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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 924 of 1855

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Page 924

अग्निं देवासो अग्रियमिन्धते वृत्रहन्तमम्.
येना वसून्याभृता तृळ्हा रक्षांसि वाजिना.. (४८)
देवगण प्रमुख, वृत्र को भली प्रकार मारने वाले एवं राक्षसों से धन छीनने वाले अग्नि
को प्रज्वलित करते हैं. (४८)
सूक्त—१७ देवता—इंद्र
पिबा सोममभि यमुग्र तर्द ऊर्वं गव्यं महि गृणान इन्द्र.
वि यो धृष्णो वधिषो वज्रहस्त विश्वा वृत्रममित्रिया शवोभिः.. (१)
हे उग्र इंद्र! तुमने अंगिरागोत्रीय ऋषियों की स्तुति सुनकर जिस सोमरस के उद्देश्य से
पणियों द्वारा चुराई गई गायों को खोजा था, उस सोमरस को पिओ. हे हाथ में वज्रधारण
करने वाले एवं शत्रुनाशक इंद्र! तुमने अपनी शक्तियों द्वारा सभी शत्रुओं को मारा था. (१)
स ईं पाहि य ऋजीषी तरुत्रो यः शिप्रीवान् वृषभे यो मतीनाम्.
यो गोत्रभिद्वज्रभृद्यो हरिष्ठाः स इन्द्र चित्राँ अभि तृन्धि वाजान्.. (२)
हे सोमलता का फोक धारण करने वाले इंद्र! तुम शत्रुओं से रक्षा करने वाले, सुंदर ठोड़ी
वाले एवं स्तोताओं की इच्छा पूरी करने वाले हो. हे इंद्र! तुम पर्वतों के भेदक, वज्रधारी एवं
घोड़ों को रथ में जोड़ने वाले हो. तुम अपना विचित्र अन्न हम पर प्रकट करो. (२)
एवा पाहि प्रत्नथा मन्दतु त्वा श्रुधि ब्रह्म वावृधस्वोत गीर्भिः.
आविः सूर्य कृणुहि पीपिहीषो जहि शत्रूँरभि गा इन्द्र तृन्धि.. (३)
हे इंद्र! प्राचीन काल के समान ही हमारा सोम पिओ. सोम तुम्हें प्रसन्न करें तुम हमारी
स्तुतियों को सुनकर बढ़ो. तुम सूर्य को प्रकट करो. हमें अन्न प्राप्त कराओ, शत्रुओं को नष्ट
करो एवं पणियों द्वारा चुराई गई गाएं खोजो. (३)
ते त्वा मदा बृहदिन्द्र स्वधाव इमे पीता उक्ष्यन्त द्युमन्तम्.
महामनूनं तवसं विभूतिं मत्सरासो जहृषन्त प्रसाहम्.. (४)
हे अन्न के स्वामी इंद्र! पिया हुआ सोमरस तुझ तेजस्वी को बहुत प्रसन्न करे एवं सींच दे.
तुम महान् सर्वगुणसंपन्न विभूतियुक्त एवं शत्रुपराजयकारी हो. (४)
येभिः सूर्यमुषसं मन्दसानोऽवासयोऽप दृढ़हानि दर्दृत्.
महामद्रिं परि गा इन्द्र सन्तं नुत्था अच्युतं सदसः परि स्वात्.. (५)
हे इंद्र! जिस सोम से प्रसन्न होकर तुमने गाढ़े अंधकार को नष्ट करते हुए सूर्य एवं उषा
को अपने-अपने स्थान पर स्थापित किया तथा उस पर्वत के टुकड़े कर दिए जो पणियों द्वारा
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