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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1808 of 1855

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Page 1808

शत्रुसेनाओं के समीप आ जाने पर भी भागते नहीं. वे शत्रुओं का वध करते हैं. वे हमारे कार्यों
को जानें. शत्रुओं के धनुषों पर चढ़ी हुई डोरियां नष्ट हों. (१)
त्वं सिन्धूँरवासृजोऽधराचो अहन्नहिम.
अशत्रुरिन्द्र जज्ञिषे विश्वं पुष्यसि वार्यं तं त्वा परि ष्वजामहे.
नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (२)
हे इंद्र! नीचे बहने वाली नदियों को तुम्हीं ने मुक्त किया है. तुम्हीं ने मेघ का नाश किया
है. हे इंद्र! तुम शत्रुरहित बनकर जन्म लेते हो एवं विश्व का पालन करते हो. तुम्हें सर्वोत्तम
जानकर हम तुम्हें स्तुतियों से वश में करते हैं. शत्रुओं के धनुषों की डोरियां नष्ट हों. (२)
वि षु विश्वा अरातयोऽर्यो नशन्त नो धियः.
अस्तासि शत्रवे वधं यो न इन्द्र जिघांसति या ते रातिर्ददिर्वसु नभन्तामन्यकेषां ज्याका
अधि धन्वसु.. (३)
हे इंद्र! सभी दानरहित शत्रु नष्ट हों और तुम्हारी स्तुतियां प्रारंभ हों. जो हमें मारना
चाहता है. उस शत्रु को तुम मारो. तुम्हारी दानशीलता हमें धन दे तथा शत्रुओं के धनुषों की
डोरियां नष्ट हों. (३)
यो न इन्द्राभितो जनो वृकायुरादिदेशति.
अधस्पदं तमीं कृधि विबाधो असि सासहिनर्भन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (४)
हे इंद्र! जो आयुध लिए हमारे चारों ओर भेड़ियों के समान घूमते हैं, उन्हें तुम धराशायी
करो. तुम शत्रुओं के बाधक एवं पराभवकारी हो. शत्रुओं के धनुषों की डोरियां नष्ट हों. (४)
यो न इन्द्राभिदासति सनाभिर्यश्च निष्ट्यः.
अव तस्य बलं तिर महीव द्यौरध त्मना नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (५)
हे इंद्र! हमारे समान जन्म वाला जो नीच शत्रु हमें नष्ट करना चाहता है, उसकी शक्ति
को इस प्रकार नीचा दिखाओ, जिस प्रकार आकाश धरती को अपने से नीचा रखता है. हमारे
शत्रुओं के धनुषों की डोरियां नष्ट हों. (५)
वयमिन्द्र त्वायवः सखित्वमा रभामहे.
ऋतस्य नः पथा नयाति विश्वानि दुरिता नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (६)
हे इंद्र! हम तुम्हारी मित्रता की इच्छा करते हैं एवं तुम्हारी मित्रता के अनुकूल कार्य करते
हैं. तुम हमें पुण्य कर्मों वाले मार्ग से आगे ले चलो. हम सभी पापों से पार हों. हमारे शत्रुओं के
धनुष की डोरियां नष्ट हों. (६)
अस्मभ्यं सु त्वमिन्द्र तां शिक्ष या दोहते प्रति वरं जरित्रे.
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