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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

About this granth

The Rigveda (ऋग्वेद) is the oldest of the four Vedas and the earliest surviving text of the Indian tradition. Its Samhita is arranged in ten mandalas containing more than a thousand hymns (suktas) addressed to Agni, Indra, Varuna, Mitra, Soma, Ushas, the Maruts, the Ribhus, the Vishvedevas and other deities, along with reflections on creation, generosity, marriage and society. Hymns such as the Nasadiya and the Purusha Sukta are often taken as the starting points of Indian philosophy.

This edition is by Dr. Ganga Sahay Sharma, a scholar with degrees in Hindi and Sanskrit and the title of Vyakaranacharya, published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, as part of a four-Veda set. Each hymn is headed by its number and deity, followed by the Sanskrit mantras and a simple Hindi rendering of their sense. A list of hymns, their subjects and the number of mantras is given at the front.

The Hindi is plain and close to everyday speech, which makes this edition a good first approach to the meaning of the mantras for readers not ready for a traditional commentary. The complete text, about 1,855 pages, can be read here page by page.

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हे सोमरस के योग्य देवो! तुम रथों में घोड़ों को जोड़ो, लगामें साफ करो एवं घोड़ों को
सजाओ. तुम सारथि के बैठने वाले आठ स्थानों से युक्त रथ को सूर्य के साथ यज्ञ में लाओ.
इसी रथ के द्वारा देवगण यज्ञ में आते हैं. (७)
अश्मन्वती रीयते सं रभध्वमुत्तिष्ठत प्र तरता सखायः.
अत्रा जहाम ये असन्नशेवाः शिवान्वयमुत्तरेमाभि वाजान्.. (८)
अश्मन्वती नामक नदी बह रही है. यज्ञ में आने के लिए इस नदी को पार करने हेतु उठो
और इसे पार कर जाओ. हे मित्र बने हुए देवो! हम असुख को त्याग कर नदी पार करें और
सुखकर अन्नों को पावें. (८)
त्वष्टा माया वेदपसामपस्तमो बिभ्रत्पात्रा देवपानानि शन्तमा.
शिशीते नूनं परशुं स्वायसं येन वृश्चादेतशो ब्रह्मणस्पतिः.. (९)
त्वष्टा पात्र बनाना जानते हैं. अतिशय शोभन कर्म वाले त्वष्टा देवों के पानकर्म में प्रयुक्त
सोमपात्रों को धारण करते हैं. वे उत्तम लोहे से बने हुए कुठार को तेज करते हैं. ब्रह्मणस्पति
त्वष्टा उसी कुठार से लकड़ी काटते हैं. (९)
सतो नूनं कवयः सं शिशीत वाशीभिर्याभिरमृताय तक्षथ.
विद्वांसः पदा गुह्यानि कर्तन येन देवासो अमृतत्व मानशुः.. (१०)
हे मेधावियो! उस कुठार को तेज करो, जिसके द्वारा सोमपान के लिए पात्र बनाए जाते
हैं. हे विद्वानो! तुम ऐसा गुप्त निवासस्थान बनाओ, जिसके कारण देवों ने अमरत्व प्राप्त
किया. (१०)
गर्भे योषामदधुर्वत्समासन्यपीच्येन मनसोत जिह्वया.
स विश्वाहा सुमना योग्या अभि सिषासनिवर्नते कार इज्जितिम्.. (११)
उन ऋभुओं ने मरी हुई गाय के चमड़े में किसी गाय को धारण किया तथा उस मरी हुई
गाय के मुख में बछड़े को रखा. यह कार्य उन्होंने देवत्व की कामना करने वाले मन के द्वारा
किया. आवश्यकरूप से सभी दिवसों में उत्तम स्तुतियां ग्रहण करने वाले ऋभुगण शत्रुओं को
जीतते हैं. (११)
सूक्त—५४ देवता—इंद्र
तां सु ते कीर्तिं मघवन्महित्वा यत्त्वा भीते रोदसी अह्वयेताम्.
प्रावो देवाँ अतिरो दासमोजः प्रजायै त्वस्यै यदशिक्ष इन्द्र.. (१)
हे धनस्वामी इंद्र! मैं तुम्हारे महत्त्व के कारण आई हुई शोभन कीर्ति का वर्णन करता हूं.
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जब द्यावा-पृथिवी ने भयभीत होकर तुम्हें बुलाया था, तब तुमने देवों की रक्षा की, राक्षसों की
शक्ति नष्ट की एवं यजमान को बल प्रदान किया. (१)
यदचरस्तन्वा वावृधानो बलानीन्द्र प्रब्रुवाणो जनेषु.
मायेत्सा ते यानि युद्धान्याहुर्नाद्य शत्रुं ननु पुरा विवित्से.. (२)
हे इंद्र! तुमने अपने शरीर को बढ़ाते हुए एवं मनुष्यों को घोषणा करते हुए जिन
वृत्रवधादि बलसाध्य कार्यों को किया था, वह केवल माया थी. तुम्हारा सब युद्ध भी माया मात्र
है. इस समय ही तुम्हारा कोई शत्रु नहीं है तो प्राचीनकाल में किस प्रकार रहा होगा? (२)
क उ नु ते महिमनः समस्यास्मत्पूर्व ऋषयोऽन्तमापुः.
यन्मातरं च पितरं च साकमजनयथास्तन्व१ः स्वायाः.. (३)
हे इंद्र! क्या हमसे पहले ऋषियों ने तुम्हारी संपूर्ण महिमा का पार पाया था? तुमने
अपने माता-पितारूपी द्यावा-पृथिवी को अपने शरीर से उत्पन्न किया था. (३)
चत्वारि ते असुर्याणि नामादाभ्यानि महिषस्य सन्ति.
त्वमङ्ग तानि विश्वानि वित्से येभिः कर्माणि मघवञ्चकर्थ.. (४)
हे पूज्य इंद्र! तुम्हारे चार असुरनाशक और अपराजेय शरीर हैं. हे धनस्वामी इंद्र! तुम
इन सबको जानते हो, जिनके द्वारा वृत्रवधादि कर्म करते हो. (४)
त्वं विश्वा दधिषे केवलानि यान्याविर्या च गुहा वसूनि.
काममिन्मे मघवन्मा वि तारीस्त्वमाज्ञाता त्वमिन्द्रासि दाता.. (५)
हे इंद्र! तुम इन सब असाधारण संपत्तियों को जानते हो, जो प्रकट एवं छिपी हुई हैं. तुम
मेरी अभिलाषा पूरी करो. तुम्हीं आज्ञा करते हो और तुम्हीं देने वाले हो. (५)
यो अदधाज्ज्योतिषि ज्योतिरन्तर्यो असृजन्मधुना सं मधूनि.
अध प्रियं शूषमिन्द्राय मन्म ब्रह्मकृतो बृहदुक्थादवाचि.. (६)
जिन इंद्र ने सूर्य आदि तेजस्वी पदार्थों में ज्योति धारण की है एवं जिन्होंने मधु के द्वारा
सोमरस को मधुर बनाया, उन इंद्र के लिए विशाल उक्थमंत्रों के रचयिता ऋषियों ने
शक्तिदाता स्तोत्र बोला है. (६)
सूक्त—५५ देवता—इंद्र
दूरे तन्नाम गुह्यं पराचैर्यत्त्वा भीते अह्वयेतां वयोधै.
उदस्तभ्नाः पृथिवीं द्याम्भीके भ्रातुः पुत्रान्मघवन्तित्त्विषाणः.. (१)
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हे इंद्र! तुम्हारा शरीर दूर है, इसलिए पराङ्मुख मनुष्यों के लिए वह अप्रकाशित है.
जिस समय डरे हुए द्यावा-पृथिवी तुम्हें अन्न के लिए बुलाते हैं, उस समय तुम धरती के ऊपर
आकाश को पकड़कर रखते हो एवं अपने भाई मेघ के जलों को दीप्त करते हो. (१)
महत्तन्नाम गुह्यं पुरुस्पृग्येन भूतं जनयो येन भव्यम्.
प्रत्नं जातं ज्योतिर्यदस्य प्रियं प्रियाः समविशन्त पञ्च.. (२)
हे इंद्र! तुम्हारा अन्यों के द्वारा अज्ञात एवं बहुतों द्वारा अभिलषित आकाशरूपी शरीर
अत्यंत विस्तृत है. उसी से तुमने भूत और भविष्यत् को उत्पन्न किया है. उसीसे तुम्हारा प्रिय
तत्त्व प्राचीन ज्योति अर्थात् आदित्य उत्पन्न हुआ. उसी के कारण पंचजन प्रसन्न हुए. (२)
आ रोदसी अपृणादोत मध्यं पञ्च देवाँ ऋतुशः सप्तसप्त.
चतुस्त्रिंशता पुरुधा वि चष्टे सरूपेण ज्योतिषा विव्रतेन.. (३)
इंद्र ने अपने शरीर से द्यावा-पृथिवी एवं अंतरिक्ष को पूर्ण किया है एवं पांच देवों, सात
तत्त्वों तथा चौंतीस देवगणों को अनेक प्रकार से देखते हैं. इंद्र यह कार्य समान रूप वाली
अपनी विस्तृत ज्योति की सहायता से करते हैं. (३)
यदुष औच्छः प्रथमा विभानामजनयो येन पुष्टस्य पुष्टम्.
यत्ते जामित्वमवरं परस्या महन्महत्या असुरत्वमेकम्.. (४)
हे उषा! तुमने नक्षत्र आदि तेजस्वी पदार्थों को सबसे पहले प्रकाश दिया. उसी तेज से
तुमने पुष्ट को अधिक पुष्ट बनाया. तुम उन्नत स्थिति वाली हो, तथापि तुम्हारी मित्रता हम
निम्न स्थिति वालों के साथ है. यही तुम्हारा एकमात्र महत्त्व और शक्तिपूर्णता है. (४)
विधुं दद्राणं समने बहूनां युवानं सन्तं पलितो जगार.
देवस्य पश्य काव्यं महित्वाद्या ममार स ह्यः समान.. (५)
युद्ध आदि अनेक कार्य करने वाले एवं युद्धों में बहुत से शत्रुओं को भगाने वाले युवा
पुरुष को इंद्र की आज्ञा से बुढ़ापा निगल लेता है. इंद्र देव का सामर्थ्य देखिए कि कल जो
ठीक से कार्य कर रहा था, वह आज मर गया है. (५)
शाक्मना शाको अरुणः सुपर्ण आ यो महः शूरः सनादनीळः.
यच्चिकेत्त सत्यमित्तन्न मोघं वसु स्पार्हमुत जेतोत दाता.. (६)
शक्तिसंपन्न व लाल रंग वाला एक पक्षी आ रहा है जो महान्, शूर, प्राचीन एवं बिना
घोंसले वाला है. वह जो करना चाहता है, वह अवश्य सत्य होता है एवं कभी असफल नहीं
होता. वह अभिलषणीय संपत्ति जीतता है एवं स्तोताओं को देता है. (६)
एभिर्देदे वृष्ण्या पौंस्यानि येभिर्धौक्षद्द्वृत्रहत्याय वज्री.
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ये कर्मणः क्रियमाणस्य मह्न ऋतेकर्ममुदजायन्त देवाः.. (७)
वज्रधारी इंद्र ने इन मरुतों के साथ वर्षा करने वाली शक्ति प्राप्त की एवं वृत्र की हत्या
करके वर्षा द्वारा धरती को सींचा. महान् इंद्र द्वारा किए गए वर्षा कार्य में मरुद्गण स्वयं ही
सहायक बनते हैं. (७)
युजा कर्माणि जनयन्विश्वौजा अशस्तिहा विश्वमनास्तुराषाट्.
पीत्वी सोमस्य दिव आ वृधानः शूरो निर्युधाधमद्दस्यून्.. (८)
सर्वत्र व्याप्त शक्ति वाले, राक्षसनाशक, अत्यंत मनस्वी एवं शत्रुओं पर शीघ्र विजय
प्राप्त करने वाले इंद्र मरुतों की सहायता से सभी कार्य करते हैं. इंद्र ने स्वर्ग से आकर
सोमपान किया और अपना शरीर बढ़ाया. शूर इंद्र ने आयुधों से शत्रुओं को मारा. (८)
सूक्त—५६ देवता—विश्वेदेव
इदं त एकं पर ऊ त एकं तृतीयेन ज्योतिषा सं विशस्व.
संवेशने तन्व१ श्चारुरेधि प्रियो देवानां परमे जनित्रे.. (१)
ऋषि अपने मरे हुए पुत्र वाजी से कहते हैं:—
तुम्हारा एक अंश अग्नि, दूसरा वायु और तीसरा तेजस्वी आत्मा है. इन तीनों अंशों से
अग्नि, वायु और आत्मा में अपने शरीर के प्रवेश के समय कल्याणकारी रूप में बढ़ो तथा
देवों के परम-जनक सूर्य के लोक में प्रिय बनो. (१)
तनूष्टे वाजिन्तन्वं१ नयन्ती वाममस्मभ्यं धातु शर्म तुभ्यम्.
अहुतो महो धरुणाय देवान्दिवीव ज्योतिः स्वमा मिमीयाः.. (२)
हे वाजी! तुम्हारे शरीर को अपने में मिलाती हुई यह धरती तुम्हारे और हमारे दोनों के
लिए कल्याण करे. तुम अपने स्थान से पतित न होकर ज्योति धारण करने के लिए देवों और
स्वर्ग में स्थित सूर्य के साथ अपनी आत्मा को मिला दो. (२)
वाज्यसि वाजिनेना सुवेनीः सुवितः स्तोमं सुवितो दिवं गाः.
सुवितो धर्म प्रथमानु सत्या सुवितो देवान्त्सुवितोऽनु पत्म.. (३)
हे पुत्र! तुम अन्नरस से शक्तिशाली एवं सुंदर हो. तुम अपने स्तोत्र की प्रेरणा से
स्तोत्रसंबंधी देव के समीप स्वर्ग में जाओ. तुम अपने द्वारा संपादित, प्रमुख एवं सच्चे फल
वाले धर्म का अनुगमन करो. तुम इंद्रादि देवों और सूर्य का अनुगमन करो. (३)
महिम्न एषां पितरश्चनेशिर देवा देवेष्वदधुरपि क्रतुम्.
समविव्यचुरुत यान्यत्विषुरैषां तनूषु नि विविशुः पुनः.. (४)
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देवत्व को प्राप्त हमारे पितरों ने देवों की महिमा प्राप्त की एवं देवों के साथ यज्ञकार्य
पूर्ण किए. जो तेजस्वी वस्तुएं हैं, वे सब उनके साथ मिल गईं. पितर देवों के शरीर में प्रवेश
कर गए हैं. (४)
सहोभिर्विश्वं परि चक्रमू रजः पूर्वा धामान्यमिता मिमानाः.
तनूषु विश्वा भुवना नि येमिरे प्रासारयन्त पुरुध प्रजा अनु.. (५)
हमारे पितरों ने अपनी शक्तियों से सारे लोकों की परिक्रमा की है तथा उन स्थानों पर
गए हैं, जहां दूसरे नहीं जा पाते. उन्होंने अपने शरीर में सभी लोकों को नियमित किया है एवं
प्रजाओं पर अपना प्रभुत्व अनेक प्रकार से स्थापित किया है. (५)
द्विधा सूनवोऽसुरं स्वर्विदमास्थापयन्त तृतीयेन कर्मणा.
स्वां प्रजां पितरः पित्र्यं सह आवरेष्वदधुस्तन्तुमाततम्.. (६)
आदित्य के पुत्र देवों ने प्रजा उत्पत्तिरूप तीसरे कर्म द्वारा शक्तिशाली एवं स्वर्गज्ञाता
आदित्य को दो प्रकार से स्थापित किया था. हमारे पितरों ने अपनी संतान को उत्पन्न करके
उनके शरीर में पैतृक बल स्थापित किया. उन्होंने चिरस्थायी वंश स्थापित किया. (६)
नावा न क्षोदः प्रदिशः पृथिव्याः स्वस्तिभिरति दुर्गाणि विश्वा.
स्वां प्रजां बृहदुक्थो महित्वावरेष्वदधादा परेषु.. (७)
मनुष्य नाव से नदी पार करने के समान धरती की विभिन्न दिशाओं का अतिक्रमण
करते हैं. लोग कल्याण द्वारा जिस प्रकार सभी विपत्तियों के पार जाते हैं, उसी प्रकार
बृहदुक्थ ऋषि ने अपनी शक्ति से अपने पुत्र को समीपवर्ती एवं दूरवर्ती पदार्थों में स्थापित
किया. (७)
सूक्त—५७ देवता—मन
मा प्र गाम पथो वयं मा यज्ञादिन्द्र सोमिनः. मान्तः स्थुर्नों अरातयः.. (१)
हे इंद्र! हम सुपथ से विचलित न हों तथा सोमरस वाले यजमान के यज्ञ से दूर न रहें.
शत्रु हमारे बीच में न आवें. (१)
यो यज्ञस्य प्रसाधनस्तन्तुर्देवेष्वाततः. तमाहुतं नशीमहि.. (२)
जो अग्नि यज्ञ का विशेष साधन है एवं आहवनीय आदि रूप से देवों के समीप तक
विस्तृत है, उस सब ओर से बुलाए गए अग्नि को हम प्राप्त करें. (२)
मनो न्वा हुवामहे नाराशंसेन सोमेन. पितॄणां च मन्मभिः... (३)

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पितरों के चमस में स्थित सोम के द्वारा हम मन को शीघ्र बुलाते हैं. हम पितरों के स्तोत्र
द्वारा मन को बुलाते हैं. (३)
आ त एतु मनः पुनः क्रत्वे दक्षाय जीवसे. ज्योक् च सूर्यं दृशे.. (४)
हे सुबंधु! तुम्हारा मन अभिचरणकर्त्ता के समीप से पुनः आवे. यह यज्ञकार्य करने एवं
बल प्रदर्शित करने के लिए आवे. तुम्हारा मन जीवित रहने एवं सूर्य के शीघ्र दर्शन करने हेतु
आवे. (४)
पुनर्नः पितरो मनो ददातु दैव्यो जनः. जीवं व्रातं सचेमहि... (५)
हमारे पितरों का समूह एवं देवगण सभी इंद्रियों को वापस कर दें. हम उन्हें प्राप्त करें.
(५)
वयं सोम व्रते तव मनस्तनूषु बिभ्रतः. प्रजावन्तः सचेमहि.. (६)
हे सोमदेव! हम तुम्हारे कर्म एवं शरीर में मन लगावें एवं संतानयुक्त होकर तुम्हारे काम
में लगें. (६)
सूक्त—५८ देवता—मृत सुबंधु का मन
यत्ते यमं वैवस्वतं मनो जगाम दूरकम्. तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (१)
विवस्वान् के पुत्र यम के पास, जो दूर रहते हैं, तुम्हारा जो मन गया है, उसे हम लौटाते
हैं. तुम इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (१)
यत्ते दिवं यत्पृथिवीं मनो जगाम दूरकम्. तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (२)
तुम्हारा जो मन दूर तक पृथ्वी या स्वर्ग के पास गया है, उसे हम लौटाते हैं. तुम इस
संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (२)
यत्ते भूमिं चतुर्भृष्टिं मनो जगाम दूरकम्. तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (३)
तुम्हारा जो मन चारों ओर ढाल वाली धरती पर दूर तक गया है, उसे हम लौटाते हैं. तुम
इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (३)
यत्ते चतस्रः प्रदिशो मनो जगाम दूरकम्. तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (४)
तुम्हारा जो मन चारों दिशाओं में दूर तक चला गया है, उसे हम वापस लौटाते हैं. तुम
इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (४)
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यत्ते समुद्रमर्णवं मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (५)
तुम्हारा जो मन जल से भरे हुए दूरवर्ती समुद्र के पास गया है, उसे हम वापस लौटाते हैं.
तुम इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (५)
यत्ते मरीची: प्रवतो मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (६)
तुम्हारा जो मन दूर तक चारों ओर जाने वाली सूर्यकिरणों के पास गया है, उसे हम
वापस लौटाते हैं. तुम इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (६)
यत्ते अपो यदोषधीर्मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (७)
तुम्हारा जो मन दूरवर्ती जल एवं ओषधियों में गया है, उसे हम वापस बुलाते हैं. तुम इस
संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (७)
यत्ते सूर्य यदुषसं मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (८)
तुम्हारा जो मन दूरवर्ती सूर्य एवं उषा के पास गया है, उसे हम वापस बुलाते हैं. तुम इस
संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (८)
यत्ते पर्वतान्बृहतो मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (९)
तुम्हारा जो मन दूरवर्ती पर्वतों तक गया है, उसे हम वापस बुलाते हैं. तुम इस संसार में
निवास करने के लिए जीते हो. (९)
यत्ते विश्वमिदं जगन्मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (१०)
तुम्हारा जो मन इस विश्व में दूर तक चला गया है, उसे हम वापस बुलाते हैं. तुम इस
संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (१०)
यत्ते परा: परावतो मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (११)
तुम्हारा जो मन अतिशय परवर्ती स्थानों में दूर तक चला गया है, उसे हम वापस बुलाते
हैं. तुम इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (११)
यत्ते भूतं च भव्यं च मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (१२)
हे सुबंधु! तुम्हारा जो मन किसी दूरवर्ती भू एवं भविष्य स्थान पर गया है, उसे हम
वापस बुलाते हैं. तुम इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (१२)
सूक्त—५९ देवता—निर्ऋति-असुनीति
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आदि
प्र तार्यायुः प्रतरं नवीयः स्थातारेव क्रतुमता रथस्य.
अध च्यवान उत्तवीत्यर्थं परातरं सु निर्ऋतिर्जिहीताम्.. (१)
जिस प्रकार सारथि वाले रथ पर चढ़ा हुआ व्यक्ति सुख प्राप्त करता है, उसी प्रकार
सुबंधु की यौवनयुक्त आयु बढ़े. ह्रासवाली आयु का आदमी अपनी मनपसंद आयु प्राप्त
करता है. तुम्हारा पाप नष्ट हो. (१)
सामन्नु राये निधिमन्वन्वं करामहे सु पुरुध श्रवांसि.
ता नो विश्वानि जरिता ममत्तु परातरं सु निर्ऋतिर्जिहीताम्.. (२)
हम परम आयुरूप धन पाने के लिए सामगान के साथ-साथ भक्षण योग्य अन्न एकत्र
करते हैं. निर्ऋति हमारे सभी अन्नों का भक्षण करें एवं दूर देश को चले जावें. (२)
अभी ष्वार्यः पौंस्यैर्भवेम द्यौर्न भूमिं गिरयो नाज्रान्,
ता नो विश्वानि जरिता चिकेत परातरं सु निर्ऋतिर्जिहीताम्.. (३)
हम बलों द्वारा अपने शत्रुओं को उसी प्रकार ठीक से हटावें, जिस प्रकार आकाश धरती
को पराजित करता है. पर्वत जिस प्रकार बादलों की गति रोक लेते हैं, उसी प्रकार हम शत्रुओं
की गति रोकें. निर्ऋति हमारी स्तुति सुनें और दूर चली जावें. (३)
मो षु णः सोम मृत्यवे परा दाः पश्येम नु सूर्यमुच्चरन्तम्.
द्युभिर्हितो जरिमा सू नो अस्तु परातरं सु निर्ऋतिर्जिहीताम्.. (४)
हे सोम! हमें मृत्यु के हाथों में मत दो. हम उदित होते हुए सूर्य को बहुत समय तक देखें.
दिवसों से प्रेरित हमारी वृद्धावस्था सुखकर हो. निर्ऋति हमारी स्तुति सुनकर दूर चली जावें.
(४)
असुनीते मनो अस्मासु धारय जीवातवे सु प्र तिरा न आयुः.
रारन्धि नः सूर्यस्य सन्दृशि घृतेन त्वं तन्वं वर्धयस्व.. (५)
हे असुनीतिदेवी! हम पर कृपा करो और जीवित रहने के लिए हमारी आयु भली प्रकार
बढ़ाओ. हमें सूर्य के चिरदर्शन के लिए स्थापित करो. तुम हमारे दिए हुए घी से अपना शरीर
बढ़ाओ. (५)
असुनीते पुनरस्मासु चक्षुः पुनः प्राणमिह नो धेहि भोगम्.
ज्योक् पश्येम सूर्यमुच्चरन्तमनुमते मृळया नः स्वस्ति.. (६)
हे असुनीतिदेवी! हमें पुनः चक्षु प्रदान करो. भोग करने के लिए हम में प्राण स्थापित
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करो. हम उदित होते हुए सूर्य को बहुत समय तक देखें. हे अनुमति! अविनाश पाने के लिए
हमारी रक्षा करो. (६)
पुनर्नो असुं पृथिवी ददातु पुनर्द्यौर्देवी पुनरन्तरिक्षम्.
पुनर्नः सोमस्तन्वं ददातु पुनः पूषा पथ्यां३ या स्वस्तिः.. (७)
पृथ्वी हमें पुनः प्राण प्रदान करे. द्युलोक और अंतरिक्ष हमें पुनः प्राण दें. सोम हमें पुनः
शरीर प्रदान करें. पूषा हमें स्वस्तिकारक वाक्य दें. (७)
शं रोदसी सुबन्धवे यह्वी ऋतस्य मातरा.
भरतामप यद्रपो द्यौः पृथिवि क्ष्मा रपो मो षु ते किं चनाममत्.. (८)
महान् द्यावा-पृथिवी सुबंधु का कल्याण करें. उदक का निर्माण करने वाली द्यावा-
पृथिवी पाप को दूर करें. हे सुबंधु! द्यावा-पृथिवी के होते हुए कोई भी पाप तुम्हारी हिंसा न
कर सकें. (८)
अव द्वके अव त्रिका दिवश्चरन्ति भेषजा.
क्ष्मा चरिष्ण्वेककं भरतामप यद्रपो द्यौः पृथिवि क्ष्मा रपो मो षु ते किं चनाममत्..
(९)
स्वर्ग में जो दो या तीन ओषधियां विचरण करती हैं, उन में से एक जो धरती पर
विचरण करती है, वह सुबंधु की हिंसा दूर करे. हे सुबंधु! स्वर्ग एवं विस्तृत पृथ्वी तुम्हारे
अमंगल दूर करें एवं किसी प्रकार का अनिष्ट न करें. (९)
समिन्द्रेरय गामनड्वाहं य आवहदुशीनराण्या अनः.
भरतामप यद्रपो द्यौः पृथिवि क्ष्मा रपो मो षु ते किं चनाममत्.. (१०)
हे इंद्र! जो बैल उशीनर की पत्नी की गाड़ी ले गया था, उसे प्रेरित करो. हे सुबंधु! स्वर्ग
एवं विस्तृत पृथ्वी तुम्हारे अमंगल दूर करें एवं किसी प्रकार भी अनिष्ट न करें. (१०)
सूक्त—६० देवता—राजा असमाति आदि
आ जनं त्वेषसन्दृशं माहीनानामुपस्तुतम्. अगन्म बिभ्रतो नमः.. (१)
हम असमाति राजा के दीप्त एवं महान् पुरुषों द्वारा प्रशंसित जनपद में नमस्कार धारण
करते हुए गए. (१)
असमातिं नितोशनं त्वेषं निययिनं रथम्. भजेरथस्य सत्पतिम्.. (२)
हम शत्रुहंता, तेजस्वी, रथ के समान सबकी अभिलाषा पूर्ण करने वाले, भजेरथ को
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पराजित करने वाले एवं सज्जनपालक राजा असमाति के देश में गए. (२)
यो जनान्महिषाँ इवातितस्थौ पवीरवान्. उतापवीरवान्युधा.. (३)
वे राजा असमाति हाथ में तलवार लें अथवा न लें, पर युद्ध में अपने शत्रुओं को इस
प्रकार पराजित कर देते हैं, जिस प्रकार सिंह भैंसों को मार डालता है. (३)
यस्येक्ष्वाकुरुप व्रते रेवान्मराय्येधते. दिवीव पञ्च कृष्टयः.. (४)
जिस जनपद में इक्ष्वाकु राजा धनी, शत्रुसंहारक एवं रक्षाकार्य में नियुक्त होकर बढ़ते हैं,
उस जनपद में रहने वाले पंचजन इस प्रकार सुखी होकर उन्नति करते हैं, जिस प्रकार स्वर्ग में
रहने वाले बढ़ते हैं. (४)
इन्द्र क्षत्रासमातिषु रथप्रोषेषु धारय. दिवीव सूर्यं दृशे.. (५)
हे इंद्र! जिस प्रकार तुमने सूर्य को सबके दर्शन के लिए आकाश में स्थित किया है, उसी
प्रकार वीरों को रथारूढ़ राजा असमाति का अनुगमन करने के लिए प्रेरित करो. (५)
अगस्त्यस्य नद्भ्यः सप्ती युनक्षि रोहिता.
पणींन्यक्रमीरभि विश्वाञ्राजन्नराधसः.. (६)
हे राजा असमाति! तुम अगस्त्य ऋषि को प्रसन्न करने वाले बांधवों के लिए धनप्राप्ति
हेतु लाल रंग के घोड़ों को रथ में जोड़ो. तुम यज्ञ न करने वाले एवं लोभी पणियों को भली
प्रकार हराओ. (६)
अयं मातायं पितायं जीवातुरागमत्. इदं तव प्रसर्पणं सुबन्धवेहि निरिहि.. (७)
हे सुबंधु! जो अग्नि आए हैं, वे ही तुम्हारे माता, पिता एवं जीवनदाता हैं. तुम्हारा शरीर
यही है. इस में स्थित होओ. (७)
यथा युगं वरत्रया नह्यन्ति धरुणाय कम्.
एवा दाधार ते मनो जीवतवे न मृत्यवेऽथो अरिष्टतातये.. (८)
जिस प्रकार रथ को धारण करने के लिए जुआ रस्सियों से बांधा जाता है, उसी प्रकार
अग्नि ने जीवित रहने, अविनाशी बनने एवं मृत्यु से दूर रहने के लिए तुम्हारे मन को धारण
कर लिया है. (८)
यथेयं पृथिवी मही दाधारेमान्वनस्पतीन्.
एवा दाधार ते मनो जीवतवे न मृत्यवेऽथो अरिष्टतातये.. (९)
जिस प्रकार यह विस्तृत पृथ्वी इन बड़े-बड़े वृक्षों को धारण करती है, उसी प्रकार अग्नि
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ने जीवित रहने, अविनाशी बनने एवं मृत्यु से दूर रहने के लिए तुम्हारे मन को धारण कर
लिया है. (९)
यमादहं वैवस्वतात्सुबन्धोर्मन आभरम्. जीवातवे न मृत्यवेऽथो अरिष्टतातये.. (१०)
मैंने विवस्वान् के पुत्र यम से सुबंधु का मन इसलिए छीन लिया है कि वे जीवित रहें,
मृत्यु से दूर हों और अविनाशी बनें. (१०)
न्यग्वातोऽव वाति न्यक्तपति सूर्य:. नीचीनमघ्न्या दुहे न्यग्भवतु ते रप:.. (११)
हे सुबंधु! वायु द्युलोक से नीचे की ओर बहते हैं एवं सूर्य नीचे की ओर तपते हैं. जिस
प्रकार गाय का दूध नीचे की ओर दुहा जाता है, उसी प्रकार तुम्हारा पाप तुमसे नीचे गिरे.
(११)
अयं मे हस्तो भगवानयं मे भगवत्तर:. अयं मे विश्वभेषजोऽयं शिवाभिमर्शन:.. (१२)
मेरा यह हाथ सौभाग्यशाली ही नहीं, अतिशय सौभाग्यशाली है. यह सबके लिए
ओषधि तुल्य एवं सबको छूकर कल्याण देने वाला है. (१२)
सूक्त—६१ देवता—विश्वेदेव
इदमित्था रौद्रं गूर्तवचा ब्रह्म क्रत्वा शच्यामन्तराजी.
क्राणा यदस्य पितरा मंहनेष्ठा: पर्षत्पक्थे अहन्ना सप्त होतॄन्.. (१)
हिस्सा बांटने वाले माता-पिता ने नाभानेदिष्ट का हिस्सा न देकर जो रुद्रस्तुति की, वही
रुद्रस्तुति करके उद्यत-वचन नाभानेदिष्ट अंगिरा गोत्र वाले ऋषियों के यज्ञ में गए एवं भूली हुई
बात सात होताओं को बताकर यज्ञ समाप्त किया. (१)
स इद्दानाय दभ्याय वन्वञ्ज्यवान: सूदैर्मिमीत वेदिम्.
तूर्वयाणो गूर्तवचस्तम: क्षोदो न रेत इतऊति सिञ्चत्.. (२)
वे रुद्रदेव स्तोताओं को धन देने के लिए एवं शत्रुओं को नष्ट करने के लिए यज्ञवेदी पर
प्रकट हुए एवं शत्रुनाशक अस्त्र उन्हें दिए. बादल जिस प्रकार जल बरसाते हैं, उसी प्रकार
शीघ्र गमन वाले एवं उद्यत-वचन रुद्र ने चारों ओर अपनी शक्ति दिखाई. (२)
मनो न येषु हवनेषु निग्मं विप: शच्या वनुथो द्रवन्ता.
आ य: शर्याभिस्तुविन्मृणो अस्याश्रीणीतादिशं गभस्तौ.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! मैं तुम्हें बुलाता हूं. तुम उस स्तोता का यज्ञ संबंधी प्रयत्न देखकर मन
के समान तीव्र गति से यज्ञ की ओर आते हो. जो हव्य लेकर सामने से मुझ यज्ञ में प्रवृत्त
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यजमान की उंगलियां पकड़कर एवं चरु पकाते हुए तुम्हारा नाम लेता है. (३)
कृष्णा यद्गोष्वरुणीषु सीदद्दिवो नपाताश्विना हुवे वाम्.
वीतं मे यज्ञमा गतं मे अन्नं ववन्वांसा नेषमस्मृतधू.. (४)
हे स्वर्गपुत्र अश्विनीकुमारो! जिस समय काली रात लाल रंग वाली उषाओं में बदलने
लगती है, उस समय मैं तुम्हारा आह्वान करता हूं. मेरे हव्य अन्न की अभिलाषा करने के लिए
तुम मेरे यज्ञ में आओ. अश्वों के समान उसे ग्रहण करो और मेरे प्रति द्रोह को भुला दो. (४)
प्रथिष्ट यस्य वीरकर्ममिष्णदनुष्ठितं नु नर्यो अपौहत्.
पुनस्तदा वृहति यत्कनाया दुहितुरा अनुभृतमनर्वा.. (५)
प्रजापति का पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ वीर्य सर्वोत्तम है. प्रजापति ने अपने उस मानव-
हितकारी वीर्य का त्याग किया, जिसे उन्होंने अपनी सुंदर उषा के शरीर में सिंचित किया था.
(५)
मध्या यत्कर्त्वमभवदभीके कामं कृण्वाने पितरि युवत्याम्.
मनानग्रेतो जहतुर्वियन्ता सानौ निषिक्तं सुकृतस्य योनौ.. (६)
जिस समय पिता ने अपनी युवती कन्या के साथ यथेच्छ कर्म किया, उस समय उनके
संभोग कर्म के समीप ही थोड़ा वीर्य गिरा. परस्पर अभिगमन करते हुए उन दोनों ने वह वीर्य
यज्ञ के ऊंचे स्थान योनि में छोड़ा था. (६)
पिता यत्स्वां दुहितरमधिष्कन्क्ष्मया रेतः सज्जमानो नि षिञ्चत्.
स्वाध्योऽजनयन्ब्रह्म देवा वास्तोष्पतिं व्रतपां निरतक्षन्.. (७)
जिस समय पिता ने अपनी पुत्री के साथ संभोग किया उस समय धरती से मिलकर वीर्य
त्याग किया. शोभन कर्म वाले देवों ने उसी वीर्य से व्रतरक्षक देव वास्तोष्पति का उत्पादन
किया. (७)
स ईं वृषा न फेनमस्यदाजौ स्मदा परैदप दभ्रचेताः.
सरत्पदा न दक्षिणा परावृङ् न ता नु मे पृश्नयो जगृभ्रे.. (८)
इंद्र ने नमुचि का वध करने के लिए संग्राम में जिस प्रकार फेन फेंका, उसी प्रकार
वास्तोष्पति हमसे दूर जा रहे हैं. अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने दक्षिणा के रूप में हमें जो गाएं दी
थीं, उन्हें अल्पमन वाले वास्तोष्पति ने स्वीकार नहीं किया, जबकि वे उन्हें ग्रहण करने में
समर्थ थे. (८)
मक्षू न वह्निः प्रजाया उपब्दिरग्निं न नग्न उप सीददूधः.
सनितेध्मं सनितोत वाजं स धर्ता जज्ञे सहसा यवीयूत्.. (९)
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प्रजाओं को कष्ट पहुंचाने वाले और अग्नि के समान प्रजाओं को जलाने वाले राक्षस
यज्ञ में शीघ्र नहीं आते. नंगे रहनेवाले राक्षस आदि रात में यज्ञ की अग्नि के पास नहीं आते.
राक्षसों से युद्ध करने वाले एवं यज्ञ के धारक अग्नि काष्ठों और अन्न को स्वीकार करते हुए
बलपूर्वक उत्पन्न हुए. (९)
मक्षू कनायाः सख्यं नवग्वा ऋतं वदन्त ऋतुयुक्तिमग्मन्.
द्विबर्हसो य उप गोपमागुरदक्षिणासो अच्युता दुदुक्षन्.. (१०)
नौ मास के अनुष्ठान के द्वारा गाएं प्राप्त करने वाले अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने सत्य
भाषण करते हुए एवं कमनीय स्तुतियां बोलते हुए यज्ञ समाप्त किया. वे इहलोक और
परलोक में उन्नत होकर इंद्र के समीप पहुंचे एवं उन्होंने दक्षिणारहित यज्ञ करके अविनाशी
फल प्राप्त किया. (१०)
मक्षू कनायाः सख्यं नवीयो राधो न रेत ऋतमित्तुरण्यन्.
शुचि यत्ते रेक्ण आयजन्त सबर्दुघायाः पय उस्रियायाः.. (११)
हे इंद्र! अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने कमनीय गायों की मित्रता शीघ्र प्राप्त करके अमृततुल्य
दूध देने वाली गाय का दूध यज्ञ में होम किया. उस समय नई संपत्ति के समान सिंचित करने
वाला जल प्राप्त किया. (११)
पश्चा यत्पश्चा वियुता बुधन्तेति ब्रवीति वक्तरी रराणः.
वसोर्वसुत्वा कारवोऽनेहा विश्वं विवेष्टि द्रविणमुप क्षु.. (१२)
स्तोता इस प्रकार कहते हैं कि इंद्र अपने स्तोता से बहुत अधिक प्रेम करते हैं. स्तोता
पणियों द्वारा चुराई गई अपनी गायों को जान पावें, उससे पहले ही वे गायों को खोजकर ले
आते हैं. (१२)
तदिन्वस्य परिषद्दानो अग्मन्पुरू सदन्तो नार्षदं बिभित्सन्.
वि शुष्णस्य संग्रथितमनर्वा विदत्पुरुप्रजातस्य गुहा यत्.. (१३)
इंद्र के चारों ओर वर्तमान सेविका रश्मियां प्रकाश देने के लिए जाती हैं. इन परम
शक्तिशाली इंद्रानुचरों ने नृषदपुत्र शुष्ण को नष्ट करने की इच्छा की. इंद्र अनेक प्रकार से
प्रादुर्भूत शुष्ण का मर्म जानते हैं. उसका जो मर्म गुहा में छिपा है, उसे भी जानते हैं. (१३)
भर्गो ह नामोत यस्य देवाः स्वर्ष्ण ये त्रिषधस्थे निषेदुः.
अग्निर्ह नामोत जातवेदाः शृधी नो होतर्ऋतस्य होताध्रुक्.. (१४)
जिस अग्नि संबंधी तेज के समीप कुशों पर देवगण स्वर्ग के समान बैठते हैं, अग्नि के
उस तेज का नाम भर्ग है. अग्नि के तेज का नाम जातवेदा है. हे होम संपन्न करने वाले अग्नि!
तुम्हीं यज्ञ संबंधी देवों को बुलाने वाले हो. तुम द्रोहरहित होकर हमारी पुकार सुनो. (१४)
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उत त्या मे रौद्रावर्चिमन्ता नासत्याविन्द्र गूर्तये यजध्यै.
मनुष्वद्वृक्तबर्हिषे रराणा मन्दू हितप्रयसा विक्षु यज्यू.. (१५)
हे इंद्र! वे प्रसिद्ध रुद्रपुत्र एवं दीप्तिशाली अश्विनीकुमार मेरी स्तुति एवं यज्ञ को स्वीकार
करें. वे मनु के यज्ञ के समान मेरे यज्ञ में भी प्रसन्न हों. वे प्रजाओं को धन दें तथा यज्ञ के योग्य
बनें. (१५)
अयं स्तुतो राजा वन्दि वेधा अपश्च विप्रस्तरति स्वसेतुः.
स कक्षीवन्तं रेजयत्सो अग्निं नेमिं न चक्रमर्वतो रघुद्रु.. (१६)
ये सबके विधाता सोम राजा सबके द्वारा प्रशंसित हैं. हमने भी उनकी प्रशंसा की है.
जिस सोम की किरणें जगद्बंधक हैं, वे प्रतिदिन अंतरिक्ष को लांघते हैं. घोड़े जिस प्रकार रथ
के पहिए की नेमि को कंपित करते हैं, उसी प्रकार सोम कक्षीवान् ऋषि और अग्नि को
कंपाते हैं. (१६)
स द्विबन्धुर्वेतरणो यष्टा सबर्धूँ धेनुमस्वं दुहध्यै.
सं यन्मित्रावरुणा वृञ्ज उक्थैर्यैँष्ठेभिरर्यमणं वरूथैः.. (१७)
वे अग्नि दोनों लोकों का कल्याण करने वाले हैं. वे विशेषरूप से तारक एवं यज्ञकर्त्ता हैं.
अग्नि ने दुधारू गाय को उस समय दुहने योग्य बनाया, जब वह ब्याने योग्य नहीं थी. शंयु
ऋषि ने महान् एवं प्रशंसनीय मंत्रों द्वारा मित्र, वरुण और अर्यमा की स्तुति की. (१७)
तद्बन्धुः सूरिर्दिवि ते धियंधा नाभानेदिष्ठो रपति प्र वेनन्.
सा नो नाभिः परमास्य वा घाहं तत्पश्चा कतिथश्चिदास.. (१८)
हे स्वर्ग में स्थित सूर्य! तुम्हारा बंधु मैं नाभानेदिष्ट तुम्हारा कर्मधारण करता हूं एवं गायों
की अभिलाषा करता हुआ तुम्हारी स्तुति करता हूं. स्वर्ग हमारा एवं सूर्य का उत्पत्तिस्थान है.
मैं सूर्य से कुछ ही पीढ़ी पीछे हूं. (१८)
इयं मे नाभिरिह मे सधस्थमिमे मे देवा अयमस्मि सर्वः.
द्विजा अह प्रथमजा ऋतस्येदं धेनुरदुहज्जायमाना.. (१९)
यह स्वर्ग ही मेरा उत्पत्तिस्थान है. यही मेरा निवासस्थान है. सभी देव मेरे हैं एवं मैं
उनका हूं. द्विजगण सत्यरूप ब्रह्मा से पहले उत्पन्न हुए. यज्ञरूपिणी गाय ने स्वयं उत्पन्न होकर
यह सब उत्पन्न किया. (१९)
अधासु मन्द्रो अरतिर्विभावाव स्यति द्विवर्तनिर्वनेषाट्.
ऊर्ध्वा यच्छ्रेणिर्न शिशुर्दन्मक्षू स्थिरं शेवृधं सूत माता.. (२०)
वे अग्नि प्रसन्न, गतिशील, दोनों लोकों में जाने वाले एवं काष्ठों को पराजित करने वाले
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हैं. ऊर्ध्वमुख, सेना के समान प्रशंसनीय, शत्रुओं का दमन करने वाले, स्थिर एवं सुखवर्धक
अग्नि को अरणि ने उत्पन्न किया. (२०)
अधा गाव उपमातिं कनाया अनु श्रान्तस्य कस्य चित्परेयुः.
श्रुधि त्वं सुद्रविणो नस्त्वं याळाश्वघ्नस्य वावृधे सूनृताभिः.. (२१)
स्तुतियां करते-करते थके हुए मुझ नाभानेदिष्ट की उत्तम स्तुतियां इंद्र के समीप जाती
हैं. हे शोभन-धन वाले अग्नि! हमारी स्तुतियां इंद्र के समीप जाती हैं. हे शोभन-धन वाले
अग्नि! हमारी स्तुतियां सुनो और हमारे इंद्र का यजन करो. तुम अश्वमेध यज्ञ करने वाले मुझ
मनु के पुत्र को स्तुतियों से बढ़ाते हो. (२१)
अध त्वमिन्द्र विद्ध्य१स्मान्महो राये नृपते वज्रबाहुः.
रक्षा च नो मघोनः पाहि सूरीननेहसस्ते हरिवो अभिष्टौ.. (२२)
हे वज्रबाहु एवं नरपालक इंद्र! हमने विशाल धन की अभिलाषा की है, उसे तुम जानो.
तुम हम हव्यधारक एवं स्तुतिप्रेरकों की रक्षा करो. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! हम
तुम्हारी दृष्टि में पापरहित बनें. (२२)
अध यद्राजाना गविष्टौ सरत्सरण्युः कारवे जरण्युः.
विप्रः प्रेष्ठः स ह्येषां बभूव परा च वक्षदुत पर्षदेनान्.. (२३)
हे दीप्तिशाली मित्र व वरुण! अंगिरागोत्रीय ऋषि यज्ञ कर रहे थे, उस समय यम गाय
पाने की इच्छा से गए. उनकी स्तुति करने का इच्छुक, ब्राह्मण नाभानेदिष्ट उनका अतिशय
प्रिय हुआ उनका यज्ञ पूरा हो और उन्हें पार पहुंचावे. (२३)
अधा न्वस्य जेन्यस्य पुष्टौ वृथा रेभन्त ईमहे तदू नु.
सरण्युरस्य सूनुरश्वो विप्रश्चासि श्रवसश्च सातौ.. (२४)
हम गौएं पाने की इच्छा से जयशील वरुण की शीघ्र स्तुति करते हुए उनके समीप
अनायास याचना करते हैं. शीघ्रगामी अश्व इस वरुण का पुत्र है. हे वरुण! तुम ब्राह्मण के
समान पूज्य एवं अन्न देने वाले हो. (२४)
युवोर्यदि सख्यायास्मे शर्धाय स्तोमं जुजुषे नमस्वान्.
विश्वत्र यस्मिन्ना गिरः समीचीः पूर्वीव गातुर्दाशत्सूनृतायै.. (२५)
हे मित्र व वरुण! अन्न धारण करने वाला अध्वर्यु तुम दोनों की शक्तिशाली मित्रता के
लिए तुम्हारी सेवा करता है. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके अंगिरागोत्रीय ऋषि को सभी स्थानों
के अनुकूल वचन सुनाई देंगे. जिस प्रकार प्राचीन मार्ग चलने के लिए सुखकर होता है, उसी
प्रकार तुम अपनी प्रिय और सत्य स्तुति हमें प्रदान करो. (२५)
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स गृणानो अद्भिर्देववानिति सुबन्धुर्नमसा सूक्तैः.

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स गृणानो अद्भिर्देववानिति सुबन्धुर्नमसा सूक्तैः.
वर्धदुक्थैर्वचोभि॒रा हि नूनं व्यध्वैति पयस उस्रियायाः.. (२६)
देवों के परम बंधु वरुण नमस्कार और शोभन स्तुतियों से प्रशंसित होकर बढ़ें. दुधारू
गाय के दूध की धारा उनके यज्ञ के लिए बहे. (२६)
त ऊ षु णो महो यजत्रा भूत देवास ऊतये सजोषाः.
ये वाजाँ अनयता वियन्तो ये स्था निचेतारो अमूराः.. (२७)
हे यज्ञ के अधिकारी देवो! तुम हमारी महती रक्षा के लिए संगत बनो. हे अंगिरागोत्रीय
ऋषियो! यज्ञ के लिए विविध प्रकार से प्रयत्न करते हुए तुम मेरे लिए अन्न लाओ. तुम इस
समय मोहरहित होकर गाय प्राप्त करो. (२७)
सूक्त—६२ देवता—विश्वेदेव
ये यज्ञेन दक्षिणाया समक्ता इन्द्रस्य सख्यममृतत्वमानश.
तेभ्यो भद्रमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः.. (१)
हे अंगिरागोत्रीय ऋषियो! तुम लोग यज्ञ संबंधी द्रव्यों एवं दक्षिणा के द्वारा सामूहिक
रूप से इंद्र की मित्रता एवं अमरता प्राप्त कर चुके हो. तुम्हारा कल्याण हो. हे शोभन मेधा
वाले अंगिराओ! तुम मुझ मनुपुत्र को इस समय स्वीकार करो. मैं भली प्रकार तुम्हारा यज्ञ
करूंगा. (१)
य उदाजन्पितरो गोमयं वस्वृतेनाभिन्दन्परिवत्सरे वलम्.
दीर्घायुत्वमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः.. (२)
हे पितृतुल्य अंगिराओ! तुम हमारे पिता के समान हो. तुम पणियों द्वारा चुराई गई गायों
को पर्वत से निकाल लाए थे. तुमने एक वर्ष तक यज्ञ करके बल नामक असुर को नष्ट किया.
तुम्हें दीर्घायु प्राप्त हो. हे अंगिराओ! तुम मुझ मनुपुत्र को इस समय स्वीकार करो. मैं भली
प्रकार तुम्हारा यज्ञ करूंगा. (२)
य ऋतेन सूर्यमारोहयन् दिव्यप्रथयन्पृथिवीं मातरं वि.
सुप्रजास्त्वमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः.. (३)
हे अंगिराओ! तुम लोगों ने यज्ञ के द्वारा सूर्य को स्वर्गलोक में स्थापित किया एवं सबकी
माता पृथ्वी को प्रसिद्ध किया. तुम्हें शोभन प्रजा प्राप्त हो. हे अंगिराओ! तुम मुझ मनुपुत्र को
इस समय स्वीकार करो. मैं भली प्रकार तुम्हारा यज्ञ करूंगा. (३)
अयं नाभा वदति वल्गु वो गृहे देवपुत्रा ऋषयस्तच्छृणोतन.
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सुब्रह्मण्यमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः.. (४)
हे देवपुत्र अंगिरा ऋषियो! यह नाभानेदिष्ट तुम्हारे यज्ञगृह के कल्याणकारी वचन
बोलता है. तुम उसे सुनो. तुम्हें शोभन-ब्रह्मतेज प्राप्त हो. हे अंगिराओ! तुम मुझ मनुपुत्र को
इस समय स्वीकार करो. मैं भली प्रकार तुम्हारा यज्ञ करूंगा. (४)
विरूपास इदृषयस्त इदगम्भीरवेपसः. ते अङ्गिरसः सूनवस्ते अग्नेः परि जज्ञिरे.. (५)
ऋषिगण नानारूप वाले हैं एवं अंगिरा गंभीर कर्म वाले हैं. अग्नि के पुत्र के अंगिरा सभी
ओर उत्पन्न हुए हैं. (५)
ये अग्नेः परि जज्ञिरे विरूपासो दिवस्परि.
नवग्वो नु दशग्वो अङ्गिरस्तमः सचा देवेषु मंहते.. (६)
विविधरूप वाले जो अंगिरा द्युलोक से अग्नि के चारों ओर उत्पन्न हुए हैं, उन्होंने नौ
अथवा दस मास तक यज्ञ करके गाय रूप धन प्राप्त किया है. अंगिराओं में सर्वश्रेष्ठ अग्नि
देवों के साथ हमें धन देते हैं. (६)
इन्द्रेण युजा निः सृजन्त वाघतो व्रजं गोमन्तमश्विनम्.
सहस्रं मे ददतो अष्टकर्ण्य१ः श्रवो देवेष्वक्रत.. (७)
यज्ञकर्म करने वाले अंगिराओं ने इंद्र के साथ मिलकर गायों और अश्वों से युक्त
पशुशाला का उद्धार किया. अंगिराओं में सर्वश्रेष्ठ अग्नि देवों के साथ हमें धन देते हैं. (७)
प्र नूनं जायतामयं मनुस्तोक्मेव रोहतु. यः सहस्रं शताश्वं सद्यो दानाय मंहते.. (८)
वे सावर्णि मनु जल से भीगे बीज के समान शीघ्र बढ़ें. वे हजारों घोड़ों से युक्त सैकड़ों
गौएं तुरंत देने के लिए तैयार हैं. (८)
न तमश्नोति कश्चन दिव इव सान्वारभम्.
सावर्ण्यस्य दक्षिणा वि सिन्धुरिव पप्रथे.. (९)
मनु जब दानकर्म आरंभ करते हैं तो कोई भी उनकी समानता नहीं करता. वे सोने के
पर्वत के समान स्थित हैं. सावर्णि मनु की दक्षिणा नदी के समान सब जगह बढ़ती है. (९)
उत दासा परिविषे स्मद्दिष्ट्ी गोपरीणसा. यदुस्तुर्वश्च मामहे.. (१०)
कल्याण करने वाले, गायों से युक्त एवं दास के समान यदु और तुर्वसु नामक राजा मनु
के भोजन के लिए पशु देते हैं. (१०)
सहस्रदा ग्रामणीर्मा रिषन्मनुः सूर्येणास्य यतमानैतु दक्षिणा.
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सूक्त—६३ देवता—पथ्या और स्वस्ति

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सावर्णेर्देवाः प्र तिरन्त्वायुर्यस्मिञ्श्रान्ता असनाम वाजम्.. (११)
हजारों गौएं देने वाले एवं मनुष्यों के नेता मनु को कोई हानि नहीं पहुंचा सकता. मनु की
दक्षिणा सूर्य के साथ तीन लोकों में प्रसिद्ध हो. देवगण सावर्णि मनु की आयु बढ़ावें. यज्ञकर्मों
में आलस्य न करने वाले हम मनु से अन्न प्राप्त करें. (११)
सूक्त—६३ देवता—पथ्या और स्वस्ति
परावतो ये दिधिषन्त आप्यं मनुप्रीतासो जनिमा विवस्वतः.
ययातेर्ये नहुष्यस्य बर्हिषि देवा आसते ते अधि ब्रुवन्तु नः.. (१)
जो देवगण दूर देश से आकर मनुष्यों के साथ मित्रता स्थापित करते हैं, मानवों द्वारा
प्रसन्न होकर जो देव वैवस्वत मनु से उत्पन्न मनुष्यों को धारण करते हैं एवं जो देव नहुषपुत्र
ययाति राजर्षि के यज्ञ में बैठते हैं, वे धन आदि देकर हमें पूजित करें. (१)
विश्वा हि वो नमस्यानि वन्द्या नामानि देवा उत यज्ञियानि वः.
ये स्थ जाता अदितेरद्भ्यस्परि ये पृथिव्यास्ते म इह श्रुता हवम्.. (२)
हे देवो! तुम्हारे सभी नाम नमस्कार के योग्य, वंदनीय एवं यज्ञ के योग्य हैं. जो देव
अदिति, जल एवं पृथ्वी से उत्पन्न हुए हैं, वे यहां हमारी पुकार को सुनें. (२)
येभ्यो माता मधुमत्पिन्वते पयः पीयूषं द्यौरदितिरद्रिबर्हाः.
उक्थशुष्मान् वृषभरान्त्स्वप्रसस्ताँ आदित्याँ अनु मदा स्वस्तये.. (३)
पृथ्वी माता जिन देवों के लिए मधुर दूध बहाती है और अदीन तथा बादलों से घिरा हुआ
आकाश जिनके लिए अमृत धारण करता है, उन प्रशंसनीय शक्ति वाले, वर्षा करने वाले,
शोभन कर्म वाले एवं अदितिपुत्र देवों के लिए स्तुति करो. (३)
नृचक्षसो अनिमिषन्तो अर्हणा बृहद्देवासो अमृतत्वमानशुः.
ज्योतीरथा अहिमाया अनागसो दिवो वर्म्माणं वसते स्वस्तये.. (४)
बिना पलक गिराए यज्ञकर्म के नेताओं को देखने वाले देवों ने लोक की रक्षा के लिए
विस्तृत अमृत प्राप्त किया था. तेजस्वी रथ वाले, विघ्नरहित यज्ञकर्मों वाले व पापरहित
देवगण लोगों के कल्याण के लिए स्वर्ग के उन्नत प्रदेश में रहते हैं. (४)
सम्राजो ये सुवृधो यज्ञमाययुरपरिह्वृता दधिरे दिवि क्षयम्.
ताँ आ विवास नमसा सुवृत्तिभिर्महो आदित्याँ अदितिं स्वस्तये.. (५)
अपने तेज से भली-भांति सुशोभित एवं भली प्रकार उन्नत जो देव यज्ञ में आते हैं एवं
किसी के द्वारा भी अहिंसित होकर स्वर्ग में रहते हैं, उन महान् देवों और अदिति की सेवा
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कल्याण के निमित्त नमस्कार एवं शोभन स्तुतियों द्वारा करो. (५)
को वः स्तोमं राधति यं जुजोषथ विश्वे देवासो मनुषो यति ष्ठन.
को वोऽध्वरं तुविजाता अरं करद्यो नः पर्षदत्यंहः स्वस्तये.. (६)
हे देवो! मेरे अतिरिक्त कौन तुम्हारी स्तुति कर सकता है, जिसकी तुम सेवा करो? हे
ज्ञाता देवो! तुम संतान वाले बनो. मेरे अतिरिक्त कौन यजमान स्तुतियों द्वारा तुम्हारा यज्ञ
अलंकृत करता है. यज्ञ हमें पाप से बचाकर हमारा कल्याण करता है. (६)
येभ्यो होत्रां प्रथमामायेजे मनुः समिद्धाग्निर्मनसा सप्त होतृभिः.
त आदित्या अभयं शर्म यच्छत सुगा नः कर्त सुपथा स्वस्तये.. (७)
सबसे पहले मनु श्रद्धायुक्त मन से सात होताओं के साथ अग्नि प्रज्वलित करके स्तुतियों
द्वारा जिन देवों का यजन करते हैं, वे देव हमें निर्भय करें, कल्याण दें एवं हमारी भलाई के
लिए सभी मार्गों को सुगम बनावें. (७)
य ईशिरे भुवनस्य प्रचेतसो विश्वस्य स्थातुर्जगतश्च मन्तवः.
ते नः कृतादकृतादेनसस्पर्रद्यद्या देवासः पिपृता स्वस्तये.. (८)
उत्तम ज्ञान वाले एवं सर्वज्ञ देव समस्त जंगम लोक के स्वामी हैं. हे देवो! तुम हमें कृत
अथवा अकृत पाप से बचाकर आज हमारे कल्याण को बढ़ाओ. (८)
भरेष्विन्द्रं सुहवं हवामहेंऽहोमुचं सुकृतं दैव्यं जनम्.
अग्निं मित्रं वरुणं सातये भगं द्यावापृथिवी मरुतः स्वस्तये.. (९)
हम पाप से छुड़ाने वाले, शोभन-आह्वान वाले एवं शोभन कर्म वाले देवों के संबंधी इंद्र
को सब यज्ञों में बुलाते हैं. हम अन्नलाभ और अविनाशी बनने के लिए अग्नि, मित्र, वरुण,
भग, द्यावा-पृथिवी और मरुतों को बुलाते हैं. (९)
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम्.
दैवीं नावं स्वरित्रामनागसमस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये.. (१०)
हम भली प्रकार रक्षा करने वाली, विस्तृत, पापरहित, शोभन, सुखयुक्त, क्षयरहित,
सुदृढ़ गठन वाली, शोभन आचरण युक्त, निष्पाप एवं विनाशरहित द्युलोकरूपी नाव पर
कल्याण के लिए चढ़ें. (१०)
विश्वे यजत्रा अधि वोचतोतये त्रायध्वं नो दुरेवाया अभिद्रुतः.
सत्यया वो देवहूत्या हुवेम शृण्वतो देवा अवसे स्वस्तये.. (११)
हे यज्ञ के पात्र देवो! तुम रक्षा के निमित्त हमसे कहो एवं विनाश करने वाली दुर्गति से
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हमें बचाओ. हम सत्यरूप यज्ञ द्वारा तुम्हें बुलाते हैं. रक्षा और कल्याण के लिए तुम हमारी
पुकार सुनो. (११)
अपामीवामप विश्वामनाहुतिमपारातिं दुर्विदत्रामघायतः.
आरे देवा द्वेषो अस्मद्युयोतनोरु णः शर्म यच्छता स्वस्तये.. (१२)
हे देवो! हमारे रोगों और देवों का आह्वान न करने वाली दुर्बुद्धि को हमसे दूर करो. तुम
लोभमय बुद्धि को हमसे अलग करो. तुम दुष्ट की पापमय बुद्धि हमसे दूर करो. तुम शत्रुओं
को हमसे दूर कर दो. तुम हमें विशेष सुख और कल्याण प्रदान करो. (१२)
अरिष्टः स मर्तो विश्व एधते प्र प्रजाभिर्जायते धर्मणस्परि.
यमादित्यासो नयथा सुनीतिभिरति विश्वानि दुरिता स्वस्तये.. (१३)
हे अदितिपुत्र देवो! जिन्हें तुम शोभन-मार्गों से ले जाते हो एवं सभी पापों से दूर करके
कल्याण प्रदान करते हो, वे सब लोग सभी अनिष्टों से सुरक्षित रहकर वृद्धि प्राप्त करते हैं एवं
धर्मकार्यों के पश्चात् संतान की उन्नति पाते हैं. (१३)
यं देवासोऽवथ वाजसातौ यं शूरसाता मरुतो हिते धने.
प्रातर्यावाणं रथमिन्द्र सानसिमरिष्यन्तमा रुहेमा स्वस्तये.. (१४)
हे देवो! अन्नलाभ के लिए तुम जिसकी रक्षा करते हो, हे मरुतो! युद्ध में संचित धन पाने
के लिए तुम जिस रथ की रक्षा करते हो, हे इंद्र! उसी प्रातःकाल युद्ध में जाने वाले, सेवन
करने योग्य एवं ध्वस्त न होने वाले रथ पर हम कल्याण के लिए चढ़ें. (१४)
स्वस्ति नः पथ्यासु धन्वसु स्वस्त्य१प्सु वृजने स्वर्वति.
स्वस्ति नः पुत्रकृथेषु योनिषु स्वस्ति राये मरुतो दधातन.. (१५)
हे मरुतो! शोभन-पथ वाले देश एवं मरुस्थल दोनों में हमारा कल्याण हो. जल एवं
आयुधों से युक्त युद्ध में हमारा कल्याण करो. पुत्रों को उत्पन्न करने वाली नारियों में हमारा
कल्याण हो. तुम धनलाभ के लिए हमारा कल्याण करो. (१५)
स्वस्तिरिद्धि प्रपथे श्रेष्ठा रेक्णस्वत्यभि या वाममेति.
सा नो अमा सो अरणे नि पातु स्वावेशा भवतु देवगोपा.. (१६)
जो धरती मार्ग पर चलने के लिए कल्याणकारिणी है, सर्वोत्तम धनसंपन्न एवं यज्ञ की
उत्तर वेदी पर प्राप्त होने वाली है, वह घर एवं वन दोनों में हमारी रक्षा करे. देवों द्वारा सुरक्षित
वह धरती हमारे लिए सुखपूर्वक रहने योग्य हो. (१६)
एवा प्लतेः सूनुरवीवृधद्धो विश्व आदित्या अदिते मनीषी.
ईशानासो नरो अमर्त्येनास्तावि जनो दिव्यो गयेन.. (१७)
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