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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1816 of 1855

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Page 1816

अग्ने तव श्रवो वयो महि भ्राजन्ते अर्चयो विभावसो.
बृहद्भानो शवसा वाजमुक्थ्यं१ दधासि दाशुषे कवे.. (१)
हे अग्नि! तुम्हारा अन्न प्रशंसनीय है. हे विभावसु! तुम्हारी ज्वाला बहुत दीप्तिशालिनी
है. हे विशाल दीप्ति वाले एवं कुशल अग्नि! तुम हव्यदाता को प्रशंसनीय अन्न एवं बल देते
हो. (१)
पावकवर्चाः शुक्रवर्चा अनूनवर्चा उदियर्षि भानुना.
पुत्रो मातरा विचरन्नुपावसि पृणक्षि रोदसी उभे.. (२)
हे शोभनदीप्ति वाले, निर्मल तेज वाले एवं संपूर्ण तेजस्वी अग्नि! तुम अपनी किरणों के
साथ उदित होते हो. तुम पुत्र के समान माता-पिता तुल्य द्यावा-पृथिवी को छूते हो एवं उनकी
गोद में खेलते हो. (२)
ऊर्जो नपाज्जातवेदः सुशस्तिभिर्मन्दस्व धीतिभिर्हितः.
त्वे इषः सं दधुर्भूरिवर्पसश्चित्रोतयो वामजाताः.. (३)
हे बल के पुत्र, सबके जानने वाले एवं स्तुतियों के साथ स्थापित अग्नि! तुम हमारे
यज्ञकर्मों से प्रसन्न बनो. तुम्हारे ऊपर अनेक रूपों वाले एवं विचित्र तृप्ति वाले सब अन्न रखे
हुए हैं. (३)
इरज्यन्नग्ने प्रथयस्व जन्तुभिरस्मे रायो अमर्त्य.
स दर्शतस्य वपुषो वि राजसि पृणक्षि सानसिं क्रतुम्.. (४)
हे मरणरहित अग्नि! तुम शत्रुओं से ईर्ष्या करते हुए हमारा धन बढ़ाओ. तुम शोभनरूप
से सुशोभित होते हो एवं सब फल देने वाले यज्ञ को छूते हो. (४)
इष्कर्तारमध्वरस्य प्रचेतसं क्षयन्तं राधसो महः.
रातिं वामस्य सुभगां महीमिषं दधासि सानसिं रयिम्.. (५)
हे अग्नि! तुम यज्ञ का संस्कार करने वाले, उत्तम ज्ञान वाले, महान् धन के स्वामी एवं
उत्तम धन के दाता हो. तुम स्तुति सुनकर सौभाग्ययुक्त महान् अन्न एवं भोगयोग्य धन दो. (५)
ऋतावानं महिषं विश्वदर्शतर्माग्नं सुम्नाय दधिरे पुरो जनाः.
श्रुत्कर्णं सप्रथस्तमं त्वा गिरा दैव्यं मानुषा युगा.. (६)
मनुष्यों ने यज्ञ के स्वामी सब कुछ देखने वाले एवं महान् अग्नि को सुख के लिए धारण
किया है. तुम्हारे कान सब कुछ सुनते हैं व तुम सबसे अधिक विस्तृत हो. यजमान, उसकी
पत्नी एवं उसके बालक तुझ दिव्य अग्नि की स्तुति करते हैं. (६)