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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1670 of 1855

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Page 1670

हे अदितिपुत्र देवो एवं अदिति! प्लुति के पुत्र विद्वान् गय ऋषि ने तुम सब लोगों को
बढ़ाया था. देवों की कृपा से मानवों को प्रभुता मिलती है. गय ऋषि ने देवसमूह की स्तुति की
थी. (१७)
सूक्त—६४ देवता—विश्वेदेव
कथा देवानां कतमस्य यामनि सुमन्तु नाम शृण्वतां मनामहे.
को मृळाति कतमो नो मयस्करत्कतम् ऊती अभ्या ववर्त्तति.. (१)
यज्ञ में किस स्तुतियोग्य देव की हम भली प्रकार स्तुति करें? कौन हमारी रक्षा करता
है? कौन हमें सुख प्रदान करता है? हमारी रक्षा के लिए कौन हमारे पास आता है. (१)
क्रतूयन्ति क्रतवो हृत्सु धीतयो वेनन्ति वेनाः पतयन्त्या दिशः.
न मर्डिता विद्यते अन्य एभ्यो देवेषु मे अधि कामा अयंसत.. (२)
हमारे हृदयों में निहित बुद्धियां यज्ञ करने की इच्छा करती हैं. हमारी बुद्धियां देवों की
कामना करती हैं. हमारी कामनाएं फलप्राप्ति के लिए देवों के पास जाती हैं. इन देवों के
अतिरिक्त कोई भी हमारा सुखदाता नहीं है. हमारी अभिलाषाएं इंद्रादि देवों तक सीमित हैं.
(२)
नरा वा शंसं पूषणमगोह्यमग्निं देवेद्धमभ्यर्चसे गिरा.
सूर्यामासा चन्द्रमसा यमं दिवि त्रितं वातमुषसमक्तुमश्विना.. (३)
हे मेरे मन! मानवों द्वारा प्रशंसनीय, धनदान के द्वारा स्तोताओं का पोषण करने वाले
एवं अन्यों द्वारा अगम्य पूषा देव एवं देवों द्वारा प्रज्वलित अग्नि देव की स्तुतियों द्वारा पूजा
करो. तुम सूर्य, चंद्र, यम, द्युलोक में स्थित यम, तीनों लोकों में व्याप्त इंद्र, वायु, उषा, रात्रि
तथा अश्विनीकुमारों की स्तुति करो. (३)
कथा कविस्तुवीरवान्कया गिरा बृहस्पतिर्वावृधते सुवृक्तिभिः.
अज एकपात्सुहवेभिरृक्वभिरहिः शृणोतु बुध्न्यो३ हवीमनि.. (४)
विद्वान् अग्नि किस प्रकार अनेक स्तोताओं वाले एवं किस स्तुति से वृद्धियुक्त होते हैं?
बृहस्पति देव शोभन स्तुतियों से बढ़ते हैं. अजएकपात् एवं अहिर्बुध्न्य नामक देव आह्वान के
समय हमारे द्वारा रचित शोभन-स्तोत्रों को सुनें. (४)
दक्षस्य वादिते जन्मनि व्रते राजाना मित्रावरुणा विवाससि.
अतूर्त्तपन्थाः पुरुरथो अर्यमा सप्तहोता विषुरूपेषु जन्मसु.. (५)
हे पृथ्वी! तुम सूर्य के जन्म के समय तेजस्वी मित्र एवं वरुण की सेवा करती हो. सूर्य
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