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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 930 of 1855

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Page 930

यथा चित्पूर्वे जरितार आसुरनेद्या अनवद्या अरिष्टाः.. (४)
अन्न के अभिलाषी हम स्तोता इस यज्ञ में मरुतों सहित शत्रुनाशक एवं प्रसिद्ध इंद्र को
बुलाते हैं. हे इंद्र! प्राचीन स्तोता जिस प्रकार निंदा, पाप एवं हिंसारहित उत्पन्न हुए थे, उसी
प्रकार हम भी हों. (४)
धृतव्रतो धनदाः सोमवृद्धः स हि वामस्य वसुनः पुरुक्षुः.
सं जग्मिरे पथ्या३ रायो अस्मिन्त्समुद्रे न सिन्धवो यादमानाः.. (५)
इंद्र यज्ञकर्मधारक, धन देने वाले, सोमरस द्वारा उन्नत, अभिलषित धन के स्वामी एवं
अधिक अन्न वाले हैं. स्तोताओं का हित करने वाले धन उसी प्रकार इंद्र के समीप जाते हैं,
जिस प्रकार बहती हुई नदियां सागर में मिलती हैं. (५)
शविष्ठं न आ भर शूर शव ओजिष्ठमोजो अभिभूत उग्रम्.
विश्वा द्युम्ना वृष्ण्या मानुषाणामस्मभ्यं दा हरिवो मादयध्यै.. (६)
हे शूर इंद्र! हमें सर्वश्रेष्ठ बल दो. हे शत्रु पराजयकारी इंद्र! हमें असह्य एवं उत्तम ओज
दो. हे हरि नामक अश्वों के स्वामी! हमें प्रसन्न करने के लिए मानवकामनाओं के पूरक सभी
धन दो. (६)
यस्ते मदः पृतनाषाळमृध्र इन्द्र तं न आ भर शूशुवांसम्.
येन तोकस्य तनयस्य सातौ मंसीमहि जिगीवांसस्त्वोताः.. (७)
हे इंद्र! तुम्हारा जो उत्साह शत्रु-सेनाओं को नष्ट करने वाला एवं अपराजित है, उस बढ़े
हुए उत्साह को हमें दो. हम तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर उसी उत्साह के कारण पुत्र एवं पौत्र के
लाभ के लिए तुम्हारी स्तुति करेंगे. (७)
आ नो भर वृषणं शुष्ममिन्द्र धनस्पृतं शूशुवांसं सुदक्षम्.
येन वंसाम पृतनासु शत्रून्तवोतिभिरुत जामीँरजामीन्.. (८)
हे इंद्र! हमें अभिलाषापूरक, धनपालक, उन्नत एवं परमदक्ष सैन्यशक्ति प्रदान करो.
तुम्हारी रक्षाओं के कारण हम उस सैन्यशक्ति द्वारा बंधुओं एवं शत्रुओं का नाश करें. (८)
आ ते शुष्मो वृषभ एतु पश्चादोत्तरादधरादा पुरस्तात्.
आ विश्वतो अभि समेत्वर्वाङिन्द्र द्युम्नं संवद्वेह्यस्मै.. (९)
हे इंद्र! तुम्हारा कामवर्षी बल पश्चिम, उत्तर, दक्षिण एवं पूर्व दिशा से हमारे सामने आवे,
वह बल सभी ओर से हमारे समीप आवे. तुम हमें सभी सुखों से युक्त धन दो. (९)
नृवत्त इन्द्र नृतमाभिरूती वंसीमहि वामं श्रोमतेभिः.
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