥ ६६ ॥
गुर्वतिस्निग्धशीतादिभोजनादतिभोजनात् ।
भुक्तमात्रस्य च स्वप्नाद्धन्त्यग्निं कुपितः कफः ॥ ६७ ॥
( ३ ) कफजन्यग्रहणी—गुरु, शीत, अति स्निग्ध भोजन के सेवन से
अथवा अतिभोजन से, और भोजन के उपरान्त तुरन्त सो जाने से कुपित हुआ
कफ अग्नि को नष्ट करता है ॥ ६७ ॥
६०४ चरकसंहिता [ अ० १५
तस्यान्नं पच्यते दुःखं हृल्लासच्छर्द्यरोचकाः ।
आस्योपदेहमाधुर्यकासष्ठीवनपीनसाः ॥ ६८ ॥
हृदयं मन्यते स्त्यानमुदरं स्तिमितं गुरु ।
दुष्टो मधुर उद्गारः सदनं स्त्रीष्वहर्षणम् ॥ ६९ ॥
भिन्नामश्लेष्मसंसृष्टगुरुवर्चःप्रवर्तनम् ।
अकृशस्यापि दौर्बल्यमालस्यं च कफात्मके ॥ ७० ॥
लक्षण—रोगी का अन्न कठिनाई से पचता है, उसको जीमचलाना, वमन,
अरुचि रहती है । लार से मुख लिपा सा रहता है, मुख मे मीठापन रहता है,
खासी, बहुत थूक का आना, नाक मे प्रतिश्याय ( जुकाम ) रहता है । रोगी
हृदय को रुका हुआ या भारी मानता है, उदर स्तिमित ( जकड़ा ) वा भारी
प्रतीत होता है । उद्गार दूषित और मधुर होता है, शरीर के अगों मे शिथिलता
रहती है, स्त्रियो के सहयोग मे मैथुन की इच्छा जागृत नही होती । रोगी का
मल फटा हुआ ( छिछलेदार ), आम ( कच्चा ) और कफ युक्त तथा भारी
होता है । बिना कृशता के भी शरीर मे दुर्बलता का अनुभव होता है, शरीर मे
आलस्य रहता, काम करने को दिल नही चाहता ॥ ६८-७० ॥
यश्चाग्निः पूर्वमुद्दिष्टो रोगानीके चतुर्विधः ।
तं चापि ग्रहणीदोष समवर्जं प्रचक्ष्महे ॥ ७१ ॥
रोगानीक [ विमानस्थान अ० ६ ] अध्याय मे जो चार प्रकार के अग्नि
बतलाई है, उनमे भी समाग्नि को छोड कर शेष तीन ( विषम, मन्द और
तीक्ष्णाग्नि ) अग्नियो को ग्रहणी दोष ही कहते हैं । वायु से विषमाग्नि, कफ से
मन्दाग्नि और पित्त से तीक्ष्णाग्नि होता है ॥ ७१ ॥
पृथग्वातादिनिर्दिष्टहेतुलिङ्गसमागमे ।
त्रिदोषं निर्दिशेत्तेषां—
( ४ ) सन्निपातजन्य ग्रहणी—जिस स्थान पर वातजन्य, पित्तजन्य और
कफजन्य ग्रहणियो के कारण और लक्षण एकत्र मिलित दिखाई देने हो उसको
सन्निपातजन्य ग्रहणी समझना चाहिये १ ।
१ अतीसार और ग्रहणी मे भेद करना चाहिये । यथा—
सामं शकृन्निरामं वा जीर्णे येनातिसार्यते ।
सोऽतिसारोऽतिसरणादाशुकारी स्वभावतः ॥
साम सान्नम्जीर्णेऽन्ने जीर्णे पक्व तु नैव वा ।
अकस्माद् वा गुरुर्बद्धमकस्माच्छिथिल मुहुः ॥