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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 917 of 1855

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Page 917

उसका यज्ञ देवों के समीप ले जाओ. (१६)
इममु त्यमथर्ववदग्निं मन्थन्ति वेधसः.
यमङ् कूरयन्तमानयन्नमूरं श्याव्याभ्यः.. (१७)
ऋत्विज् अथवा ऋषि के समान इस अग्नि का मंथन करते हैं एवं देवों के मध्य से
निकलकर इधर-उधर भागते हुए बुद्धिसंपन्न अग्नि को अंधकार के मध्य से लाते हैं. (१७)
जनिष्वा देववीतये सर्वताता स्वस्तये.
आ देवान् वक्ष्यमृताँ ऋतावृधो यज्ञं देवेषु पिस्पृशः.. (१८)
हे अग्नि! तुम देवों की कामना करने वाले यजमान के कल्याण के निमित्त यज्ञ में उत्पन्न
होओ, यज्ञ बढ़ाने वाले देवों का यजन करो एवं हमारे यज्ञ को देवों के पास ले जाओ. (१८)
वयमु त्वा गृहपते जनानामग्ने अकर्म समिध बृहन्तम्.
अस्थूरि नो गार्हपत्यानि सन्तु तिग्मेन नस्तेजसा सं शिशाधि.. (१९)
हे यज्ञपालनकर्त्ता अग्नि! मनुष्यों में हम ही तुमको समिधाओं द्वारा बढ़ाते हैं. हमारे
गार्हपत्य-यज्ञ, पुत्र, पशुधन आदि से संपन्न हों. तुम हमें तीखे तेज से मिलाओ. (१९)
सूक्त—१६ देवता—अग्नि
त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषां हितः. देवेभिर्मानुषे जने.. (१)
हे अग्नि! तुम समस्त यज्ञों को पूर्ण करने वाले हो. देवों ने मानवी प्रजाओं में तुम्हें होता
बनाया है. (१)
स नो मन्द्राभिरध्वरे जिह्वाभिर्यजा महः.
आ देवान्वक्षि यक्षि च.. (२)
हे अग्नि! तुम प्रसन्नता देने वाली ज्वालाओं द्वारा हमारे यज्ञ में देवों का यजन करो. तुम
देवों को यहां लाओ एवं उन्हें हव्य दो. (२)
वेत्था हि वेधो अध्वनः पथश्च देवाञ्जसा.
अग्ने यज्ञेषु सुक्रतो.. (३)
हे यज्ञविधाता एवं शोभनयज्ञकर्मयुक्त अग्नि! तुम यज्ञ में देवों के छोटे एवं बड़े मार्गों को
शीघ्रता से जानते हो. (३)
त्वामीळे अध द्विता भरतो वाजिभिः शुनम्.
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