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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1815 of 1855

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Page 1815

सूर्य की किरणों वाले एवं हरे रंग के बालों वाले सविता सदा पूर्व की ओर प्रकाश का
उदय करते हैं. सविता के जन्म पर पूषा आगे बढ़ते हैं. ज्ञानी सविता सारे संसार को भली-
भांति देखते एवं रक्षा करते हैं. (१)
नृचक्षा एष दिवो मध्य आस्त आपप्रिवान् रोदसी अन्तरिक्षम्.
स विश्वाचीरभि चष्टे घृताचीरन्तरा पूर्वमपरं च केतुम्.. (२)
सविता मनुष्यों को देखते हुए अंतरिक्ष के मध्य स्थित होते हैं तथा धरती आकाश और
अंतरिक्ष को अपने प्रकाश से भर देते हैं. सविता सभी दिशाओं और उनके कोनों को
प्रकाशित करते हैं. सविता पहले, बाद तथा बीच के मार्गों को प्रकाशित करते हैं. (२)
रायो बुध्नः सङ्गमनो वसूनां विश्वा रूपाभि चष्टे शचीभिः.
देवइव सविता सत्यधर्मेन्द्रो न तस्थौ समरे धनानाम्.. (३)
धनों के मूल व संपत्तियों के संगम सविता अपनी शक्ति से सभी पदार्थों को प्रकाशित
करते हैं. सविता दिव्यगुणयुक्त देव के समान सत्यधर्मा हैं एवं धन संबंधी युद्ध में स्थित रहते
हैं. (३)
विश्वावसुं सोम गन्धर्वमापो ददृशुषीस्तदृतेना व्यायन्.
तदन्ववैदिन्द्रो रारहाण आसां परि सूर्यस्य परिधीँरपश्यत्.. (४)
हे सोम! विश्वावसु नामक गंधर्व को जब वसतीवरी स्थित जलों ने तुम्हारे साथ देखा,
उस समय पुण्यकर्म के प्रभाव से जल ऊपर आया. इन जलों को प्रेरित करने वाले इंद्र इस
बात को जानते हैं. उन्होंने चारों ओर सूर्यमंडल देखा है. (४)
विश्वावसुर्भि तन्नो गृणातु दिव्यो गन्धर्वो रजसो विमानः.
यद्वा घा सत्यमुत यन्न विद्म धियो हिन्वानो धिय इन्नो अव्याः.. (५)
स्वर्ग में रहने वाले एवं जल के निर्माता विश्वावसु गंधर्व यह बात हमारे सामने कहें. जो
बात सत्य है और हम उसे नहीं जानते, वे उस बात में हमारी बुद्धियों को प्रेरित करते हुए
हमारी बुद्धियों की रक्षा करें. (५)
सस्निमविन्दच्चरणे नदीनामपावृणोद्द्रुहो अश्मव्रजानाम्.
प्रासां गन्धर्वो अमृतानि वोचदिन्द्रो दक्षं परि जानादहीनाम्.. (६)
इंद्र ने नदियों के संचरणस्थल अंतरिक्ष में मेघ को पाया एवं पत्थरों का बना द्वार खोल
दिया. गंधर्व ने इन नदियों के जल की बात बताई, इंद्र मेघों का बल ठीक से जानते हैं. (६)
सूक्त—१४० देवता—अग्नि
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