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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1822 of 1855

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Page 1822

उप तेऽधां सहमानामभि त्वाधां सहीयसा.
मामनु प्र ते मनो वत्सं गौरिव धावतु पथा वारिव धावतु.. (६)
हे पति! मैंने तुम्हारे तकिए के सहारे इस शक्तिशालिनी ओषधि को तुम्हारे सिरहाने रख
दिया है. जिस प्रकार गाय दौड़कर बछड़े के पास चली जाती है और पानी नीचे की ओर
चलता है, उसी प्रकार तुम्हारा मन मेरे समीप आवे. (६)
सूक्त—१४६ देवता—विशाल वन
अरण्यान्यरण्यान्यसौ या प्रेव नश्यसि.
कथा ग्रामं न पृच्छसि न त्वा भीरिव विन्दतीँ३.. (१)
हे विशाल वन! तुम देखते-देखते ही नष्ट हो जाते हो. तुम गांव में जाने का मार्ग क्यों
नहीं पूछते? अकेले यहां तुम्हें डर नहीं लगता? (१)
वृषारवाय वदते यदुपावति चिच्चिकः.
आघाटिभिरिव धावयन्नरण्यानिर्महीयते.. (२)
बैल के समान शब्द करने वाले जीव को वन में दूसरा जीव चींचीं करके क्यों उत्तर देता
है? ये मानो वीणा पर स्वरों की उत्पत्ति करते हुए वन का यश गाते हैं. (२)
उत गावइवादन्त्युत वेश्मेव दृश्यते.
उतो अरण्यानिः सायं शकटीरिव सर्जति.. (३)
इस वन में कहीं गाएं चरती सी जान पड़ती हैं और कहीं घर से दिखाई पड़ती हैं. संध्या
के समय वन से अनेक गाड़ियां निकलती जान पड़ती हैं. (३)
गामङ्गैष आ ह्वयति दार्वङ्गैषो अपावधीत्.
वसन्नरण्यान्यां सायमकूक्षदिति मन्यते.. (४)
वन में एक व्यक्ति गाय को बुलाता है और दूसरा लकड़ियां काटता है. विशाल वन में
रहने वाला व्यक्ति संध्या के समय पशुओं का शब्द सुनकर डर सा जाता है. (४)
न वा अरण्यानिर्हन्त्यन्यश्चेन्नाभिगच्छति.
स्वादोः फलस्य जग्ध्वाय यथाकामं नि पद्यते.. (५)
विशाल वन किसी को नहीं मारता. यदि सिंह, व्याघ्र आदि पशु न आवें तो वन के
स्वादिष्ट फल खाकर लोग प्रसन्नतापूर्वक समय बिता सकते हैं. (५)
आज्जनगन्धिं सुरभिं बह्वन्नामकृषीवलाम्.
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