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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1809 of 1855

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Page 1809

अच्छिद्रोध्नी पीपयद्यथा नः सहस्रधारा पयसा मही गौः.. (७)
हे इंद्र! तुम हमारे लिए यह विद्या सिखाओ, जिससे स्तोता की अभिलाषा पूर्ण हो. यह
धरित्रीरूपी बड़े थनों वाली गाय हजार धाराओं में दूध गिराकर हमें सुखी करे. (७)
सूक्त—१३४ देवता—इंद्र
उभे यदिन्द्र रोदसी आप्राथोषाइव.
महान्तं त्वा महीनां सम्राजं चर्षणीनां देवी जनित्र्यजीजनद् भद्रा जनित्र्यजीजनत्..
(१)
हे इंद्र! तुम उषा के समान धरती-आकाश दोनों को अपने तेज से पूर्ण करते हो. तुम
अतिशय महान् एवं मानव प्रजाओं में राजा हो. देवी एवं कल्याणमयी माता ने तुम्हें उत्पन्न
किया है. (१)
अव स्म दुर्हणायतो मर्तस्य तनुहि स्थिरम्.
अधस्पदं तमीं कृधि यो अस्माँ आदिदेशति देवी जनित्र्यजीजनद् भद्रा
जनित्र्यजीजनत्.. (२)
हे इंद्र! जो व्यक्ति हमारा हनन करना चाहता है, उसके स्थिर बल को भी तुम क्षीण
करो. जो हमारा नाश करना चाहता है, उसे तुम अपने पैरों से कुचल दो. दिव्य गुण वाली एवं
कल्याणमयी माता ने तुम्हें जन्म दिया है. (२)
अव त्या बृहतीरिषो विश्वश्चन्द्रा अमित्रहन्.
शचीभिः शक्र धूनुहीन्द्र विश्वाभिरूतिभि र्देवी जनित्र्यजीजनद् भद्रा जनित्र्यजीजनत्..
(३)
हे शत्रुनाशक एवं शक्तिशाली इंद्र! तुम अपनी शक्तियों द्वारा सर्वसुखकारी एवं विस्तृत
अन्न को हमारी ओर भेजो और सभी साधनों से हमारी रक्षा करो. दिव्य गुणवाली एवं
कल्याणमयी माता ने तुम्हें जन्म दिया है. (३)
अव यत्त्वं शतक्रतविन्द्र विश्वानि धूनुषे.
रयिं न सुन्वते सचा सहीस्रिणीभिरूतिभि र्देवी जनित्र्यजीजनद् भद्रा
जनित्र्यजीजनत्.. (४)
हे शतक्रतु इंद्र! जिस समय तुम सभी प्रकार के अन्न प्रेषित करोगे, उस समय सोमरस
निचोड़ने वाले यजमान को हजारों रक्षासाधनों से बचाओगे. दिव्य गुण वाली एवं
कल्याणमयी माता ने तुम्हें जन्म दिया है. (४)
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