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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 919 of 1855

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Page 919

हे अग्नि देव! तुम हमें विस्तीर्ण प्रशंसनीय महान् शोभन व शक्ति से युक्त धन दो. (१२)
त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत.
मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः.. (१३)
हे अग्नि! शीश के समान सारे जगत् को धारण करने वाले कमल पत्र पर अथर्वा ऋषि
ने तुम्हारा मंथन किया था. (१३)
तमु त्वा दध्यङ्ङृषिः पुत्र ईधे अथर्वणः.
वृत्रहणं पुरन्दरम्.. (१४)
हे शत्रुहंता एवं असुर-नगरनाशक अग्नि! अथर्वा ऋषि के पुत्र दध्यङ् ने तुम्हें प्रज्वलित
किया था. (१४)
तमु त्वा पाथ्यो वृषा समीधे दस्युहन्तमम्.
धनञ्जयं रणेरणे.. (१५)
हे शत्रुहंता एवं प्रत्येक युद्ध में धन जीतने वाले अग्नि! पाथ्यवृषा नामक ऋषि ने तुम्हें
भली प्रकार प्रज्वलित किया था. (१५)
एह्यू षु ब्रवाणि तेऽग्न इत्थेतरा गिरः.
एभिर्वर्धास इन्दुभिः.. (१६)
हे अग्नि! यहां आओ. हम तुम्हारे निमित्त उत्तम स्तुतियां बोलते हैं, उन्हें एवं इसी प्रकार
की अन्य बातों को सुनो. तुम इस सोमरस द्वारा बढ़ो. (१६)
यत्र क्व च ते मनो दक्षं दधस उत्तरम्.
तत्रा सदः कृणवसे.. (१७)
हे अग्नि! जिस किसी यजमान के प्रति तुम्हारा मन अनुग्रहपूर्ण है, उसे तुम शक्तिदायक
उत्तम अन्न देते हो एवं वहीं निवास करते हो. (१७)
नहि ते पूर्तमक्षिपद्भुवन्नेमानां वसो.
अथा दुवो वनवसे.. (१८)
हे अग्नि! तुम्हारा तेज हमारी दृष्टि को नष्ट करने वाला न हो. तुम थोड़े यजमानों को ही
गृह देते हो. तुम हमारी सेवा स्वीकार करो. (१८)
आग्निरगामि भारतो वृत्रहा पुरुचेतनः.
दिवोदासस्य सत्पतिः.. (१९)