ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextअपामिदं नयनं समुद्रस्य निवेशनम्.
अन्यं कृणुष्वेतः पन्थां तेन याहि वशाँ अनु.. (७)
यह स्थान जल का आधार एवं समुद्र का निवेश है. हे अग्नि! तुम दूसरा स्थान अपनाओ
एवं उसी मार्ग से इच्छानुसार जाओ. (७)
आयने ते परायणे दूर्वा रोहन्तु पुष्पिणीः.
ह्रदाश्च पुण्डरीकाणि समुद्रस्य गृहा इमे.. (८)
हे अग्नि! तुम्हारे आने एवं जाने के मार्ग में फूलों वाली दूब उगे. यहां तालाब, श्वेत कमल
और सागर का निवासस्थान है. (८)
सूक्त—१४३ देवता—अश्विनीकुमार
त्यं चिदत्रिमृतजुरमर्थमश्वं न यातवे.
कक्षीवन्तं यदी पुना रथं न कृणुथो नवम्.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने यज्ञ करके वृद्ध बने अत्रि ऋषि को इतना शक्तिशाली बना
दिया था कि वे घोड़े के समान चल सकें. तुमने कक्षीवान् ऋषि को उसी प्रकार युवा बना
दिया था, जिस प्रकार बढ़ई पुराने रथ को नया कर देता है. (१)
त्यं चिदश्वं न वाजिनमरेणवो यमत्नत.
दृळ्हं ग्रन्थिं न वि ष्यतमत्रिं यविष्ठमा रजः.. (२)
प्रबल असुरों ने अत्रि ऋषि को शीघ्रगामी घोड़े के समान बांध दिया था. तुमने मजबूत
गांठ के समान बंधे अत्रि को खोल दिया था. वे युवक के समान धरती पर गए. (२)
नरा दंसिष्ठावत्रये शुभ्रा सिषासतं धियः.
अथा हि वां दिवो नरा पुनः स्तोमो न विशसे.. (३)
हे यज्ञकर्म के नेता, अति सुंदर एवं शुभ अश्विनीकुमारो! तुम अत्रि ऋषि को बुद्धि देने
की इच्छा करो. हे स्वर्ग के नेता अश्विनीकुमारो! इस प्रकार मैं पुनः तुम्हारी स्तुति में प्रवेश
करूंगा. (३)
चिते तद्वां सुराधसा रातिः सुमतिरश्विना.
आ यन्नः सदने पृथौ समने पर्षथो नरा.. (४)
हे शोभन दान वाले एवं यज्ञकर्म के नेता अश्विनीकुमारो! हमारे घर में जब बड़े समारोह
के साथ यज्ञ हो रहा था, उस समय तुमने हमारी रक्षा की थी, इसलिए हम जानते हैं कि
हमारा दान और शोभन स्तुतियां तुमने जान ली हैं. (४)
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