Skip to content
SarvaKosh
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 921 of 1855

Read in context
Page 921

हे अग्नि! यज्ञकर्म द्वारा तुम्हारी सेवा करने वाला यजमान श्रेष्ठ एवं शोभन धन वाला हो
तथा सदा तुम्हारी स्तुति करता रहे. (२६)
ते ते अग्ने त्वोता इषयन्तो विश्वायुः.
तरन्तो अर्यो अरातीर्वन्वन्तो अर्यो अराती:.. (२७)
हे अग्नि! तुम्हारे स्तोता तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर एवं अन्न की इच्छा करते हुए समस्त
अन्नों को प्राप्त करें, आक्रमणकारी शत्रुओं को हरावें एवं उन्हें मार डालें. (२७)
अग्निस्तिग्मेन शोचिषा यासद्विश्वं. न्य१त्रिणम्.
अग्निर्नो वनते रयिम्.. (२८)
अग्नि अपने तीखे तेज द्वारा समस्त राक्षसों का विनाश करें एवं हमें धन दें. (२८)
सुवीरं रयिमा भर जातवेदो विचर्षणे.
जहि रक्षांसि सुक्रतो.. (२९)
हे जातवेद एवं विशेषद्रष्टा अग्नि! तुम इसे शोभन पुत्रादि से युक्त धन दो. हे शोभन कर्म
वाले! राक्षसों का नाश करो. (२९)
त्वं नः पाह्यंहसो जातवेदो अघायतः.
रक्षा णो ब्रह्मणस्कवे.. (३०)
हे जातवेद अग्नि! तुम पाप से हमारी रक्षा करो. हे मंत्रों के रचयिता अग्नि! अहित
चाहने वालों से हमारी रक्षा करो. (३०)
यो नो अग्ने दुरेव आ मर्त्तो वधाय दाशति.
तस्मान्नः पाह्यंहसः.. (३१)
हे अग्नि! बुरे अभिप्राय वाला जो व्यक्ति हमें शस्त्र दिखाता है, उससे हमारी रक्षा करो
एवं पाप से हमारी रक्षा करो. (३१)
त्वं तं देव जिह्वया परि बाधस्व दुष्कृतम्.
मर्तो यो नो जिघांसति.. (३२)
हे अग्नि देव! उस दुष्ट व्यक्ति को तुम अपनी ज्वालाओं द्वारा भली प्रकार जलाओ, जो
हमारी हिंसा करना चाहता है. (३२)
भरद्वाजाय सप्रथः शर्म यच्छ सहन्त्य.
अग्ने वरेण्यं वसु.. (३३)
ebook converter DEMO Watermarks*