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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages
Page 911Permalink

समान अपनी किरणों का विस्तार करते हैं. (१)
आ यस्मिन्त्वे स्वपाके यजत्र यक्षद्राजन्त्सर्वतातेव नु द्यौः.
त्रिषधस्थस्ततरुषो न जंहो हव्या मघानि मानुषा यजध्यै.. (२)
हे यज्ञ के योग्य एवं राजमान अग्नि! सभी स्तोता तुझ बुद्धिमान् अग्नि में शीघ्र यज्ञ
करते हैं. तुम तीनों लोकों में स्थित होने के कारण मनुष्यों के श्रेष्ठ हव्य को देवों के पास सूर्य
की तीव्र गति से ले जाओ. (२)
तेजिष्ठा यस्यारतिर्वनेराट् तोदो अध्वन्न वृधसानो अद्यौत्.
अद्रोग्धो न द्रविता चेतति त्मन्नमर्त्योऽवत्रं ओषधीषु.. (३)
जिन अग्नि की ज्वाला परम तेजस्विनी होकर वन में प्रकाशित होती है, वे बढ़कर अपने
मार्ग में सूर्य के समान प्रकाशित होते हैं एवं वायु के समान सबसे द्रोहरहित एवं अमर बनकर
ओषधियों के प्रति द्रवित होते हुए सारे संसार का ज्ञान कराते हैं. (३)
सास्माकेभिरेतरी न शूषैरग्निः ष्टवे दम आ जातवेदाः.
द्रुवन्नो वन्वन् क्रत्वा नार्वोसः पितेव जारयायि यज्ञैः.. (४)
हमारे यज्ञगृह में जातवेद अग्नि की स्तुति उसी प्रकार की जाती है, जिस प्रकार
यज्ञकर्त्ता उन्हें सुख देने वाली स्तुतियां बोलते हैं. यजमान अग्नि की सेवा करते हैं. अग्नि वृक्षों
को खाने वाले, वन का सहारा लेने वाले तथा बैल के समान शीघ्र आने वाले हैं. (४)
अध स्मास्य पनयन्ति भासो वृथा यत्तक्षदनुयाति पृथ्वीम्.
सद्यो यः स्पन्द्रो विषितो धवीयान्नृणो न तायुरति धन्वा राट्.. (५)
अग्नि जब बिना प्रयत्न के ही वनों को जलाते हुए वहां की धरती पर चलते हैं तो स्तोता
मर्त्यलोक में अग्नि की ज्वालाओं की स्तुति करते हैं. चोर के समान तेज और निर्बाधरूप में
चलने वाले अग्नि मरुभूमि में सुशोभित होते हैं. (५)
स त्वं नो अर्वन्निदाया विश्वेभिरग्ने अग्निभिरिधानः.
वेषि रायो वि यासि दुच्छुना मदेम शतहिमाः सुवीराः.. (६)
हे गमनशील अग्नि! तुम सभी प्रकार की अग्नियों के साथ प्रज्वलित होकर निंदा से
हमारी रक्षा करो व हमें धन देकर शत्रुओं का नाश करो. हम शोभन संतान को पाकर सौ वर्ष
तक प्रसन्न रहें. (६)
सूक्त—१३ देवता—अग्नि
त्वद्विश्वा सुभग सौभगान्यग्ने वि यन्ति वनिनो न वयाः.
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श्रुष्टी रयिर्वाजो वृत्रतूर्ये दिवो वृष्टिरीड्यो रीतिरपाम्.. (१)
हे शोभन धन वाले अग्नि! सभी उत्तम धन तुमसे उत्पन्न हुए हैं. जिस प्रकार वृक्षों से
शाखाएं उत्पन्न होती हैं, उसी प्रकार तुमसे पशुसमूह, युद्ध में शत्रुओं को जीतने वाली शक्ति
एवं आकाश से वर्षा शीघ्र उत्पन्न होती है. तुम सबके स्तुतियोग्य बनकर जल को उत्पन्न करते
हो. (१)
त्वं भगो न आ हि रत्नमिषे परिज्मेव क्षयसि दस्मवर्चाः.
अग्ने मित्रो न बृहत ऋतस्यासि क्षत्ता वामस्य देव भूरेः.. (२)
हे सेवा करने योग्य अग्नि! हमें रमणीय धन दो. हे दर्शनीय प्रकाश वाले अग्नि! तुम वायु
के समान सब जगह फैलो. अग्नि देव! तुम मित्र के समान विशाल यज्ञसाधनों एवं पर्याप्त धन
के दाता बनो. (२)
स सत्पतिः शवसा हन्ति वृत्रमग्ने विप्रो वि पणेर्भर्ति वाजम्.
यं त्वं प्रचेत ऋतजात राया सजोषा नप्त्रापां हिनोषि.. (३)
हे उत्तम ज्ञानसंपन्न व यज्ञ के निमित्त उत्पन्न अग्नि! तुम जल के पुत्र विद्युत् से मिलकर
जिस व्यक्ति को धन देना चाहते हो, वह सज्जनों का रक्षक व बुद्धिमान् होकर शक्ति द्वारा
शत्रुओं का नाश करता है तथा पणि लोगों की शक्ति छीन लेता है. (३)
यस्ते सूनो सहसो गीर्भिरुक्थैर्यज्ञैर्मर्तो निशितिं वेद्यानट्.
विश्वं स देव प्रति वारमग्ने धत्ते धान्यं१ पत्यते वस्वयैः.. (४)
हे बलपुत्र अग्नि देव! जो यजमान स्तुति वचनों, स्तोत्रों एवं यज्ञसाधनों द्वारा यज्ञवेदी में
तुम्हारा तीक्ष्ण प्रकाश पहुंचाता है, वह पर्याप्त अन्न धारण करता है तथा संपत्तियों को पाता
है. (४)
ता नृभ्य आ सौश्रवसा सुवीराग्ने सूनो सहसः पुष्यसे धाः.
कृणोषि यच्छवसा भूति पश्वो वयो वृकायारये जसुरये.. (५)
हे बलपुत्र अग्नि! हमारे पोषण के निमित्त तुम शत्रुओं से लाया हुआ शोभन अन्न हमें
संतान सहित दो. तुम पशुओं व दूधदहीरूप जो अन्न दानहीन असुरों से प्राप्त करते हो वह
अधिक मात्रा में हमें दो. (५)
वद्मा सूनो सहसो नो विहाया अग्ने तोकं तनयं वाजि नो दाः.
विश्वाभिर्गीर्भिरभि पूर्तिमश्यां मदेम शतहिमाः सुवीराः.. (६)
हे बलपुत्र एवं महान् अग्नि! तुम हमारे हितोपदेशक बनो तथा हमें अन्न के साथ-साथ
पुत्र-पौत्र दो. हम समस्त स्तुतियों द्वारा अपनी कामनाओं को प्राप्त करें तथा सौ वर्ष तक
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उत्तम संतान के साथ जिएं. (६)
सूक्त—१४ देवता—अग्नि
अग्ना यो मर्त्यो दुवो धियं जुजोष धीतिभिः.
भसन्नु ष प्र पूर्व्य इषं वुरीतावसे.. (१)
जो मनुष्य स्तुतियों के साथ अग्नि की यज्ञकर्म से सेवा करता है, वह अन्य लोगों की
अपेक्षा प्रतापी बनकर अपनी संतान की रक्षा के लिए शत्रुओं का धन प्राप्त करता है. (१)
अग्निरिद्धि प्रचेता अग्निर्वेधस्तम ऋषिः.
अग्निं होतारमीळते यज्ञेषु मनुषो विशः.. (२)
अग्नि ही उत्तम ज्ञानसंपन्न हैं, वे यज्ञकर्मों की रक्षा के कुशलतम कर्त्ता एवं सबके द्रष्टा
हैं. यजमानों के ऋत्विज् यज्ञों में अग्नि को देवों का बुलाने वाला बताकर स्तुति करते हैं. (२)
नाना ह्यग्नेऽवसे स्पर्धन्ते रायो अर्यः.
तूर्वन्तो दस्युमायवो व्रतैः सीक्षन्तो अव्रतम्.. (३)
हे अग्नि! शत्रुओं के धन तुम्हारे स्तोताओं की रक्षा के लिए एक-दूसरे से पहले जाने की
इच्छा करते हैं. शत्रुओं की हिंसा करते हुए तुम्हारे स्तोता यज्ञों द्वारा यज्ञहीनों को हराना चाहते
हैं. (३)
अग्निरप्सामृतीषहं वीरं ददाति सत्पतिम्.
यस्य त्रसन्ति शवसः सञ्चक्षि शत्रवो भिया.. (४)
अग्नि स्तोताओं को करने योग्य कर्मों को करने वाला, शत्रुओं का सामना करने वाला
तथा उत्तम कर्मों को पूर्ण करने वाला पुत्र देते हैं. उसे देखकर उसकी शक्ति से डरे हुए शत्रु
कांपने लगते हैं. (४)
अग्निर्हि विद्मना निदो देवो मर्तमुरुष्यति.
सहावा यस्यावृतो रयिर्वाजेष्ववृतः.. (५)
शक्तिशाली एवं ज्ञानसंपन्न अग्नि उस यजमान की निंदकों से रक्षा करते हैं, जिसका
हव्य यज्ञों में राक्षसों आदि से अछूता होता है एवं जो अन्य देवों के यजमानों से पृथक् होता
है. (५)
अच्छा नो मित्रमहो देव देवानग्ने वोचः सुमतिं रोदस्योः.
वीहि स्वस्तिं सुक्षितिं दिवो नॄन्द्धिषो अंहांसि दुरिता तरेम ता तरेम तवावसा तरेम.. (६)
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हे अनुकूल दीप्ति वाले एवं धरती-आकाश में वर्तमान अग्नि देव! तुम हमारी स्तुति देवों
को भली प्रकार बताओ एवं हम स्तोताओं को शोभनगृह के साथ सुख दो. हम शत्रुओं को
नष्ट करके पापों के पार जावें, तुम्हारी कृपा से हम शत्रु से छुटकारा पावें. (६)
सूक्त—१५ देवता—अग्नि
इमम् षु वो अतिथिमुषर्बुधं विश्वासां विशां पतिमृञ्जसे गिरा.
वेतीद्दिवो जनुषा कच्चिदा शुचिर्ज्योक्चिदत्ति गर्भो यदच्युतम्.. (१)
हे भरद्वाज! तुम प्रातःकाल जागने वाले, प्रजाओं के रक्षक, सदा गतिशील एवं स्वतः
पवित्र अग्नि को स्तुतियों द्वारा भली-भांति प्रसन्न करो. अग्नि सदा द्युलोक से यज्ञ में आते हैं
एवं दोषरहित हव्य को खाते हैं. (१)
मित्रं न यं सुधितं भृगवो दधुर्वनेष्वातावीड्यमूर्ध्वशोचिषम्.
स त्वं सुप्रीतो वीतहव्ये अद्भुत प्रशस्तिभिर्महयसे दिवेदिवे.. (२)
हे अरणिरूप काष्ठ में सुरक्षित, स्तुतियोग्य, ऊर्ध्वगामी ज्वालाओं वाले एवं विचित्र
अग्नि! भृगु ने तुम्हें मित्र के समान अपने घर में स्थापित किया. उत्तम स्तुतियों द्वारा प्रतिदिन
पूजा करने वाले भरद्वाज के प्रति तुम भली प्रकार प्रसन्न बनो. (२)
स त्वं दक्षस्यावृको वृधो भूर्यः परस्यान्तरस्य तरुषः.
रायः सूनो सहसो मर्त्येष्वा छर्दैर्यच्छ वीतहव्याय सप्रथो भरद्वाजाय सप्रथः.. (३)
हे बाधकरहित अग्नि! तुम यज्ञकर्त्ता यजमान को बढ़ाने वाले तथा दूरवर्ती एवं
समीपवर्ती शत्रु से रक्षा करने वाले हो. हे बलपुत्र अग्नि! तुम सर्वथा बढ़कर मनुष्यों में
भरद्वाज को धन एवं गृह दो. (३)
द्युतानं वो अतिथिं स्वर्णरम्ग्निं होतारं मनुषः स्वध्वरम्.
विप्रं न द्युक्षवचसं सुवृक्तिभिर्हव्यवाहमरतिं देवमृञ्जसे.. (४)
हे भरद्वाज! तुम हव्य वहन करने वाले, दीप्तिसंपन्न, अपने अतिथि, स्वर्ग के नेता, मनु
के यज्ञ में देवों को बुलाने वाले, शोभनयज्ञ वाले, मेधावी, तेजपूर्णवाणी वाले एवं सबके स्वामी
अग्नि देव को उत्तम स्तुतियों से प्रसन्न करो. (४)
पावकया यश्चितयन्त्या कृपा क्षामन्नुरुच उषसो न भानुना.
तूर्वन्न यामन्नेतशस्य नू रण आ यो घृणे न ततृषाणो अजरः.. (५)
जो अग्नि उषा के प्रकाश के समान पावक एवं ज्ञान कराने वाली दीप्ति से धरती पर
विराजमान होते हैं एवं सूर्य के विरुद्ध संग्राम में एतश ऋषि की रक्षा जिन्होंने शत्रुहिंसक वीर
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के समान की थी, हे भरद्वाज! ऐसे सर्वभक्षक तथा सदायूवा अग्नि को तुम प्रसन्न करो. (५)
अग्निमग्निं वः समिधा दुवस्यत प्रियंप्रियं वो अतिथिं गृणीषणि.
उप वो गीर्भिरमृतं विवासत देवो देवेषु वनते हि वार्यं देवो देवेषु वनते हि नो दुवः..
(६)
हे स्तोताओ! तुम अतिशय तेजस्वी, अतिथि के समान पूज्य एवं स्तुतियोग्य अग्नि का
अग्नि के ही समान समिधाओं से स्वागत करो तथा मरणरहित अग्नि देव के समीप जाकर
सेवा करो. वे समिधाएं एवं हमारी सेवा स्वीकार कर लेते हैं. (६)
समिद्धमग्निं समिधा गिरा गृणे शुचिं पावकं पुरो अध्वरे ध्रुवम्.
विप्रं होतारं पुरुवारमद्भुहं कविं सुम्नैरीमहे जातवेदसम्.. (७)
हम समिधाओं द्वारा प्रदीप्त अग्नि की स्तुतियों द्वारा प्रशंसा करते हैं, सबको पवित्र
करने वाले एवं ध्रुव अग्नि को हम अपने यज्ञ में धारण करते हैं तथा मेधावी देवों को बुलाने
वाले, अनेक जनों द्वारा वरण करने योग्य, सबके अनुकूल क्रांतदर्शी एवं सब प्राणियों को
जानने वाले अग्नि की सुखकर स्तुतियों द्वारा सेवा करते हैं. (७)
त्वां दूतमग्ने अमृतं युगेयुगे हव्यवाहं दधिरे पायुमीड्यम्.
देवासश्च मर्तासश्च जागृविं विभुं विशपतिं नमसा नि षेदिरे.. (८)
हे मरणरहित, प्रत्येक काल में हव्यवहन करने वाले, पालक एवं स्तुतियोग्य अग्नि! देवों
एवं मानवों ने तुम्हें दूत बनाया था. उन्होंने जागरणशील व्याप्त एवं प्रजापालक अग्नि को
नमस्कार द्वारा यज्ञ में स्थापित किया था. (८)
विभूषन्नग्न उभयाँ अनु व्रता दूतो देवानां रजसी समीयसे.
यत्ते धीतिं सुमतिमावृणीमहेऽध स्मा नस्त्रिवरूथः शिवो भव.. (९)
हे अग्नि! तुम देवों और मानवों को अलंकृत करते हुए एवं यज्ञकर्मों में देवों के दूत बनते
हुए धरती-आकाश में विचरण करते हो. हम यज्ञकर्मों एवं शोभन स्तुतियों से तुम्हारी सेवा
करते हैं, इसलिए तुम तीनों लोकों में रहकर हमें सुख दो. (९)
तं सुप्रतीकं सुदृशं स्वञ्चमविद्वांसो विदुष्टरं सपेम.
स यक्षद्विश्वा वयुनानि विद्वान्प्र हव्यमग्निरमृतेषु वोचत्.. (१०)
हम अल्प बुद्धि वाले लोग तुझ अतिशय विद्वान्, शोभन अंग वाले, देखने में सुंदर एवं
उत्तम गति वाले अग्नि की सेवा करते हैं. सबको जानने वाले अग्नि अमर देवों को हमारा हव्य
बतावें एवं देवों का यजन करें. (१०)
तमग्ने पास्युत तं पिपर्षि यस्त आनट् कवये शूर धीतिम्.
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यज्ञस्य वा निशितिं वोदितिं वा तमित्पृणक्षि शवसोत राया.. (११)
हे शूर एवं क्रांतदर्शी अग्नि! तुम उस व्यक्ति की रक्षा करते हो एवं अभिलाषाएं पूर्ण
करते हो, जो तुम्हारी स्तुति करता है. जो यज्ञसाधन हव्य का संस्कार करता है अथवा उसे
उत्तम बनाता है, तुम उस व्यक्ति को बल संपन्न करके धनों से पूर्ण करते हो. (११)
त्वमग्ने वनुष्यतो नि पाहि त्वमु नः सहसावन्नवद्यात्.
सं त्वा ध्वस्मन्वदभ्येतु पाथः सं रयिः स्पृहयाय्यः सहस्री.. (१२)
हे अग्नि! शत्रु से हमारी रक्षा करो. हे शक्तिशाली अग्नि! पाप से हमारी रक्षा करो.
हमारा दोषरहित हव्यान्र तुम्हारे समीप पहुंचे एवं तुम्हारा दिया हुआ हजारों प्रकार का धन हमें
मिले. (१२)
अग्निहौता गृहपतिः स राजा विश्वा वेद जनिमा जातवेदाः.
देवानामृत यौ मर्त्यानां यजिष्ठः स प्र यजतामृतावा.. (१३)
देवों को बुलाने वाले, गृह के स्वामी, दीप्तिशाली एवं सबको जानने वाले अग्नि सभी
जन्मधारियों को जानते हैं. देवों एवं मानवों में अतिशय यज्ञकर्त्ता एवं सत्यशील अग्नि
उत्तमरूप से देवों का यजन करें. (१३)
अग्ने यदद्य विशो अध्वरस्य होत: पावकशोचे वेष्ट्वं हि यज्वा.
ऋता यजासि महिना वि यद्भूईर्व्या वह यविष्ठ या ते अद्य.. (१४)
हे यज्ञ संपन्न करने वाले एवं पवित्रप्रकाश वाले अग्नि! इस समय तुम यजमान के
कर्त्तव्य की कामना करो. तुम देवों के यज्ञकर्त्ता हो, इसलिए देवयजन करो. हे अतिशय युवा
अग्नि! तुम अपने महत्त्व से सर्वव्यापक हुए हो. आज तुम्हें जो भी हव्य दिया जावे, उसे वहन
करो. (१४)
अभि प्रयांसि सुधितानि हि ख्यो नि त्वा दधीत रोदसी यजध्यै.
अवा नो मघवन्वाजसातावग्ने विश्वानि दुरिता तरेम ता तरेम तवावसा तरेम.. (१५)
हे अग्नि! वेदी पर भली-भांति रखे हविरूप अन्नों को देखो. धरती-आकाश में यज्ञ करने
के निमित्त तुम्हारी स्थापना की गई है. हे धनस्वामी अग्नि! अन्न निमित्तक युद्ध में हमारी रक्षा
करो. तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होकर हम सभी पापों से छूट जावें. (१५)
अग्ने विश्वेभिः स्वनीक देवैरूर्णावन्तं प्रथमः सीद योनिम्.
कुलायिनं घृतवन्तं सवित्रे यज्ञं नय यजमानाय साधु.. (१६)
हे शोभन ज्वालाओं वाले एवं देवप्रमुख अग्नि! कंबलों से युक्त घोंसले के समान एवं
घृतसंपन्न वेदी पर सभी देवों के साथ बैठो तथा यज्ञकर्त्ता यजमान के कल्याण के निमित्त
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उसका यज्ञ देवों के समीप ले जाओ. (१६)
इममु त्यमथर्ववदग्निं मन्थन्ति वेधसः.
यमङ् कूरयन्तमानयन्नमूरं श्याव्याभ्यः.. (१७)
ऋत्विज् अथवा ऋषि के समान इस अग्नि का मंथन करते हैं एवं देवों के मध्य से
निकलकर इधर-उधर भागते हुए बुद्धिसंपन्न अग्नि को अंधकार के मध्य से लाते हैं. (१७)
जनिष्वा देववीतये सर्वताता स्वस्तये.
आ देवान् वक्ष्यमृताँ ऋतावृधो यज्ञं देवेषु पिस्पृशः.. (१८)
हे अग्नि! तुम देवों की कामना करने वाले यजमान के कल्याण के निमित्त यज्ञ में उत्पन्न
होओ, यज्ञ बढ़ाने वाले देवों का यजन करो एवं हमारे यज्ञ को देवों के पास ले जाओ. (१८)
वयमु त्वा गृहपते जनानामग्ने अकर्म समिध बृहन्तम्.
अस्थूरि नो गार्हपत्यानि सन्तु तिग्मेन नस्तेजसा सं शिशाधि.. (१९)
हे यज्ञपालनकर्त्ता अग्नि! मनुष्यों में हम ही तुमको समिधाओं द्वारा बढ़ाते हैं. हमारे
गार्हपत्य-यज्ञ, पुत्र, पशुधन आदि से संपन्न हों. तुम हमें तीखे तेज से मिलाओ. (१९)
सूक्त—१६ देवता—अग्नि
त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषां हितः. देवेभिर्मानुषे जने.. (१)
हे अग्नि! तुम समस्त यज्ञों को पूर्ण करने वाले हो. देवों ने मानवी प्रजाओं में तुम्हें होता
बनाया है. (१)
स नो मन्द्राभिरध्वरे जिह्वाभिर्यजा महः.
आ देवान्वक्षि यक्षि च.. (२)
हे अग्नि! तुम प्रसन्नता देने वाली ज्वालाओं द्वारा हमारे यज्ञ में देवों का यजन करो. तुम
देवों को यहां लाओ एवं उन्हें हव्य दो. (२)
वेत्था हि वेधो अध्वनः पथश्च देवाञ्जसा.
अग्ने यज्ञेषु सुक्रतो.. (३)
हे यज्ञविधाता एवं शोभनयज्ञकर्मयुक्त अग्नि! तुम यज्ञ में देवों के छोटे एवं बड़े मार्गों को
शीघ्रता से जानते हो. (३)
त्वामीळे अध द्विता भरतो वाजिभिः शुनम्.
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ईजे यज्ञेषु यज्ञियम्.. (४)
हे अग्नि! भरत ने सुख पाने के लिए ऋत्विजों के साथ मिलकर तुम्हारी स्तुति की थी
एवं तुझ यज्ञयोग्य अग्नि का हव्यान्नों द्वारा यजन किया था. (४)
त्वमिमा वार्या पुरु दिवोदासाय सुन्वते.
भरद्वाजाय दाशुषे.. (५)
हे अग्नि! तुमने सोमरस निचोड़ने वाले दिवोदास को जिस प्रकार उत्तम धन अधिक
मात्रा में दिए थे, उसी प्रकार हव्य देने वाले मुझ भरद्वाज को दो. (५)
त्वं दूतो अमर्त्य आ वहा दैव्यं जनम्. शृण्वन्विप्रस्य सुष्टुतिम्.. (६)
हे मरणरहित एवं देवदूत अग्नि! तुम मेधावी भरद्वाज की शोभन स्तुति को सुनते हुए
इस यज्ञ में देवों को लाओ. (६)
त्वामग्ने स्वाध्यो३ मर्तासो देववीतये. यज्ञेषु देवमीळते.. (७)
हे अग्नि देव! शोभन चिंतन वाले मनुष्य देवों को प्रसन्न करने के हेतु यज्ञों में तुम्हारी
स्तुति करते हैं. (७)
तव प्र यक्षि सन्दृशमुत क्रतुं सुदानव:. विश्वे जुषन्त कामिन:.. (८)
हे अग्नि! हम सब दानशील यजमान तुम्हारे दर्शनीय तेज की पूजा तथा सेवा करते हैं.
(८)
त्वं होता मनुर्हितो वह्निरासा विदुष्टर:. अग्ने यक्षि दिवो विश:.. (९)
हे ज्वालाओं द्वारा हव्य वहन करने वाले एवं उत्तम विद्वान् अग्नि! मनु ने तुम्हें यज्ञ का
होता नियुक्त किया है. तुम देवों का यजन करो. (९)
अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये. नि होता सत्सि बर्हिषि.. (१०)
हे अग्नि! देवों को हव्य देने के लिए तुम्हारी स्तुति की जा रही है. तुम हव्य भक्षण के
लिए आओ एवं बिछे हुए कुशों पर बैठो. (१०)
तं त्वा समिद्भीरङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि. बृहच्छोचा यविष्ठ्य.. (११)
हे अगांररूप अग्नि! हम समिधाओं एवं घृत द्वारा तुम्हें बढ़ाते हैं. हे अतिशय युवा
अग्नि! तुम अधिक दीप्त बनो. (११)
स नः पृथु श्रवाय्यमच्छा देव विवाससि. बृहदग्ने सुवीर्यम्.. (१२)
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हे अग्नि देव! तुम हमें विस्तीर्ण प्रशंसनीय महान् शोभन व शक्ति से युक्त धन दो. (१२)
त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत.
मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः.. (१३)
हे अग्नि! शीश के समान सारे जगत् को धारण करने वाले कमल पत्र पर अथर्वा ऋषि
ने तुम्हारा मंथन किया था. (१३)
तमु त्वा दध्यङ्ङृषिः पुत्र ईधे अथर्वणः.
वृत्रहणं पुरन्दरम्.. (१४)
हे शत्रुहंता एवं असुर-नगरनाशक अग्नि! अथर्वा ऋषि के पुत्र दध्यङ् ने तुम्हें प्रज्वलित
किया था. (१४)
तमु त्वा पाथ्यो वृषा समीधे दस्युहन्तमम्.
धनञ्जयं रणेरणे.. (१५)
हे शत्रुहंता एवं प्रत्येक युद्ध में धन जीतने वाले अग्नि! पाथ्यवृषा नामक ऋषि ने तुम्हें
भली प्रकार प्रज्वलित किया था. (१५)
एह्यू षु ब्रवाणि तेऽग्न इत्थेतरा गिरः.
एभिर्वर्धास इन्दुभिः.. (१६)
हे अग्नि! यहां आओ. हम तुम्हारे निमित्त उत्तम स्तुतियां बोलते हैं, उन्हें एवं इसी प्रकार
की अन्य बातों को सुनो. तुम इस सोमरस द्वारा बढ़ो. (१६)
यत्र क्व च ते मनो दक्षं दधस उत्तरम्.
तत्रा सदः कृणवसे.. (१७)
हे अग्नि! जिस किसी यजमान के प्रति तुम्हारा मन अनुग्रहपूर्ण है, उसे तुम शक्तिदायक
उत्तम अन्न देते हो एवं वहीं निवास करते हो. (१७)
नहि ते पूर्तमक्षिपद्भुवन्नेमानां वसो.
अथा दुवो वनवसे.. (१८)
हे अग्नि! तुम्हारा तेज हमारी दृष्टि को नष्ट करने वाला न हो. तुम थोड़े यजमानों को ही
गृह देते हो. तुम हमारी सेवा स्वीकार करो. (१८)
आग्निरगामि भारतो वृत्रहा पुरुचेतनः.
दिवोदासस्य सत्पतिः.. (१९)

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हम हव्य के स्वामी, दिवोदास राजा के शत्रुओं का नाश करने वाले अधिक ज्ञान वाले
एवं यजमानों के पालक अग्नि से स्तुतियों के सहित मिलते हैं. (१९)
स हि विश्वाति पार्थिवा रयिं दाशन्महित्वना.
वन्वन्नवातो अस्तृतः.. (२०)
काष्ठों को जलाने वाले, शत्रुओं के आक्रमण से रहित एवं अपराजित अग्नि अपनी
महिमा से सभी सांसारिक संपत्तियां हमें दें. (२०)
स प्रत्नवन्नवीयसाग्ने द्युम्नेन संयता.
बृहत्ततन्थ भानुना.. (२१)
हे अग्नि! तुम प्राचीन के समान ही नवीन तेज से युक्त होकर अपनी किरणों द्वारा
आकाश का विस्तार करते हो. (२१)
प्र वः सखायो अग्नये स्तोमं यज्ञं च धृष्णुया.
अर्च गाय च वेधसे.. (२२)
हे मित्र ऋत्विजो! तुम यज्ञविधाता एवं शत्रुविनाशक अग्नि के प्रति यह स्तोत्र गाओ तथा
हव्य दो. (२२)
स हि यो मानुषा युगा सीदद्धोता कविक्रतुः.
दूतश्च हव्यवाहनः.. (२३)
देवों को बुलाने वाले, परम मेधावी, मानवों के यज्ञों के समय देवदूत एवं हव्य वहन
करने वाले अग्नि हमारे यज्ञ में बिछाये हुए कुशों पर बैठें. (२३)
ता राजाना शुचिव्रतादित्यान्मारुतं गणम्.
वसो यक्षीह रोदसी.. (२४)
हे निवास स्थान देने वाले अग्नि! तुम इस यज्ञ में दीप्तिसंपन्न एवं पवित्रकर्मा मित्र,
वरुण, आदित्य मरुद्गण तथा धरती-आकाश का यजन करो. (२४)
वस्वी ते अग्ने सन्दृष्टिरिषयते मत्र्याय.
ऊर्जो नपादमृतस्य.. (२५)
हे बलपुत्र एवं मरणरहित अग्नि! तुम्हारा प्रशंसायोग्य तेज यजमान को अन्न देता है.
(२५)
क्रत्वा दा अस्तु श्रेष्ठोऽद्य त्वा वन्वन्तसुरेक्णाः.
मर्त आनाश सुवृक्तिम्.. (२६)
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हे अग्नि! यज्ञकर्म द्वारा तुम्हारी सेवा करने वाला यजमान श्रेष्ठ एवं शोभन धन वाला हो
तथा सदा तुम्हारी स्तुति करता रहे. (२६)
ते ते अग्ने त्वोता इषयन्तो विश्वायुः.
तरन्तो अर्यो अरातीर्वन्वन्तो अर्यो अराती:.. (२७)
हे अग्नि! तुम्हारे स्तोता तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर एवं अन्न की इच्छा करते हुए समस्त
अन्नों को प्राप्त करें, आक्रमणकारी शत्रुओं को हरावें एवं उन्हें मार डालें. (२७)
अग्निस्तिग्मेन शोचिषा यासद्विश्वं. न्य१त्रिणम्.
अग्निर्नो वनते रयिम्.. (२८)
अग्नि अपने तीखे तेज द्वारा समस्त राक्षसों का विनाश करें एवं हमें धन दें. (२८)
सुवीरं रयिमा भर जातवेदो विचर्षणे.
जहि रक्षांसि सुक्रतो.. (२९)
हे जातवेद एवं विशेषद्रष्टा अग्नि! तुम इसे शोभन पुत्रादि से युक्त धन दो. हे शोभन कर्म
वाले! राक्षसों का नाश करो. (२९)
त्वं नः पाह्यंहसो जातवेदो अघायतः.
रक्षा णो ब्रह्मणस्कवे.. (३०)
हे जातवेद अग्नि! तुम पाप से हमारी रक्षा करो. हे मंत्रों के रचयिता अग्नि! अहित
चाहने वालों से हमारी रक्षा करो. (३०)
यो नो अग्ने दुरेव आ मर्त्तो वधाय दाशति.
तस्मान्नः पाह्यंहसः.. (३१)
हे अग्नि! बुरे अभिप्राय वाला जो व्यक्ति हमें शस्त्र दिखाता है, उससे हमारी रक्षा करो
एवं पाप से हमारी रक्षा करो. (३१)
त्वं तं देव जिह्वया परि बाधस्व दुष्कृतम्.
मर्तो यो नो जिघांसति.. (३२)
हे अग्नि देव! उस दुष्ट व्यक्ति को तुम अपनी ज्वालाओं द्वारा भली प्रकार जलाओ, जो
हमारी हिंसा करना चाहता है. (३२)
भरद्वाजाय सप्रथः शर्म यच्छ सहन्त्य.
अग्ने वरेण्यं वसु.. (३३)
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हे शत्रुओं को पराजित करने वाले अग्नि! मुझ भरद्वाज को तुम विस्तृत सुख एवं चाहने
योग्य धन दो. (३३)
अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद्द्रविणस्युर्विपन्यया.
समिद्धः शुक्र आहुतः.. (३४)
प्रज्वलित शुक्लवर्ण एवं हव्य द्वारा बुलाए गए अग्नि स्तुतियां सुनकर स्तोताओं की
कामना करते हुए शत्रुओं को नष्ट करें. (३४)
गर्भे मातुः पितुष्पिता विविद्युतानो अक्षरे.
सीदन्नृतस्य योनिमा.. (३५)
पृथ्वीरूपी माता के गर्भ के समान, अविनाशी वेदी पर प्रज्वलित तथा हव्य द्वारा
द्युलोकरूपी पिता का पालन करने वाले अग्नि यज्ञवेदी पर बैठकर शत्रुओं का विनाश करें.
(३५)
ब्रह्म प्रजावदा भर जातवेदो विचर्षणे.
अग्ने यद्दीदयद्दिवि.. (३६)
हे जातवेद एवं विशेषद्रष्टा अग्नि! जो अन्न देवों के मध्य स्वर्ग में दीप्त होता है, उसे
संतान के साथ हमें दो. (३६)
उप त्वा रण्वसन्दृशं प्रयस्वन्तः सहस्कृत.
अग्ने ससृज्महे गिरः.. (३७)
हे बलपुत्र एवं शोभनदर्शन वाले अग्नि! इव्यान्न धारण करने वाले हम तुम्हारे लिए
स्तुतियां बोलते हैं. (३७)
उपच्छायामिव घृणेरगन्म शर्म ते वयम्.
अग्ने हिरण्यऽसन्दृशः.. (३८)
हे स्वर्ण के समान प्रकाशयुक्त तेज वाले एवं दीप्तिसंपन्न अग्नि! इम छाया के समान
तुम्हारी शरण में आते हैं. (३८)
य उग्र इव शर्यहा तिग्मशृङ्गो न वंसगः.
अग्ने पुरो रुरोजिथ.. (३९)
अग्नि शक्तिशाली धनुर्धारी के समान बाणों से शत्रुओं को मारने वाले एवं तेज सींगों
वाले बैल के समान हैं. हे अग्नि! तुमने राक्षसों के नगरों को नष्ट किया है. (३९)
आ यं हस्ते न खादिनं शिशुं जातं न बिभ्रति.
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विशामग्निं स्वध्वरम्.. (४०)
हे ऋत्विजो! सुंदर यज्ञों को पूर्ण करने वाले अग्नि की सेवा करो. अध्वर्यु अग्नि को इस
प्रकार हाथ से पकड़ते हैं, जैसे कोई बाघ आदि के बच्चे को पकड़ता है. (४०)
प्र देवं देववीतये भरता वसुवित्तमम्. आ स्वे योनौ नि षीदतु.. (४१)
हे अध्वर्युगण! तुम देवों को खिलाने के निमित्त द्योतमान एवं धनों को जानने वाले अग्नि
में हव्य डालो. अग्नि अपनी वेदी पर बैठें. (४१)
आ जातं जातवेदसि प्रियं शिशीतातिथिम्. स्योन आ गृहपतिम्.. (४२)
हे अध्वर्युगण! उत्पन्न हुए, अतिथि के समान पूज्य एवं गृहस्वामी अग्नि को जातवेद
नामक सुखकर अग्नि में स्थित करो. (४२)
अग्ने युक्ष्वा हि ये तवाश्वासो देव साधवः. अरं वहन्ति मन्यवे.. (४३)
हे अग्नि देव! अपने उन सुशील घोड़ों को रथ में जोड़ो, जो तुम्हें यज्ञों की ओर ठीक से
ले जाते हैं. (४३)
अच्छा नो याह्या वहाभि प्रयांसि वीतये. आ देवान्त्सोमपीतये.. (४४)
हे अग्नि! तुम हमारे सामने आओ. तुम हव्यभक्षण एवं सोमपान करने के लिए देवों को
बुलाओ. (४४)
उदग्ने भारत द्युमदजस्रेण दविद्युतत्. शोचा वि भाह्यजर.. (४५)
हे हव्यवहन करने वाले अग्नि! तुम अपने तेज को बढ़ाते हुए प्रज्वलित होओ. हे युवा
एवं परम दीप्तिसंपन्न अग्नि! तुम निर्बाध तेज द्वारा प्रकाशित बनो. (४५)
वीती यो देवं मर्तो दुवस्येदग्निमीळीताध्वरे हविष्मान्.
होतारं सत्ययजं रोदस्योरुत्तानहस्तो नमसा विवासेत्.. (४६)
हव्यवाहक यजमान हव्यरूप शोभन अन्न द्वारा किसी भी देवता की सेवा करता है, उस
यज्ञ में अग्नि बुलाए जाते हैं. यजमान हाथ जोड़कर एवं नमस्कार करता हुआ धरती-आकाश
में वर्तमान देवों को बुलाने वाले हव्य द्वारा यजनयोग्य अग्नि की सेवा करें. (४६)
आ ते अग्न ऋचा हविर्हृदा तष्टं भरामसि. ते ते भवन्तूक्षण ऋषभासो वशा उत..
(४७)
हे अग्नि! हम हृदय द्वारा सुंदर बनाई गई ऋचाओं को हव्य के समान तुम्हें देते हैं. हमारा
दिया हुआ हव्य तुम्हारे लिए गाय एवं बैल के रूप में परिवर्तित हो. (४७)
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सूक्त—१७ देवता—इंद्र

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अग्निं देवासो अग्रियमिन्धते वृत्रहन्तमम्.
येना वसून्याभृता तृळ्हा रक्षांसि वाजिना.. (४८)
देवगण प्रमुख, वृत्र को भली प्रकार मारने वाले एवं राक्षसों से धन छीनने वाले अग्नि
को प्रज्वलित करते हैं. (४८)
सूक्त—१७ देवता—इंद्र
पिबा सोममभि यमुग्र तर्द ऊर्वं गव्यं महि गृणान इन्द्र.
वि यो धृष्णो वधिषो वज्रहस्त विश्वा वृत्रममित्रिया शवोभिः.. (१)
हे उग्र इंद्र! तुमने अंगिरागोत्रीय ऋषियों की स्तुति सुनकर जिस सोमरस के उद्देश्य से
पणियों द्वारा चुराई गई गायों को खोजा था, उस सोमरस को पिओ. हे हाथ में वज्रधारण
करने वाले एवं शत्रुनाशक इंद्र! तुमने अपनी शक्तियों द्वारा सभी शत्रुओं को मारा था. (१)
स ईं पाहि य ऋजीषी तरुत्रो यः शिप्रीवान् वृषभे यो मतीनाम्.
यो गोत्रभिद्वज्रभृद्यो हरिष्ठाः स इन्द्र चित्राँ अभि तृन्धि वाजान्.. (२)
हे सोमलता का फोक धारण करने वाले इंद्र! तुम शत्रुओं से रक्षा करने वाले, सुंदर ठोड़ी
वाले एवं स्तोताओं की इच्छा पूरी करने वाले हो. हे इंद्र! तुम पर्वतों के भेदक, वज्रधारी एवं
घोड़ों को रथ में जोड़ने वाले हो. तुम अपना विचित्र अन्न हम पर प्रकट करो. (२)
एवा पाहि प्रत्नथा मन्दतु त्वा श्रुधि ब्रह्म वावृधस्वोत गीर्भिः.
आविः सूर्य कृणुहि पीपिहीषो जहि शत्रूँरभि गा इन्द्र तृन्धि.. (३)
हे इंद्र! प्राचीन काल के समान ही हमारा सोम पिओ. सोम तुम्हें प्रसन्न करें तुम हमारी
स्तुतियों को सुनकर बढ़ो. तुम सूर्य को प्रकट करो. हमें अन्न प्राप्त कराओ, शत्रुओं को नष्ट
करो एवं पणियों द्वारा चुराई गई गाएं खोजो. (३)
ते त्वा मदा बृहदिन्द्र स्वधाव इमे पीता उक्ष्यन्त द्युमन्तम्.
महामनूनं तवसं विभूतिं मत्सरासो जहृषन्त प्रसाहम्.. (४)
हे अन्न के स्वामी इंद्र! पिया हुआ सोमरस तुझ तेजस्वी को बहुत प्रसन्न करे एवं सींच दे.
तुम महान् सर्वगुणसंपन्न विभूतियुक्त एवं शत्रुपराजयकारी हो. (४)
येभिः सूर्यमुषसं मन्दसानोऽवासयोऽप दृढ़हानि दर्दृत्.
महामद्रिं परि गा इन्द्र सन्तं नुत्था अच्युतं सदसः परि स्वात्.. (५)
हे इंद्र! जिस सोम से प्रसन्न होकर तुमने गाढ़े अंधकार को नष्ट करते हुए सूर्य एवं उषा
को अपने-अपने स्थान पर स्थापित किया तथा उस पर्वत के टुकड़े कर दिए जो पणियों द्वारा
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चुराई हुई गाएं छिपाए हुए था तथा अपनी शक्ति से स्थिर था. (५)
तव क्रत्वा तव तद्दंसनाभिरामासु पक्वं शच्या नि दीथः.
और्णोर्दुर उसियाभ्यो वि दृळ्होदूर्वाद्विगा असृजो अङ्गिरस्वान्.. (६)
हे इंद्र! तुमने अपने कार्यों, बुद्धि और सामर्थ्य द्वारा कमजोर गायों को दुधारू बनाया है,
गायों के बाहर जाने के लिए पर्वत में द्वार बनाए हैं एवं अंगिरागोत्रीय ऋषियों से मिलकर उन्हें
घेरे से स्वतंत्र किया है. (६)
पप्रथ क्षां महि दंसो व्यु१र्वीमुप द्यांमृष्वो बृहदिन्द्र स्तभायः.
अधारयो रोदसी देवपुत्रे प्रत्ने मातरा यह्वी ऋतस्य.. (७)
हे महान् इंद्र! तुमने अपने महान् कर्म द्वारा धरती को विशेष रूप से पूर्ण बनाया है,
विस्तृत आकाश को स्थिर किया है एवं देवों के माता-पितारूप धरती-आकाश को धारण
किया है. धरती-आकाश अति प्राचीन एवं उदक के जन्मदाता हैं. (७)
अध त्वा विश्वे पुर इन्द्र देवा एकं तवसं दधिरे भराय.
अदेवो यदभ्यौहिष्ट देवान्त्स्वर्षार्ता वृणत इन्द्रमत्र.. (८)
जब वृत्र असुर ने संग्राम के लिए देवों को ललकारा तो उन्होंने तुम्हें ही अपने आगे
चलने वाला बनाया. हे बलवान् इंद्र! मरुतों के युद्ध में भी तुम्हें वरण किया गया था. (८)
अध द्यौश्चित्ते अप सा नु वज्राद्द्वितानमद्विद्यसा स्वस्य मन्योः.
अहिं यदिन्द्रो अभ्योहसानं नि चिद्विश्वायुः शयथे जघान.. (९)
हे अधिक अन्न के स्वामी इंद्र! जब तुमने आक्रमणकारी वृत्र को धरती पर सोने के लिए
मार डाला था, तब तुम्हारे क्रोध एवं वज्र से आकाश भी कांप गया था (९)
अध त्वष्टा ते मह उग्र वज्रं सहस्रभृष्टिं ववृत्तच्छताश्रिम्.
निकाममरमणसं येन नवन्तमहिं सं पिणग्ऋजीषिन्.. (१०)
हे उग्र इंद्र! त्वष्टा ने तुम्हारे लिए हजार धार एवं सौ टुकड़ों वाला वज्र बनाया था. हे
सोमलता का नीरस अंश ग्रहण करने वाले इंद्र! तुमने उस वज्र द्वारा निश्चित अभिलाषा वाले
शत्रुओं से भिड़ने को उतावले एवं गर्जन करते हुए वृत्र को पीस डाला था. (१०)
वर्धान्यं विश्वे मरुतः सजोषाः पचच्छतं महिषाँ इन्द्र तुभ्यम्.
पूषा विष्णुस्त्रीणि सरांसि धावन्वृत्रहणं मदिरमंशुमस्मै.. (११)
हे इंद्र! परस्पर समान प्रीति वाले मरुद्गण तुम्हें स्तोत्रों द्वारा बढ़ाते हैं. तुम्हारे लिए पूषा
तथा विष्णु ने सौ भैंसे पकाए हैं तथा तीन पात्रों को नशीले एवं शत्रुनाशक सोम से भरा है.
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(११)
आ क्षोदो महि वृतं नदीनां परिष्ठितमसृज ऊर्मिमपाम्.
तासामनु प्रवत इन्द्र पन्थां प्रार्दयो नीचीरपसः समुद्रम्.. (१२)
हे इंद्र! तुमने वृत्र द्वारा रोकी हुई सब ओर स्थित नदियों के जल को बंधनमुक्त किया था
एवं जलसमूह की उत्पत्ति की थी. तुमने नदियों के मार्ग को नीचा बनाया है तथा उनके जल
को सागर में पहुंचाया है. (१२)
एवा ता विश्वा चकृवांसमिन्द्रं महामुग्रमजुर्यं सहोदाम्.
सुवीरं त्वा स्वायुधं सुवज्रमा ब्रह्म नव्यमवसे ववृत्यात्.. (१३)
हमारी नवीन स्तुतियां इस प्रकार सभी काम करने वाले, महान्, उग्र, नित्ययुवा,
शक्तिदाता, शोभन वीरों वाले, शोभन वज्रधारी, उत्तम आयुधों के स्वामी इंद्र को रक्षा के लिए
प्रेरित करें. (१३)
स नो वाजाय श्रवस इषे च राये धेहि द्युमत इन्द्र विप्रान्.
भरद्वाजे नृवत इन्द्र सूरीन्दिवि च स्मैधि पार्ये न इन्द्र.. (१४)
हे इंद्र! तुम शक्तिशाली एवं बुद्धिमान् हम लोगों को बल, शक्ति, अन्न एवं धन प्रदान
करो. हम भरद्वाजगोत्रीय ऋषियों को सेवकों तथा स्तुति करने वाले पुत्र-पौत्रों से युक्त करो
एवं भविष्य में हमारी रक्षा करो. (१४)
अया वाजं देवहितं सनेम मदेम शतहिमाः सुवीराः.. (१५)
इस स्तुति द्वारा हम इंद्र द्वारा दिया हुआ अन्न प्राप्त करें एवं शोभन संतान वाले होकर
सौ वर्ष तक प्रसन्न हों. (१५)
सूक्त—१८ देवता—इंद्र
तमु ष्टुहि यो अभिभूत्योजा वन्वन्नवातः पुरुहूत इन्द्रः.
अषाळ्हमुग्रं सहमानमाभिर्गीर्भिर्वर्ध वृषभं चर्षणीनाम्.. (१)
हे भरद्वाज ऋषि! उस इंद्र की स्तुति करो जो शत्रुओं को पराजित करने वाले, तेज से
युक्त, शत्रुहिंसक, अपराजित एवं बहुतों द्वारा बुलाए गए हैं. तुम इन स्तुतिवचनों द्वारा
अपराजित, ओजस्वी, शत्रुनाशक एवं प्रजाओं की इच्छा पूर्ण करने वाले इंद्र को बढ़ाओ. (१)
स युध्मः सत्वा खजकृत्समद्वा तुविम्रक्षो नदनुमाँ ऋजीषी.
बृहद्रेणुश्च्यवनो मानुषीणामेकः कृष्टीनामभवत्सहावा.. (२)
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इंद्र! योद्धा, दाता, धूल उड़ाने वाले, यजमानों के साथ प्रसन्न, वर्षा द्वारा बहुतों को प्रसन्न
करने वाले, गर्जनयुक्त, तीनों सवनों में सोम पीने वाले, युद्धकर्त्ता प्रमुख एवं मनु की सभी
प्रजाओं के रक्षक हैं. (२)
त्वं ह नु त्यददमायो दस्यूर्रैकः कृष्टीरवनोरायर्याय.
अस्ति स्विन्नु वीर्यं१ तत्त इन्द्र न स्विदस्तितदृतुथा वि वोचः.. (३)
हे प्रसिद्ध इंद्र! तुम यज्ञकर्मरहित लोगों को शीघ्र वश में करो. एकमात्र तुम्हीं ने
यज्ञकर्त्ताओं को पुत्र, वासादि दिए हैं. तुम में वह शक्ति अब है या नहीं. समय-समय पर तुम
शक्ति को प्रकट करो. (३)
सदिद्धि ते तुविजातस्य मन्ये सहः सहिष तुरतस्तुरस्य.
उग्रमुग्रस्य तवसस्तवीयोऽरध्रस्य रध्रतुरो बभूव.. (४)
हे शक्तिशाली इंद्र! बहुत से यज्ञों में प्रकट होने वाले एवं हमारे शत्रुओं की हिंसा करने
वाले तुम में अधिक बल है, ऐसा मैं मानता हूं. तुम्हारा बल उग्र शत्रुओं द्वारा वश में न होने
वाला एवं शत्रुओं को वश में करने वाला है. (४)
तन्नः प्रत्नं सख्यमस्तु युष्मे इत्था वदद्भिर्वलमङ्गिरोभिः.
हन्नच्युतच्युद्दश्मेषयन्तमृणोः पुरो वि दुरो अस्य विश्वाः.. (५)
हे दृढ़ पर्वतों को गिराने वाले एवं दर्शनीय इंद्र! तुम्हारे साथ हमारी मित्रता चिरकाल तक
रहे. तुमने स्तुतिकर्त्ता अंगिरागोत्रीय ऋषियों के ऊपर शस्त्र चलाने वाले बल नामक असुर को
मारा एवं उसके सभी नगरों तथा उनके द्वारों को नष्ट कर दिया. (५)
स हि धीभिर्हव्यो अस्त्युग्र ईशानकृन्महति वृत्रतूर्ये.
स तोकसाता तनये स वज्री वितन्तसाय्यो अभवत्समत्सु.. (६)
हे ओजस्वी एवं स्तोताओं को समर्थ बनाने वाले इंद्र! तुम महान् संग्राम में स्तोताओं
द्वारा बुलाए जाते हो. पुत्र एवं पौत्र प्राप्ति के लिए बुलाए जाने वाले वज्रधारी इंद्र विशेषरूप
से वंदनीय हैं. (६)
स मज्मना जनिम मानुषाणाममर्त्येन नाम्नाति प्र सर्स्रे.
स द्युम्नेन स शवसोत राया स वीर्येण नृतमः समोकाः.. (७)
इंद्र ने अपने अविनाशी एवं शत्रुओं को झुकाने वाले बल से मानवसमूहों पर अधिकार
पाया है. इंद्र यश, बल, धन एवं वीर्य से नेताओं में श्रेष्ठ तथा साथ निवास करने वाले बनते हैं.
(७)
स यो न मुहे न मिथू जनो भूत्सुमन्तुनामा चुमुरिं धुनिं च.
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वृणक्पिप्रुं शम्बरं शुष्णमिन्द्रः पुरां च्यौत्नाय शयथाय नू चित्.. (८)
वे इंद्र युद्ध में कभी कर्त्तव्य विमुख नहीं होते एवं मिथ्या वस्तुओं को जन्म नहीं देते.
प्रसिद्ध नाम वाले इंद्र ने चुमुरि, पिप्रु, शंबर, शुष्ण एवं धुनि नामक राक्षसों को मारा है. वे
उनके नगरों को गिराने एवं उन शत्रुओं को मारने के लिए शीघ्र काम करते हैं. (८)
उदावता त्वक्षसा पन्यसा च वृत्रहत्याय रथमिन्द्र तिष्ठ.
धिष्व वज्रं हस्त आ दक्षिणत्राभि प्र मन्द पुरुदत्रा माया:.. (९)
हे उन्नतशील एवं शत्रुनाशक बल से युक्त इंद्र! तुम वृत्र को मारने के लिए रथ पर बैठो
एवं अपने दाहिने हाथ में वज्र धारण करो. हे विशाल धन के स्वामी इंद्र! तुम असुरों की माया
को समाप्त करो. (९)
अग्निर्न शुष्कं वनमिन्द्र हेती रक्षो नि धक्ष्यशनिर्न भीमा.
गम्भीरय ऋष्वया यो रुरोजाध्वानयद्दुरिता दम्भयच्च.. (१०)
हे वज्र के समान भयानक इंद्र! अग्नि जिस प्रकार सूखे वन को जला देती है, उसी
प्रकार तुम अपने वज्र से राक्षसों को जलाओ. इंद्र ने अपराजित एवं महान् वज्र द्वारा शत्रुओं
को नष्ट किया. संग्राम में गर्जन करने वाले इंद्र शत्रुओं का भेदन करते हैं. (१०)
आ सहस्रं पथिभिरिन्द्र राया तुविद्युम्न तुविवाजेभिरर्वाक्.
याहि सूनो सहसो यस्य नू चिद्देव ईशे पुरुहू योतो:.. (११)
हे बहुधनसंपन्न, बल के पुत्र एवं बहुतों द्वारा पुकारे गए इंद्र! कोई भी असुर तुम्हें
बलरहित नहीं कर सकता. तुम धनयुक्त होकर हजारों सवारियों द्वारा शीघ्र हमारे सामने
आओ. (११)
प्र तुविद्युम्नस्य स्थविरस्य घृष्वेर्दिवो ररप्शे महिमा पृथिव्याः.
नास्य शत्रुर्ना प्रतिमानमस्ति न प्रतिषिः पुरुमायस्य सह्योः.. (१२)
परम यशस्वी, उन्नतिशील एवं शत्रुपराभवकारी इंद्र की महिमा धरती-आकाश से भी
महान् है. अधिक बुद्धि वाले एवं शत्रुनाशक इंद्र को न कोई मारने वाला है, न समानता करने
वाला है और न आश्रय है. (१२)
प्र तत्ते अद्या करणं कृतं भूत्कुत्सं यदायुमतिथग्वमस्मै.
पुरू सहस्रा नि शिशा अभि क्षामूर्त्तूर्वाणं धृषता निनेथ.. (१३)
हे इंद्र! आज तुम्हारा वह कर्म प्रकाशित होता है. तुमने शुष्ण असुर से कुत्स को, शत्रुओं
से आयु एवं दिवोदास को बचाया था. तुमने अतिथिग्व राजा को शंबर राक्षस का धन
दिलाया. हे इंद्र! तुम्हारे पराभवकारी वज्र ने शंबर को मारकर धरती पर तेज चलने वाले
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दिवोदास को विपत्ति से बचाया. (१३)
अनु त्वाहिघ्ने अध देव देवा मदन्विश्वे कवितमं कवीनाम्.
करो यत्र वरिवो बाधिताय दिवे जनाय तन्वे गृणानः.. (१४)
हे इंद्र! सभी स्तोता इस समय मेघ का भेदन करने के लिए तुझ परम मेधावी की स्तुति
कर रहे हैं. तुम स्तुतियां सुनकर उसी समय दरिद्र तथा पीड़ित यजमान एवं उसकी संतान को
धन देते हो. (१४)
अनु द्यावापृथिवी तत्त ओजोऽमर्त्या जिहत इन्द्र देवाः.
कृष्वा कृत्नो अकृतं यत्ते अस्त्युक्थं नवीयो जनयस्व यज्ञैः.. (१५)
हे इंद्र! धरती, आकाश एवं मरणरहित समस्त देव तुम्हारे बल को स्वीकार करते हैं. हे
बहुकर्मकर्त्ता इंद्र! तुम अपना अनकिया काम करो. इसके बाद तुम यज्ञों में अधिक नवीन
स्तोत्र को जन्म दो. (१५)
सूक्त—१९ देवता—इंद्र
महाँ इन्द्रो नृवदा चर्षणिप्रा उत द्विबर्हा अमिनः सहोभिः.
अस्मद्र्यग्वावृधे वीर्यायोरुः सुकृतः कर्तृभिर्भूत्.. (१)
जैसे राजा मनुष्यों की कामना पूर्ण करता है, उसी प्रकार स्तोताओं की इच्छा पूरी करने
वाले इंद्र आवें. दोनों लोकों में पराक्रम दिखाने वाले एवं शत्रुसेनाओं द्वारा अपराजित इंद्र
हमारे सामने वीरता के कार्यों के लिए बढ़ते हैं. विस्तृत शरीर एवं गुणों वाले इंद्र को यजमान
भली प्रकार जानते हैं. (१)
इन्द्रमेव धिषणा सातये धाद्बृहन्तमृष्वमजरं युवानम्.
अषाळ्हेन शवसा शूशुवांसं सद्यश्चिद्यो वावृधे असामि.. (२)
हमारी स्तुति दान के निमित्त महान्, गमनशील, युवा एवं शत्रुओं द्वारा अपराजित बल से
उन्नत इंद्र को प्राप्त होती है. इंद्र उत्पन्न होते ही अधिक मात्रा में बढ़ गए थे. (२)
पृथू करस्ना बहुला गभस्ती अस्मद्र्य१क्सं मिमीहि श्रवांसि.
यूथेव पश्वः पशूपा दमूना अस्माँ इन्द्राभ्या ववृत्स्वाजौ.. (३)
हे शांत मन वाले इंद्र! तुम अन्न देने के लिए अपने विस्तीर्ण, कार्यकुशल एवं अधिक देने
वाले हाथों को हमारे सामने करो. जिस प्रकार ग्वाला पशुओं के समूह को हांकता है, उसी
प्रकार तुम युद्ध में हमारा संचालन करो. (३)
तं व इन्द्रं चतिनमस्य शाकैरहि नूनं वाजयन्तो हुवेम.
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यथा चित्पूर्वे जरितार आसुरनेद्या अनवद्या अरिष्टाः.. (४)
अन्न के अभिलाषी हम स्तोता इस यज्ञ में मरुतों सहित शत्रुनाशक एवं प्रसिद्ध इंद्र को
बुलाते हैं. हे इंद्र! प्राचीन स्तोता जिस प्रकार निंदा, पाप एवं हिंसारहित उत्पन्न हुए थे, उसी
प्रकार हम भी हों. (४)
धृतव्रतो धनदाः सोमवृद्धः स हि वामस्य वसुनः पुरुक्षुः.
सं जग्मिरे पथ्या३ रायो अस्मिन्त्समुद्रे न सिन्धवो यादमानाः.. (५)
इंद्र यज्ञकर्मधारक, धन देने वाले, सोमरस द्वारा उन्नत, अभिलषित धन के स्वामी एवं
अधिक अन्न वाले हैं. स्तोताओं का हित करने वाले धन उसी प्रकार इंद्र के समीप जाते हैं,
जिस प्रकार बहती हुई नदियां सागर में मिलती हैं. (५)
शविष्ठं न आ भर शूर शव ओजिष्ठमोजो अभिभूत उग्रम्.
विश्वा द्युम्ना वृष्ण्या मानुषाणामस्मभ्यं दा हरिवो मादयध्यै.. (६)
हे शूर इंद्र! हमें सर्वश्रेष्ठ बल दो. हे शत्रु पराजयकारी इंद्र! हमें असह्य एवं उत्तम ओज
दो. हे हरि नामक अश्वों के स्वामी! हमें प्रसन्न करने के लिए मानवकामनाओं के पूरक सभी
धन दो. (६)
यस्ते मदः पृतनाषाळमृध्र इन्द्र तं न आ भर शूशुवांसम्.
येन तोकस्य तनयस्य सातौ मंसीमहि जिगीवांसस्त्वोताः.. (७)
हे इंद्र! तुम्हारा जो उत्साह शत्रु-सेनाओं को नष्ट करने वाला एवं अपराजित है, उस बढ़े
हुए उत्साह को हमें दो. हम तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर उसी उत्साह के कारण पुत्र एवं पौत्र के
लाभ के लिए तुम्हारी स्तुति करेंगे. (७)
आ नो भर वृषणं शुष्ममिन्द्र धनस्पृतं शूशुवांसं सुदक्षम्.
येन वंसाम पृतनासु शत्रून्तवोतिभिरुत जामीँरजामीन्.. (८)
हे इंद्र! हमें अभिलाषापूरक, धनपालक, उन्नत एवं परमदक्ष सैन्यशक्ति प्रदान करो.
तुम्हारी रक्षाओं के कारण हम उस सैन्यशक्ति द्वारा बंधुओं एवं शत्रुओं का नाश करें. (८)
आ ते शुष्मो वृषभ एतु पश्चादोत्तरादधरादा पुरस्तात्.
आ विश्वतो अभि समेत्वर्वाङिन्द्र द्युम्नं संवद्वेह्यस्मै.. (९)
हे इंद्र! तुम्हारा कामवर्षी बल पश्चिम, उत्तर, दक्षिण एवं पूर्व दिशा से हमारे सामने आवे,
वह बल सभी ओर से हमारे समीप आवे. तुम हमें सभी सुखों से युक्त धन दो. (९)
नृवत्त इन्द्र नृतमाभिरूती वंसीमहि वामं श्रोमतेभिः.
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