ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
About this granth
The Rigveda (ऋग्वेद) is the oldest of the four Vedas and the earliest surviving text of the Indian tradition. Its Samhita is arranged in ten mandalas containing more than a thousand hymns (suktas) addressed to Agni, Indra, Varuna, Mitra, Soma, Ushas, the Maruts, the Ribhus, the Vishvedevas and other deities, along with reflections on creation, generosity, marriage and society. Hymns such as the Nasadiya and the Purusha Sukta are often taken as the starting points of Indian philosophy.
This edition is by Dr. Ganga Sahay Sharma, a scholar with degrees in Hindi and Sanskrit and the title of Vyakaranacharya, published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, as part of a four-Veda set. Each hymn is headed by its number and deity, followed by the Sanskrit mantras and a simple Hindi rendering of their sense. A list of hymns, their subjects and the number of mantras is given at the front.
The Hindi is plain and close to everyday speech, which makes this edition a good first approach to the meaning of the mantras for readers not ready for a traditional commentary. The complete text, about 1,855 pages, can be read here page by page.
सूक्त—६४ देवता—विश्वेदेव
हे अदितिपुत्र देवो एवं अदिति! प्लुति के पुत्र विद्वान् गय ऋषि ने तुम सब लोगों को
बढ़ाया था. देवों की कृपा से मानवों को प्रभुता मिलती है. गय ऋषि ने देवसमूह की स्तुति की
थी. (१७)
सूक्त—६४ देवता—विश्वेदेव
कथा देवानां कतमस्य यामनि सुमन्तु नाम शृण्वतां मनामहे.
को मृळाति कतमो नो मयस्करत्कतम् ऊती अभ्या ववर्त्तति.. (१)
यज्ञ में किस स्तुतियोग्य देव की हम भली प्रकार स्तुति करें? कौन हमारी रक्षा करता
है? कौन हमें सुख प्रदान करता है? हमारी रक्षा के लिए कौन हमारे पास आता है. (१)
क्रतूयन्ति क्रतवो हृत्सु धीतयो वेनन्ति वेनाः पतयन्त्या दिशः.
न मर्डिता विद्यते अन्य एभ्यो देवेषु मे अधि कामा अयंसत.. (२)
हमारे हृदयों में निहित बुद्धियां यज्ञ करने की इच्छा करती हैं. हमारी बुद्धियां देवों की
कामना करती हैं. हमारी कामनाएं फलप्राप्ति के लिए देवों के पास जाती हैं. इन देवों के
अतिरिक्त कोई भी हमारा सुखदाता नहीं है. हमारी अभिलाषाएं इंद्रादि देवों तक सीमित हैं.
(२)
नरा वा शंसं पूषणमगोह्यमग्निं देवेद्धमभ्यर्चसे गिरा.
सूर्यामासा चन्द्रमसा यमं दिवि त्रितं वातमुषसमक्तुमश्विना.. (३)
हे मेरे मन! मानवों द्वारा प्रशंसनीय, धनदान के द्वारा स्तोताओं का पोषण करने वाले
एवं अन्यों द्वारा अगम्य पूषा देव एवं देवों द्वारा प्रज्वलित अग्नि देव की स्तुतियों द्वारा पूजा
करो. तुम सूर्य, चंद्र, यम, द्युलोक में स्थित यम, तीनों लोकों में व्याप्त इंद्र, वायु, उषा, रात्रि
तथा अश्विनीकुमारों की स्तुति करो. (३)
कथा कविस्तुवीरवान्कया गिरा बृहस्पतिर्वावृधते सुवृक्तिभिः.
अज एकपात्सुहवेभिरृक्वभिरहिः शृणोतु बुध्न्यो३ हवीमनि.. (४)
विद्वान् अग्नि किस प्रकार अनेक स्तोताओं वाले एवं किस स्तुति से वृद्धियुक्त होते हैं?
बृहस्पति देव शोभन स्तुतियों से बढ़ते हैं. अजएकपात् एवं अहिर्बुध्न्य नामक देव आह्वान के
समय हमारे द्वारा रचित शोभन-स्तोत्रों को सुनें. (४)
दक्षस्य वादिते जन्मनि व्रते राजाना मित्रावरुणा विवाससि.
अतूर्त्तपन्थाः पुरुरथो अर्यमा सप्तहोता विषुरूपेषु जन्मसु.. (५)
हे पृथ्वी! तुम सूर्य के जन्म के समय तेजस्वी मित्र एवं वरुण की सेवा करती हो. सूर्य
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विशाल रथ पर चढ़कर धीरे-धीरे जाते हैं. सात होता वाले सूर्य के अनेक रूप हैं. (५)
ते नो अर्वन्तो हवनश्रुतो हवं विश्वे शृण्वन्तु वाजिनो मित्रद्रवः.
सहस्रसा मेधसाताविव त्मना महो ये धनं समिथेषु जभ्रिरे.. (६)
इंद्र के वे प्रसिद्ध घोड़े हमारा आह्वान सुनें जो सबकी पुकार सुनते हैं, मार्ग पर सधे हुए
चरण रखते हैं, यज्ञ के समय हजारों की संख्या में धन देते हैं एवं युद्ध के समय शत्रुओं से
स्वयं ही महान् धन ले आते हैं. (६)
प्र वो वायुं रथयुजं पुरन्धिं स्तोमैः कृणुध्वं सख्याय पूषणम्.
ते हि देवस्य सवितुः सवीमनि क्रतुं सचन्ते सचितः सचेतसः.. (७)
हे स्तोताओ! रथ में घोड़े जोड़ने वाले वायु, अनेक कर्म करने वाले इंद्र एवं पूषा की
स्तुति करके उनसे अपनी मित्रता स्वीकार कराओ. वे समान बुद्धि वाले एवं ज्ञानयुक्त होकर
प्रातःकाल में सविता देव का यज्ञ करते हैं. (७)
त्रिः सप्त सस्रा नद्यो महीरपो वनस्पतीन्पर्वताँ अग्निमूतये.
कृशानुमस्तॄंस्तिष्यं सधस्थ आ रुद्रं रुद्रेषु रुद्रियं हवामहे.. (८)
हम यज्ञ में सोम की रक्षा के निमित्त इक्कीस जल वाली विशाल वनस्पतियों, पर्वतों
अग्नि, कृशानु नामक सोमपालक गंधर्व, बाण चलाने वाले गंधर्वों, नक्षत्रों व स्तुतियोग्य रुद्र
को बुलाते हैं. (८)
सरस्वती सरयुः सिन्धुरूर्मिभिर्महो महीरवसा यन्तु वक्षणीः.
देवीरापो मातरः सूदयित्न्वो घृतवत्पयो मधुमन्नो अर्चत.. (९)
परम महान् एवं तरंगों वाली सरस्वती, सरयू, सिंधु आदि इक्कीस नदियां रक्षा के लिए
हमारे यज्ञ में आवें. जल बहाने वाली एवं माता के समान ये दिव्य नदियां हमें घी और मधु के
समान जल प्रदान करें. (९)
उत माता बृहद्दिवा शृणोतु नस्त्वष्टा देवेभिर्जन्निभिः पिता वचः.
ऋभुक्षा वाजो रथस्पतिर्भगो रण्वः शंसः शशमानस्य पातु नः.. (१०)
विशाल दीप्ति वाली देवमाता हमारी पुकार सुनें. त्वष्टा अपने पुत्र देवों तथा उनकी
पत्नियों के साथ हमारा वचन सुनें. ऋभुक्षा, वाज, रथपति भग व रमणीय मरुद्गण हम
स्तोताओं की रक्षा करें. (१०)
रण्वः संदृष्टौ पितुमाँ इव क्षयो भद्रा रुद्राणां मरुतामुपस्तुतिः.
गोभिः ष्याम यशसो जनेष्वा सदा देवास इळया सचेमहि.. (११)
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मरुद्गण अन्न वाले घर के समान देखने में सुंदर हैं. रुद्रपुत्र मरुतों की स्तुति
कल्याणकारिणी है. हम गायों रूपी धन से युक्त होकर मानवों में यशस्वी बनें. हे देवो! हम
सदा अन्न से युक्त हों. (११)
यां मे धियं मरुत इन्द्र देवा अददात वरुण मित्र यूयम्.
तां पीपयत पयसेव धेनुं कुविद्गिरो अधि रथे वहाथ.. (१२)
हे मरुतो, इंद्र, देवगण, वरुण एवं मित्र! जिस प्रकार गाय दूध से भरी रहती है, उसी
प्रकार तुम मेरे कर्म को फलयुक्त करो. तुम हमारी स्तुतियां सुनकर रथ के द्वारा यज्ञ में आए
हो. (१२)
कुविदङ्ग प्रति यथा चिदस्य नः सजात्यस्य मरुतो बुबोधथ.
नाभा यत्र प्रथमं संनसामहे तत्र जामित्वमदितिर्दधातु नः.. (१३)
हे मरुतो! तुमने पहले अनेक बार जैसा हमारी मैत्री को जाना है, उसी प्रकार इस बार
भी जानो. धरती की नाभितुल्य जिस वेदी पर हम हव्य से मिलते हैं, वहां देवमाता अदिति
हमारे साथ मित्रता करें. (१३)
ते हि द्यावापृथिवी मातरा मही देवी देवाञ्जन्मना यज्ञिये इतः.
उभे बिभृत उभयं भरीमभिः पुरू रेतांसि पितृभिश्च सिञ्चतः.. (१४)
सबका निर्माण करने वाले, महान्, दिव्य एवं यज्ञ के योग्य द्यावा-पृथिवी जन्म के साथ
ही देवों को प्राप्त करते हैं. ये द्यावा-पृथिवी नानाविध उपायों से देवों और मानवों की रक्षा
करते हैं तथा पितृतुल्य देवों के साथ जल बरसाते हैं. (१४)
वि षा होत्रा विश्वमश्नोति वार्यं बृहस्पतिररमतिः पनीयसी.
ग्रावा यत्र मधुषुदुच्यते बृहदवीवश्नन्त मतिभिर्मनीषिणः.. (१५)
बड़ों का पालन करने वाली, पर्याप्त स्तुति वाली, देवों की अधिक स्तुति करने वाली एवं
सोमरस निचोड़ने के कारण महती वाणी सभी उत्तम धनों को व्याप्त करती हैं. विद्वान् स्तोता
अपनी स्तुतियों से देवों को यज्ञ का अभिलाषी बनाते हैं. (१५)
एवा कविस्तुवीरवाँ ऋतज्ञा द्रविणस्युर्द्रविणसश्चकानः.
उक्थेभिरत्र मतिभिश्च विप्रोऽपीपयदगयो दिव्यानि जन्म.. (१६)
कवि अनेक प्रकार की स्तुतियों वाले, यज्ञ के ज्ञाता, धन के इच्छुक, पशु आदि के
अभिलाषी एवं मेधावी गय ऋषि ने धन की कामना करते हुए उक्थों और स्तोत्रों द्वारा देवों
की स्तुति की थी. (१६)
एवा प्लतेः सूनुरवीवृधद्वो विश्व आदित्या अदिते मनीषी.
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ईशानासो नरो अमर्त्येनास्तावि जनो दिव्यो गयेन.. (१७)
हे अदितिपुत्र देवो और देवमाता अदिति! प्लुति के पुत्र एवं विद्वान् गय ऋषि ने तुम सब
लोगों को बढ़ाया था. देवों की कृपा से मानवों को प्रभुता मिलती है. गय ऋषि ने देवसमूह की
स्तुति की थी. (१७)
सूक्त—६५ देवता—विश्वेदेव
अग्निरिन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा वायुः पूषा सरस्वती सजोषसः.
आदित्या विष्णुर्मरुतः स्वबृहत् सोमो रुद्रो अदितिर्ब्रह्मणस्पतिः.. (१)
अग्नि, इंद्र, मित्र, अर्यमा, वायु, पूषा, सरस्वती, आदित्यगण, विष्णु, मरुद्गण, स्वर्ग,
विशाल स्वर्ग, सोम, रुद्र, अदिति और ब्रह्मणस्पति सब मिलकर अपनी महिमा से अंतरिक्ष को
पूर्ण करते हैं. (१)
इन्द्राग्नी वृत्रहत्येषु सत्पती मिथे हिन्वाना तन्वा३ समोकसा.
अन्तरिक्षं मह्या पप्रुरोजसा सोमो घृतश्रीर्महिमानमीरयन्.. (२)
सज्जनों के पालक, युद्ध में एकत्र होकर शरीरबल से शत्रुओं का नाश करने वाले एवं
महान् आकाश को अपने तेज से पूर्ण करने वाले इंद्र अग्नि के बल को घृतमिश्रित सोमरस से
बढ़ाते हैं. (२)
तेषां हि मह्ना महतामनर्वणां स्तोमाँ इयर्म्यृतज्ञा ऋतावृधाम्.
ये अप्सवमर्णवं चित्रराधस्ते नो रासन्तां महये सुमित्र्याः.. (३)
यज्ञ का ज्ञाता मैं अपने महत्त्व से महान् शत्रुओं द्वारा अपराजेय एवं यज्ञ की वृद्धि करने
वाले देवों की स्तुति करता हूं. विचित्र धन से युक्त वे देव मेघों से जल बरसाते हैं. शोभन मैत्री
वाले वे देव हमें धन देकर मानवों में श्रेष्ठ बनावें. (३)
स्वर्णरमन्तरिक्षाणि रोचना द्यावाभूमी पृथिवीं स्कम्भुरोजसा.
पृक्षा इव महयन्तः सुरातयो देवाः स्तवन्ते मनुषाय सूरयः.. (४)
उन्हीं देवों ने अपनी शक्ति से सबके नेता सूर्य, आकाश में स्थित तेजस्वी नक्षत्रों, द्युलोक
एवं धरती को स्थित किया है. दरिद्रों को धन दान करने के समान स्तोताओं को धन से
सम्मानित करने वाले देव मानवों को श्रेष्ठ बनाते हैं. हम यज्ञों में ऐसे देवों की स्तुति करते हैं.
(४)
मित्राय शिक्ष वरुणाय दाशुषे या सम्राजा मनसा न प्रयुच्छतः.
ययोर्धाम धर्मणा रोचते बृहद् ययोरुभे रोदसी नाधसी वृतौ.. (५)
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स्तोताओं को धन देने वाले मित्र और वरुण को हव्य दो. भली प्रकार सुशोभित ये दोनों
मन से कभी असावधान नहीं होते. इनका शरीर अपने तेज से प्रकाशित होता है. विस्तृत
द्यावा-पृथिवी याचना करती हुई इनके समीप उपस्थित होती है. (५)
या गौर्वर्तनिं पर्येति निष्कृतं पयो दुहाना व्रतनीरवारतः.
सा प्रब्रुवाणा वरुणाय दाशुषे देवेभ्यो दाशद्धविषा विवस्वते.. (६)
मेरी जो दुधारू व यज्ञसंपादिका गाय बिना प्रार्थना के यज्ञ में आती है, वह वरुण को
हव्य देने वाले तथा अन्न द्वारा अन्य देवों की सेवा करने वाले मेरी रक्षा करें. मैं उस गाय की
स्तुति करता हूं. (६)
दिवक्षसो अग्निजिह्वा ऋतावृध ऋतस्य योनिं विमृशन्त आसते.
द्यां स्कभित्व्य१ प आ चक्रुरोजसा यज्ञं जनित्वी तन्वी३ नि मामृजुः.. (७)
अपने तेज से आकाश को पूर्ण करने वाले, अग्निरूपी जिह्वा वाले व यज्ञ की वृद्धि
करने वाले देव यज्ञ में अपना-अपना स्थान पहचान कर बैठते हैं. आकाश को धारण करके
अपनी शक्ति से जल निकालते हैं एवं यज्ञ के द्रव्यों को अपने शरीर में सुशोभित करते हैं. (७)
परिक्षिता पितरा पूर्वजावरी ऋतस्य योना क्षयतः समोकसा.
द्यावापृथिवी वरुणाय सव्रते घृतवत्पयो महिषाय पिन्वतः.. (८)
सर्वत्र व्याप्त, सबके माता-पिता के समान, सबसे पहले उत्पन्न होने वाले एवं समान
स्थान वाले द्यावा-पृथिवी यज्ञस्थल में रहते हैं. समान कर्म वाले द्यावा-पृथिवी पूज्य वरुण को
बहने वाले जल से सींचते हैं. (८)
पर्जन्यावाता वृषभा पुरीषिणेन्द्रवायू वरुणो मित्रो अर्यमा.
देवाँ आदित्याँ अदितिं हवामहे ये पार्थिवासो दिव्यासो अप्सु ये.. (९)
अभिलाषापूरक तथा जलयुक्त मेघ एवं वायु को व इंद्र, वरुण, अर्यमा, अदितिपुत्र देवों
एवं देवमाता अदिति को हम बुलाते हैं. हम पृथ्वी, आकाश एवं जल में स्थित देवों को भी
बुलाते हैं. (९)
त्वष्टारं वायुमृभवो य ओहते दैव्या होतारा उषसं स्वस्तये.
बृहस्पतिं वृत्रखादं सुमेधसमिन्द्रियं सोमं धनसा उ ईमहे.. (१०)
हे ऋभुओ! हम उन्हीं सोम से धन की याचना करते हैं जो तुम्हारे कल्याण के निमित्त
देवों को बुलाने वाले त्वष्टा, वायु एवं उषा के पास जाते हैं, जो बृहस्पति एवं शोभन मेधा वाले
इंद्र के समीप पहुंचते हैं एवं इंद्र को प्रसन्न करते हैं. (१०)
ब्रह्म गामश्वं जनयन्त ओषधीर्वनस्पतीन्पृथिवीं पर्वताँ अपः.
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सूर्यं दिवि रोहयन्तः सुदानव आर्या व्रता विसृजन्तो अधि क्षमि.. (११)
देवों ने अन्न, गाय, घोड़े, वृक्षों, वनस्पतियों, पृथ्वी, पर्वतों और जलों को उत्पन्न किया है
एवं सूर्य को आकाश में चढ़ाया है. शोभन दान वाले देवों ने धरती पर उत्तम कार्य किए हैं.
(११)
भुज्युमंहसः पिपृथो निरश्विना श्यावं पुत्रं वध्रिमत्या अजिन्वतम्.
कमद्युवं विमदायोहथुर्युवं विष्णाप्वं विश्वकायाव सृजथः.. (१२)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने भुज्यु को उपद्रवकारी समुद्र से बचाया, वध्रिमती को सोने के
रंग वाला पुत्र दिया, विमद ऋषि को कामोद्दीपक पत्नी दी तथा विश्वक ऋषि को विष्णाप्व
नामक पुत्र दिया. (१२)
पावीरवी तन्यतुरेकपादजो दिवो धर्ता सिन्धुरापः समुद्रियः.
विश्वे देवासः शृणवन्वचांसि मे सरस्वती सह धीभिः पुरन्ध्या.. (१३)
आयुधों वाली एवं गर्जन करने वाली मध्यम वाणी, द्युलोक को धारण करने वाले
अजएकपात्, सिंधु, सागर का जल, विश्वेदेव एवं कर्मों के साथ अनेक प्रकार की बुद्धियों से
युक्त सरस्वती मेरे वचनों को सुनें. (१३)
विश्वे देवाः सह धीभिः पुरन्ध्या मनोर्र्यजत्रा अमृता ऋतज्ञाः.
रातिषाचो अभिषाचः स्वर्विदः स्वर्णिगरो ब्रह्म सूक्तं जुषेरत.. (१४)
कर्मों एवं ज्ञानों से युक्त, मानवीय यज्ञों में सत्कार के पात्र, मरणरहित, सत्य को जानने
वाले, हव्यग्रहणकर्त्ता, सामने से यज्ञ में सम्मिलित होने वाले एवं सब कुछ प्राप्त करने वाले
इंद्रादि देव हमारी स्तुतियों एवं अन्न को ग्रहण करें. (१४)
देवान्वसिष्ठो अमृतान्ववन्दे ये विश्वा भुवनाभि प्रतस्थुः.
ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१५)
वसिष्ठ वंश में उत्पन्न ऋषि ने मरणरहित देवों की वंदना की है. वे देव सभी लोकों में
स्थित हैं. वे हमें आज अधिक यशस्कर अन्न दें. हे देवो! तुम कल्याणकारी साधनों द्वारा
हमारी रक्षा करो. (१५)
सूक्त—६६ देवता—विश्वेदेव
देवान्हुवे बृहच्छ्रवसः स्वस्तये ज्योतिष्कृतो अध्वरस्य प्रचेतसः.
ये वावृधुः प्रतरं विश्ववेदस इन्द्रज्येष्ठासो अमृता ऋतावृधः.. (१)
मैं अधिक अन्न वाले, आदित्यतेज के कर्त्ता, उत्तम ज्ञान वाले, इंद्रप्रमुख, मरणरहित व
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यज्ञ के द्वारा प्रवृद्ध देवों को इसलिए बुलाता हूं कि मेरा यज्ञ बिना विघ्नों के समाप्त हो सके.
(१)
इन्द्रप्रसूता वरुणप्रशिष्टा ये सूर्यस्य ज्योतिषो भागमानशुः.
मरुद्गणे वृजने मन्म धीमहि माघोने यज्ञं जनयन्त सूरयः.. (२)
हम इंद्र द्वारा प्रेरित, वरुण द्वारा अनुमोदित, ज्योतिर्मय सूर्य के मार्ग को व्याप्त करने
वाले एवं शत्रुनाशक मरुतों की स्तुति करते हैं. हे विद्वान् यजमान! उन्हीं इंद्र पुत्र मरुतों के
लिए हम यज्ञ की तैयारी करते हैं. (२)
इन्द्रो वसुभिः परि पातु नो गयमादित्यैर्नो अदितिः शर्म यच्छतु.
रुद्रो रुद्रेभिर्देवो मृळयाति नस्त्वष्टा नो ग्नाभिः सुविताय जिन्वतु.. (३)
इंद्र वसुओं के साथ हमारे घर की रक्षा करें. अदिति देवों के साथ हमारा कल्याण करें.
रुद्रदेव मरुतों के साथ हमें सुखी करें. त्वष्टा अपनी पत्नियों के साथ हमें अभ्युदय के लिए
प्रसन्न करें. (३)
अदितिर्द्यावापृथिवी ऋतं महदिन्द्राविष्णू मरुतः स्वर्बृहत्.
देवाँ आदित्याँ अवसे हवामहे वसून् रुद्रान्तस्वितारं सुदंससम्.. (४)
अदिति, द्यावा-पृथिवी, महान् सत्य, इंद्र, विष्णु, मरुत्, विस्तृत स्वर्ग, देवों, आदित्यों,
वसुओं, रुद्रों और उत्तम दान करने वाले सूर्य को हम अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं. (४)
सरस्वान्धीभिर्वरुणो धृतव्रतः पूषा विष्णुर्महिमा वायुरश्विना.
ब्रह्मकृतो अमृता विश्ववेदसः शर्म नो यंसन् त्रिवरूथमंहसः.. (५)
बुद्धि से युक्त सागर, व्रत धारण करने वाले वरुण, पूषा, महत्त्वयुक्त विष्णु, वायु,
अश्विनीकुमार व स्तोता को अन्न देने वाले, मरणरहित, सर्वज्ञ व पापनाशक देवगण हमें तीन
मंजिल वाला मकान दें. (५)
वृषा यज्ञो वृषणः सन्तु यज्ञिया वृषणो देवा वृषणो हविष्कृतः.
वृषणा द्यावापृथिवी ऋतावरी वृषा पर्जन्यो वृषणो वृषस्तुभः.. (६)
यज्ञ हमारी कामनाएं पूरी करें. यज्ञ के पात्र देवगण हमारी अभिलाषा पूरी करने वाले
हों. देवगण, हव्य संग्रह करने वाले, यज्ञयुक्त ऋतावरी, पर्जन्य और स्तोता सब हमारी कामना
करें. (६)
अग्नीषोमा वृषणा वाजसातये पुरुप्रशस्ता वृषणा उप ब्रुवे.
यावीजिरे वृषणो देवयज्यया ता नः शर्म त्रिवरूथं वि यंसतः.. (७)
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अभीष्टदाता एवं बहुतों द्वारा प्रशंसित अग्नि व सोम की स्तुति मैं अन्न पाने के लिए
करता हूं. ऋत्विज् यज्ञ में हव्यों द्वारा उनकी पूजा करते हैं. वे हमें तीन मंजिल वाला मकान
दें. (७)
धृतव्रताः क्षत्रिया यज्ञनिष्कृतो बृहद्दिवा अध्वराणामभिश्रियः.
अग्निहोतार ऋतसापो अद्रुहोऽपो असृजन्ननु वृत्रतूर्ये.. (८)
व्रतपालन में तत्पर, शक्तिशाली, यज्ञ को अलंकृत करने वाले, महान् तेजस्वी, यज्ञ में
सम्मिलित होने वाले, अग्नि द्वारा बुलाए हुए एवं सत्य के पात्र देवों ने वृत्रयुद्ध के समय जल
की रचना की. (८)
द्यावापृथिवी जनयन्नभि व्रताप ओषधीर्वनिनानि यज्ञिया.
अन्तरिक्षं स्व१रा पप्रूरतये वशं देवासस्तन्वी३ नि मामृजुः.. (९)
इंद्रादि देवों ने द्यावा-पृथिवी को लक्ष्य करके अपने कर्म से जल, ओषधियां, यज्ञ के
उपयोग में आने वाली पलाश आदि की लकड़ियां बनाकर शत्रुओं से रक्षा के लिए स्वर्ग और
आकाश को अपने तेज द्वारा पूर्ण कर दिया. देवों ने अभिलषित यज्ञ को अपने शरीरों में
अलंकृत किया. (९)
धर्तारो दिव ऋभवः सुहस्ता वातापर्जन्या महिषस्य तन्यतोः.
आप ओषधीः प्र तिरन्तु नो गिरो भगो रातिर्वाजिनो यन्तु मे हवम्.. (१०)
सुंदर हाथों वाले ऋभु स्वर्ग को धारण करने वाले हैं. वायु और बादल महान् शब्द करते
हैं. जल और वनस्पतियां हमारी स्तुतियों को बढ़ावें. धन देने वाले भग एवं सूर्य हमारे यज्ञ में
आवें. (१०)
समुद्रः सिन्धु रजो अन्तरिक्षमज एकपात्तनयित्नुरर्णवः.
अहिर्बुध्न्यः शृणवद्वचांसि मे विश्वे देवास उत सूर्यो मम.. (११)
सागर, सरिता, धूल से भरी धरती, अंतरिक्ष, अजएकपात्, गरजने वाला मेघ और
अहिर्बुध्न्य मेरी पुकार सुनें. सभी देव एवं विद्वान् मेरी स्तुति सुनें. (११)
स्याम वो मनवो देववीतये प्राञ्चं नो यज्ञं प्र णयत साधुया.
आदित्या रुद्रा वसवः सुदानव इमा ब्रह्म शस्यमानानि जिन्वत.. (१२)
हे देव! हम मानव तुम्हें यज्ञ अर्पण करने वाले बनें. हमारे प्राचीन यज्ञ को तुम पूर्ण करो.
हे आदित्यो, रुद्रपुत्र मरुतो एवं शोभन-दान वाले वसुओ! तुम इन उच्चरित स्तोत्रों को सुनो.
(१२)
दैव्या होतारा प्रथमा पुरोहित ऋतस्य पन्थामन्वेमि साधुया.
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क्षेत्रस्य पतिं प्रतिवेशमीमहे विश्वान्देवाँ अमृताँ अप्रयुच्छतः.. (१३)
पुरोहितों में प्रमुख व देवों को बुलाने वाले अग्नि एवं आदित्य की सेवा मैं हव्य द्वारा
करता हूं एवं विघ्नरहित होकर यज्ञमार्ग का अनुगमन करता हूं. मैं अपने समीपवर्ती, क्षेत्रपति,
मरणरहित एवं प्रमादरहित सभी देवों से याचना करता हूं. (१३)
वसिष्ठासः पितृवद्वाचमक्रत देवाँ ईळाना ऋषिवत् स्वस्तये.
प्रीता इव ज्ञातयः काममेत्यास्मे देवासोऽव धूनुता वसु.. (१४)
वसिष्ठ के पुत्रों ने अपने पिता के समान स्तुति की. उन्होंने अपने पिता के समान ही
कल्याण पाने के लिए देवों की प्रशंसा की. प्रसन्न बांधव जिस प्रकार धन देते हैं, उसी प्रकार
तुम हमारे सामने आकर हमारा अभिलाषित धन हमारे समीप लाओ. (१४)
देवान्वसिष्ठो अमृतान्ववन्दे ये विश्वा भुवनाभि प्रतस्थुः.
ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१५)
वसिष्ठ वंश में उत्पन्न ऋषि ने मरणरहित देवों की वंदना की है. वे देव सभी लोकों में
स्थित हैं. वे हमें आज अधिक यश देने वाला अन्न दें. हे देवो! तुम कल्याणकारी साधनों द्वारा
हमारी रक्षा करो. (१५)
सूक्त—६७ देवता—बृहस्पति
इमां धियं सप्तशीर्णीं पिता न ऋतप्रजातां बृहतीमविन्दत्.
तुरीयं स्विज्जनयद्विश्वजन्योऽयास्य उक्थमिन्द्राय शंसन्.. (१)
हमारे पिता अंगिरा ने सत्य से उत्पन्न एवं सात छंदों वाली विशाल स्तुति को बनाया था.
सर्वजनहितकारी अयास्य ऋषि ने इंद्र की प्रशंसा करते हुए एक चरण वाला स्तोत्र भी बनाया.
(१)
ऋतं शंसन्त ऋजु दीध्याना दिवस्पुत्रासो असुरस्य वीराः.
विप्रं पदमङ्गिरसो दधाना यज्ञस्य धाम प्रथमं मनन्त.. (२)
अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने सत्य भाषण करते हुए व कल्याण का ध्यान करते हुए यज्ञ के
सुंदर तेज को धारण करके प्रारंभ से ही बृहस्पति की स्तुति की. वे ऋषि दीप्त एवं बुद्धिशाली
अग्नि के पुत्र हैं एवं उनका मन सरल है. (२)
हंसैरिव सखिभिर्वावदद्भिरश्मन्मयानि नहना व्यस्यन्.
बृहस्पतिरभिकनिक्रदद्गा उत प्रास्तौदुच्च विद्वाँ अगायत.. (३)
बृहस्पति ने हंसों के समान शब्द करने वाले अपने मित्रों की सहायता से पणियों द्वारा
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चुराई गई गायों का पाषाणमय द्वार खोला तथा रंभाती हुई गायों के बंधन ढीले किए.
बृहस्पति ने उच्च स्वर से स्तुति की तथा सब जानते हुए गान किया. (३)
अवो द्वाभ्यां पर एकया गा गुहा तिष्ठन्तीरनृतस्य सेतौ.
बृहस्पतिस्तमसि ज्योतिरिच्छन्नुदस्रा आकर्वि हि तिस्र आवः.. (४)
उस अंधकारपूर्ण गुफा में स्थित गायों को नीचे एक एवं ऊपर दो द्वारों की सहायता से
छिपाया गया था. बृहस्पति ने अंधकार में प्रकाश ले जाने की इच्छा करते हुए तीनों द्वारों को
खोला और गायों को बाहर निकाल दिया. (४)
विभिद्या पुरं शयथेमपाचीं निस्त्रीणि साकमुदधेरकृन्तत्.
बृहस्पतिरुषसं सूर्यं गामर्कं विवेद स्तनयन्निव द्यौः.. (५)
बृहस्पति रात भर सोते रहे. प्रातः उन्होंने गुहा का पिछला भाग तोड़ा तथा बादल के
समान राक्षस की उस गुफा के तीनों द्वार खोल दिए. बृहस्पति ने प्रातःकाल सूर्य एवं गायों को
एक साथ देखा. बृहस्पति उस समय मेघ के समान गर्जन कर रहे थे. (५)
इन्द्रो वलं रक्षितारं दुघानां करेणेव वि चकर्ता रवेण.
स्वेदाञ्जिभिराशिरमिच्छमानोऽरोदयत्पणिमा गा अमुष्णात्.. (६)
बृहस्पति ने दुधारू गायों की रक्षा करने वाले असुर को हुंकार से इस प्रकार नष्ट कर
दिया, जैसे अपने हाथ के आयुध से मारा हो. उन्होंने मरुतों के साथ संयोग की इच्छा करते
हुए पणियों को रुलाया और गायों को वापस ले आए. (६)
स ईं सत्येभिः सखिभिः शुचद्भिर्गोधायसं वि धनसैरदर्दः.
ब्रह्मणस्पतिर्वृषभिर्वराहर्घर्मस्वेदेभिर्द्रविणं व्यानट्.. (७)
बृहस्पति ने अपने तेजस्वी, सत्यवादी एवं धन देने वाले सहायकों से मिलकर गायों को
रोकने वाले राक्षस को विदीर्ण कर दिया. स्तोत्रों के स्वामी बृहस्पति ने जल बरसाने वाले, जल
का आहरण करने वाले एवं दीप्त आगमन वाले मरुतों के साथ गोधन को बाहर निकाला.
(७)
ते सत्येन मनसा गोपतिं गा इयानास इषणयन्त धीभिः.
बृहस्पतिर्मिथो अवद्यपेभिरुदुस्रिया असृजत स्वयुग्भिः.. (८)
मरुतों ने सच्चे मन से पणियों द्वारा अपहृत गायों को अपने कर्मों से प्राप्त करके
बृहस्पति को गायों का स्वामी बनाने की अभिलाषा की. बृहस्पति ने अपने सहयोगी मरुतों के
साथ गायों को गुफा से बाहर किया. (८)
तं वर्धयन्तो मतिभिः शिवाभिः सिंहमिव नानदतं सधस्थे.
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बृहस्पतिं वृषणं शूरसातौ भरेभरे अनु मदेम जिष्णुम्.. (९)
हम मरुद्गण तथा अंतरिक्ष में सिंह के समान गर्जन करने वाले, अभिलाषापूरक एवं
विजयशील बृहस्पति को कल्याणकारिणी स्तुतियों के द्वारा बढ़ाते हैं एवं संग्रामों में उनकी
प्रशंसा करते हैं. (९)
यदा वाजमसनद्विश्वरूपमा द्यामरुक्षदुत्तराणि सद्य.
बृहस्पतिं वृषणं वर्धयन्तो नाना सन्तो बिभ्रतो ज्योतिरासा.. (१०)
बृहस्पति जिस समय नानारूप वाले अन्नों का उपयोग करते हैं और जब अंतरिक्ष
अथवा ऊंचे स्थानों पर चढ़ते हैं, उस समय नाना दिशाओं में स्थित तेजस्वी देवगण अभिलाषा
पूर्ण करने वाले बृहस्पति की स्तुति अपने मुंह से करते हैं. (१०)
सत्यामाशिषं कृणुता वयोधै कीरिं चिद्द्यावथ स्वेभिरेवैः.
पश्चा मृधो अप भवन्तु विश्वास्तद्रोदसी शृणुतं विश्वमिन्वे.. (११)
हे देवो! मेरी अन्न संबंधी स्तुति को सच्चा बनाओ. अपने गमनों द्वारा मुझ स्तोता की
रक्षा करो. मेरे शत्रु नष्ट हों. सबको प्रसन्न करने वाली द्यावा-पृथिवी मेरे वचन को सुनें. (११)
इन्द्रो महा महतो अर्णवस्य वि मूर्धानमभिनदर्बुदस्य.
अहन्नहिमरिणात्सप्त सिन्धून्देवैर्द्यावापृथिवी प्रावतं नः.. (१२)
स्वामी एवं महत्त्वशाली बृहस्पति ने महान् एवं उदकपूर्ण मेघ का मस्तक काट डाला.
उन्होंने जल रोकने वाले राक्षस को मारा एवं सात नदियों को प्रवाहित किया. हे द्यावा-
पृथिवी! तुम देवों के साथ मिलकर हमारी रक्षा करो. (१२)
सूक्त—६८ देवता—बृहस्पति
उदप्रुतो न वयो रक्षमाणा वावदतो अभ्रियस्येव घोषाः.
गिरिभ्रजो नोर्मयो मदन्तो बृहस्पतिमभ्यर्का अनावन्.. (१)
खेतों को जल से सींचने वाले किसान पकी फसलों को रखाते समय जैसा शब्द करते हैं
अथवा बादल जिस प्रकार गर्जन करते हैं अथवा बादलों से गिरा हुआ जल समूह जिस प्रकार
नाद करता है, उसी प्रकार स्तोताओं ने बृहस्पति की स्तुति की. (१)
सं गोभिराङ्गिरसो नक्षमाणो भग इवेदर्यमणं निनाय.
जने मित्रो न दम्पती अनक्ति बृहस्पते वाजयाशूँरिवाजौ.. (२)
अंगिरा ऋषि के पुत्र एवं भगदेव के समान अपने तेज से सबको व्याप्त करते हुए
बृहस्पति गुफा में बंद गायों तक सूर्य का प्रकाश ले गए. सूर्य जिस प्रकार जनपद में अपनी
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किरणों का संयोग करता है एवं पतिपत्नी को परस्पर मिलाता है, उसी प्रकार बृहस्पति ने
गायों को उनके स्वामियों से मिलाया. हे बृहस्पति! गायों को युद्ध में दौड़ने वाले घोड़ों के
समान दौड़ाओ. (२)
साध्वर्या अतिथिनिरीषिराः स्पार्हाः सुवर्णा अनवद्यरूपाः.
बृहस्पतिः पर्वतेभ्यो वितुर्या निर्गा ऊपे यवमिव स्थिविभ्यः.. (३)
अन्न की कुठिया से जिस प्रकार जौ बाहर निकाले जाते हैं, उसी प्रकार बृहस्पति ने
कल्याणकारी दूध देने वाली, नित्य गमनशील, स्पृहणीय, शोभन वर्ण वाली और
प्रशंसनीयरूप से युक्त गायों को पर्वत से बाहर निकाला. (३)
आपुषायन्मधुन ऋतस्य योनिमवक्षिपन्नर्क उल्कामिव द्योः.
बृहस्पतिरुद्धरन्नश्मनो गा भूम्या उदनेव वि त्वचं बिभेद.. (४)
आदरणीय बृहस्पति ने धरती को जल से सींचते हुए एवं मेघ को वर्षा के निमित्त
बिखेरते हुए पणियों द्वारा छीनी हुई गायों को पर्वत से निकालकर धरातल को उनके खुरों से
इस प्रकार छिन्नभिन्न कराया, जिस प्रकार सूर्य आकाश से अपनी किरणें गिराते हैं. (४)
अप ज्योतिषा तमो अन्तरिक्षादुदनः शीपालमिव वात आजत्.
बृहस्पतिरनुमृश्या वलस्याभ्रमिव वात आ चक्र आ गाः.. (५)
वायु जिस प्रकार जल से काई हटा देता है, उसी प्रकार बृहस्पति ने सूर्य के प्रकाश द्वारा
पर्वत का अंधकार समाप्त किया. हवा जिस तरह बादलों को हटाती है, उसी प्रकार बृहस्पति
ने विचार करके बल नामक राक्षस के स्थान में छिपी हुई गायों को बाहर निकाला. (५)
यदा वलस्य पीयतो जसुं भेद बृहस्पतिरग्नितपोभिरर्कैः.
दद्भिर्न जिह्वा परिविष्टमाददाविर्निधौरकृणोदुस्रियाणाम्.. (६)
बृहस्पति ने जिस समय हिंसक बल असुर के आयुधों को सूर्य के समान तेजस्वी तथा
अग्नि के समान तृप्त करने वाले आयुधों द्वारा छिन्नभिन्न किया, उसी समय गायों पर
अधिकार कर लिया. जीभ जिस प्रकार दांतों द्वारा काटे हुए पदार्थ का भक्षण करती है, उसी
प्रकार बृहस्पति ने बल को मारकर गायों को प्राप्त किया. (६)
बृहस्पतिरमत हि त्यदासां नाम स्वरीणां सदने गुहा यत्.
आण्डैव भित्त्वा शकुनस्य गर्भमुदुस्रियाः पर्वतस्य त्मनाजत.. (७)
बृहस्पति ने गुफा में रंभाने वाली गायों का स्वर जिस समय जाना, उसी समय पर्वत को
भेदकर अकेले ही गाएं इस प्रकार बाहर निकालीं, जिस प्रकार पक्षी अंडे को फोड़कर बच्चा
बाहर निकालता है. (७)
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अश्नापिनद्धं मधु पर्यपश्यन्मत्स्यं न दीन उदनि क्षियन्तम्.
निष्टज्जभार चमसं न वृक्षाद् बृहस्पतिर्विर्वेणा विकृत्य.. (८)
बृहस्पति ने पर्वत में बंद मधुर गायों को इस प्रकार देखा, जिस प्रकार थोड़े जल में
मछलियां विकल दिखाई देती हैं. जिस प्रकार पेड़ की लकड़ी से सोमरस का पात्र चमस
निकाला जाता है, उसी प्रकार बृहस्पति ने पर्वत से गायों को बाहर निकाला. (८)
सोषामविन्दत्स स्व१: सो अग्निं सो अर्केण वि बबाधे तमांसि.
बृहस्पतिर्गोवपुषो वलस्य निर्मज्जानं न पर्वणो जभार.. (९)
बृहस्पति ने गायों को देखने के लिए उषा को प्राप्त किया तथा सूर्य एवं अग्नि की
सहायता से अंधकार को मिटाया. जैसे हड्डी से मज्जा बाहर निकाली जाती है, उसी प्रकार
बृहस्पति ने बल राक्षस की सुरक्षा से गायों को बाहर निकाला. (९)
हिमेव पर्णा मुषिता वनानि बृहस्पतिनाकृपयद्वलो गा:.
अनानुकृत्यमपुनश्चकार यात्सूर्यामासा मिथ उच्चरात:.. (१०)
पाला जिस प्रकार कमल के पत्तों को नष्ट कर देता है, उसी प्रकार बल राक्षस द्वारा
चुराई गई गायों का बृहस्पति ने हरण किया. यह कार्य दूसरे के द्वारा होना संभव नहीं था और
न कोई इसका अनुकरण कर सकता है. इस कार्य से सूर्य और चंद्रमा दिन तथा रात में उदित
होने लगे. (१०)
अभि श्यावं न कृशनेभिरश्वं नक्षत्रेभि: पितरो द्यामपिंशन्.
रात्र्यां तमो अदधुर्ज्योतिरहन्बृहस्पतिर्भिन्दद्रिं विदद्गा:.. (११)
सबका पालन करने वाले देवों ने आकाश को नक्षत्रों से इस प्रकार सजाया है, जिस
प्रकार काले रंग के घोड़े को सोने के आभूषणों से सुशोभित किया जाता है. देवों ने रात में
अंधकार तथा दिन में प्रकाश धारण किया. उसी समय बृहस्पति ने अपनी शक्ति से
शिलासमूह को भेदकर गायों को प्राप्त किया. (११)
इदमकर्म नमो अभियाय य: पूर्वीर्वन्वानोनवीति.
बृहस्पति: स हि गोभि: सो अश्वै: स वीरेभि: स नृभिनो वयो धात्.. (१२)
जिन बृहस्पति ने अनेक ऋचाओं को क्रम से कहा तथा जो आकाशवासी हो गए हैं,
उनको हमने नमस्कार किया. वे हमें गायों, घोड़ों, संतान एवं सेवाओं से युक्त धन दें. (१२)
सूक्त—६९ देवता—अग्नि
भद्रा अग्नेर्ध्वस्यस्य संदृशो वामी प्रणीति: सुरणा उपेतय:.
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यदीं सुमित्रा विशो अग्र इन्धते घृतेनाहुतो जरते दविद्युतत्.. (१)
वध्यश्व ऋषि द्वारा स्थापित अग्नि की मूर्ति देखने योग्य, प्रसन्नता व कल्याणकारिणी
तथा यज्ञ में आगमन रमणीय हो. हम सुमित्र लोग जब अग्नि को पहली बार प्रज्वलित करते
हैं, तब घृताहुति पाकर तेजस्वी अग्नि हमारे द्वारा प्रशंसित होते हैं. (१)
घृतमग्नेर्वध्यश्वस्य वर्धनं घृतमन्नं घृतम्वस्य मेदनम्.
घृतेनाहुत उर्विया वि पप्रथे सूर्य इव रोचते सर्पिरासुतिः.. (२)
वध्यश्व द्वारा स्थापित अग्नि का घृत ही बढ़ाने वाला, आहार एवं पोषक हो. घृत की
आहुति पाकर अग्नि अधिक दीप्त होते हैं. घृत द्वारा हवन किए गए अग्नि सूर्य के समान
प्रकाशित होते हैं. (२)
यत्ते मनुर्यदनीकं सुमित्रः समीधे अग्ने तदिदं नवीयः.
स रेवच्छोच स गिरो जुषस्व स वाजं दर्षि स इह श्रवो धाः.. (३)
हे अग्नि! मनु ने जिस प्रकार तुम्हारी किरणों को दीप्त किया था, उसी प्रकार मैं सुमित्र
ऋषि भी उन्हें दीप्त करता हूं. तुम्हारी किरणें नवीन हैं. तुम धनसंपन्न होकर जलो, हमारी
स्तुतियां स्वीकार करो, शत्रुसेना को मारो एवं हमें अन्न दो. (३)
यं त्वा पूर्वमीळितो वध्यश्वः समीधे अग्ने स इदं जुषस्व.
स नः स्तिपा उत भवा तनूपा दात्रं रक्षस्व यदिदं ते अस्मे.. (४)
हे अग्नि! पहले तुम्हें स्तोता वध्यश्व ने प्रज्वलित किया था. तुम हमारा स्तोत्र स्वीकार
करो. तुम हमारे घर और शरीर के रक्षक बनो. तुमने हमें जो कुछ दिया है, उसकी रक्षा करो.
(४)
भवा द्युम्नी वाध्यश्वोत गोपा मा त्वा तारीदभिमातिर्जनानाम्.
शूर इव धृष्णुश्च्यवनः सुमित्रः प्र नु वोचं वाध्यश्वस्य नाम.. (५)
हे वध्यश्व द्वारा स्थापित अग्नि! तुम तेजस्वी एवं रक्षक बनो. कोई भी तुम्हारी हिंसा न
करे, क्योंकि तुम शत्रु लोगों को पराजित करने वाले हो. तुम शूर के समान शत्रुपराभवकारी
एवं शत्रुनाशक बनो. मैं तुम्हारे नामों का वर्णन करता हूं. (५)
समज्या पर्वत्या३वसूनि दासा वृत्राण्यार्या जिगेथ.
शूर इव धृष्णुश्च्यवनो जनानां त्वमग्ने पृतनायूँरभि ष्याः.. (६)
हे अग्नि! तुमने मानवहितकारी एवं पर्वत पर उत्पन्न धन को दासों से जीत कर आर्यों
को दिया. तुम शूर के समान शत्रुजनों के पराभवकारी एवं नाशक बनो तथा आक्रमणकारियों
से भिड़ जाओ. (६)
दीर्घतन्तुर्बृहदुक्षायमग्निः सहस्रस्तरीः शतनीथ ऋभ्वा.
द्युमान् द्युमत्सु नृभिर्मृज्यमानः सुमित्रेषु दीदयो देवयत्सु.. (७)
हे विशाल स्तुतियों वाले, प्रधान दाता, अनेक प्रकार के हव्यों द्वारा आच्छादित, अनेक
आहवनीय द्वारों से लाए गए, अतिशय प्रदीप्त एवं प्रधान पुरोहितों द्वारा अलंकृत अग्नि! तुम
देवों की कामना करने वाले सुमित्र एवं उसके परिवार वालों के घरों में प्रज्वलित बनो. (७)
त्वे धेनुः सुदुघा जातवेदोऽसश्चतेव समना सबर्धुक्.
त्वं नृभिर्दक्षिणावद्भिरग्ने सुमित्रेभिरिध्यसे देवयद्भिः.. (८)
हे अग्नि! तुम्हारे पास सरलता से दुही जाने वाली, एकमात्र सूर्य से संगत व अमृत देने
वाली गाय है. तुम देवों की कामना करने वाले, दक्षिणायुक्त एवं प्रधान यज्ञकर्त्ता सुमित्रवंशियों
द्वारा प्रज्वलित किए जाते हो. (८)
देवाश्चित्ते अमृता जातवेदो महिमानं वाध्यश्वः प्र वोचन..
यत्सम्पृच्छं मानुषीर्विश आयन्तवं नृभिरजयस्त्वावृधेभिः.. (९)
हे वध्यश्व द्वारा स्थापित अग्नि! मरणरहित देवों ने भी तुम्हारी महिमा का वर्णन किया
है. जब मानवी प्रजा यह पूछने तुम्हारे पास आई कि देवों के साथ असुरों का नाश कौन
करता है, तब तुमने सबके नेता एवं तुम्हारे द्वारा बढ़ाए गए देवों के साथ मिलकर
विघ्नकारियों को जीत लिया. (९)
पितेव पुत्रमबिभरुपस्थे त्वामग्ने वध्यश्वः सपर्यन्..
जुषाणो अस्य समिधं यविष्ठोत पूर्वां अवनोर्वाधतश्चित्.. (१०)
हे अग्नि! मेरे पिता वध्यश्व ने इस प्रकार तुम्हारी सेवा की, जिस प्रकार पिता गोद में
बैठाकर पुत्र का पालन करता है. हे अतिशय युवा अग्नि! तुमने मेरे पिता की समिधाएं प्राप्त
करके विशेष बाधक शत्रुओं का भी वध किया. (१०)
शश्वदग्निर्वध्यश्वस्य शत्रून्नृभिर्जिगाय सुतसोमवद्भिः.
समनं चिद्दहंश्चित्रभानोऽव व्राधन्तमभिनद्वृधश्चित्.. (११)
उस अग्नि ने वध्यश्व के सोमरस निचोड़ने वाले एवं यज्ञनेता ऋत्विजों की सहायता से
सदा शत्रुओं को जीता. हे नाना तेजों वाले अग्नि! तुमने संग्राम में उन्हें जलाया. अग्नि ने बढ़े
हुए हिंसकों को नष्ट किया. (११)
अयमग्निर्वध्यश्वस्य वृत्रहा सनकात्प्रेद्धो नमसोपवाक्यः.
स नो अजामींरुत वा निजामीनभि तिष्ठ शर्धतो वाध्यश्व.. (१२)
वध्यश्व द्वारा स्थापित वे अग्नि शत्रुहंता, प्राचीन काल से विशेष दीप्त एवं नमस्कार से
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सूक्त—७० देवता—आप्री
स्तुतियोग्य हैं. तुम हमारी जाति से बाहर एवं विविध जातियों वाले शत्रुओं को हटाओ. (१२)
सूक्त—७० देवता—आप्री
इमां मे अग्ने समिधं जुषस्वेळस्पदे प्रति हर्या घृताचीम्.
वर्ष्मन्पृथिव्याः सुदिनत्वे अह्नामूर्ध्वो भव सुक्रतो देवयज्या.. (१)
हे अग्नि! उत्तर वेदी पर स्थापित मेरी समिधाओं को स्वीकार करो तथा घी से भरे हुए
चमस का सेवन करो. हे शोभन बुद्धि वाले अग्नि! तुम उत्तम दिनों के हेतु धरती के उन्नत
प्रदेश में देवयज्ञ के कारण उत्पन्न ज्वालाओं के साथ ऊपर उठो. (१)
आ देवानामग्रयावेह यातु नराशंसो विश्वरूपेभिरश्वैः.
ऋतस्य पथा नमसा मियेधो देवेभ्यो देवतमः सुषूदत्.. (२)
देवों के आगे चलने वाले एवं मानवों द्वारा प्रशंसित अग्नि नाना वर्ण वाले अश्वों की
सहायता से इस यज्ञ में पधारें. स्तुतियोग्य एवं देवों में प्रमुख अग्नि यज्ञमार्ग के द्वारा हमारा
हव्य एवं नमस्कार देवों के समीप ले जावें. (२)
शश्वत्तममीळते दूत्याय हविष्मन्तो मनुष्यासो अग्निम्.
वह्निभैरश्वैः सुवृता रथेना देवान्वक्षि नि षदेह होता.. (३)
हव्य धारण करने वाले मनुष्य दूतकर्म के लिए अतिशय सनातन अग्नि की स्तुति करते
हैं. हे अग्नि! तुम वहनसमर्थ घोड़ों एवं सुंदर रथ की सहायता से देवों को ले जाओ एवं होता
के रूप में इस यज्ञ में बैठो. (३)
वि प्रथतां देवजुष्टं तिरश्चा दीर्घं द्राघ्मा सुरभि भूत्वस्मे.
अहेळता मनसा देव बर्हिरिन्द्रज्येष्ठाँ उशतो यक्षि देवान्.. (४)
हे बर्हि नामक अग्नि! देवों द्वारा सेवित एवं तिरछा बिछा हुआ यह हमारा कुश विस्तृत
एवं अत्यंत सुगंधित हो. तुम प्रसन्नचित्त होकर हव्य के अभिलाषी इंद्र-प्रमुख देवों की पूजा
करो. (४)
दिवो वा सानु स्पृशता वरीयः पृथिव्या वा मात्रया वि श्रयध्वम्.
उशतीर्द्वारो महिना महद्भिर्देवं रथं रथयुर्धारयध्वम्.. (५)
हे द्वार नामक देवियो! तुम आकाश से ऊंचे स्थान को छुओ एवं धरती के समान विस्तृत
बनो. तुम देवों एवं रथ की अभिलाषा करती हुई अपने महत्त्व से देवों द्वारा अधिष्ठित एवं
उनके विहार के साधन रथ को धारण करो. (५)
देवी दिवो दुहितरा सुशिल्पे उषासानक्ता सदतां नि योनौ.
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आ वां देवास उशती उशन्त उरौ सीदन्तु सुभगे उपस्थे.. (६)
द्योतमान, द्युलोक की पुत्रियों के समान एवं शोभनरूप वाले दिन-रात यज्ञ के स्थान में
बैठें. हे अभिलाषा करने वाली एवं शोभन धन से युक्त देवियो! तुम्हारे शोभन एवं विस्तृत
स्थान में हव्य के इच्छुक देवगण बैठें. (६)
ऊर्ध्वो ग्रावा बृहदग्निः समिद्धः प्रिया धामान्यदितेरुपस्थे.
पुरोहितावृत्विजा यज्ञे अस्मिन् विदुष्टरा द्रविणमा यजेथाम्.. (७)
हे ऋत्विज् एवं होता! तुम अतिशय विद्वान् हो. तुम उस समय इस यज्ञ के निमित्त धन
दो, जिस समय सोमरस निचोड़ने के लिए पत्थर उठाया जाता है, महान् अग्नि को प्रज्वलित
किया जाता है एवं देवों के प्रिय यज्ञपात्र धरती के यज्ञस्थान में लाए जाते हैं. (७)
तिस्रो देवीर्बर्हिरिदं वरीय आ सीदत चकृमा वः स्योनम्.
मनुष्वद्यज्ञं सुधिता हवींषीळा देवी घृतपदी जुषन्त.. (८)
हे इडा आदि तीन देवियो! इस अति विस्तृत कुश पर बैठो. हमने इसे तुम्हारे लिए
बिछाया है. इडा, तेजस्विनी सरस्वती एवं दीप्त पदों वाली भारती ने जिस प्रकार मनु के यज्ञ
में हव्यों का सेवन किया था, उसी प्रकार वे हमारे यज्ञ में भली प्रकार रखे हुए हव्य का सेवन
करें. (८)
देव त्वष्टर्यद्ध चारुत्वमानड्यदङ्गिरसामभवः सचाभूः.
स देवानां पाथ उप प्र विद्वांनुशन्यक्षि द्रविणोदः सुरत्नः.. (९)
हे त्वष्टा देव! तुमने कल्याणकारीरूप प्राप्त कर लिया है, इसलिए तुम हम अंगिरागोत्रीय
ऋषियों के सहायक हुए हो. हे धनदाता एवं शोभन रत्नों वाले अग्नि! तुम हव्य की
अभिलाषा करते हुए एवं जानते हुए देवों का भाग उनके पास ले जाओ. (९)
वनस्पते रशनया नियूया देवानां पाथ उप वक्षि विद्वान्.
स्वदाति देवः कृणवद्धवींष्यवतां द्यावापृथिवी हवं मे.. (१०)
हे वृक्ष से बने हुए एवं विद्वान् यज्ञ के खंभे! तुम रशना द्वारा बंधकर देवों के पास अन्न ले
जाओ. वनस्पतिरूपी देव हव्यों का स्वाद लें एवं उसे देवों तक पहुंचावें. द्यावा-पृथिवी मेरी
पुकार की रक्षा करें. (१०)
आग्ने वह वरुणमिष्टये न इन्द्रं दिवो मरुतो अन्तरिक्षात्.
सीदन्तु बर्हिर्विश्व आ यजत्राः स्वाहा देवा अमृता मादयन्ताम्.. (११)
हे अग्नि! तुम हमारे यज्ञ के निमित्त वरुण, इंद्र एवं मित्र को अंतरिक्ष से ले आओ. यज्ञ
के पात्र देवगण कुशों पर बैठें. मरणरहित देव स्वाहा शब्द से प्रसन्न हों. (११)
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सूक्त—७१ देवता—ब्रह्मज्ञान
सूक्त—७१ देवता—ब्रह्मज्ञान
बृहस्पते प्रथमं वाचो अग्रं यत्प्रैरत नामधेयं दधानाः.
यदेषां श्रेष्ठं यदरिप्रमासीत्प्रेणा तदेषां निहितं गुहाविः.. (१)
हे बृहस्पति! बच्चे सबसे पहले पदार्थों का नाम मात्र जानते हैं. यह उनकी भाषा की
पहली सीढ़ी है. बालकों का जो पापरहित वेदार्थ ज्ञान है, वह गुहा में छिपा हुआ रहता है. वह
ज्ञान सरस्वती की कृपा से प्रकट होता है. (१)
सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत.
अत्रा सखायः सख्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधि वाचि.. (२)
जिस प्रकार सत्तू वाले भुने हुए जौ सूप से शुद्ध किए जाते हैं, उसी प्रकार विद्वान् लोग
मन में विचार करके शुद्ध भाषा बोलते हैं. उस समय विद्वान् लोग मित्रताओं को जानते हैं.
इनके वचनों में मंगलकारिणी लक्ष्मी छिपी रहती हैं. (२)
यज्ञेन वाचः पदवीयमायन्तामन्वविन्दन्नृषिषु प्रविष्टाम्.
तामाभृत्या व्यदधुः पुरुत्रा तां सप्त रेभा अभि सं नवन्ते.. (३)
बुद्धिमान् मनुष्य यज्ञ के द्वारा भाषा का मार्ग जानते हैं. उन्होंने ऋषियों के मन में प्रविष्ट
वाणी को जान लिया है. उस भाषा को प्राप्त करके उन्होंने अनेक देशों में फैलाया. सातों छंद
इसी भाषा में एकत्र होते हैं. (३)
उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाचमुत त्वः शृण्वन्न शृणोत्येनाम्.
उतो त्वस्मै तन्वं१ वि सस्रे जायेव पत्य उशती सुवासाः.. (४)
कुछ लोग मन से विचार करके भी भाषा को नहीं समझ पाते. कुछ लोग भाषा को
सुनकर भी नहीं सुनते. किसी किसी के सामने भाषा अपने शरीर को इस प्रकार विसर्जित
कर देती है, जिस प्रकार शोभन वस्त्रों वाली एवं पति की कामना करने वाली नारी पति के
सामने अपने शरीर को प्रदर्शित करती है. (४)
उत त्वं सख्ते स्थिरपीतमाहुर्नैनं हिन्वन्त्यपि वाजिनेषु.
अधेन्वा चरति माययैष वाचं शुश्रुवाँ अफलामपुष्पाम्.. (५)
किसी-किसी को विद्वानों की मंडली में उत्तम भावग्रहण करने वाले के रूप में प्रतिष्ठा
प्राप्त होती है. इनकी किसी भी कार्य में उपेक्षा नहीं की जाती. कुछ लोग फल और पुष्परहित
वाणी की सेवा करते हैं. इनकी वाणी वास्तविक धेनु नहीं, अपितु मायारूपिणी धेनु है. (५)
यस्तित्याज सचिविदं सखायं न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति.
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यदीं शृणोत्यलकं शृणोति नहि प्रवेद सुकृतस्य पन्थाम्.. (६)
जो वेद पढ़ने वाला, मित्र को जानने वाले मित्र को त्याग देता है, उसकी वाणी में कोई
सार नहीं होता. वह पुरुष जो भी सुनता है, व्यर्थ सुनता है. वह सत्कर्म का मार्ग नहीं जानता.
(६)
अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः.
आदघ्नास उपकक्षास उ त्वे हृदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे.. (७)
आंखों और कानों वाले मित्र मन का भाव प्रकाशित करने में अद्वितीय होते हैं. कुछ
लोग कमर तक गहरे तालाब के समान, कुछ मुख तक गहरे तालाब के समान एवं कुछ स्नान
करने योग्य तालाबों के समान दिखाई देते हैं. (७)
हृदा तष्टेषु मनसो जवेषु यद् ब्राह्मणाः संयजन्ते सखायः.
अत्राह त्वं वि जहुर्वेद्याभिरोहब्रह्माणो वि चरन्त्यु त्वे.. (८)
जिस समय समान ज्ञान वाले अनेक ब्राह्मण हृदय द्वारा समझे जाने वाले वेदार्थ के
गुणदोष पर विचार करने पर एकत्र होते हैं, उस समय किसी-किसी को विशेष ज्ञान होता है
एवं कोई कोई स्तोत्र का अर्थ जानकर घूमते हैं. (८)
इमे ये नार्वाङ्न परश्चरन्ति न ब्राह्मणासो न सुतेकरासः.
त एते वाचमभिपद्य पापया सिरीस्तन्त्रं तन्वते अप्रजज्ञयः.. (९)
ये अविद्वान् लोग इस लोक में वेद को जानने वाले ब्राह्मणों द्वारा एवं परलोकवासी देवों
के साथ यज्ञकर्म का आचरण नहीं करते. वे न तो स्तोता हैं और न सोमयज्ञ करने वाले हैं. ये
पाप का आश्रय लेने वाली लौकिक वाणी से युक्त होकर मूर्ख के समान हल चलाते हुए
कृषिकर्म करते हैं. (९)
सर्वे नन्दन्ति यशसागतेन सभासाहेन सख्या सखायः.
किल्विषस्पृत्पितुषणिर्ह्येषामरं हितो भवति वाजिनाय.. (१०)
मित्र के समान आचरण करने वाले एवं सभा में यश प्रदान करने वाले यश को पाकर
प्रसन्न होते हैं. यश के कारण पाप दूर होता है. अन्न मिलता है एवं शक्ति प्राप्त होती है. इस
प्रकार यश से अनेक प्रकार का हित होता है. (१०)
ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान्गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु.
ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्यां यज्ञस्य मात्रां वि मिमीति उ त्वः.. (११)
कुछ होता अनेक ऋचाओं का उच्चारण करते हुए यज्ञ में सहायक होते हैं एवं कुछ लोग
गायत्री छंद में साममंत्रों को गाते हैं. ब्रह्मा नामक पुरोहित प्रायश्चित्त की व्याख्या करता है एवं
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अध्वर्यु यज्ञ में विविध कार्य करता है. (११)
सूक्त—७२ देवता—देव
देवानां नु वयं जाना प्र वोचाम विपन्यया.
उक्थेषु शस्यमानेषु यः पश्यादुत्तरे युगे.. (१)
हम स्पष्ट शब्दों में देवों की उत्पत्ति का वर्णन करते हैं. ये देव भविष्य में स्तोत्रों के
उच्चारण के समय स्तोता को देखेंगे. (१)
ब्रह्मणस्पतिरेता सं कर्मार इवाधमत्. देवानां पूर्व्ये युगेऽसतः सदजायत.. (२)
लोहार जिस प्रकार धौंकनी चलाता है, उसी प्रकार ब्रह्मणस्पति ने देवों को उत्पन्न किया.
देवों से पूर्व के समय में असत् से सत् उत्पन्न हुआ. (२)
देवानां युगे प्रथमेऽसतः सदजायत. तदाशा अन्वजायन्त तदुत्तानपदस्परि.. (३)
देवों की उत्पत्ति से पहले के समय में असत् से सत् उत्पन्न हुआ. इसके बाद दिशाएं
उत्पन्न हुईं. दिशाओं से वृक्ष उत्पन्न हुए. (३)
भूर्जज्ञ उत्तानपदो भुव आशा अजायन्त. अदितेर्दक्षो अजायत दक्षाद्वदितिः परि.. (४)
वृक्षों से भूमि उत्पन्न हुई एवं भूमि से दिशाएं उत्पन्न हुईं. अदिति से दक्ष उत्पन्न हुए और
बाद में दक्ष से अदिति उत्पन्न हुई. (४)
अदितिर्ह्यजनिष्ट दक्ष या दुहिता तव. तां देवा अन्वजायन्त भद्रा अमृतबन्धवः.. (५)
हे दक्ष! तुम्हारी पुत्री अदिति ने देवों को उत्पन्न किया. अदिति के पश्चात् प्रशंसनीय एवं
अमृत के बंधु देवों ने जन्म लिया. (५)
यद्देवा अदः सलिले सुसंरब्धा अतिष्ठत. अत्रा वो नृत्यतामिव तीव्रो रेणुरपायत.. (६)
हे देवो! जब तुम इस जल में रहकर अपने को जानते हुए स्थित थे, तब तुम नृत्य सा
करने लगे. इससे बहुत धूल उड़ी. (६)
यद्देवा यतयो यथा भुवनान्यपिन्वत. अत्रा समुद्र आ गूळ्हमा सूर्यमजभर्तन.. (७)
बादल जिस प्रकार वर्षा द्वारा संसार को भरते हैं, उसी प्रकार देवों ने संसार को ढक
लिया. उन्होंने सागर में ढके हुए सूर्य को चमकने के लिए बाहर निकाला. (७)
अष्टौ पुत्रासो अदितेर्ये जातास्तन्व१ स्परि.
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