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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

३९- कुरुक्षेत्रके तीर्थोंका अनुक्रान्त वर्णन

अध्याय ३६ ]
कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन
१६१
य आपगां नदीं गत्वा तिलैः संतर्पयिष्यति ।
तेन तृप्ता भविष्यामो यावत्कल्पशतं गतम् ॥ ५
नभस्ये मासि सम्प्राप्ते कृष्णपक्षे विशेषतः ।
चतुर्दश्यां तु मध्याह्ने पिण्डदो मुक्तिमाप्नुयात् ॥ ६
ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् ।
ब्रह्मोदुम्बरमित्येवं सर्वलोकेषु विश्रुतम् ॥ ७
तत्र ब्रह्मर्षिकुण्डेषु स्नातस्य द्विजसत्तमाः ।
सप्तर्षीणां प्रसादेन सप्तसोमफलं भवेत् ॥ ८
भरद्वाजो गौतमश्च जगदग्निश्च कश्यपः ।
विश्वामित्रो वसिष्ठश्च अत्रिश्च भगवानृषिः ॥ ९
एतैः समेत्य तत्कुण्डं कल्पितं भुवि दुर्लभम् ।
ब्रह्मणा सेवितं यस्माद् ब्रह्मोदुम्बरमुच्यते ॥ १०
तस्मिंस्तीर्थवरे स्नातो ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ।
ब्रह्मलोकमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ ११
देवान् पितॄन् समुद्दिश्य यो विप्रं भोजयिष्यति ।
पितरस्तस्य सुखिता दास्यन्ति भुवि दुर्लभम् ॥ १२
सप्तर्षींश्च समुद्दिश्य पृथक् स्नानं समाचरेत् ।
ऋणीणां च प्रसादेन सप्तलोकाधिपो भवेत् ॥ १३
कपिस्यलेति विख्यातं सर्वपातकनाशनम् ।
यस्मिन् स्थितः स्वयं देवो वृद्धकेदारसंज्ञितः ॥ १४
तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च रुद्रं दिण्डिसमन्वितम् ।
अन्तर्धानमवाप्नोति शिवलोके स मोदते ॥ १५
यस्तत्र तर्पणं कृत्वा पिबते चुलकत्रयम् ।
दिण्डिदेवं नमस्कृत्य केदारस्य फलं लभेत् ॥ १६
यस्तत्र कुरुते श्राद्धं शिवमुद्दिश्य मानवः ।
चैत्रशुक्लचतुर्दश्यां प्राप्नोति परमं पदम् ॥ १७
कलस्यां तु ततो गच्छेद यत्र देवी स्वयं स्थिता ।
दुर्गा कात्यायनी भद्रा निद्रा माया सनातनी ॥ १८
कलस्यां च नरः स्नात्वा दृष्ट्वा दुर्गां तटे स्थिताम् ।
संसारगहनं दुर्गं निस्तरेन्नात्र संशयः ॥ १९
ऐसा पुत्र या पौत्र उत्पन्न होगा, जो आपगा नदीके तटपर
जाकर तिलसे तर्पण करेगा, जिससे हम सभी सैकड़ों
कल्पतक (अनन्त कालतक) तृप्त रहेंगे ॥ १-५ ॥
भाद्रपदके महीनेमें, विशेषकर कृष्णपक्षमें, चतुर्दशी
तिथिको मध्याह्न कालमें पिण्डदान करनेवाला मनुष्य
मुक्ति प्राप्त करता है। विप्रवरो ! उसके बाद समस्त
लोकोंमें 'ब्रह्मोदुम्बर' नामसे प्रसिद्ध ब्रह्माके श्रेष्ठ स्थानमें
जाना चाहिये। द्विजवरो ! वहाँ ब्रह्मर्षिकुण्डमें स्नान
करनेवाले व्यक्तिको सप्तर्षियोंकी कृपासे सात सोमयज्ञोंका
फल प्राप्त होता है। भरद्वाज, गौतम, जमदग्नि, कश्यप,
विश्वामित्र, वसिष्ठ एवं भगवान् अत्रि (-इन सात)
ऋषियोंने मिलकर पृथ्वीमें दुर्लभ इस कुण्डको बनाया
था। ब्रह्माद्वारा सेवित होनेके कारण यह स्थान 'ब्रह्मोदुम्बर'
कहलाता है ॥ ६-१० ॥
अव्यक्त जन्मवाले ब्रह्माके उस श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान
करके मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है- इसमें कोई
संदेहकी बात नहीं है। जो मनुष्य वहाँ देवताओं और
पितरोंके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको भोजन करायेगा, उसके पितर
सुखी होकर उसे संसारमें दुर्लभ वस्तु प्रदान करेंगे। सात
ऋषियोंके उद्देश्यसे जो (व्यक्ति) अलगसे स्नान करेगा, वह
ऋषियोंके अनुग्रहसे सात लोकोंका स्वामी होगा। वहाँ
सभी पापोंका विनाश करनेवाला विख्यात कपिस्थल
नामक तीर्थ है, जहाँ वृद्धकेदार नामके देव स्वयं विद्यमान
हैं। वहाँ स्नान करनेके बाद दिण्डिके साथ रुद्रदेवका अर्चन
करनेसे मनुष्यको अन्तर्धानकी शक्ति प्राप्त होती है और
वह शिवलोकमें आनन्द प्राप्त करता है ॥ ११-१५ ॥
जो व्यक्ति उस स्थानपर तर्पण करके दिण्डि
भगवान्को प्रणाम कर तीन चुल्लू जल पीता है, वह
केदार्तीर्थमें जानेका फल प्राप्त करता है। जो व्यक्ति
वहाँ शिवजीके उद्देश्यसे चैत्र शुक्ला चतुर्दशी तिथिमें
श्राद्ध करता है, वह परम पद (मोक्ष) -को प्राप्त कर
लेता है। उसके बाद कलसी नामके तीर्थमें जाना चाहिये
जहाँ भद्रा, निद्रा, माया, सनातनी, कात्यायनीरूपा दुर्गादेवी
स्वयं अवस्थित हैं। कलसी तीर्थमें स्नानकर उसके तीरपर
स्थित दुर्गादेवीका दर्शन करनेवाला मनुष्य दुस्तर संसार-
दुर्ग (सांसारिक भवबन्धन) -को पार कर जाता है। इसमें
(तनिक भी) संदेह नहीं करना चाहिये ॥ १६-१९ ॥

१६२
श्रीवामनपुराण
[ अध्याय ३६
ततो गच्छेत सरकं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम्।
दुर्गदेवीके दर्शनके बाद तीनों लोकोंमें दुर्लभ
कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् ॥ २०
सरकतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ कृष्णपक्षकी चतुर्दशी
तिथिको माहेश्वरदेवका दर्शन करके मनुष्य (अपने)
लभते सर्वकामांश्च शिवलोकं स गच्छति ।
सभी मनोरथोंको प्राप्त करता और (अन्तमें) शिवलोकमें
तिस्रः कोट्यस्तु तीर्थानां सरके द्विजसत्तमाः ॥ २१
चला जाता है। द्विजश्रेष्ठो! सरकतीर्थमें तीन करोड़
तीर्थ विद्यमान हैं। सरके बीच कूपमें रुद्रकोटि स्थित
रुद्रकोटिस्तथा कूपे सरोमध्ये व्यवस्थिता।
है। उस सरमें यदि व्यक्ति स्नान कर रुद्रकोटिका
तस्मिन् सरे च यः स्नात्वा रुद्रकोटिं स्मरेन्नरः ॥ २२
स्मरण करता है तो निःसंदेह (उसके द्वारा) रुद्रकोटि
पूजिता रुद्रकोटिश्च भविष्यति न संशयः।
पूजित हो जाते हैं और रुद्रोंके प्रसादसे वह व्यक्ति
रुद्राणां च प्रसादेन सर्वदोषविवर्जितः ॥ २३
समस्त दोषोंसे छूट जाता है। वह इन्द्रसम्बन्धी ज्ञानसे
पूरित होकर परम पदको प्राप्त कर लेता है। वहीं
ऐन्द्रज्ञानेन संयुक्तः परं पदमवाप्नुयात्।
पापों और भयोंका दूर करनेवाला इडास्पद नामका
इडास्पदं च तत्रैव तीर्थ पापभयापहम्॥ २४
तीर्थ वर्तमान है॥ २०–२४॥
अस्मिन् मुक्तिमवाप्नोति दर्शनादेव मानवः।
इस इडास्पद नामके तीर्थके दर्शनसे ही मनुष्य
तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च पितृदेवगणानपि ॥ २५
मुक्तिको प्राप्त कर लेता है। वहाँ स्नान करके पितरों एवं
देवोंका पूजन करनेसे मनुष्यकी दुर्गति नहीं होती और
न दुर्गतिमवाप्नोति मनसा चिन्तितं लभेत्।
उसे मनोवाञ्छित वस्तु प्राप्त होती है। सभी पापोंका
केदारं च महातीर्थं सर्वकल्मषनाशनम् ॥ २६
विनाश करनेवाला केदार नामक महातीर्थ है। वहाँ
जाकर स्नान करनेसे मनुष्यको सभी प्रकारके दानोंका
तत्र स्नात्वा तु पुरुषः सर्वदानफलं लभेत्।
फल प्राप्त होता है। वहींपर पृथ्वीमें दुर्लभ किंरूप
किंरूपं च महातीर्थं तत्रैव भुवि दुर्लभम्।
नामका (भी) तीर्थ है। उसमें स्नान करनेवाले मनुष्यको
तस्मिन् स्नातस्तु पुरुषः सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥ २७
सभी प्रकारके यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। सरकके
सरकस्य तु पूर्वेण तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।
पूर्वमें तीनों लोकोंमें सुप्रसिद्ध सम्पूर्ण पापोंका विनाश
अन्यजन्म सुविख्यातं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ २८
करनेवाला अन्यजन्म नामका तीर्थ है॥ २५-२८॥
नारसिंहं वपुः कृत्वा हत्वा दानवमूर्जितम्।
नरसिंहका शरीर धारण कर शक्तिशाली दानव
तिर्यग्योनौ स्थितो विष्णुः सिंहैषु रतिमाप्नुवन् ॥ २९
(हिरण्याक्ष)-का वध करनेके बाद विष्णु पशुयोनिमें
स्थित सिंहोंमें प्रेम करने लगे। उसके बाद गन्धर्वोंके
ततो देवाः सगन्धर्वा आराध्य वरदं शिवम्।
साथ सभी देवताओंने वरदाता शिवकी आराधना कर
ऊचुः प्रणतसर्वाङ्गा विष्णुदेहस्य लम्भने ॥ ३०
साष्टाङ्ग प्रणाम करते हुए विष्णुसे पुनः स्वदेह (स्वरूप)
ततो देवो महात्माऽसौ शारभं रूपमास्थितः ।
धारण करनेकी प्रार्थना की। उसके बाद (फिर)
युद्धं च कारयामास दिव्यं वर्षसहस्रकम्।
महादेवने शरभ (सिंहोंसे भी बलवान् पशु-विशेष)-का
युध्यमानौ तु तौ देवौ पतितौ सरमध्यतः ॥ ३१
रूप धारण करके (नरसिंहसे) हजारों दिव्य वर्षोंतक
युद्ध किया-कराया। दोनों देवता (आपसमें) युद्ध करते
तस्मिन् सरस्तटे विप्रो देवर्षिर्नारदः स्थितः ।
हुए सरोवरमें गिर पड़े। उस सरोवरके तीरपर (स्थित)
अश्वत्थवृक्षमाश्रित्य ध्यानस्थस्तौ ददर्श ह ॥ ३२
अश्वत्थ (पीपल)-वृक्षके नीचे देवर्षि नारद ध्यान लगाये

अध्याय ३६ ]
कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन
१६३
विष्णुश्चतुर्भुजो जज्ञे लिङ्गाकारः शिवः स्थितः ।
तौ दृष्ट्वा तत्र पुरुषौ तुष्टाव भक्तिभावितः ॥ ३३
नमः शिवाय देवाय विष्णवे प्रभविष्णवे ।
हरये च उमाभर्त्रे स्थितिकालभृते नमः ॥ ३४
हराय बहुरूपाय विश्वरूपाय विष्णवे ।
त्र्यम्बकाय सुसिद्धाय कृष्णाय ज्ञानहेतवे ॥ ३५
धन्योऽहं सुकृती नित्यं यद् दृष्टौ पुरुषोत्तमौ ।
ममाश्रममिदं पुण्यं युवाभ्यां विमलीकृतम् ।
अद्यप्रभृति त्रैलोक्ये अन्यजन्मेति विश्रुतम् ॥ ३६
य इहागत्य स्नात्वा च पितॄन् संतर्पयिष्यति ।
तस्य श्रद्धान्वितस्येह ज्ञानमैन्द्रं भविष्यति ॥ ३७
अश्वत्थस्य तु यन्मूलं सदा तत्र वसाम्यहम् ।
अश्वत्थवन्दनं कृत्वा यमं रौद्रं न पश्यति ॥ ३८
ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा नागस्य ह्रदमुत्तमम् ।
पौण्डरीके नरः स्नात्वा पुण्डरीकफलं लभेत् ॥ ३९
दशम्यां शुक्लपक्षस्य चैत्रस्य तु विशेषतः ।
स्नानं जपं तथा श्राद्धं मुक्तिमार्गप्रदायकम् ॥ ४०
ततस्त्रिविष्टपं गच्छेत् तीर्थं देवनिषेवितम् ।
तत्र वैतरणी पुण्या नदी पापप्रमोचनी ॥ ४१
तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च शूलपाणिं वृषध्वजम् ।
सर्वपापविशुद्धात्मा गच्छत्येव परां गतिम् ॥ ४२
ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा रसावर्त्तमनुत्तमम् ।
तत्र स्नात्वा भक्तियुक्तः सिद्धिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥ ४३
बैठे थे। उन्होंने उन दोनोंको देखा। (फिर तो) विष्णु
चतुर्भुजरूपमें और शिव लिङ्गरूपमें (परिवर्तित) हो
गये। उन दोनों पुरुषों (देवों)-को देखकर उन्होंने
भक्तिभावसे उनकी स्तुति की ॥ २९-३३ ॥
[ नारदजीने स्तुति की ] - देवाधिदेव शिवको
नमस्कार है। प्रभावशाली विष्णुको नमस्कार है। स्थिति
(प्रजापालन) करनेवाले श्रीहरिको नमस्कार है। संहारके
आधारभूत उमापति भगवान् शिवको नमस्कार है।
बहुरूपधारी शङ्करजी एवं विश्वरूपधारी (विश्वात्मा)
विष्णुको नमस्कार है। परमसिद्ध (योगीश्वर) शङ्कर एवं
ज्ञानके मूल कारण भगवान् कृष्णको नमस्कार है। मैं
धन्य तथा सदा पुण्यवान् हूँ; क्योंकि मुझे (आज) आप
दोनों (श्रेष्ठ) पुरुषों (देवों)-के दर्शन प्राप्त हुए। आप
दोनों पुरुषोंद्वारा पवित्र किया गया मेरा यह आश्रम
पुण्यमय हो गया। आजसे तीनों लोकोंमें यह 'अन्यजन्म'
नामसे प्रसिद्ध हो जायगा। जो व्यक्ति यहाँ आकर इस
तीर्थमें स्नान कर अपने पितरोंका तर्पण करेगा श्रद्धासे
सम्पन्न उस पुरुषको यहाँ इन्द्र-सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त हो
जायगा ॥ ३४-३७ ॥
मैं पीपल वृक्षके मूलमें सदा निवास करूँगा। उस
अश्वत्थ (पीपल वृक्ष) -को प्रणाम करनेवाला व्यक्ति
भयंकर यमराजको नहीं देखेगा। श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! उसके
बाद (उस तीर्थसेवीको) उत्तम नागह्रदमें जाना चाहिये।
पौण्डरीकमें स्नान करके मनुष्य पुण्डरीक (एक
प्रकारके यज्ञ)-का फल प्राप्त करता है। शुक्लपक्षकी
दशमी, विशेषकर चैत्रमासकी (शुक्ला) दशमी तिथिमें
वहाँ किया गया स्नान, जप और श्राद्ध मोक्षपथकी
प्राप्ति करानेवाला होता है। पुण्डरीकमें स्नान करनेके
बाद देवताओंद्वारा पूजित 'त्रिविष्टप' नामक तीर्थमें
जाना चाहिये। वहाँ पापोंसे विमुक्त करनेवाली पवित्र
वैतरणी नदी है। वहाँ स्नानकर शूलपाणि वृषध्वज
(शिव)-की पूजा कर मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो
जाता है तथा विशुद्ध होकर निश्चय ही परमगतिको
प्राप्त कर लेता है ॥ ३८-४२ ॥
विप्रश्रेष्ठो ! तत्पश्चात् सर्वश्रेष्ठ रसावर्त (तीर्थ)-में
जाना चाहिये। वहाँ भक्तिसहित स्नान करनेवाला सर्वश्रेष्ठ