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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1683 of 1855

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Page 1683

यदीं सुमित्रा विशो अग्र इन्धते घृतेनाहुतो जरते दविद्युतत्.. (१)
वध्यश्व ऋषि द्वारा स्थापित अग्नि की मूर्ति देखने योग्य, प्रसन्नता व कल्याणकारिणी
तथा यज्ञ में आगमन रमणीय हो. हम सुमित्र लोग जब अग्नि को पहली बार प्रज्वलित करते
हैं, तब घृताहुति पाकर तेजस्वी अग्नि हमारे द्वारा प्रशंसित होते हैं. (१)
घृतमग्नेर्वध्यश्वस्य वर्धनं घृतमन्नं घृतम्वस्य मेदनम्.
घृतेनाहुत उर्विया वि पप्रथे सूर्य इव रोचते सर्पिरासुतिः.. (२)
वध्यश्व द्वारा स्थापित अग्नि का घृत ही बढ़ाने वाला, आहार एवं पोषक हो. घृत की
आहुति पाकर अग्नि अधिक दीप्त होते हैं. घृत द्वारा हवन किए गए अग्नि सूर्य के समान
प्रकाशित होते हैं. (२)
यत्ते मनुर्यदनीकं सुमित्रः समीधे अग्ने तदिदं नवीयः.
स रेवच्छोच स गिरो जुषस्व स वाजं दर्षि स इह श्रवो धाः.. (३)
हे अग्नि! मनु ने जिस प्रकार तुम्हारी किरणों को दीप्त किया था, उसी प्रकार मैं सुमित्र
ऋषि भी उन्हें दीप्त करता हूं. तुम्हारी किरणें नवीन हैं. तुम धनसंपन्न होकर जलो, हमारी
स्तुतियां स्वीकार करो, शत्रुसेना को मारो एवं हमें अन्न दो. (३)
यं त्वा पूर्वमीळितो वध्यश्वः समीधे अग्ने स इदं जुषस्व.
स नः स्तिपा उत भवा तनूपा दात्रं रक्षस्व यदिदं ते अस्मे.. (४)
हे अग्नि! पहले तुम्हें स्तोता वध्यश्व ने प्रज्वलित किया था. तुम हमारा स्तोत्र स्वीकार
करो. तुम हमारे घर और शरीर के रक्षक बनो. तुमने हमें जो कुछ दिया है, उसकी रक्षा करो.
(४)
भवा द्युम्नी वाध्यश्वोत गोपा मा त्वा तारीदभिमातिर्जनानाम्.
शूर इव धृष्णुश्च्यवनः सुमित्रः प्र नु वोचं वाध्यश्वस्य नाम.. (५)
हे वध्यश्व द्वारा स्थापित अग्नि! तुम तेजस्वी एवं रक्षक बनो. कोई भी तुम्हारी हिंसा न
करे, क्योंकि तुम शत्रु लोगों को पराजित करने वाले हो. तुम शूर के समान शत्रुपराभवकारी
एवं शत्रुनाशक बनो. मैं तुम्हारे नामों का वर्णन करता हूं. (५)
समज्या पर्वत्या३वसूनि दासा वृत्राण्यार्या जिगेथ.
शूर इव धृष्णुश्च्यवनो जनानां त्वमग्ने पृतनायूँरभि ष्याः.. (६)
हे अग्नि! तुमने मानवहितकारी एवं पर्वत पर उत्पन्न धन को दासों से जीत कर आर्यों
को दिया. तुम शूर के समान शत्रुजनों के पराभवकारी एवं नाशक बनो तथा आक्रमणकारियों
से भिड़ जाओ. (६)