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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1813 of 1855

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Page 1813

दो प्रकार की वायु समुद्र तक एवं उससे भी आगे बहती हैं. हे स्तोता! एक वायु तुम्हें
शक्ति दे और दूसरी तुम्हारा पाप नष्ट करे. (२)
आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद्रपः.
त्वं हि विश्वभेषजो देवानां दूत ईयसे.. (३)
हे इधर जाने वाली वायु! तुम ओषधियां लाओ. हे उधर जाने वाली वायु! तुम पापों को
ले जाओ. तुम सभी ओषधियों के समान हो एवं देवों की दूत बनकर चलती हो. (३)
आ त्वागमं शन्तातिभिरथो अरिष्टतातिभिः.
दक्षं ते भद्रमाभार्षं परा यक्ष्मं सुवामि ते.. (४)
हे यजमान! मैं तुम्हारे लिए सुखकारी एवं कष्टविनाशक रक्षासाधन लेकर आया हूं. मैंने
तुम में कल्याणकारी शक्ति भरी है. मैं अब तुम्हारे रोग को दूर करता हूं. (४)
त्रायन्तामिह देवास्त्रायतां मरुतां गणः.
त्रायन्तां विश्वा भूतानि यथायमरपा असत्.. (५)
इस स्थान पर देव, मरुद्गण एवं सभी प्राणी रक्षा करें. इस प्रकार यह व्यक्ति रोगरहित
बने. (५)
आप इद्वा उ भेषजीरापो अमीवचातनीः.
आपः सर्वस्य भेषजीस्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्.. (६)
जल ही भेषज के समान रोगों को नष्ट करने वाले एवं सब प्राणियों के रोगनाशक हैं. वे
ही जल तुम्हारे लिए ओषधि का कार्य करें. (६)
हस्ताभ्यां दशशाखाभ्यां जिह्वा वाचः पुरोगवी.
अनामयित्नुभ्यां त्वा ताभ्यां त्वोप स्पृशामसि.. (७)
हाथ की दस उंगलियों के साथ-साथ वचन के आगे-आगे जीभ चलती है. मैं अपने
रोगनाशक हाथों द्वारा तुम्हें छूता हूं. (७)
सूक्त—१३८ देवता—इंद्र
तव त्य इन्द्र सख्येषु वह्नय ऋतं मन्वाना व्यदर्दिर्वलम्.
यत्रा दशस्यन्नुषसो रिणन्नपः कुत्साय मन्मन्नह्याश्च दंसयः.. (१)
हे इंद्र! तुम्हारी मित्रता पाने के लिए हव्य वहन करने वाले एवं यज्ञ अनुष्ठानकर्त्ता लोगों
ने बल राक्षस का नाश कर दिया है. उस समय स्तुति होने पर तुमने कुत्स को उषा का प्रकाश
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