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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 915 of 1855

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Page 915

के समान की थी, हे भरद्वाज! ऐसे सर्वभक्षक तथा सदायूवा अग्नि को तुम प्रसन्न करो. (५)
अग्निमग्निं वः समिधा दुवस्यत प्रियंप्रियं वो अतिथिं गृणीषणि.
उप वो गीर्भिरमृतं विवासत देवो देवेषु वनते हि वार्यं देवो देवेषु वनते हि नो दुवः..
(६)
हे स्तोताओ! तुम अतिशय तेजस्वी, अतिथि के समान पूज्य एवं स्तुतियोग्य अग्नि का
अग्नि के ही समान समिधाओं से स्वागत करो तथा मरणरहित अग्नि देव के समीप जाकर
सेवा करो. वे समिधाएं एवं हमारी सेवा स्वीकार कर लेते हैं. (६)
समिद्धमग्निं समिधा गिरा गृणे शुचिं पावकं पुरो अध्वरे ध्रुवम्.
विप्रं होतारं पुरुवारमद्भुहं कविं सुम्नैरीमहे जातवेदसम्.. (७)
हम समिधाओं द्वारा प्रदीप्त अग्नि की स्तुतियों द्वारा प्रशंसा करते हैं, सबको पवित्र
करने वाले एवं ध्रुव अग्नि को हम अपने यज्ञ में धारण करते हैं तथा मेधावी देवों को बुलाने
वाले, अनेक जनों द्वारा वरण करने योग्य, सबके अनुकूल क्रांतदर्शी एवं सब प्राणियों को
जानने वाले अग्नि की सुखकर स्तुतियों द्वारा सेवा करते हैं. (७)
त्वां दूतमग्ने अमृतं युगेयुगे हव्यवाहं दधिरे पायुमीड्यम्.
देवासश्च मर्तासश्च जागृविं विभुं विशपतिं नमसा नि षेदिरे.. (८)
हे मरणरहित, प्रत्येक काल में हव्यवहन करने वाले, पालक एवं स्तुतियोग्य अग्नि! देवों
एवं मानवों ने तुम्हें दूत बनाया था. उन्होंने जागरणशील व्याप्त एवं प्रजापालक अग्नि को
नमस्कार द्वारा यज्ञ में स्थापित किया था. (८)
विभूषन्नग्न उभयाँ अनु व्रता दूतो देवानां रजसी समीयसे.
यत्ते धीतिं सुमतिमावृणीमहेऽध स्मा नस्त्रिवरूथः शिवो भव.. (९)
हे अग्नि! तुम देवों और मानवों को अलंकृत करते हुए एवं यज्ञकर्मों में देवों के दूत बनते
हुए धरती-आकाश में विचरण करते हो. हम यज्ञकर्मों एवं शोभन स्तुतियों से तुम्हारी सेवा
करते हैं, इसलिए तुम तीनों लोकों में रहकर हमें सुख दो. (९)
तं सुप्रतीकं सुदृशं स्वञ्चमविद्वांसो विदुष्टरं सपेम.
स यक्षद्विश्वा वयुनानि विद्वान्प्र हव्यमग्निरमृतेषु वोचत्.. (१०)
हम अल्प बुद्धि वाले लोग तुझ अतिशय विद्वान्, शोभन अंग वाले, देखने में सुंदर एवं
उत्तम गति वाले अग्नि की सेवा करते हैं. सबको जानने वाले अग्नि अमर देवों को हमारा हव्य
बतावें एवं देवों का यजन करें. (१०)
तमग्ने पास्युत तं पिपर्षि यस्त आनट् कवये शूर धीतिम्.
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