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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 923 of 1855

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Page 923

विशामग्निं स्वध्वरम्.. (४०)
हे ऋत्विजो! सुंदर यज्ञों को पूर्ण करने वाले अग्नि की सेवा करो. अध्वर्यु अग्नि को इस
प्रकार हाथ से पकड़ते हैं, जैसे कोई बाघ आदि के बच्चे को पकड़ता है. (४०)
प्र देवं देववीतये भरता वसुवित्तमम्. आ स्वे योनौ नि षीदतु.. (४१)
हे अध्वर्युगण! तुम देवों को खिलाने के निमित्त द्योतमान एवं धनों को जानने वाले अग्नि
में हव्य डालो. अग्नि अपनी वेदी पर बैठें. (४१)
आ जातं जातवेदसि प्रियं शिशीतातिथिम्. स्योन आ गृहपतिम्.. (४२)
हे अध्वर्युगण! उत्पन्न हुए, अतिथि के समान पूज्य एवं गृहस्वामी अग्नि को जातवेद
नामक सुखकर अग्नि में स्थित करो. (४२)
अग्ने युक्ष्वा हि ये तवाश्वासो देव साधवः. अरं वहन्ति मन्यवे.. (४३)
हे अग्नि देव! अपने उन सुशील घोड़ों को रथ में जोड़ो, जो तुम्हें यज्ञों की ओर ठीक से
ले जाते हैं. (४३)
अच्छा नो याह्या वहाभि प्रयांसि वीतये. आ देवान्त्सोमपीतये.. (४४)
हे अग्नि! तुम हमारे सामने आओ. तुम हव्यभक्षण एवं सोमपान करने के लिए देवों को
बुलाओ. (४४)
उदग्ने भारत द्युमदजस्रेण दविद्युतत्. शोचा वि भाह्यजर.. (४५)
हे हव्यवहन करने वाले अग्नि! तुम अपने तेज को बढ़ाते हुए प्रज्वलित होओ. हे युवा
एवं परम दीप्तिसंपन्न अग्नि! तुम निर्बाध तेज द्वारा प्रकाशित बनो. (४५)
वीती यो देवं मर्तो दुवस्येदग्निमीळीताध्वरे हविष्मान्.
होतारं सत्ययजं रोदस्योरुत्तानहस्तो नमसा विवासेत्.. (४६)
हव्यवाहक यजमान हव्यरूप शोभन अन्न द्वारा किसी भी देवता की सेवा करता है, उस
यज्ञ में अग्नि बुलाए जाते हैं. यजमान हाथ जोड़कर एवं नमस्कार करता हुआ धरती-आकाश
में वर्तमान देवों को बुलाने वाले हव्य द्वारा यजनयोग्य अग्नि की सेवा करें. (४६)
आ ते अग्न ऋचा हविर्हृदा तष्टं भरामसि. ते ते भवन्तूक्षण ऋषभासो वशा उत..
(४७)
हे अग्नि! हम हृदय द्वारा सुंदर बनाई गई ऋचाओं को हव्य के समान तुम्हें देते हैं. हमारा
दिया हुआ हव्य तुम्हारे लिए गाय एवं बैल के रूप में परिवर्तित हो. (४७)
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