वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन
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विष्णुश्चतुर्भुजो जज्ञे लिङ्गाकारः शिवः स्थितः ।
तौ दृष्ट्वा तत्र पुरुषौ तुष्टाव भक्तिभावितः ॥ ३३
नमः शिवाय देवाय विष्णवे प्रभविष्णवे ।
हरये च उमाभर्त्रे स्थितिकालभृते नमः ॥ ३४
हराय बहुरूपाय विश्वरूपाय विष्णवे ।
त्र्यम्बकाय सुसिद्धाय कृष्णाय ज्ञानहेतवे ॥ ३५
धन्योऽहं सुकृती नित्यं यद् दृष्टौ पुरुषोत्तमौ ।
ममाश्रममिदं पुण्यं युवाभ्यां विमलीकृतम् ।
अद्यप्रभृति त्रैलोक्ये अन्यजन्मेति विश्रुतम् ॥ ३६
य इहागत्य स्नात्वा च पितॄन् संतर्पयिष्यति ।
तस्य श्रद्धान्वितस्येह ज्ञानमैन्द्रं भविष्यति ॥ ३७
अश्वत्थस्य तु यन्मूलं सदा तत्र वसाम्यहम् ।
अश्वत्थवन्दनं कृत्वा यमं रौद्रं न पश्यति ॥ ३८
ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा नागस्य ह्रदमुत्तमम् ।
पौण्डरीके नरः स्नात्वा पुण्डरीकफलं लभेत् ॥ ३९
दशम्यां शुक्लपक्षस्य चैत्रस्य तु विशेषतः ।
स्नानं जपं तथा श्राद्धं मुक्तिमार्गप्रदायकम् ॥ ४०
ततस्त्रिविष्टपं गच्छेत् तीर्थं देवनिषेवितम् ।
तत्र वैतरणी पुण्या नदी पापप्रमोचनी ॥ ४१
तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च शूलपाणिं वृषध्वजम् ।
सर्वपापविशुद्धात्मा गच्छत्येव परां गतिम् ॥ ४२
ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा रसावर्त्तमनुत्तमम् ।
तत्र स्नात्वा भक्तियुक्तः सिद्धिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥ ४३
बैठे थे। उन्होंने उन दोनोंको देखा। (फिर तो) विष्णु
चतुर्भुजरूपमें और शिव लिङ्गरूपमें (परिवर्तित) हो
गये। उन दोनों पुरुषों (देवों)-को देखकर उन्होंने
भक्तिभावसे उनकी स्तुति की ॥ २९-३३ ॥
[ नारदजीने स्तुति की ] - देवाधिदेव शिवको
नमस्कार है। प्रभावशाली विष्णुको नमस्कार है। स्थिति
(प्रजापालन) करनेवाले श्रीहरिको नमस्कार है। संहारके
आधारभूत उमापति भगवान् शिवको नमस्कार है।
बहुरूपधारी शङ्करजी एवं विश्वरूपधारी (विश्वात्मा)
विष्णुको नमस्कार है। परमसिद्ध (योगीश्वर) शङ्कर एवं
ज्ञानके मूल कारण भगवान् कृष्णको नमस्कार है। मैं
धन्य तथा सदा पुण्यवान् हूँ; क्योंकि मुझे (आज) आप
दोनों (श्रेष्ठ) पुरुषों (देवों)-के दर्शन प्राप्त हुए। आप
दोनों पुरुषोंद्वारा पवित्र किया गया मेरा यह आश्रम
पुण्यमय हो गया। आजसे तीनों लोकोंमें यह 'अन्यजन्म'
नामसे प्रसिद्ध हो जायगा। जो व्यक्ति यहाँ आकर इस
तीर्थमें स्नान कर अपने पितरोंका तर्पण करेगा श्रद्धासे
सम्पन्न उस पुरुषको यहाँ इन्द्र-सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त हो
जायगा ॥ ३४-३७ ॥
मैं पीपल वृक्षके मूलमें सदा निवास करूँगा। उस
अश्वत्थ (पीपल वृक्ष) -को प्रणाम करनेवाला व्यक्ति
भयंकर यमराजको नहीं देखेगा। श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! उसके
बाद (उस तीर्थसेवीको) उत्तम नागह्रदमें जाना चाहिये।
पौण्डरीकमें स्नान करके मनुष्य पुण्डरीक (एक
प्रकारके यज्ञ)-का फल प्राप्त करता है। शुक्लपक्षकी
दशमी, विशेषकर चैत्रमासकी (शुक्ला) दशमी तिथिमें
वहाँ किया गया स्नान, जप और श्राद्ध मोक्षपथकी
प्राप्ति करानेवाला होता है। पुण्डरीकमें स्नान करनेके
बाद देवताओंद्वारा पूजित 'त्रिविष्टप' नामक तीर्थमें
जाना चाहिये। वहाँ पापोंसे विमुक्त करनेवाली पवित्र
वैतरणी नदी है। वहाँ स्नानकर शूलपाणि वृषध्वज
(शिव)-की पूजा कर मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो
जाता है तथा विशुद्ध होकर निश्चय ही परमगतिको
प्राप्त कर लेता है ॥ ३८-४२ ॥
विप्रश्रेष्ठो ! तत्पश्चात् सर्वश्रेष्ठ रसावर्त (तीर्थ)-में
जाना चाहिये। वहाँ भक्तिसहित स्नान करनेवाला सर्वश्रेष्ठ