वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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श्रीवामनपुराण
[ अध्याय ३६
ततो गच्छेत सरकं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम्।
दुर्गदेवीके दर्शनके बाद तीनों लोकोंमें दुर्लभ
कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् ॥ २०
सरकतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ कृष्णपक्षकी चतुर्दशी
तिथिको माहेश्वरदेवका दर्शन करके मनुष्य (अपने)
लभते सर्वकामांश्च शिवलोकं स गच्छति ।
सभी मनोरथोंको प्राप्त करता और (अन्तमें) शिवलोकमें
तिस्रः कोट्यस्तु तीर्थानां सरके द्विजसत्तमाः ॥ २१
चला जाता है। द्विजश्रेष्ठो! सरकतीर्थमें तीन करोड़
तीर्थ विद्यमान हैं। सरके बीच कूपमें रुद्रकोटि स्थित
रुद्रकोटिस्तथा कूपे सरोमध्ये व्यवस्थिता।
है। उस सरमें यदि व्यक्ति स्नान कर रुद्रकोटिका
तस्मिन् सरे च यः स्नात्वा रुद्रकोटिं स्मरेन्नरः ॥ २२
स्मरण करता है तो निःसंदेह (उसके द्वारा) रुद्रकोटि
पूजिता रुद्रकोटिश्च भविष्यति न संशयः।
पूजित हो जाते हैं और रुद्रोंके प्रसादसे वह व्यक्ति
रुद्राणां च प्रसादेन सर्वदोषविवर्जितः ॥ २३
समस्त दोषोंसे छूट जाता है। वह इन्द्रसम्बन्धी ज्ञानसे
पूरित होकर परम पदको प्राप्त कर लेता है। वहीं
ऐन्द्रज्ञानेन संयुक्तः परं पदमवाप्नुयात्।
पापों और भयोंका दूर करनेवाला इडास्पद नामका
इडास्पदं च तत्रैव तीर्थ पापभयापहम्॥ २४
तीर्थ वर्तमान है॥ २०–२४॥
अस्मिन् मुक्तिमवाप्नोति दर्शनादेव मानवः।
इस इडास्पद नामके तीर्थके दर्शनसे ही मनुष्य
तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च पितृदेवगणानपि ॥ २५
मुक्तिको प्राप्त कर लेता है। वहाँ स्नान करके पितरों एवं
देवोंका पूजन करनेसे मनुष्यकी दुर्गति नहीं होती और
न दुर्गतिमवाप्नोति मनसा चिन्तितं लभेत्।
उसे मनोवाञ्छित वस्तु प्राप्त होती है। सभी पापोंका
केदारं च महातीर्थं सर्वकल्मषनाशनम् ॥ २६
विनाश करनेवाला केदार नामक महातीर्थ है। वहाँ
जाकर स्नान करनेसे मनुष्यको सभी प्रकारके दानोंका
तत्र स्नात्वा तु पुरुषः सर्वदानफलं लभेत्।
फल प्राप्त होता है। वहींपर पृथ्वीमें दुर्लभ किंरूप
किंरूपं च महातीर्थं तत्रैव भुवि दुर्लभम्।
नामका (भी) तीर्थ है। उसमें स्नान करनेवाले मनुष्यको
तस्मिन् स्नातस्तु पुरुषः सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥ २७
सभी प्रकारके यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। सरकके
सरकस्य तु पूर्वेण तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।
पूर्वमें तीनों लोकोंमें सुप्रसिद्ध सम्पूर्ण पापोंका विनाश
अन्यजन्म सुविख्यातं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ २८
करनेवाला अन्यजन्म नामका तीर्थ है॥ २५-२८॥
नारसिंहं वपुः कृत्वा हत्वा दानवमूर्जितम्।
नरसिंहका शरीर धारण कर शक्तिशाली दानव
तिर्यग्योनौ स्थितो विष्णुः सिंहैषु रतिमाप्नुवन् ॥ २९
(हिरण्याक्ष)-का वध करनेके बाद विष्णु पशुयोनिमें
स्थित सिंहोंमें प्रेम करने लगे। उसके बाद गन्धर्वोंके
ततो देवाः सगन्धर्वा आराध्य वरदं शिवम्।
साथ सभी देवताओंने वरदाता शिवकी आराधना कर
ऊचुः प्रणतसर्वाङ्गा विष्णुदेहस्य लम्भने ॥ ३०
साष्टाङ्ग प्रणाम करते हुए विष्णुसे पुनः स्वदेह (स्वरूप)
ततो देवो महात्माऽसौ शारभं रूपमास्थितः ।
धारण करनेकी प्रार्थना की। उसके बाद (फिर)
युद्धं च कारयामास दिव्यं वर्षसहस्रकम्।
महादेवने शरभ (सिंहोंसे भी बलवान् पशु-विशेष)-का
युध्यमानौ तु तौ देवौ पतितौ सरमध्यतः ॥ ३१
रूप धारण करके (नरसिंहसे) हजारों दिव्य वर्षोंतक
युद्ध किया-कराया। दोनों देवता (आपसमें) युद्ध करते
तस्मिन् सरस्तटे विप्रो देवर्षिर्नारदः स्थितः ।
हुए सरोवरमें गिर पड़े। उस सरोवरके तीरपर (स्थित)
अश्वत्थवृक्षमाश्रित्य ध्यानस्थस्तौ ददर्श ह ॥ ३२
अश्वत्थ (पीपल)-वृक्षके नीचे देवर्षि नारद ध्यान लगाये