ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसूर्यं दिवि रोहयन्तः सुदानव आर्या व्रता विसृजन्तो अधि क्षमि.. (११)
देवों ने अन्न, गाय, घोड़े, वृक्षों, वनस्पतियों, पृथ्वी, पर्वतों और जलों को उत्पन्न किया है
एवं सूर्य को आकाश में चढ़ाया है. शोभन दान वाले देवों ने धरती पर उत्तम कार्य किए हैं.
(११)
भुज्युमंहसः पिपृथो निरश्विना श्यावं पुत्रं वध्रिमत्या अजिन्वतम्.
कमद्युवं विमदायोहथुर्युवं विष्णाप्वं विश्वकायाव सृजथः.. (१२)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने भुज्यु को उपद्रवकारी समुद्र से बचाया, वध्रिमती को सोने के
रंग वाला पुत्र दिया, विमद ऋषि को कामोद्दीपक पत्नी दी तथा विश्वक ऋषि को विष्णाप्व
नामक पुत्र दिया. (१२)
पावीरवी तन्यतुरेकपादजो दिवो धर्ता सिन्धुरापः समुद्रियः.
विश्वे देवासः शृणवन्वचांसि मे सरस्वती सह धीभिः पुरन्ध्या.. (१३)
आयुधों वाली एवं गर्जन करने वाली मध्यम वाणी, द्युलोक को धारण करने वाले
अजएकपात्, सिंधु, सागर का जल, विश्वेदेव एवं कर्मों के साथ अनेक प्रकार की बुद्धियों से
युक्त सरस्वती मेरे वचनों को सुनें. (१३)
विश्वे देवाः सह धीभिः पुरन्ध्या मनोर्र्यजत्रा अमृता ऋतज्ञाः.
रातिषाचो अभिषाचः स्वर्विदः स्वर्णिगरो ब्रह्म सूक्तं जुषेरत.. (१४)
कर्मों एवं ज्ञानों से युक्त, मानवीय यज्ञों में सत्कार के पात्र, मरणरहित, सत्य को जानने
वाले, हव्यग्रहणकर्त्ता, सामने से यज्ञ में सम्मिलित होने वाले एवं सब कुछ प्राप्त करने वाले
इंद्रादि देव हमारी स्तुतियों एवं अन्न को ग्रहण करें. (१४)
देवान्वसिष्ठो अमृतान्ववन्दे ये विश्वा भुवनाभि प्रतस्थुः.
ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१५)
वसिष्ठ वंश में उत्पन्न ऋषि ने मरणरहित देवों की वंदना की है. वे देव सभी लोकों में
स्थित हैं. वे हमें आज अधिक यशस्कर अन्न दें. हे देवो! तुम कल्याणकारी साधनों द्वारा
हमारी रक्षा करो. (१५)
सूक्त—६६ देवता—विश्वेदेव
देवान्हुवे बृहच्छ्रवसः स्वस्तये ज्योतिष्कृतो अध्वरस्य प्रचेतसः.
ये वावृधुः प्रतरं विश्ववेदस इन्द्रज्येष्ठासो अमृता ऋतावृधः.. (१)
मैं अधिक अन्न वाले, आदित्यतेज के कर्त्ता, उत्तम ज्ञान वाले, इंद्रप्रमुख, मरणरहित व
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