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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1673 of 1855

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Page 1673

ईशानासो नरो अमर्त्येनास्तावि जनो दिव्यो गयेन.. (१७)
हे अदितिपुत्र देवो और देवमाता अदिति! प्लुति के पुत्र एवं विद्वान् गय ऋषि ने तुम सब
लोगों को बढ़ाया था. देवों की कृपा से मानवों को प्रभुता मिलती है. गय ऋषि ने देवसमूह की
स्तुति की थी. (१७)
सूक्त—६५ देवता—विश्वेदेव
अग्निरिन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा वायुः पूषा सरस्वती सजोषसः.
आदित्या विष्णुर्मरुतः स्वबृहत् सोमो रुद्रो अदितिर्ब्रह्मणस्पतिः.. (१)
अग्नि, इंद्र, मित्र, अर्यमा, वायु, पूषा, सरस्वती, आदित्यगण, विष्णु, मरुद्गण, स्वर्ग,
विशाल स्वर्ग, सोम, रुद्र, अदिति और ब्रह्मणस्पति सब मिलकर अपनी महिमा से अंतरिक्ष को
पूर्ण करते हैं. (१)
इन्द्राग्नी वृत्रहत्येषु सत्पती मिथे हिन्वाना तन्वा३ समोकसा.
अन्तरिक्षं मह्या पप्रुरोजसा सोमो घृतश्रीर्महिमानमीरयन्.. (२)
सज्जनों के पालक, युद्ध में एकत्र होकर शरीरबल से शत्रुओं का नाश करने वाले एवं
महान् आकाश को अपने तेज से पूर्ण करने वाले इंद्र अग्नि के बल को घृतमिश्रित सोमरस से
बढ़ाते हैं. (२)
तेषां हि मह्ना महतामनर्वणां स्तोमाँ इयर्म्यृतज्ञा ऋतावृधाम्.
ये अप्सवमर्णवं चित्रराधस्ते नो रासन्तां महये सुमित्र्याः.. (३)
यज्ञ का ज्ञाता मैं अपने महत्त्व से महान् शत्रुओं द्वारा अपराजेय एवं यज्ञ की वृद्धि करने
वाले देवों की स्तुति करता हूं. विचित्र धन से युक्त वे देव मेघों से जल बरसाते हैं. शोभन मैत्री
वाले वे देव हमें धन देकर मानवों में श्रेष्ठ बनावें. (३)
स्वर्णरमन्तरिक्षाणि रोचना द्यावाभूमी पृथिवीं स्कम्भुरोजसा.
पृक्षा इव महयन्तः सुरातयो देवाः स्तवन्ते मनुषाय सूरयः.. (४)
उन्हीं देवों ने अपनी शक्ति से सबके नेता सूर्य, आकाश में स्थित तेजस्वी नक्षत्रों, द्युलोक
एवं धरती को स्थित किया है. दरिद्रों को धन दान करने के समान स्तोताओं को धन से
सम्मानित करने वाले देव मानवों को श्रेष्ठ बनाते हैं. हम यज्ञों में ऐसे देवों की स्तुति करते हैं.
(४)
मित्राय शिक्ष वरुणाय दाशुषे या सम्राजा मनसा न प्रयुच्छतः.
ययोर्धाम धर्मणा रोचते बृहद् ययोरुभे रोदसी नाधसी वृतौ.. (५)
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