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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 913 of 1855

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Page 913

उत्तम संतान के साथ जिएं. (६)
सूक्त—१४ देवता—अग्नि
अग्ना यो मर्त्यो दुवो धियं जुजोष धीतिभिः.
भसन्नु ष प्र पूर्व्य इषं वुरीतावसे.. (१)
जो मनुष्य स्तुतियों के साथ अग्नि की यज्ञकर्म से सेवा करता है, वह अन्य लोगों की
अपेक्षा प्रतापी बनकर अपनी संतान की रक्षा के लिए शत्रुओं का धन प्राप्त करता है. (१)
अग्निरिद्धि प्रचेता अग्निर्वेधस्तम ऋषिः.
अग्निं होतारमीळते यज्ञेषु मनुषो विशः.. (२)
अग्नि ही उत्तम ज्ञानसंपन्न हैं, वे यज्ञकर्मों की रक्षा के कुशलतम कर्त्ता एवं सबके द्रष्टा
हैं. यजमानों के ऋत्विज् यज्ञों में अग्नि को देवों का बुलाने वाला बताकर स्तुति करते हैं. (२)
नाना ह्यग्नेऽवसे स्पर्धन्ते रायो अर्यः.
तूर्वन्तो दस्युमायवो व्रतैः सीक्षन्तो अव्रतम्.. (३)
हे अग्नि! शत्रुओं के धन तुम्हारे स्तोताओं की रक्षा के लिए एक-दूसरे से पहले जाने की
इच्छा करते हैं. शत्रुओं की हिंसा करते हुए तुम्हारे स्तोता यज्ञों द्वारा यज्ञहीनों को हराना चाहते
हैं. (३)
अग्निरप्सामृतीषहं वीरं ददाति सत्पतिम्.
यस्य त्रसन्ति शवसः सञ्चक्षि शत्रवो भिया.. (४)
अग्नि स्तोताओं को करने योग्य कर्मों को करने वाला, शत्रुओं का सामना करने वाला
तथा उत्तम कर्मों को पूर्ण करने वाला पुत्र देते हैं. उसे देखकर उसकी शक्ति से डरे हुए शत्रु
कांपने लगते हैं. (४)
अग्निर्हि विद्मना निदो देवो मर्तमुरुष्यति.
सहावा यस्यावृतो रयिर्वाजेष्ववृतः.. (५)
शक्तिशाली एवं ज्ञानसंपन्न अग्नि उस यजमान की निंदकों से रक्षा करते हैं, जिसका
हव्य यज्ञों में राक्षसों आदि से अछूता होता है एवं जो अन्य देवों के यजमानों से पृथक् होता
है. (५)
अच्छा नो मित्रमहो देव देवानग्ने वोचः सुमतिं रोदस्योः.
वीहि स्वस्तिं सुक्षितिं दिवो नॄन्द्धिषो अंहांसि दुरिता तरेम ता तरेम तवावसा तरेम.. (६)
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