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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

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स्तुतियोग्य हैं. तुम हमारी जाति से बाहर एवं विविध जातियों वाले शत्रुओं को हटाओ. (१२)
सूक्त—७० देवता—आप्री
इमां मे अग्ने समिधं जुषस्वेळस्पदे प्रति हर्या घृताचीम्.
वर्ष्मन्पृथिव्याः सुदिनत्वे अह्नामूर्ध्वो भव सुक्रतो देवयज्या.. (१)
हे अग्नि! उत्तर वेदी पर स्थापित मेरी समिधाओं को स्वीकार करो तथा घी से भरे हुए
चमस का सेवन करो. हे शोभन बुद्धि वाले अग्नि! तुम उत्तम दिनों के हेतु धरती के उन्नत
प्रदेश में देवयज्ञ के कारण उत्पन्न ज्वालाओं के साथ ऊपर उठो. (१)
आ देवानामग्रयावेह यातु नराशंसो विश्वरूपेभिरश्वैः.
ऋतस्य पथा नमसा मियेधो देवेभ्यो देवतमः सुषूदत्.. (२)
देवों के आगे चलने वाले एवं मानवों द्वारा प्रशंसित अग्नि नाना वर्ण वाले अश्वों की
सहायता से इस यज्ञ में पधारें. स्तुतियोग्य एवं देवों में प्रमुख अग्नि यज्ञमार्ग के द्वारा हमारा
हव्य एवं नमस्कार देवों के समीप ले जावें. (२)
शश्वत्तममीळते दूत्याय हविष्मन्तो मनुष्यासो अग्निम्.
वह्निभैरश्वैः सुवृता रथेना देवान्वक्षि नि षदेह होता.. (३)
हव्य धारण करने वाले मनुष्य दूतकर्म के लिए अतिशय सनातन अग्नि की स्तुति करते
हैं. हे अग्नि! तुम वहनसमर्थ घोड़ों एवं सुंदर रथ की सहायता से देवों को ले जाओ एवं होता
के रूप में इस यज्ञ में बैठो. (३)
वि प्रथतां देवजुष्टं तिरश्चा दीर्घं द्राघ्मा सुरभि भूत्वस्मे.
अहेळता मनसा देव बर्हिरिन्द्रज्येष्ठाँ उशतो यक्षि देवान्.. (४)
हे बर्हि नामक अग्नि! देवों द्वारा सेवित एवं तिरछा बिछा हुआ यह हमारा कुश विस्तृत
एवं अत्यंत सुगंधित हो. तुम प्रसन्नचित्त होकर हव्य के अभिलाषी इंद्र-प्रमुख देवों की पूजा
करो. (४)
दिवो वा सानु स्पृशता वरीयः पृथिव्या वा मात्रया वि श्रयध्वम्.
उशतीर्द्वारो महिना महद्भिर्देवं रथं रथयुर्धारयध्वम्.. (५)
हे द्वार नामक देवियो! तुम आकाश से ऊंचे स्थान को छुओ एवं धरती के समान विस्तृत
बनो. तुम देवों एवं रथ की अभिलाषा करती हुई अपने महत्त्व से देवों द्वारा अधिष्ठित एवं
उनके विहार के साधन रथ को धारण करो. (५)
देवी दिवो दुहितरा सुशिल्पे उषासानक्ता सदतां नि योनौ.
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