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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

सूक्त—१३० देवता—प्रजापति

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यह विशेष सृष्टि जिससे उत्पन्न हुई है, पता नहीं वह इसे धारण करता है अथवा नहीं.
विस्तृत आकाश में जो इस सृष्टि का अध्यक्ष है, पता नहीं वह उसे जानता है या नहीं जानता.
(७)
सूक्त—१३० देवता—प्रजापति
यो यज्ञो विश्वतस्तन्तुभिस्तत एकशतं देवकर्मेभिरायतः.
इमे वयन्ति पितरो य आययुः प्र वयाप वयेत्यासते तते.. (१)
आकाश आदि तंतुओं द्वारा जो सर्गरूप यज्ञ सब ओर विस्तृत है, वह सौ देव संबंधी
कर्मों से व्याप्त है. प्रजापति के पालक देव जो सारी सृष्टि में व्याप्त हैं, वे इस प्रपंच का
निर्माण करते हैं. वे ही इस विस्तृत विश्व के प्राण हैं. (१)
पुमाँ एनं तनुत उत्कृणत्ति पुमान्वि तत्ने अधि नाके अस्मिन्.
इमे मयूखा उप सेदुरू सदः सामानि चक्रुस्तसराण्योतवे.. (२)
प्रजापति इस सृष्टिरूपी यज्ञ को विस्तृत करता है एवं वही इसे संकुचित करता है. वही
धरती एवं स्वर्ग में इस सृष्टिरूपी यज्ञ का विस्तार करता है. प्रजापति की किरण के समान ये
देव यज्ञस्थान में बैठे थे. इन्होंने यज्ञरूपी वस्त्र को बुनने के लिए तिरछे धागे के रूप में
साममंत्रों का निर्माण किया. (२)
कासीत्प्रमा प्रतिमा किं निदानमाज्यं किमासीत्परिधिः क आसीत्.
छन्दः किमासीत्प्रउगं किमुक्थं यद्देवा देवमयजन्त विश्वे.. (३)
जिस समय सभी देवों ने प्रजापति का यज्ञ किया, उस समय क्या प्रमाण था? उस
समय देवमूर्ति क्या थी? उस यज्ञ का फल, घृत, समिधाएं, छंद और उक्थमंत्र क्या थे? (३)
अग्नेर्गायत्र्यभवत्सायुग्वोष्णिहया सविता सं बभूव.
अनुष्टुभा सोम उक्थैर्महस्वान्बृहस्पतेर्बृहती वाचमावत्.. (४)
गायत्री छंद अग्नि का तथा उष्णिक छंद सविता का सहायक हुआ. सोम अनुष्टुप् छंद से
तथा तेजस्वी सूर्य उक्थ छंद से युक्त हुए. बृहती छंद ने बृहस्पति के वचनों का सहारा लिया.
(४)
विराण्मित्रावरुणयोरभिश्रीरिन्द्रस्य त्रिष्टुबिह भागो अह्नः.
विश्वान्देवाञ्जगत्या विवेश तेन चाक्लृप्र ऋषयो मनुष्याः.. (५)
विराट् छंद मित्र और वरुण का आश्रित हुआ. त्रिष्टुप् छंद एवं माध्यंदिन का सोमरस इंद्र
के भाग में पड़ा. जगती छंद ने सभी देवों का आश्रय लिया. इन छंदों द्वारा ऋषियों और
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मनुष्यों ने यज्ञ की कल्पना की. (५)
चाक्लृप्रे तेन ऋषयो मनुष्या यज्ञे जाते पितरो नः पुराणे.
पश्यन्मन्ये मनसा चक्षसा तान् य इमं यज्ञमयजन्त पूर्वे.. (६)
यज्ञ के उत्पन्न होने पर हमारे प्राचीन पितरों अर्थात् ऋषियों और मनुष्यों ने उक्त छंदों
की सहायता से यज्ञ पूर्ण किया. जिन पूर्व पुरुषों ने इस यज्ञ को पूर्ण किया था, उन्हें मैं मन की
आंखों से देख रहा हूं. मैं ऐसा मानता हूं. (६)
सहस्तोमाः सहछन्दस आवृतः सहप्रमा ऋषयः सप्त दैव्याः.
पूर्वेषां पन्थामनुदृश्य धीरा अन्वालेभिरे रथ्यो३ न रश्मीन्.. (७)
सात दिव्य ऋषियों ने यज्ञ के मंत्र, छंद एवं नियम एक साथ जानकर यज्ञ का अनुष्ठान
किया. जिस प्रकार सारथि घोड़ों की लगाम पकड़ता है, उसी प्रकार धीर ऋषियों ने प्राचीन
लोगों के मार्ग का अनुसरण किया. (७)
सूक्त—१३१ देवता—अश्विनीकुमार व इंद्र
अप प्राच इन्द्र विश्वाँ अमित्रानपाचो अभिभूते नुदस्व.
अपोदीचो अप शूराधराच उरौ यथा तव शर्मन्मदेम.. (१)
हे शत्रुपराभवकारी इंद्र! हमारे सामने, पीछे, उत्तर और दक्षिण में जो शत्रु हैं, उन्हें
समाप्त करो. हे शूर इंद्र! तुम्हारे पास विशेष सुख पाकर हम प्रसन्न हों. (१)
कुविद्वङ्ग यवमन्तो यवं चिद्यथा दान्त्यनुपूर्वं वियूय.
इहेहैषां कृणुहि भोजनानि ये बर्हिषो नमोवृक्तिं न जग्मुः.. (२)
हे इंद्र! जौ के खेत के मालिक जिस प्रकार उसे क्रमशः अनेक बार में काटते हैं, उसी
प्रकार उन लोगों की भोजन सामग्री नष्ट करो जो ‘नमः’ शब्द का उच्चारण नहीं करते एवं यज्ञ
का अनुष्ठान नहीं करते. (२)
नहि स्थूर्युतुथा यातमस्ति नोत श्रवो विवदे सङ्गमेषु.
गव्यन्त इन्द्रं सख्याय विप्रा अश्वायन्तो वृषणं वाजयन्तः.. (३)
एक पहिए वाली गाड़ी उचित समय पर कहीं नहीं पहुंच सकती. उससे युद्ध के समय
भी अन्न नहीं मिल सकता. गौ, अश्व एवं अन्न की अभिलाषा करने वाले लोग इंद्र की मित्रता
चाहते हैं. (३)
युवं सुराममश्विना नमुचावासुरे सचा. विपिपाना शुभस्पती इन्द्रं कर्मस्वावतम्.. (४)
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हे उदक के स्वामी अश्विनीकुमारो! तुमने नमुचि असुर के साथ इंद्र के युद्ध के अवसर
पर सोमरस पीकर इंद्र के कार्य में सहायता दी थी. (४)
पुत्रमिव पितरावश्विनोभेन्द्रावथुः काव्यैर्दंसनाभिः.
यत्सुरामं व्यपिबः शचीभिः सरस्वती त्वा मघवन्नभिष्णक्.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार माता-पिता पुत्र की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार तुमने
सोमरस पीकर अपने प्रशंसनीय कर्मों एवं शक्तियों के साथ इंद्र की रक्षा की थी. हे इंद्र!
सरस्वती तुम्हारे समीप थीं. (५)
इन्द्रः सुत्रामा स्ववाँ अवोभिः सुमृळीको भवतु विश्ववेदाः.
बाधतां द्वेषो अभयं कृणोतु सुवीर्यस्य पतयः स्याम.. (६)
उत्तम रक्षक, धनवान् एवं सर्वज्ञ इंद्र अपने रक्षासाधनों द्वारा सुख पहुंचाने वाले बनें. वे
शत्रुओं को बाधा पहुंचावें एवं हमें भयरहित बनावें. हम उत्तम बल के स्वामी बनें. (६)
तस्य वयं सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम.
स सुत्रामा स्ववाँ इन्द्रो अस्मे आराच्चिद् द्वेषः सनुतर्युयोतु.. (७)
हम यज्ञ का भाग ग्रहण करने वाले इंद्र की कल्याणकारिणी कृपादृष्टि में रहें. वे शोभन
रक्षक एवं धनी इंद्र हमारे समीपवर्ती एवं दूरवर्ती शत्रु को हमसे अलग करें. (७)
सूक्त—१३२ देवता—मित्र व वरुण
ईजानमिद् द्यौर्गूर्तावसुरीजानं भूमिरभि प्रभूषणि.
ईजानं देवावश्विनावभि सुम्नैरवर्धताम्.. (१)
स्वर्ग यज्ञकर्त्ता के लिए ही धन धारण करता है. भूमि उसीको संपत्ति वाला बनाती है.
अश्विनीकुमार देवयज्ञकर्त्ता को ही नाना सुखसामग्री द्वारा बढ़ाते हैं. (१)
ता वां मित्रावरुणा धारयत्क्षिती सुषुम्नेषितत्वता यजामसि.
युवोः क्राणाय सख्यैरभि ष्याम रक्षसः.. (२)
हे धरती को धारण करने वाले मित्र व वरुण! हम सुख के उत्तम साधन पाने के लिए
तुम्हारी पूजा करते हैं. यज्ञकर्त्ता के प्रति तुम दोनों का जो मित्रता का भाव है, उसी के द्वारा
हम राक्षसों को जीतें. (२)
अधा चिन्नु यदिद्विषामहे वामभि प्रियं रेक्णः पत्यमानाः.
दद्वाँ वा यत्पुष्यति रेक्णः सम्बारन्नकिरस्य मघानि.. (३)

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हे मित्रवरुण! जिस समय हम तुम्हारे लिए हव्य धारण करने की इच्छा करते हैं, उसी
समय हम प्रिय धन के पास पहुंच जाते हैं. तुम्हें हव्य देने वाला जो धन प्राप्त करता है, उसको
कोई भी नष्ट नहीं कर सकता. (३)
असावन्यो असुर सूयत द्यौस्त्वं विश्वेषां वरुणासि राजा.
मूर्धा रथस्य चाकन्नैतावतैनासान्तकध्रुक्.. (४)
हे शक्तिशाली मित्र! स्वर्ग जिसे उत्पन्न करता है, वह सूर्य तुमसे भिन्न है. हे वरुण! तुम
सबके राजा हो. तुम्हारे रथ का ऊपरी भाग इधर ही आ रहा है. यह यज्ञ राक्षसों को नष्ट करने
वाला है. इसे पाप नहीं छू पाता. (४)
अस्मिन्त्स्वे३ तच्छकपूत एनो हिते मित्रे निगतान्हन्ति वीरान्.
अवोर्वा यद्द्वात्तनूष्ववः प्रियासु यज्ञियास्वर्वा.. (५)
मित्र देव के हितैषी बन जाने के कारण मुझ शकपूत ऋषि में स्थित पाप नीच शत्रुओं
को नष्ट करता है. मित्र देव आकर हमारे शरीरों की रक्षा करें तथा यज्ञों की प्रिय सामग्री को
सुरक्षित करें. (५)
युवोर्हि मातादितिर्विचेतसा द्यौर्न भूमिः पयसा पुपूतनि.
अव प्रिया दिदिष्टन सूरो निनिक्त रश्मिभिः.. (६)
हे विशिष्ट ज्ञान वाले मित्र एवं वरुण! अदिति तुम्हारी माता है. तुम धरती और आकाश
को जल से भर दो. तुम नीचे वाले लोक में प्रिय वस्तुएं दो एवं सूर्य की किरणों द्वारा सारे
संसार को पवित्र बनाओ. (६)
युवं ह्यप्रराजावसीदतं तिष्ठद्रथं न धूर्षदं वनर्षदम्.
ता नः कणूकयन्तीर्नृमेधस्तत्रे अंहसः सुमेधस्तत्रे अंहसः.. (७)
हे मित्र व वरुण! तुम अपने-अपने कर्मों से दीप्तिशाली बनकर अपने स्थानों पर ठहरो.
वन में घूमने वाला तुम्हारा रथ घोड़ों के मार्ग में स्थित है. तुम दोनों जोर से चिल्लाते हुए
शत्रुओं को हराने के लिए रथ में बैठते हो. बुद्धिमान् ऋषि नृमेध से छूट चुके हैं. (७)
सूक्त—१३३ देवता—इंद्र
प्रो ष्वस्मै पुरोरथमिन्द्राय शूषमर्चत.
अभीके चिदु लोककृत्सङ्गे समत्सु वृत्रहास्माकं बोधि चोदिता नभन्तामन्यकेषां
ज्याका अधि धन्वसु.. (१)
हे स्तोताओ! इंद्र के रथ के आगे चलने वाली सेना की भली-भांति पूजा करो. इंद्र
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शत्रुसेनाओं के समीप आ जाने पर भी भागते नहीं. वे शत्रुओं का वध करते हैं. वे हमारे कार्यों
को जानें. शत्रुओं के धनुषों पर चढ़ी हुई डोरियां नष्ट हों. (१)
त्वं सिन्धूँरवासृजोऽधराचो अहन्नहिम.
अशत्रुरिन्द्र जज्ञिषे विश्वं पुष्यसि वार्यं तं त्वा परि ष्वजामहे.
नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (२)
हे इंद्र! नीचे बहने वाली नदियों को तुम्हीं ने मुक्त किया है. तुम्हीं ने मेघ का नाश किया
है. हे इंद्र! तुम शत्रुरहित बनकर जन्म लेते हो एवं विश्व का पालन करते हो. तुम्हें सर्वोत्तम
जानकर हम तुम्हें स्तुतियों से वश में करते हैं. शत्रुओं के धनुषों की डोरियां नष्ट हों. (२)
वि षु विश्वा अरातयोऽर्यो नशन्त नो धियः.
अस्तासि शत्रवे वधं यो न इन्द्र जिघांसति या ते रातिर्ददिर्वसु नभन्तामन्यकेषां ज्याका
अधि धन्वसु.. (३)
हे इंद्र! सभी दानरहित शत्रु नष्ट हों और तुम्हारी स्तुतियां प्रारंभ हों. जो हमें मारना
चाहता है. उस शत्रु को तुम मारो. तुम्हारी दानशीलता हमें धन दे तथा शत्रुओं के धनुषों की
डोरियां नष्ट हों. (३)
यो न इन्द्राभितो जनो वृकायुरादिदेशति.
अधस्पदं तमीं कृधि विबाधो असि सासहिनर्भन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (४)
हे इंद्र! जो आयुध लिए हमारे चारों ओर भेड़ियों के समान घूमते हैं, उन्हें तुम धराशायी
करो. तुम शत्रुओं के बाधक एवं पराभवकारी हो. शत्रुओं के धनुषों की डोरियां नष्ट हों. (४)
यो न इन्द्राभिदासति सनाभिर्यश्च निष्ट्यः.
अव तस्य बलं तिर महीव द्यौरध त्मना नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (५)
हे इंद्र! हमारे समान जन्म वाला जो नीच शत्रु हमें नष्ट करना चाहता है, उसकी शक्ति
को इस प्रकार नीचा दिखाओ, जिस प्रकार आकाश धरती को अपने से नीचा रखता है. हमारे
शत्रुओं के धनुषों की डोरियां नष्ट हों. (५)
वयमिन्द्र त्वायवः सखित्वमा रभामहे.
ऋतस्य नः पथा नयाति विश्वानि दुरिता नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (६)
हे इंद्र! हम तुम्हारी मित्रता की इच्छा करते हैं एवं तुम्हारी मित्रता के अनुकूल कार्य करते
हैं. तुम हमें पुण्य कर्मों वाले मार्ग से आगे ले चलो. हम सभी पापों से पार हों. हमारे शत्रुओं के
धनुष की डोरियां नष्ट हों. (६)
अस्मभ्यं सु त्वमिन्द्र तां शिक्ष या दोहते प्रति वरं जरित्रे.
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सूक्त—१३४ देवता—इंद्र

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अच्छिद्रोध्नी पीपयद्यथा नः सहस्रधारा पयसा मही गौः.. (७)
हे इंद्र! तुम हमारे लिए यह विद्या सिखाओ, जिससे स्तोता की अभिलाषा पूर्ण हो. यह
धरित्रीरूपी बड़े थनों वाली गाय हजार धाराओं में दूध गिराकर हमें सुखी करे. (७)
सूक्त—१३४ देवता—इंद्र
उभे यदिन्द्र रोदसी आप्राथोषाइव.
महान्तं त्वा महीनां सम्राजं चर्षणीनां देवी जनित्र्यजीजनद् भद्रा जनित्र्यजीजनत्..
(१)
हे इंद्र! तुम उषा के समान धरती-आकाश दोनों को अपने तेज से पूर्ण करते हो. तुम
अतिशय महान् एवं मानव प्रजाओं में राजा हो. देवी एवं कल्याणमयी माता ने तुम्हें उत्पन्न
किया है. (१)
अव स्म दुर्हणायतो मर्तस्य तनुहि स्थिरम्.
अधस्पदं तमीं कृधि यो अस्माँ आदिदेशति देवी जनित्र्यजीजनद् भद्रा
जनित्र्यजीजनत्.. (२)
हे इंद्र! जो व्यक्ति हमारा हनन करना चाहता है, उसके स्थिर बल को भी तुम क्षीण
करो. जो हमारा नाश करना चाहता है, उसे तुम अपने पैरों से कुचल दो. दिव्य गुण वाली एवं
कल्याणमयी माता ने तुम्हें जन्म दिया है. (२)
अव त्या बृहतीरिषो विश्वश्चन्द्रा अमित्रहन्.
शचीभिः शक्र धूनुहीन्द्र विश्वाभिरूतिभि र्देवी जनित्र्यजीजनद् भद्रा जनित्र्यजीजनत्..
(३)
हे शत्रुनाशक एवं शक्तिशाली इंद्र! तुम अपनी शक्तियों द्वारा सर्वसुखकारी एवं विस्तृत
अन्न को हमारी ओर भेजो और सभी साधनों से हमारी रक्षा करो. दिव्य गुणवाली एवं
कल्याणमयी माता ने तुम्हें जन्म दिया है. (३)
अव यत्त्वं शतक्रतविन्द्र विश्वानि धूनुषे.
रयिं न सुन्वते सचा सहीस्रिणीभिरूतिभि र्देवी जनित्र्यजीजनद् भद्रा
जनित्र्यजीजनत्.. (४)
हे शतक्रतु इंद्र! जिस समय तुम सभी प्रकार के अन्न प्रेषित करोगे, उस समय सोमरस
निचोड़ने वाले यजमान को हजारों रक्षासाधनों से बचाओगे. दिव्य गुण वाली एवं
कल्याणमयी माता ने तुम्हें जन्म दिया है. (४)
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अव स्वेदाइवाभितो विष्वक्पतन्तु दिद्यवः.
दूर्वायाइव तन्तवो व्य१स्मदेतु दुर्मति र्देवी जनित्र्यजीजनद् भद्रा जनित्र्यजीजनत्..
(५)
इंद्र के दीप्तिशाली आयुध पसीने की बूंदों के समान चारों ओर गिरें. वे दूध के तंतुओं के
समान फैलें और दुर्बुद्धि हमसे दूर जावें. दिव्य गुण वाली एवं कल्याणमयी माता ने तुम्हें जन्म
दिया है. (५)
दीर्घ ह्याङ्कुशं यथा शक्तिं बिभर्षि मन्तुमः.
पूर्वेण मघवन्पदाजो वयां यथा यमो देवी जनित्र्यजीजनद् भद्रा जनित्र्यजीजनत्.. (६)
हे ज्ञानी एवं धनी इंद्र! तुम अपने शक्ति नामक आयुध को अंकुश के समान धारण करते
हो. बकरा जिस प्रकार अपने अगले पैरों से पेड़ की शाखा को खींचता है, उसी प्रकार तुम
अपनी शक्ति से शत्रुओं को खींचते हो. दिव्य गुण वाली एवं कल्याणमयी माता ने तुम्हें जन्म
दिया है. (६)
नकिर्देवा मिनीमसि नकिरा योपयामसि मन्त्रश्रुत्यं चरामसि.
पक्षेभिरपिक्षेभिरत्राभि सं रभामहे.. (७)
हे देवो! हम तुम्हारे कर्मों में कोई भूल नहीं करते. हम तुम्हारे किसी काम में उदासी नहीं
बरतते. हम मंत्र और श्रुति के अनुसार चलते हैं एवं दोनों हाथों में यज्ञ सामग्री लेकर यज्ञ पूर्ण
करते हैं. (७)
सूक्त—१३५ देवता—यम
यस्मिन्व्रक्षे सुपलाशे देवैः सम्पिबते यमः.
अत्रा नो विशपतिः पिता पुराणाँ अनु वेनति.. (१)
नचिकेता ने कहा—"जिस सुंदर पत्तों वाले वृक्ष पर यम देवों के साथ भोग करते हैं,
प्रजाओं के पति हमारे पिता की इच्छा है कि मैं उसी वृक्ष पर जाकर अपने पूर्वजों से मिलूं.
(१)
पुराणाँ अनुवेनन्तं चरन्तं पापयामुया. असूयन्नभ्यचाकशं तस्मा अस्पृहयं पुनः.. (२)
मेरे पिता ने निर्दयतापूर्वक आज्ञा दी कि मैं अपने पूर्वजों का साथी बनूं. मैंने निंदापूर्वक
उनकी ओर देखा. अब मैं उनके प्रति अनुराग रखता हूं." (२)
यं कुमार नवं रथमचक्रं मनसाकृणोः.
एकेषं विश्वतः प्राञ्चमपश्यन्नधि तिष्ठसि.. (३)
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यम ने कहा—"हे कुमार नचिकेता! तुमने अपने ही मन से बिना पहियों वाला, एक दंड
वाला, सब ओर जाने वाला व नवीन रथ चाहा था. बिना विचारे ही तुम उस पर बैठ गए हो.
(३)
यं कुमार प्रावर्तयो रथं विप्रेभ्यस्परि. तं सामानु प्रावर्तत समितो नाव्याहितम्.. (४)
हे कुमार नचिकेता! तुमने मेधावियों से ऊपर आकाश में उस रथ को चलाया है. तुमने
उस रथ को पिता की सलाह के अनुसार चलाया है. तुम्हारे पिता की उपदेश रूपी नौका पर
चढ़ कर यह रथ यहां आया है." (४)
कः कुमारमजनयद्रथं को निरवर्तयत्. कः स्वित्तदद्य नो ब्रूयादनुदेयी यथाभवत्.. (५)
"इस बालक को किसने जन्म दिया एवं इस रथ को किसने यहां भेजा?" आज मुझे
यह बात कौन बताएगा कि इसे किस प्रकार उपदेश देकर लौटाया जाए? (५)
यथाभवदनुदेयी ततो अग्रमजायत. पुरस्ताद् बुध्न आततः पश्चान्निर्यणं कृतम्.. (६)
यह बालक जिस बात को सुनकर जीवलोक में लौटेगा, वह इसे पहले ही बता दी गई
थी. पहले यम के घर जाने का पिता का आदेश हुआ. इसके बाद लौटने की शर्त बताई गई."
(६)
इदं यमस्य सादनं देवमानं यदुच्यते. इयमस्य धम्यते नाळीरयं गीर्भिः परिष्कृतः.. (७)
यम का यही निवासस्थान देवों द्वारा निर्मित बताया जाता है. यम की प्रसन्नता के लिए
यह बांसुरी बजाई जाती है और इसे स्तुतियों से सुशोभित किया जाता है. (७)
सूक्त—१३६ देवता—अग्नि, सूर्य, वायु
केश्य१ग्निं केशी विषं केशी बिभर्ति रोदसी.
केशी विश्वं स्वर्दृशे केशीदं ज्योतिरुच्यते.. (१)
सूर्य अग्नि, जल और द्यावा-पृथिवी को धारण करते हैं. सूर्य प्रकाश के द्वारा संसार को
देखने योग्य बनाते हैं. इस प्रकाश का नाम ही सूर्य है. (१)
मुनयो वातरशनाः पिशङ्गा वसते मला.
वातस्यानु ध्राजिं यन्ति यद्देवासो अविक्षत.. (२)
वातरशन के मुनिपुत्र पीले रंग के वल्कल धारण करते हैं. देवों ने देवत्व प्राप्त किया एवं
वायु की गति से चलने लगे. (२)
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उन्मदिता मौनेयेन वाताँ आ तस्थिमा वयम्.
शरीरेदस्माकं यूयं मर्तासो अभि पश्यथ.. (३)
हम सब लोक का व्यवहार त्यागकर मतवाले हो गए हैं और वायु के ऊपर स्थित हैं. हे
मनुष्यो! तुम हमारा शरीर ही देख पाते हो. (३)
अन्तरिक्षेण पतति विश्वा रूपावचाकशत्.
मुनिर्देवस्य देवस्य सौकृत्याय सखा हितः.. (४)
मुनि आकाश में उड़ते हैं एवं सारे रूपों को देखते हैं. देवों के प्रियमित्र मुनि उत्तम कार्य
करने के लिए ही जीते हैं. (४)
वातस्याश्वो वायोः सखाथो देवेषितो मुनिः.
उभौ समुद्रावा क्षेति यश्च पूर्व उतापरः.. (५)
मुनि वायु का भोजन करने वाले, वायु के मित्र एवं देवों द्वारा अभिलषित हैं. वे पूर्व और
पश्चिम दोनों सागरों में निवास करते हैं. (५)
अप्सरसां गन्धर्वाणां मृगाणां चरणे चरन्.
केशी केतस्य विद्वान्सखा स्वादुर्मदिन्तमः.. (६)
केशी अप्सराओं व गंधर्वों के विचरणस्थान अंतरिक्ष में तथा पशुओं के विचरणस्थल
धरती पर घूमते हैं. वे सभी जानने योग्य बातों को जानते हैं, सब रसों के उत्पादक हैं एवं
अतिशय आनंददाता है. (६)
वायुरस्मा उपामन्थत्पिनष्टि स्मा कुनन्नमा.
केशी विषस्य पात्रेण यद्रुद्रेणापिबत्सह.. (७)
सूर्य रुद्रपुत्र मरुतों के साथ अपने किरण रूपी पात्रों द्वारा जब जल पीते हैं, उस समय
वायु उस जल को हिलाकर माध्यमिका वाणी को पूर्ण कर देते हैं. (७)
सूक्त—१३७ देवता—विश्वेदेव
उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुनः. उतागश्चक्रुषं देवा देवा जीवयथा पुनः.. (१)
हे देवो! मुझ गिरे हुए को ऊपर उठाओ. मुझ पाप करने वाले की तुम रक्षा करो एवं मुझे
चिरजीवी बनाओ. (१)
द्वाविमौ वातौ वात आ सिन्धोरा परावतः.
दक्षं ते अन्य आ वातु परान्यो वातु यद्रपः.. (२)
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दो प्रकार की वायु समुद्र तक एवं उससे भी आगे बहती हैं. हे स्तोता! एक वायु तुम्हें
शक्ति दे और दूसरी तुम्हारा पाप नष्ट करे. (२)
आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद्रपः.
त्वं हि विश्वभेषजो देवानां दूत ईयसे.. (३)
हे इधर जाने वाली वायु! तुम ओषधियां लाओ. हे उधर जाने वाली वायु! तुम पापों को
ले जाओ. तुम सभी ओषधियों के समान हो एवं देवों की दूत बनकर चलती हो. (३)
आ त्वागमं शन्तातिभिरथो अरिष्टतातिभिः.
दक्षं ते भद्रमाभार्षं परा यक्ष्मं सुवामि ते.. (४)
हे यजमान! मैं तुम्हारे लिए सुखकारी एवं कष्टविनाशक रक्षासाधन लेकर आया हूं. मैंने
तुम में कल्याणकारी शक्ति भरी है. मैं अब तुम्हारे रोग को दूर करता हूं. (४)
त्रायन्तामिह देवास्त्रायतां मरुतां गणः.
त्रायन्तां विश्वा भूतानि यथायमरपा असत्.. (५)
इस स्थान पर देव, मरुद्गण एवं सभी प्राणी रक्षा करें. इस प्रकार यह व्यक्ति रोगरहित
बने. (५)
आप इद्वा उ भेषजीरापो अमीवचातनीः.
आपः सर्वस्य भेषजीस्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्.. (६)
जल ही भेषज के समान रोगों को नष्ट करने वाले एवं सब प्राणियों के रोगनाशक हैं. वे
ही जल तुम्हारे लिए ओषधि का कार्य करें. (६)
हस्ताभ्यां दशशाखाभ्यां जिह्वा वाचः पुरोगवी.
अनामयित्नुभ्यां त्वा ताभ्यां त्वोप स्पृशामसि.. (७)
हाथ की दस उंगलियों के साथ-साथ वचन के आगे-आगे जीभ चलती है. मैं अपने
रोगनाशक हाथों द्वारा तुम्हें छूता हूं. (७)
सूक्त—१३८ देवता—इंद्र
तव त्य इन्द्र सख्येषु वह्नय ऋतं मन्वाना व्यदर्दिर्वलम्.
यत्रा दशस्यन्नुषसो रिणन्नपः कुत्साय मन्मन्नह्याश्च दंसयः.. (१)
हे इंद्र! तुम्हारी मित्रता पाने के लिए हव्य वहन करने वाले एवं यज्ञ अनुष्ठानकर्त्ता लोगों
ने बल राक्षस का नाश कर दिया है. उस समय स्तुति होने पर तुमने कुत्स को उषा का प्रकाश
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देते हुए जल को छोड़ा एवं वृत्र के कर्मों का विनाश कर दिया. (१)
अवासृजः प्रस्वः श्चञ्चयो गिरीनुदाज उस्रा अपिबो मधु प्रियम्.
अवर्धयो वनिनो अस्य दंससा शुशोच सूर्य ऋतजातया गिरा.. (२)
हे इंद्र! तुमने सबके जन्म के हेतुरूप जल को छोड़ा, पर्वतों को विचलित किया, गायों
को हांककर ले गए, मधुर सोम पिया एवं वनों को बढ़ाया. यज्ञों के लिए उत्पन्न वेदमंत्रों द्वारा
प्रवासित इंद्र के कर्मों से सूर्य दीप्तिशाली थे. (२)
वि सूर्यो मध्ये अमुचद्रथं दिवो विदद्दासाय प्रतिमानमार्यः.
दृळहानि पिप्रोरसुरस्य मायिन इन्द्रो व्यासच्चकृवाँ ऋजिश्वना.. (३)
सूर्य ने आकाश में अपना रथ चलाया तथा देखा कि आर्यजन दासों का सामना कर रहे
हैं. इंद्र ने ऋजिश्व के साथ मित्रता करके मायावी राक्षस पिप्रु की शक्ति नष्ट कर दी. (३)
अनाधृष्टानि धृषितो व्यासन्निर्धीरदेवाँ अमृणदयास्यः.
मासेव सूर्यो वसु पुर्यमा ददे गृणानः शत्रूँरृशणाद्विरुक्मता.. (४)
शत्रुपराभवकारी इंद्र ने अपराजेय सेनाओं को नष्ट कर दिया तथा देव विरोधियों की
संपत्ति का नाश कर दिया. सूर्य जैसे विशेष मास में धरती का रस खींचता है, उसी प्रकार इंद्र
ने शत्रुनगरों का धन छीन लिया. (४)
अयुद्धसेनो विभ्वा विभिन्दता दाशद्वृत्रहा तुज्यानि तेजते.
इन्द्रस्य वज्रादबिभेदभिश्वथः प्राक्रामच्छुन्ध्यूरजहादुषा अनः.. (५)
इंद्र ने स्तुतियां सुनते-सुनते चमकीले अस्त्र से शत्रु को मार डाला. इंद्र की सेना के साथ
कोई लड़ नहीं सकता. इंद्र सब जगह जाने वाले तथा शत्रुनाशक वज्र से लोग डरें. इसके बाद
सूर्य चले और उषा ने अपनी गाड़ी चलाई. (५)
एता त्या ते श्रुत्यानि केवला यदेक एकमकृणोरयज्ञम्.
मासां विधानमदधा अधि द्यवि त्वया विभिन्नं भरति प्रथिं पिता.. (६)
हे इंद्र! तुम्हारा ही यह वीरकर्म सुना जाता है कि तुमने अकेले ही यज्ञविरोधी एवं प्रमुख
राक्षस को मारा. तुमने आकाश के ऊपर सूर्य के जाने का प्रबंध किया. द्युलोक वृत्र द्वारा तोड़े
गए रथचक्र को तुम्हारे द्वारा ही धारण करता है. (६)
सूक्त—१३९ देवता—सविता व विश्वावसु
सूर्यरश्मिर्हरिकेशः पुरस्तात्सविता ज्योतिरुदयाँ अजस्रम्.
तस्य पूषा प्रसवे याति विद्वान्सम्पश्यन्विश्वा भुवनानि गोपाः.. (१)
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सूर्य की किरणों वाले एवं हरे रंग के बालों वाले सविता सदा पूर्व की ओर प्रकाश का
उदय करते हैं. सविता के जन्म पर पूषा आगे बढ़ते हैं. ज्ञानी सविता सारे संसार को भली-
भांति देखते एवं रक्षा करते हैं. (१)
नृचक्षा एष दिवो मध्य आस्त आपप्रिवान् रोदसी अन्तरिक्षम्.
स विश्वाचीरभि चष्टे घृताचीरन्तरा पूर्वमपरं च केतुम्.. (२)
सविता मनुष्यों को देखते हुए अंतरिक्ष के मध्य स्थित होते हैं तथा धरती आकाश और
अंतरिक्ष को अपने प्रकाश से भर देते हैं. सविता सभी दिशाओं और उनके कोनों को
प्रकाशित करते हैं. सविता पहले, बाद तथा बीच के मार्गों को प्रकाशित करते हैं. (२)
रायो बुध्नः सङ्गमनो वसूनां विश्वा रूपाभि चष्टे शचीभिः.
देवइव सविता सत्यधर्मेन्द्रो न तस्थौ समरे धनानाम्.. (३)
धनों के मूल व संपत्तियों के संगम सविता अपनी शक्ति से सभी पदार्थों को प्रकाशित
करते हैं. सविता दिव्यगुणयुक्त देव के समान सत्यधर्मा हैं एवं धन संबंधी युद्ध में स्थित रहते
हैं. (३)
विश्वावसुं सोम गन्धर्वमापो ददृशुषीस्तदृतेना व्यायन्.
तदन्ववैदिन्द्रो रारहाण आसां परि सूर्यस्य परिधीँरपश्यत्.. (४)
हे सोम! विश्वावसु नामक गंधर्व को जब वसतीवरी स्थित जलों ने तुम्हारे साथ देखा,
उस समय पुण्यकर्म के प्रभाव से जल ऊपर आया. इन जलों को प्रेरित करने वाले इंद्र इस
बात को जानते हैं. उन्होंने चारों ओर सूर्यमंडल देखा है. (४)
विश्वावसुर्भि तन्नो गृणातु दिव्यो गन्धर्वो रजसो विमानः.
यद्वा घा सत्यमुत यन्न विद्म धियो हिन्वानो धिय इन्नो अव्याः.. (५)
स्वर्ग में रहने वाले एवं जल के निर्माता विश्वावसु गंधर्व यह बात हमारे सामने कहें. जो
बात सत्य है और हम उसे नहीं जानते, वे उस बात में हमारी बुद्धियों को प्रेरित करते हुए
हमारी बुद्धियों की रक्षा करें. (५)
सस्निमविन्दच्चरणे नदीनामपावृणोद्द्रुहो अश्मव्रजानाम्.
प्रासां गन्धर्वो अमृतानि वोचदिन्द्रो दक्षं परि जानादहीनाम्.. (६)
इंद्र ने नदियों के संचरणस्थल अंतरिक्ष में मेघ को पाया एवं पत्थरों का बना द्वार खोल
दिया. गंधर्व ने इन नदियों के जल की बात बताई, इंद्र मेघों का बल ठीक से जानते हैं. (६)
सूक्त—१४० देवता—अग्नि
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अग्ने तव श्रवो वयो महि भ्राजन्ते अर्चयो विभावसो.
बृहद्भानो शवसा वाजमुक्थ्यं१ दधासि दाशुषे कवे.. (१)
हे अग्नि! तुम्हारा अन्न प्रशंसनीय है. हे विभावसु! तुम्हारी ज्वाला बहुत दीप्तिशालिनी
है. हे विशाल दीप्ति वाले एवं कुशल अग्नि! तुम हव्यदाता को प्रशंसनीय अन्न एवं बल देते
हो. (१)
पावकवर्चाः शुक्रवर्चा अनूनवर्चा उदियर्षि भानुना.
पुत्रो मातरा विचरन्नुपावसि पृणक्षि रोदसी उभे.. (२)
हे शोभनदीप्ति वाले, निर्मल तेज वाले एवं संपूर्ण तेजस्वी अग्नि! तुम अपनी किरणों के
साथ उदित होते हो. तुम पुत्र के समान माता-पिता तुल्य द्यावा-पृथिवी को छूते हो एवं उनकी
गोद में खेलते हो. (२)
ऊर्जो नपाज्जातवेदः सुशस्तिभिर्मन्दस्व धीतिभिर्हितः.
त्वे इषः सं दधुर्भूरिवर्पसश्चित्रोतयो वामजाताः.. (३)
हे बल के पुत्र, सबके जानने वाले एवं स्तुतियों के साथ स्थापित अग्नि! तुम हमारे
यज्ञकर्मों से प्रसन्न बनो. तुम्हारे ऊपर अनेक रूपों वाले एवं विचित्र तृप्ति वाले सब अन्न रखे
हुए हैं. (३)
इरज्यन्नग्ने प्रथयस्व जन्तुभिरस्मे रायो अमर्त्य.
स दर्शतस्य वपुषो वि राजसि पृणक्षि सानसिं क्रतुम्.. (४)
हे मरणरहित अग्नि! तुम शत्रुओं से ईर्ष्या करते हुए हमारा धन बढ़ाओ. तुम शोभनरूप
से सुशोभित होते हो एवं सब फल देने वाले यज्ञ को छूते हो. (४)
इष्कर्तारमध्वरस्य प्रचेतसं क्षयन्तं राधसो महः.
रातिं वामस्य सुभगां महीमिषं दधासि सानसिं रयिम्.. (५)
हे अग्नि! तुम यज्ञ का संस्कार करने वाले, उत्तम ज्ञान वाले, महान् धन के स्वामी एवं
उत्तम धन के दाता हो. तुम स्तुति सुनकर सौभाग्ययुक्त महान् अन्न एवं भोगयोग्य धन दो. (५)
ऋतावानं महिषं विश्वदर्शतर्माग्नं सुम्नाय दधिरे पुरो जनाः.
श्रुत्कर्णं सप्रथस्तमं त्वा गिरा दैव्यं मानुषा युगा.. (६)
मनुष्यों ने यज्ञ के स्वामी सब कुछ देखने वाले एवं महान् अग्नि को सुख के लिए धारण
किया है. तुम्हारे कान सब कुछ सुनते हैं व तुम सबसे अधिक विस्तृत हो. यजमान, उसकी
पत्नी एवं उसके बालक तुझ दिव्य अग्नि की स्तुति करते हैं. (६)

सूक्त—१४१          देवता—विश्वेदेव

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सूक्त—१४१          देवता—विश्वेदेव
अग्ने अच्छा वदेह नः प्रत्यङ्नः सुमना भव.
प्र नो यच्छ विशस्पते धनदा असि नस्त्वम्.. (१)
हे अग्नि! हमारे सामने आकर उत्तम बातें कहो एवं हमारे प्रति प्रसन्न बनो. हे प्रजाओं के
स्वामी अग्नि! तुम धन देने वाले हो, इसलिए हमें धन दो. (१)
प्र नो यच्छत्वर्यमा प्र भगः प्र बृहस्पतिः.
प्र देवाः प्रोत सूनृता रायो देवी ददातु नः.. (२)
अर्यमा, भग, बृहस्पति, अन्य देव एवं सत्यरूपा सरस्वती देवी हमें धन दें. (२)
सोमं राजानमवसेऽग्निं गीर्भिर्हवामहे.
आदित्यान्विष्णुं सूर्य ब्रह्माणं च बृहस्पतिम्.. (३)
हम अपनी रक्षा के लिए राजा सोम, अग्नि, आदित्यगण, सूर्य, विष्णु, बृहस्पति एवं
प्रजापति को स्तुतियों द्वारा बुलाते हैं. (३)
इन्द्रवायू बृहस्पतिं सुहवेह हवामहे.
यथा नः सर्व इज्जनः सङ्गत्यां सुमना असत्.. (४)
हम शोभन आह्वान वाले इंद्र, वायु एवं बृहस्पति को इस यज्ञ में बुलाते हैं. ये सब
मिलकर हमें धन देने के लिए प्रसन्न हों. (४)
अर्यमणं बृहस्पतिमिन्द्रं दानाय चोदय.
वातं विष्णुं सरस्वतीं सवितारं च वाजिनम्.. (५)
हे स्तोता! अर्यमा, बृहस्पति, इंद्र, वायु, विष्णु, सरस्वती एवं शक्तिशाली सविता को दान
की प्रेरणा करो. (५)
त्वं नो अग्ने अग्निभिर्ब्रह्म यज्ञं च वर्धय.
त्वं नो देवतातये रायो दानाय चोदय.. (६)
हे अग्नि! तुम अन्य अग्नियों के साथ मिलकर हमारी स्तुतियों एवं यज्ञ को बढ़ाओ. तुम
हमारे यज्ञ के लिए दाताओं को धनदान की प्रेरणा दो. (६)
सूक्त—१४२          देवता—अग्नि
अयमग्ने जरिता त्वे अभूदपि सहसः सूनो नह्य१न्यदस्त्याप्यम्.
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भद्रं हि शर्म त्रिवरूथमस्ति त आरे हिंसानामप दिद्युमा कृधि.. (१)
हे अग्नि! यह ऋषि तुम्हारा स्तोता हुआ. हे बलपुत्र अग्नि! तुम्हारे समान मेरा दूसरा
आत्मीय नहीं है. तुम्हारा तीन कोठों वाला निवास सुंदर है. हम तुम्हारे समीप आकर तुम्हारी
ज्वाला से दुःखी हैं, इसलिए इसे दूर करो. (१)
प्रवत्ते अग्ने जनिमा पितूयतः साचीव विश्वा भुवना न्यृञ्जसे.
प्र सप्तयः प्र सनिषन्त नो धियः पुरश्चरन्ति पशूपा इव त्मना.. (२)
हे अग्नि! जब तुम अन्न भक्षण की अभिलाषा से प्रकट होते हो, तब तुम्हारा जन्म
उत्कृष्ट होता है. तुम सचिव के समान सभी लोकों को सुशोभित करते हो. तुम्हारी इधर-उधर
जाने वाली किरणें हमारी स्तुतियों को प्राप्त करती हैं एवं पशुपालक के समान वे किरणें
स्तुतियों के आगे-आगे चलती हैं. (२)
उत वा उ परि वृणक्षि बप्सद्बहोरग्न उलपस्य स्वधावः.
उत खिल्या उर्वराणां भवन्ति मा ते हेतिं तविषीं चुक्रुधाम.. (३)
हे दीप्तिशाली अग्नि! तुम जलाते समय बहुत से तिनकों को छोड़ देते हो एवं फसलों
वाली धरती को खाली कर देते हो. हम तुम्हारी विस्तृत ज्वाला को क्रोधित न करें. (३)
यदुद्रतो निवतो यासि बप्सत्पृथगेषि प्रगर्धिनीव सेना.
यदा ते वातो अनुवाति शोचिर्वप्तेव श्मश्रु वपसि प्र भूम.. (४)
हे अग्नि! तुम जब वृक्षों को जलाते हुए ऊपर-नीचे चलते हो, तब तुम्हारी गति लूटने
वाली सेना के समान सबसे अलग होती है. जब हवा तुम्हारी ज्वालाओं के पीछे चलती है, तब
तुम असीम प्रदेश को इस प्रकार साफ कर देते हो, जिस प्रकार नाई दाढ़ी के बाल काटता है.
(४)
प्रत्यस्य श्रेणयो ददृश्र एकं नियानं बहवो रथासः.
बाहू यदग्ने अनुमर्मृजानो न्यङ्ङुत्तानामन्वेषि भूमिम्.. (५)
अग्नि की अनेक ज्वालाएं दिखाई देती हैं. इनके रथ अनेक हैं, पर सबका गंतव्य एक ही
है. हे अग्नि! जब तुम अपनी ज्वालारूपी बाहुओं से वनों को जलाते हो, तब नम्र बनकर ऊंची
भूमि पर चढ़ते हो. (५)
उत्ते शुष्मा जिहतामुत्ते अर्चिरुत्ते अग्ने शशमानस्य वाजाः.
उच्छ्वञ्चस्व नि नम वर्धमान आ त्वाद्य विश्वे वसवः सदन्तु.. (६)
हे प्रशंसित अग्नि! तुम्हारी ज्वालाएं दीप्ति एवं वेग संपन्न हों. हे वृद्धि करते हुए अग्नि!
तुम ऊपर एवं नीचे जाओ. सभी वासदाता देव आज तुम्हें प्राप्त करें. (६)

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अपामिदं नयनं समुद्रस्य निवेशनम्.
अन्यं कृणुष्वेतः पन्थां तेन याहि वशाँ अनु.. (७)
यह स्थान जल का आधार एवं समुद्र का निवेश है. हे अग्नि! तुम दूसरा स्थान अपनाओ
एवं उसी मार्ग से इच्छानुसार जाओ. (७)
आयने ते परायणे दूर्वा रोहन्तु पुष्पिणीः.
ह्रदाश्च पुण्डरीकाणि समुद्रस्य गृहा इमे.. (८)
हे अग्नि! तुम्हारे आने एवं जाने के मार्ग में फूलों वाली दूब उगे. यहां तालाब, श्वेत कमल
और सागर का निवासस्थान है. (८)
सूक्त—१४३ देवता—अश्विनीकुमार
त्यं चिदत्रिमृतजुरमर्थमश्वं न यातवे.
कक्षीवन्तं यदी पुना रथं न कृणुथो नवम्.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने यज्ञ करके वृद्ध बने अत्रि ऋषि को इतना शक्तिशाली बना
दिया था कि वे घोड़े के समान चल सकें. तुमने कक्षीवान् ऋषि को उसी प्रकार युवा बना
दिया था, जिस प्रकार बढ़ई पुराने रथ को नया कर देता है. (१)
त्यं चिदश्वं न वाजिनमरेणवो यमत्नत.
दृळ्हं ग्रन्थिं न वि ष्यतमत्रिं यविष्ठमा रजः.. (२)
प्रबल असुरों ने अत्रि ऋषि को शीघ्रगामी घोड़े के समान बांध दिया था. तुमने मजबूत
गांठ के समान बंधे अत्रि को खोल दिया था. वे युवक के समान धरती पर गए. (२)
नरा दंसिष्ठावत्रये शुभ्रा सिषासतं धियः.
अथा हि वां दिवो नरा पुनः स्तोमो न विशसे.. (३)
हे यज्ञकर्म के नेता, अति सुंदर एवं शुभ अश्विनीकुमारो! तुम अत्रि ऋषि को बुद्धि देने
की इच्छा करो. हे स्वर्ग के नेता अश्विनीकुमारो! इस प्रकार मैं पुनः तुम्हारी स्तुति में प्रवेश
करूंगा. (३)
चिते तद्वां सुराधसा रातिः सुमतिरश्विना.
आ यन्नः सदने पृथौ समने पर्षथो नरा.. (४)
हे शोभन दान वाले एवं यज्ञकर्म के नेता अश्विनीकुमारो! हमारे घर में जब बड़े समारोह
के साथ यज्ञ हो रहा था, उस समय तुमने हमारी रक्षा की थी, इसलिए हम जानते हैं कि
हमारा दान और शोभन स्तुतियां तुमने जान ली हैं. (४)
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युवं भुज्युं समुद्र आ रजसः पार ईङ्खितम्.
यातमच्छा पतत्रिभिर्नासत्या सातये कृतम्.. (५)
हे सत्यरूप अश्विनीकुमारो! तुमने सागर में गिरे हुए और तरंगों पर डूबते-उतराते भुज्यु
ऋषि की रक्षा सौ डांडों वाली नौका द्वारा की एवं उन्हें यज्ञ करने योग्य बनाया. (५)
आ वां सुम्नैः शंयूइव मंहिष्ठा विश्ववेदसा.
समस्मे भूषतं नरोत्सं न पिप्युषीरिषः.. (६)
हे सब कुछ जानने वाले अश्विनीकुमारो! तुम धनी लोगों के समान दाता बनकर धनों के
साथ हमारे पास आओ. जैसे दूध गाय के थन में भर जाता है, उसी प्रकार तुम हमें धन से
पूर्ण करो. (६)
सूक्त—१४४ देवता—इंद्र
अयं हि ते अमर्त्य इन्दुरत्यो न पत्यते. दक्षो विश्वायुर्वेधसे.. (१)
हे सृष्टिकर्त्ता इंद्र! यह अमृत तुल्य सोमरस तुम्हें घोड़े के समान दौड़ाता है. यह बल का
आधार एवं सबका जीवन है. (१)
अयमस्मासु काव्य ऋभुर्वज्रो दास्वते.
अयं बिभर्त्यूर्ध्वकृशनं मदमृभुर्न कृत्व्यं मदम्.. (२)
दाता इंद्र का दीप्त वज्र हम लोगों में प्रशंसनीय है. इंद्र ऊर्ध्वकृशन नामक स्तोता तथा
यज्ञकर्त्ता का पालन ऋभु नामक देव के समान करते हैं. (२)
घृषुः श्येनाय कृत्वन आसु स्वासु वंसगः. अव दीधेदहीशुवः.. (३)
दीप्तिशाली इंद्र अपनी प्रजाओं में शोभन रूप से चलते हैं एवं मुझ श्येन ऋषि का वंश
उन्होंने बढ़ाया है. (३)
यं सुपर्णः परावतः श्येनस्य पुत्र आभरत्. शतचक्रं यो३ह्यो वर्तनिः.. (४)
तीव्रगति वाले श्येन के पुत्र सुपर्ण जिस सोम को दूर देश से लाए थे, वह सोम सैकड़ों
कामों में उपयोगी एवं वृत्र का उत्साह बढ़ाने वाला है. (४)
यं ते श्येनश्चारुमवृकं पदाभरदरुणं मानमन्धसः.
एना वयो वि तार्यायुर्जीवस एना जागार बन्धुता.. (५)
हे इंद्र! श्येन तुम्हारे लिए जो सोम अपने चरण से पकड़कर लाए हैं, वह शोभन,

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वाचकरहित, लाल रंग का एवं यज्ञ द्वारा अन्न को उत्पन्न करने वाला है. सोम के लिए अन्न एवं
जीवनयोग्य आयु दो एवं इसके साथ मित्रता करो. (५)
एवा तदिन्द्र इन्दुना देवेषु चिद्धारयाते महि त्यजः.
क्रत्वा वयो वि तार्यायुः सुक्रतो क्रत्वायमस्मदा सुतः.. (६)
इंद्र इस सोमरस को पीकर हमारी तथा देवों की विशेष रक्षा करते हैं. हे शोभन कर्म
वाले इंद्र! हमें यज्ञ करने के लिए अन्न एवं परम आयु दो. यह सोमरस हमने यज्ञ के लिए
निचोड़ा है. (६)
सूक्त—१४५ देवता—सौत की पीड़ा
इमां खनाम्योषधिं वीरुधं बलवत्तमाम्.
यया सपत्नीं बाधते यया संविन्दते पतिम्.. (१)
मैं इस परम शक्तिशाली एवं लतारूपिणी ओषधि को खोदती हूं. इसके द्वारा सौत को
कष्ट पहुंचाकर पति का प्रेम पाया जाता है. (१)
उत्तानपर्णे सुभगे देवजूते सहस्वति. सपत्नीं मे परा धम पतिं मे केवलं कुरु.. (२)
हे ऊपर की ओर पत्तों वाली, सौभाग्य का कारण, देवों द्वारा प्रेरित एवं पति को वश में
करने वाली ओषधि! तुम मेरी सौत को दूर हटाकर मेरे पति को केवल मेरा बनाओ. (२)
उत्तराहमुत्तर उत्तरेदुत्तराभ्यः. अथा सपत्नी या ममाधरा साधराभ्यः.. (३)
हे उत्तम ओषधि! मैं अपने पति की प्रधान नारियों में भी प्रधान बनूं. मेरी सौत निम्न से
भी निम्न स्थान प्राप्त करे. (३)
नह्यस्या नाम गृभ्णामि नो अस्मिन्नमते जने.
परामेव परावतं सपत्नीं गमयामसि.. (४)
मैं अपनी सौत का नाम तक नहीं लेती. सौत को कोई भी पंसद नहीं करता. मैं अपनी
सौत को बहुत दूर स्थान पर भेजती हूं. (४)
अहमस्मि सहमानाथ त्वमसि सासहिः.
उभे सहस्वती भूत्वी सपत्नीं मे सहावहै.. (५)
हे ओषधि! मैं तुम्हारी कृपा से अपनी सौत को पराजित करूंगी. इस प्रकार तुम भी
पराजित करने वाली हो. हम और तुम दोनों शक्तिशाली बनकर सौत को शक्तिहीन करें.
(५)
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उप तेऽधां सहमानामभि त्वाधां सहीयसा.
मामनु प्र ते मनो वत्सं गौरिव धावतु पथा वारिव धावतु.. (६)
हे पति! मैंने तुम्हारे तकिए के सहारे इस शक्तिशालिनी ओषधि को तुम्हारे सिरहाने रख
दिया है. जिस प्रकार गाय दौड़कर बछड़े के पास चली जाती है और पानी नीचे की ओर
चलता है, उसी प्रकार तुम्हारा मन मेरे समीप आवे. (६)
सूक्त—१४६ देवता—विशाल वन
अरण्यान्यरण्यान्यसौ या प्रेव नश्यसि.
कथा ग्रामं न पृच्छसि न त्वा भीरिव विन्दतीँ३.. (१)
हे विशाल वन! तुम देखते-देखते ही नष्ट हो जाते हो. तुम गांव में जाने का मार्ग क्यों
नहीं पूछते? अकेले यहां तुम्हें डर नहीं लगता? (१)
वृषारवाय वदते यदुपावति चिच्चिकः.
आघाटिभिरिव धावयन्नरण्यानिर्महीयते.. (२)
बैल के समान शब्द करने वाले जीव को वन में दूसरा जीव चींचीं करके क्यों उत्तर देता
है? ये मानो वीणा पर स्वरों की उत्पत्ति करते हुए वन का यश गाते हैं. (२)
उत गावइवादन्त्युत वेश्मेव दृश्यते.
उतो अरण्यानिः सायं शकटीरिव सर्जति.. (३)
इस वन में कहीं गाएं चरती सी जान पड़ती हैं और कहीं घर से दिखाई पड़ती हैं. संध्या
के समय वन से अनेक गाड़ियां निकलती जान पड़ती हैं. (३)
गामङ्गैष आ ह्वयति दार्वङ्गैषो अपावधीत्.
वसन्नरण्यान्यां सायमकूक्षदिति मन्यते.. (४)
वन में एक व्यक्ति गाय को बुलाता है और दूसरा लकड़ियां काटता है. विशाल वन में
रहने वाला व्यक्ति संध्या के समय पशुओं का शब्द सुनकर डर सा जाता है. (४)
न वा अरण्यानिर्हन्त्यन्यश्चेन्नाभिगच्छति.
स्वादोः फलस्य जग्ध्वाय यथाकामं नि पद्यते.. (५)
विशाल वन किसी को नहीं मारता. यदि सिंह, व्याघ्र आदि पशु न आवें तो वन के
स्वादिष्ट फल खाकर लोग प्रसन्नतापूर्वक समय बिता सकते हैं. (५)
आज्जनगन्धिं सुरभिं बह्वन्नामकृषीवलाम्.
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सूक्त—१४७ देवता—इंद्र

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प्राहं मृगाणां मातरमरण्यानिमशंसिषम्.. (६)
कस्तूरी आदि वन की सुगंधियां हैं. खाने की वस्तुएं तो बहुत हैं, पर कोई किसान नहीं
है. मैंने पशुओं की माता के रूप में विशाल वनों की स्तुति की है. (६)
सूक्त—१४७ देवता—इंद्र
श्रत्ते दधामि प्रथमाय मन्यवेऽहन्यद्वृत्रं नर्यं विवेरपः.
उभे यत्त्वा भवतो रोदसी अनु रेजते शुष्मात्पृथिवी चिदद्रिवः .. (१)
हे इंद्र! तुम्हारे क्रोध पर मैं सर्वाधिक श्रद्धा करता हूं. तुमने वृत्र का वध किया एवं लोक
हितकारी जल का निर्माण किया. हे वज्रधारी इंद्र! द्यावा-पृथिवी तुम्हारे अधीन हैं एवं अंतरिक्ष
तुम्हारे भय से कांपता है. (१)
त्वं मायाभिरनवद्य मायिनं श्रवस्यता मनसा वृत्रमर्दयः.
त्वामिन्नरो वृणते गविष्टिषु त्वां विश्‍वासु हव्यास्र्विष्टिषु.. (२)
हे प्रशंसनीय इंद्र! तुमने अन्न बनाने की अभिलाषा से मायावी वृत्र को अपनी शक्तियों
द्वारा नष्ट किया. पणियों द्वारा चुराई गई गाएं पाने के लिए लोग तुम्हारी सेवा करते हैं. सभी
यज्ञों एवं हवनों में तुम्हारी प्रशंसा की जाती है. (२)
ऐषु चाकन्धि पुरुहूत सूरिषु वृधासो ये मघवन्नानशुर्मघम्.
अर्चन्ति तोके तनये परिष्टिषु मेधसाता वाजिनमहये धने.. (३)
हे बहुतों द्वारा बुलाए गए एवं धनी इंद्र! तुम इन विद्वानों के समीप प्रकट होओ. ये
तुम्हारी कृपा से धनी एवं उन्नत बने हैं. ये लोग पुत्र, पौत्र एवं अन्य फल पाने के लिए एवं धन
के निमित्त यज्ञों में शक्तिशाली इंद्र की पूजा करते हैं. (३)
स इन्नु रायः सुभृतस्य चाकनन्मदं यो अस्य रंह्यं चिकेतति.
त्वावृधो मघवन्दाश्वध्वरो मक्षू स वाजं भरते धना नृभिः.. (४)
जो स्तोता अपनी स्तुतियों से इंद्र को सोमपान का आनंद देना जानता है, वही यथेष्ट धन
पाने के लिए शीघ्र प्रार्थना कर सकता है. हे धनी इंद्र! तुम्हारे द्वारा बढ़ाया हुआ एवं यज्ञ में
दान देने वाला यजमान शीघ्र ही अपने सेवकों द्वारा धन और अन्न से पूर्ण हो जाता है. (४)
त्वं शर्धाय महिना गृणान उरु कृधि मघवञ्छग्धि रायः.
त्वं नो मित्रो वरुणो न मायी पित्वो न दस्म दयसे विभक्ता.. (५)
हे विशाल स्तोता द्वारा प्रशंसित एवं धनी इंद्र! तुम हमारे बलों का विस्तार करो एवं हमें
धन दो. दर्शनीय इंद्र! तुम मित्र और वरुण के समान ज्ञानी हो. तुम हमारे लिए अन्न दो. (५)
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