Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

About this granth

The Rigveda (ऋग्वेद) is the oldest of the four Vedas and the earliest surviving text of the Indian tradition. Its Samhita is arranged in ten mandalas containing more than a thousand hymns (suktas) addressed to Agni, Indra, Varuna, Mitra, Soma, Ushas, the Maruts, the Ribhus, the Vishvedevas and other deities, along with reflections on creation, generosity, marriage and society. Hymns such as the Nasadiya and the Purusha Sukta are often taken as the starting points of Indian philosophy.

This edition is by Dr. Ganga Sahay Sharma, a scholar with degrees in Hindi and Sanskrit and the title of Vyakaranacharya, published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, as part of a four-Veda set. Each hymn is headed by its number and deity, followed by the Sanskrit mantras and a simple Hindi rendering of their sense. A list of hymns, their subjects and the number of mantras is given at the front.

The Hindi is plain and close to everyday speech, which makes this edition a good first approach to the meaning of the mantras for readers not ready for a traditional commentary. The complete text, about 1,855 pages, can be read here page by page.

Page 1640Permalink

वृद्धियुक्त, शोभनबल वाला, शत्रुहंता, शत्रु नगरियों को तोड़ने वाला एवं सच्चे कर्मों वाला पुत्र
दो. तुम हमें वर्षक एवं विचित्र धन दो. (४)
अश्वावन्तं रथिनं वीरवन्तं सहस्रिणं शतिनं वाजमिन्द्र.
भद्राव्रातं विप्रवीरं स्वर्षांमस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः.. (५)
हे इंद्र! तुम हमें घोड़ों से युक्त, रथस्वामी, वीर पुरुषों वाला, सैकड़ों और हजारों
संपत्तियों वाला, कल्याणकारी सेवकों से घिरा हुआ, विप्रों व वीरों से युक्त एवं सबकी सेवा
करने वाला पुत्र दो. तुम हमें वर्षक एवं विचित्र धन दो. (५)
प्र सप्तगुमृतीतिं सुमेधां बृहस्पतिं मतिरच्छा जिगाति.
य आङ्गिरसो नमसोपसद्योऽस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः.. (६)
मैं सात गायों का स्वामी, सत्यकर्मों वाला, शोभन बुद्धियुक्त एवं विशाल मंत्रों का स्वामी
हूं. देवों की स्तुति मेरे पास आती है. अंगिरा गोत्र में उत्पन्न मैं नमस्कार के साथ देवों के पास
जाता हूं. हे इंद्र! तुम हमें वर्षक एवं विचित्र धन दो. (६)
वनीवानो मम दूतास इन्द्रं स्तोमाश्र्वरन्ति सुमतीरियानाः.
हृदिस्पृशो मनसा वच्यमाना अस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः.. (७)
मुझ सुंदर भावों वाले की दूत सदृश स्तुतियां हमारे प्रति इंद्र की अनुकूल बुद्धि की
याचना करती हुई इंद्र के पास जाती हैं. मैं श्रोताओं के मन को छूने वाली स्तुतियां सच्चे मन
से करता हूं. हे इंद्र! तुम हमें वर्षक एवं विचित्र धन दो. (७)
यत्त्वा यामि दद्धि तन्न इन्द्र बृहन्तं क्षयमसमं जनानाम्.
अभि तद् द्यावापृथिवी गृणीतामस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः.. (८)
हे इंद्र! मैं तुमसे जो मांगता हूं, वह तुम मुझे दो. मुझे ऐसा बड़ा घर दो, जो किसी के
पास नहीं है. द्यावा-पृथिवी हमें यह दें. तुम हमें वर्षक और विचित्र धन दो. (८)
सूक्त—४८ देवता—इंद्र
अहं भुवं वसुनः पूर्व्यस्पतिरहं धनानि सं जयामि शश्वतः.
मां हवन्ते पितरं न जन्तवोऽहं दाशुषे वि भजामि भोजनम्.. (१)
मैं ही धन का असाधारण स्वामी रहा हूं. मैं सदा धनों को जीतता रहा हूं. यजमान मुझे
ही बुलाते हैं. पुत्र जैसे पिता को अन्न देता है, वैसे ही मैं हव्यदाता यजमान को अन्न देता हूं.
(१)
अहमिन्द्रो रोधो वक्षो अथर्वणस्तिताय गा अजनयमहंरधि.
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1641Permalink

अह दस्युभ्यः परि नृम्णमा ददे गोत्रा शिक्षन् दधीचे मातरिश्वने.. (२)
मैंने अथर्वा के पुत्र दध्यङ् का शिर काट डाला था. कुएं में गिरे हुए त्रित की रक्षा के लिए
मैंने मेघ में जल धारण किया था एवं शत्रुओं से धन छीना था. मैंने मातरिश्वा के पुत्र दधीचि के
कल्याण के लिए जलरक्षक मेघों को नम्र बनाया था. (२)
मह्यं त्वष्टा वज्रमतक्षदायसं मयि देवासोऽवृजन्नपि क्रतुम्.
ममानीकं सूर्यस्येव दुष्तरं मामार्यन्ति कृतेन कर्त्वेन च.. (३)
त्वष्टा ने मेरे लिए लोहे का वज्र बनाया था. देवगण मेरे लिए यज्ञ पूरा करते हैं. मेरी सेवा
सूर्य के समान दुस्तर है. लोग मेरे द्वारा भूतकाल में किए गए एवं भविष्य में किए जाने वाले
कार्यों के कारण मेरे पास आते हैं. (३)
अहमेतं गव्यमश्व्यं पशुं पुरीषिणं सायकेना हिरण्ययम्.
पुरू सहस्रा नि शिशामि दाशुषे यन्मा सोमास उक्थिनो अमन्दिषुः.. (४)
जब यजमान मुझे सोमरस एवं स्तुतियों से प्रसन्न करते हैं, तब मैं आयुधों के द्वारा शत्रु
की गायों, घोड़ों, धनों एवं दुधारू पशुओं को जीतता हूं तथा हव्यदाता यजमान के कल्याण
के लिए अनेक शस्त्रों को तेज करता हूं. (४)
अहमिन्द्रो न परा जिग्य इद्धनं न मृत्यवेऽव तस्थे कदा चन.
सोममिन्मा सुन्वन्तो याचता वसु न मे पूरवः सख्ये रिषाथन.. (५)
मैं धनों का स्वामी हूं. मेरे धनों को कोई जीत नहीं पाता. मैं कभी भी मृत्यु का लक्ष्य नहीं
बनता. हे सोमरस निचोड़ने वाले यजमानो! तुम मनचाहा धन मुझसे ही मांगो. हे मनुष्यो! मेरी
मित्रता का विनाश कभी मत करो. (५)
अहमेताञ्छाश्वसतो द्वाद्वेन्द्रं ये वज्रं युधयेऽकृण्वत.
आह्वयमानाँ अव हन्मनाहनं दृळ्हा वदन्ननमस्युर्नमस्विनः.. (६)
मैंने अधिक शक्तिशाली व दो-दो के रूप में मुझ वज्रधारी इंद्र के साथ लड़ने के लिए
तैयार व युद्ध के लिए ललकारने वाले शत्रुओं को कठोर वचन कहकर मार डाला. मैं स्वयं
नहीं झुका. मैंने उन्हें झुका दिया. (६)
अभी३दमेकमेको अस्मि निष्षाळभी द्वा किमु त्रयः करन्ति.
खले न पर्षान् प्रति हान्म भूरि किं मा निन्दन्ति शत्रवोऽनिन्द्राः.. (७)
मैं अकेला ही एक शत्रु को हराता हूं. शत्रुओं को सहन न करने वाला मैं दो को भी
पराजित करता हूं. तीन शत्रु मेरा क्या कर लेंगे? किसान जिस प्रकार खलियान में अनाज को
कुचलता है, उसी प्रकार मैं बहुत से शत्रुओं को नष्ट कर देता हूं. मुझ इंद्र के विरोधी शत्रु मेरी
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1642Permalink

क्या निंदा कर सकते हैं? (७)
अहं गुङ्गुभ्यो अतिथिग्वमिष्करमिषं न वृत्रतुरं विक्षु धारयम्.
यत्पर्णयघ्न उत वा करञ्जहे प्राहं महे वृत्रहत्ये अश्रुश्रवि.. (८)
मैंने गुंगु नामक जनपदों की रक्षा के लिए अतिथिग्व के पुत्र दिवोदास ऋषि को
विपत्तिनिवारक, शत्रुनाशक एवं प्रजाओं में अन्न के समान सेवनीय बनाकर स्थापित किया
था. मैं पर्णय और करंज नामक शत्रुओं के वध वाले युद्ध में बहुत प्रसिद्ध हुआ था. (८)
प्र मे नमी साप्य इषे भुजे भूद्गवामेषे सख्या कृणुत द्विता.
दिद्युं यदस्य समिथेषु मंहयमादिदेनं शंस्यमुक्थ्यं करम्.. (९)
मेरे स्तोता सबके आश्रय योग्य तथा अन्न व भोगों के दाता होते हैं. लोग गायों को
खोजने एवं मित्रता पाने के लिए दो प्रकार से मेरी स्तुति करते हैं. मैं जब अपने स्तोता की
विजय के लिए युद्धों में आयुध ग्रहण करता हूं, तब इसे प्रशंसा और स्तुति के योग्य बना देता
हूं. (९)
प्र नेमस्मिन्ददृशे सोमो अन्तर्गोपा नेममाविरस्था कृणोति.
स तिग्मशृङ्गं वृषभं युयुत्सन् द्रुहस्तस्थौ बहुले बद्धो अन्तः.. (१०)
दो युद्ध करने वालों में जो सोमयज्ञ करने वाला होता है, उसी की रक्षा करने वाला इंद्र
वज्र से उसे अपराजेय बनाता है. जो सोमयज्ञ नहीं करता, वह तीखे बाण बरसाने वाले के
साथ लड़ने को तैयार होता है, पर अंधकार में बंध जाता है. (१०)
आदित्यानां वसूनां रुद्रियाणां देवी देवानां न मिनामि धाम.
ते मा भद्राय शवसे ततक्षुरपराजितमस्तृतमषाळहम्.. (११)
मैं इंद्र, आदित्यों, वसुओं एवं रुद्रदेवों का स्थान नष्ट नहीं करता हूं. इन देवों ने मुझ
अपराजित, अहिंसित एवं न झुकने वाले इंद्र को कल्याण एवं अन्न के लिए बनाया था. (११)
सूक्त—४९ देवता—विकुंठा संबंधी इंद्र
अहं दां गृणते पूर्व्यं वस्वहं ब्रह्म कृणवं मह्यं वर्धनम्.
अहं भुवं यजमानस्य चोदितायज्वनः साक्षि विश्वस्मिन्भरे.. (१)
मैंने अपने स्तोता को अधिक धन दिया. मैंने अपनी वृद्धि करने वाले यज्ञों का अनुष्ठान
किया. मैं अपने यजमान को धन देता हूं तथा यज्ञ न करने वाले सभी को युद्ध में पराजित
करता हूं. (१)
मां धुरिन्द्रं नाम देवता दिवश्च ग्मश्चापां च जन्तवः.
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1643Permalink

अहं हरी वृषणा विव्रता रघू अहं वज्रं शवसे धृष्ण्वा ददे.. (२)
स्वर्ग में विचरण करने वाले देवों व धरती तथा जल के जंतुओं ने मेरा नाम 'इंद्र' रखा है.
मैं यज्ञ में जाने के लिए हरे रंग वाले, शक्तिशाली, विविध कर्म वाले एवं शीघ्रगामी अश्वों को
रथ में जोड़ता हूं तथा धर्षक वज्र को शक्ति प्राप्त करने के लिए धारण करता हूं. (२)
अहमत्कं कवये शिश्रथं हथैरहं कुत्समावामाभिरूतिभिः.
अहं शुष्णस्य श्रथिता वधर्यमं न यो रर आर्यं नाम दस्यवे.. (३)
मैंने उशना ऋषि को सुखवास देने के लिए अत्क को अनेक आयुधों से मारा. मैंने अनेक
रक्षासाधनों से कुत्स की रक्षा की. मैंने शुष्ण असुर को मारने के लिए वज्र उठाया. मैंने
दस्युजनों को 'आर्य' नाम से नहीं पुकारा. (३)
अहं पितेव वेतसूँरभिष्टये तुग्रं कुत्साय स्मदिभं च रन्धयम्.
अहं भुवं यजमानस्य राजनि प्र यद्धरे तुजये न प्रियाधुषे.. (४)
मैंने अभिलाषा करने वाले कुत्स ऋषि के अधिकार में वेतसु नामक देश इस प्रकार दे
दिया था, जिस प्रकार पिता पुत्र को अपनी संपत्ति देता है. मैंने तुग्र और स्वदिभ नामक
व्यक्तियों को भी कुत्स के अधिकार में दे दिया. मैं यजमान को राजा बनाता हूं. जिस प्रकार
पिता पुत्र को देता है, उसी प्रकार मैं यजमान को प्रिय वस्तुएं देता हूं. (४)
अहं रन्धयं मृगयं श्रुतर्वणे यन्माजिहीत वयुना चनानुषक्.
अहं वेशं नम्रमायवेऽकरमहं सव्याय पड्गृभिमरन्धयम्.. (५)
जब श्रुतर्वा ऋषि मेरे समीप आए और उन्होंने मेरी स्तुति की, तब मैंने उनके कल्याण
के लिए रांथय नामक असुर को वश में किया. मैंने वेश असुर को नम्र ऋषि तथा षड्गृभि
असुर को सव्य ऋषि के कल्याण के लिए वश में किया. (५)
अहं स यो नववास्त्वं बृहद्रथं सं वृत्रेव दासं वृत्रहारुजम्.
यद्वर्धयन्तं प्रथयन्तमानुषग्दूरे पारे रजसो रोचनाकरम्.. (६)
मैं वह इंद्र हूं, जिसने नववास्त्व और बृहद्रथ को वृत्र के समान मारा था. मैंने बढ़ते हुए
एवं प्रसिद्ध दोनों असुरों को उज्ज्वल लोक से बाहर निकाल दिया था. (६)
अहं सूर्यस्य परि याम्याशुभिः प्रैतशोभिर्वहमान ओजसा.
यन्मा सावो मनुष आह निर्णिज ऋध्वक्कृषे दासं कृत्व्यं हथै:... (७)
मैं शीघ्रगामी एवं उज्ज्वल वर्ण अश्वों द्वारा ढोया जाकर अपने बल से सूर्य की परिक्रमा
करता हूं. जब यजमान का सोम अभिषव मुझे बुलाता है, उस समय मैं हनन साधन आयुधों
द्वारा शत्रु को ढेर करता हूं. (७)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1644Permalink

अहं सप्तहा नहुषो नहुष्टरः प्राश्रावयं शवसा तुर्वशं यदुम्.
अहं न्य१न्यं सहसा सहस्करं नव व्राधतो नवतिं च वक्ष्यम्.. (८)
मैं सात शत्रु नगरियों को नष्ट करने वाला व बंधनकर्त्ताओं में श्रेष्ठ हूं. मैंने अपने बल से
तुर्वश और यदु को प्रसिद्ध किया. मैंने अपने अन्य स्तोताओं को शक्तिशाली बनाया तथा
शत्रुओं की उन्नतिशील निन्यानवे नगरियों को ध्वस्त किया. (८)
अहं सप्त स्रवतो धारयं वृषा द्रवित्न्वः पृथिव्यां सीरा अधि.
अहमर्णांसि वि तिरामि सुक्रतुर्युधा विदं मनवे गातुमिष्टये.. (९)
मैं वर्षा करने वाला हूं. मैंने बहने वाली सात नदियों को धरती पर धारण किया है. मैं
शोभन यज्ञ करने वाला हूं. मैं लोगों को जल देता हूं. मैंने युद्ध के द्वारा मनुष्यों के चलने के
लिए मार्ग दिया है. (९)
अहं तदास धारयं यदासुन देवश्चन त्वष्टाधारयद्रुशत्.
स्पार्हं गवामूहः सु वक्षणास्वा मधोर्मधु श्वात्र्यं सोममाशिरम्.. (१०)
इन गायों के थनों में मैंने जैसा दीप्त, स्पृहणीय एवं मधुर दूध धारण किया है, वैसा कोई
भी देव नहीं रख सकता. नदी में जिस प्रकार जल बहता है, उसी प्रकार स्तनों में दूध रहता है
एवं वह सोमरस में मिलकर सुखद बन जाता है. (१०)
एवा देवाँ इन्द्रो विव्ये नॄन् प्र च्यौत्नेन मघवा सत्यराधाः.
विश्वेत्ता ते हरिवः शचीवोऽभि तुरासः स्वयशो गृणन्ति.. (११)
इस प्रकार धनवान् एवं सत्य धन वाले इंद्र अपने बल से देवों एवं मानवों को विशेष
गतिशील बनाते हैं. हे हरि नामक अश्वों वाले एवं विविध कर्मों के कर्त्ता इंद्र! सारा संसार
तुम्हारे वश में है. ऋत्विज् शीघ्रतापूर्वक तुम्हारे यश का वर्णन करते हैं. (११)
सूक्त—५० देवता—विकुंठा संबंधी इंद्र
प्र वो महे मन्दमानायान्धसोऽर्चा विश्वानराय विश्वाभुवे.
इन्द्रस्य यस्य सुमुखं सहो महि श्रवो नृम्णं च रोदसी सपर्यतः.. (१)
हे स्तोता! सबके नेता, सबको बनाने वाले, महान् एवं सोम से प्रसन्न होने वाले इंद्र की
अर्चना करो. इंद्र के प्रशंसनीय बल, महान् अन्न और सुख की पूजा द्यावा-पृथिवी करते हैं.
(१)
सो चिन्नु सख्या नर्य इनः स्तुतश्चर्कृत्य इन्द्रो मावते नरे.
विश्वासु धुर्षु वाजकृत्येषु सत्पते वृत्रे वाप्स्व१भि शूर मन्दसे.. (२)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1645Permalink

मित्रता के कारण मनुष्यों के हितैषी, सबके ईश्वर, सबके द्वारा प्रशंसित इंद्र मुझ जैसे
व्यक्ति द्वारा बार-बार सेवनीय हैं. हे सज्जनों के पालक एवं शूर इंद्र! सभी कठिन कार्यों एवं
शक्ति द्वारा संपन्न होने वाले कर्मों में तथा जलप्राप्ति के लिए सब तुम्हारी पूजा करते हैं. (२)
के ते नर इन्द्र ये त इषे ये ते सुम्नं सधन्य१मियक्षान्.
के ते वाजायासुर्याय हिन्विरे के अप्सु स्वासूर्वरासु पौंस्ये.. (३)
हे इंद्र! वे महान् लोग कौन हैं जो तुमसे अन्न, धनसहित सुख एवं कल्याण प्राप्त करते
हैं? तुम्हें असुरविनाश योग्य शक्ति प्रदान करने वाला सोमरस देने वाले लोग कौन हैं? अपनी
उपजाऊ भूमियों पर वर्षा का जल एवं बल पाने के लिए तुम्हें हवि देने वाले लोग कौन हैं?
(३)
भुवस्त्वमिन्द्र ब्रह्मणा महान्भुवो विश्वेषु सवनेषु यज्ञियः.
भुवो नँश्च्यौत्नो विश्वस्मिन्भरे ज्येष्ठश्च मन्त्रो विश्वचर्षणे.. (४)
हे इंद्र! तुम हमारी स्तुति से महान् बने हो. तुम सभी यज्ञों में यज्ञ का भाग पाने के योग्य
हो. तुम सभी युद्धों में शत्रुओं को हराने वाले बने हो. हे सबके दर्शक इंद्र! तुम सर्वोत्तम मंत्र के
समान हो. (४)
अवा नु कं ज्यायान् यज्ञवनसो महीं त ओमात्रां कृष्टयो विदुः.
असो नु कमजरो वर्धाश्च विश्वेदेता सवना तूतमा कृषे.. (५)
हे सर्वोत्तम इंद्र! तुम स्तोताओं की शीघ्र रक्षा करो. मनुष्य तुम्हारी महती रक्षाशक्ति को
जानते हैं. तुम जरारहित होकर हवि आदि से शीघ्र बढ़ो एवं इन सभी यज्ञों को शीघ्र पूर्ण करो.
(५)
एता विश्वा सवना तूतमा कृषे स्वयं सूनो सहसो यानि दधिषे.
वराय ते पात्रं धर्मणे तना यज्ञो मन्त्रो ब्रह्मोद्यतं वचः.. (६)
हे शक्ति के पुत्र इंद्र! तुम जिन यज्ञों को धारण करते हो, उन्हें शीघ्र ही पूर्ण करते हो. हे
शत्रुनाशकर्त्ता इंद्र! तुम्हारा पात्र हमारी रक्षा करे, तुम्हारा धन हमको धारण करे एवं यज्ञ, मंत्र
और ब्रह्मवाक्य तुम्हारे समीप उपस्थित हों. (६)
ये ते विप्र ब्रह्मकृतः सुते सचा वसूनां च वसुनश्च दावने.
प्र ते सुम्नस्य मनसा पथा भुवन्मदे सुतस्य सोम्यस्यान्धसः.. (७)
हे मेधावी इंद्र! जो स्तोता विविध धन एवं निवासस्थान पाने की इच्छा से सोमरस निचोड़
जाने पर तुम्हारी सेवा करते हैं, वे उस समय मनोमार्ग से सुख पाने के अधिकारी बनते हैं.
निचोड़े हुए सोमरस का नशा उन्हें चढ़ जाता है. (७)
ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—५१ देवता—अग्नि आदि

Page 1646Permalink

सूक्त—५१ देवता—अग्नि आदि
महत्तदुल्बं स्थविरं तदासीद्येनाविष्टितः प्रविवेशिथापः.
विश्वा अपश्यद्बहुधा ते अग्ने जातवेदस्तन्वो देव एकः.. (१)
देवों ने अग्नि से कहा—"हे अग्नि! वह आवरण विशाल एवं स्थूल था, जिससे लिपटे
हुए तुम जलों में प्रविष्ट हुए थे. हे जातवेद अग्नि! तुम्हारे विविध प्रकार के शरीरों को एक देव
ने देखा." (१)
को मा ददर्श कतमः स देवो यो मे तन्वो बहुधा पर्यपश्यत्.
क्वाह मित्रावरुणा क्षियन्त्यग्नेर्विश्वा समिधो देवयानीः.. (२)
अग्नि ने उत्तर दिया—"मुझे किसने देखा था? वह कौन सा देव है, जिसने मेरे विविध
शरीरों को देखा था? हे मित्र और वरुण! मुझ अग्नि की दीप्त एवं देवयज्ञ साधन देह कहां है?
यह बताओ." (२)
ऐच्छाम त्वा बहुधा जातवेदः प्रविष्टमग्ने अप्स्वोषधीषु.
तं त्वा यमो अचिकेच्चित्रभानो दशान्तरुष्यादतिरोचमानम्.. (३)
देव कहने लगे—"हे जातवेद अग्नि! जलों और ओषधियों में अनेक प्रकार से घुसे हुए
तुम्हें हम कहां खोजें? हे विचित्र किरणों वाले अग्नि! दस आवासस्थानों में अत्यंत प्रकाशमान
तुम्हें यम ने पहचान लिया था." (३)
होत्रादहं वरुण बिभ्यदायं नेदेव मा युनजन्नत्र देवाः.
तस्य मे तन्वो बहुधा निविष्टा एतमर्थं न चिकेताहमग्निः.. (४)
अग्नि बोले—"हे वरुण! मैं हव्य-वहन के कार्य से डरकर यहां आ गया हूं. मैं चाहता हूं
कि देवगण मुझे पहले के समान हव्य वहन के कार्य में न लगावें. इसी भय के कारण मेरा
शरीर अनेक प्रकार से जल में छिपा है. मैं अब यह हव्यवहन का काम स्वीकार नहीं करूंगा."
(४)
एहि मनुर्देवयुर्यज्ञकामोऽरङ्कृत्या तमसि क्षेष्यग्ने.
सुगान्पथः कृणुहि देवयानान्वह हव्यानि सुमनस्यमानः.. (५)
देवों ने कहा—"हे अग्नि! आओ, यजमान देवों का अभिलाषी एवं यज्ञ करने का
इच्छुक है. तुम तेजपुंज को धारण करते हुए भी अंधकार में हो. देवों के प्रति आने वाले लोगों
का मार्ग सरल बनाओ एवं प्रसन्नचित्त होकर हव्य-वहन करो. (५)
अग्नेः पूर्वे भ्रातरो अर्थमेतं रथीवाध्वानमन्वावरीवुः.
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1647Permalink

तस्माद्भिया वरुण दूरमायं गौरो न क्षेप्रोरविजे ज्यायाः.. (६)
अग्नि ने कहा—"हे देवो! रथी जिस प्रकार मार्ग पर चला जाता है, उसी प्रकार मेरे तीन
भाई क्रमशः हव्य-वहन करते हुए समाप्त हो गए. हे वरुण! इसी डर से मैं दूर चला आया हूं.
गौरमृग जिस प्रकार धनुर्धारी की ज्या से डरता है, उसी प्रकार मैं हव्य वहन कार्य से कांपता
हूं." (६)
कुर्मस्त आयुरजरं यदग्ने यथा युक्तो जातवेदो न रिष्याः.
अथा वहासि सुमनस्यमानो भागं देवेभ्यो हविषः सुजात.. (७)
देवों ने कहा—"हे अग्नि! हम तुम्हें जरारहित आयु प्रदान करते हैं. हे जातवेद! इस
आयु से युक्त होकर तुम नहीं मरोगे. हे शोभन जन्म वाले अग्नि! तुम प्रसन्नचित्त होकर
यजमान द्वारा दिए गए हव्य का भाग देवों के पास ले जाओ." (७)
प्रयाजान्मे अनुयाजाँश्च केवलानूर्जस्वन्तं हविषो दत्त भागम्.
घृतं चापां पुरुषं चौषधीनामग्नेश्च दीर्घमायुरस्तु देवाः.. (८)
अग्नि ने कहा—"हे देवो! तुम मुझे यज्ञ के प्रारंभ वाले, अंत वाले तथा असाधारण हव्य
भाग अधिक मात्रा में दो. तुम मुझे जल का सार अंश घृत, ओषधियों से उत्पन्न प्रधान भाग
एवं दीर्घ आयु दो." (८)
तव प्रयाजा अनुयाजाश्च केवल ऊर्जस्वन्तो हविषः सन्तु भागाः.
तवाग्ने यज्ञोऽयमस्तु सर्वस्तुभ्यं नमन्तां प्रदिशश्चतस्रः.. (९)
देवों ने कहा—"हे अग्नि! यज्ञ के प्रारंभ वाले, अंत वाले तथा असाधारण हव्य भाग
अधिक मात्रा में तुम्हारे हों. यह पूरा यज्ञ तुम्हारा हो और चारों दिशाएं तुम्हारे सामने आदर से
झुकें." (९)
सूक्त—५२ देवता—विश्वेदेव
विश्वे देवाः शास्तन मा यथेह होता वृतो मनवै यन्निषद्य.
प्र मे ब्रूत भागधेयं यथा वो येन पथा हव्यमा वो वहानि.. (१)
अग्नि ने मन ही मन कहा—"हे विश्वेदेवो! तुमने मुझे होता के रूप में वरण किया है.
मुझे यहां बैठकर जो मंत्र पढ़ना है, वह मुझे बताओ. मेरा और तुम्हारा भाग कौन सा है, यह
मुझे बताओ. मुझे वह मार्ग भी बताओ, जिससे मैं हव्य तुम्हारे पास ले जाऊं. (१)
अहं होता न्यसीदं यजीयान् विश्वे देवा मरुतो मा जुनन्ति.
अहरहरश्विनाध्वर्यवं वां ब्रह्मा समिद्भवति साहुतिर्वाम्.. (२)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1648Permalink

मैं होता के रथ में बैठा हूं और यज्ञ करूंगा. सभी देवों और मरुतों ने मुझे इस कार्य के
लिए प्रेरित किया है. हे अश्विनीकुमारो! तुम्हें प्रतिदिन अध्वर्यु का काम करना है. चंद्रमा ब्रह्मा
होंगे. तुम दोनों के लिए आहुति प्राप्त होगी. (२)
अयं यो होता किरु स यमस्य कमप्यूहे यत्समञ्जन्ति देवाः.
अहरहर्जातये मासिमास्यथा देवा दधिरे हव्यवाहम्.. (३)
यह जो होता है, वह क्या काम करता है? वह यजमान के द्वारा होम किया हुआ हव्य-
वहन करता है. उस हव्य को देव धारण करते हैं. प्रतिदिन और प्रतिमास हवन होता है. इस
कार्य के लिए देवों ने मुझे नियुक्त किया है. (३)
मां देवा दधिरे हव्यवाहमपम्लुक्तं बहु कृच्छा चरन्तम्.
अग्निर्विद्वान्यज्ञं नः कल्पयाति पञ्चयामं त्रिवृतं सप्ततन्तुम्.. (४)
मुझ पलायन करने वाले एवं अनेक दुर्गम स्थानों में घूमने वाले अग्नि को देवों ने हव्य-
वहन करने वाला नियुक्त किया था. देवों ने यह सोचा था कि ये अग्नि सब कुछ जानते हैं,
इसलिए हमारे पांच मार्गों, तीन प्रकारों एवं सात छंदों की स्तुतियों वाले यज्ञ को पूर्ण करेंगे.
(४)
आ वो यक्ष्यमृतत्वं सुवीरं यथा वो देवा वरिवः कराणि.
आ बाह्वोर्वज्रमिन्द्रस्य धेयामथेमा विश्वाः पृतना जयाति.. (५)
हे देवो! मैं तुम्हारी हव्य-वहनरूपी सेवा करता हूं, इसलिए तुमसे मरणरहित होने एवं
संतानयुक्त होने की याचना करता हूं. मैं इंद्र की दोनों भुजाओं में वज्र देता हूं, जिससे वे सभी
शत्रु सेनाओं को जीतते हैं.” (५)
त्रीणि शता त्री सहस्राण्यग्निं त्रिंशच्च देवा नव चासपर्यन्.
औक्षन्घृतैरस्तृणन्बर्हिरस्मा आदिद्धोतारं न्यसादयन्त.. (६)
तीन हजार तीन सौ उनतालीस देवों ने अग्नि की सेवा की. देवों ने अग्नि को घृत से
भिगोया, उनके लिए कुश बिछाए एवं होता बनाकर यज्ञ में बैठाया. (६)
सूक्त—५३ देवता—अग्नि
यमैच्छाम मनसा सोऽयमागाद्यज्ञस्य विद्वान्परुषश्चिकित्वान्.
स नो यक्षद्देवताता यजीयान्हि हि षत्सदन्तरः पूर्वो अस्मत्.. (१)
हम मन से जिन अग्नि की कामना करते थे, वे आ गए हैं. अग्नि यज्ञ को जानते हैं और
अपने शरीर को पूर्ण करते हैं. यज्ञकर्त्ताओं में श्रेष्ठ अग्नि हमारे यज्ञ में होम करते हैं. हम देवों
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1649Permalink

से पूर्व में, वर्तमान अग्नि देवों के मध्य बैठे हैं. (१)
अराधि होता निषदा यजीयानभि प्रयांसि सुधितानि हि ख्यत्.
यजामहै यज्ञियान्हन्त देवाँ ईळामहा ईड्याँ आज्येन.. (२)
होता और यज्ञकर्त्ताओं में श्रेष्ठ अग्नि यज्ञवेदी पर बैठकर आहुति के योग्य हुए हैं. वे
भली-भांति रखे हुए चरु, पुरोडाश आदि को सब ओर से इसलिए देखते हैं कि यज्ञ के योग्य
देवों का शीघ्र होम करें और स्तुतियोग्य देवों की स्तुति करें. (२)
साध्वीमकद्देववीतिं नो अद्य यज्ञस्य जिह्वामविदाम गुह्याम्.
स आयुरागात्सुरभिर्वसानो भद्रामकद्देवहूतिं नो अद्य.. (३)
अग्नि हमारे देवागमन वाले यज्ञकार्य को भली-भांति पूर्ण करें. हम यज्ञ की गूढ़ जिह्वा
के समान अग्नि को प्राप्त कर चुके हैं. वे अग्नि सुगंधि एवं आयु को धारण करते हुए आए हैं
एवं आज हमारे देवाह्वानरूपी यज्ञ को कल्याणमय किया है. (३)
तदद्य वाचः प्रथमं मसीय येनासुराँ अभि देवा असाम.
ऊर्जाद उत यज्ञियासः पञ्च जना मम होत्रं जुषध्वम्.. (४)
हम आज उस प्रमुख वचन का उच्चारण करें, जिसके कारण हम तथा देवगण असुरों
को पराजित कर सकें. हे अन्न भक्षण करने वाले एवं यज्ञ के योग्य पंचजनो! तुम हमारे होम
का सेवन करो. (४)
पञ्च जना मम होत्रं जुषन्तां गोजाता उत ये यज्ञियासः.
पृथिवी नः पार्थिवात्पात्वंहसोऽन्तरिक्षं दिव्यात्पात्वस्मान्.. (५)
पंचजन मेरे आह्वान को स्वीकार करें. भूमि से उत्पन्न एवं यज्ञपात्र देव मेरे अग्निहोत्र का
सेवन करें. पृथ्वी हमें पार्थिव पाप तथा अंतरिक्ष हमें दिव्य पाप से बचावे. (५)
तन्तुं तन्वन्नजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान्.
अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्.. (६)
हे अग्नि! तुम यज्ञ का विस्तार करते हुए लोकभासक सूर्य का अनुगमन करो तथा उन
ज्योतिपूर्ण मार्गों की रक्षा करो, जिन्हें यज्ञकर्म द्वारा प्राप्त किया जाता है. अग्नि स्तोताओं का
कार्य दोषरहित बनावें. हे अग्नि! तुम स्तुतियोग्य बनो और देवसमूह को यज्ञाभिमुख बनाओ.
(६)
अक्षानहो नह्यतनोत सोम्या इष्कृणुध्वं रशना ओत पिंशत.
अष्टावन्धुरं वहताभितो रथं येन देवासो अनयन्नभि प्रियम्.. (७)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1650Permalink

हे सोमरस के योग्य देवो! तुम रथों में घोड़ों को जोड़ो, लगामें साफ करो एवं घोड़ों को
सजाओ. तुम सारथि के बैठने वाले आठ स्थानों से युक्त रथ को सूर्य के साथ यज्ञ में लाओ.
इसी रथ के द्वारा देवगण यज्ञ में आते हैं. (७)
अश्मन्वती रीयते सं रभध्वमुत्तिष्ठत प्र तरता सखायः.
अत्रा जहाम ये असन्नशेवाः शिवान्वयमुत्तरेमाभि वाजान्.. (८)
अश्मन्वती नामक नदी बह रही है. यज्ञ में आने के लिए इस नदी को पार करने हेतु उठो
और इसे पार कर जाओ. हे मित्र बने हुए देवो! हम असुख को त्याग कर नदी पार करें और
सुखकर अन्नों को पावें. (८)
त्वष्टा माया वेदपसामपस्तमो बिभ्रत्पात्रा देवपानानि शन्तमा.
शिशीते नूनं परशुं स्वायसं येन वृश्चादेतशो ब्रह्मणस्पतिः.. (९)
त्वष्टा पात्र बनाना जानते हैं. अतिशय शोभन कर्म वाले त्वष्टा देवों के पानकर्म में प्रयुक्त
सोमपात्रों को धारण करते हैं. वे उत्तम लोहे से बने हुए कुठार को तेज करते हैं. ब्रह्मणस्पति
त्वष्टा उसी कुठार से लकड़ी काटते हैं. (९)
सतो नूनं कवयः सं शिशीत वाशीभिर्याभिरमृताय तक्षथ.
विद्वांसः पदा गुह्यानि कर्तन येन देवासो अमृतत्व मानशुः.. (१०)
हे मेधावियो! उस कुठार को तेज करो, जिसके द्वारा सोमपान के लिए पात्र बनाए जाते
हैं. हे विद्वानो! तुम ऐसा गुप्त निवासस्थान बनाओ, जिसके कारण देवों ने अमरत्व प्राप्त
किया. (१०)
गर्भे योषामदधुर्वत्समासन्यपीच्येन मनसोत जिह्वया.
स विश्वाहा सुमना योग्या अभि सिषासनिवर्नते कार इज्जितिम्.. (११)
उन ऋभुओं ने मरी हुई गाय के चमड़े में किसी गाय को धारण किया तथा उस मरी हुई
गाय के मुख में बछड़े को रखा. यह कार्य उन्होंने देवत्व की कामना करने वाले मन के द्वारा
किया. आवश्यकरूप से सभी दिवसों में उत्तम स्तुतियां ग्रहण करने वाले ऋभुगण शत्रुओं को
जीतते हैं. (११)
सूक्त—५४ देवता—इंद्र
तां सु ते कीर्तिं मघवन्महित्वा यत्त्वा भीते रोदसी अह्वयेताम्.
प्रावो देवाँ अतिरो दासमोजः प्रजायै त्वस्यै यदशिक्ष इन्द्र.. (१)
हे धनस्वामी इंद्र! मैं तुम्हारे महत्त्व के कारण आई हुई शोभन कीर्ति का वर्णन करता हूं.
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1651Permalink

जब द्यावा-पृथिवी ने भयभीत होकर तुम्हें बुलाया था, तब तुमने देवों की रक्षा की, राक्षसों की
शक्ति नष्ट की एवं यजमान को बल प्रदान किया. (१)
यदचरस्तन्वा वावृधानो बलानीन्द्र प्रब्रुवाणो जनेषु.
मायेत्सा ते यानि युद्धान्याहुर्नाद्य शत्रुं ननु पुरा विवित्से.. (२)
हे इंद्र! तुमने अपने शरीर को बढ़ाते हुए एवं मनुष्यों को घोषणा करते हुए जिन
वृत्रवधादि बलसाध्य कार्यों को किया था, वह केवल माया थी. तुम्हारा सब युद्ध भी माया मात्र
है. इस समय ही तुम्हारा कोई शत्रु नहीं है तो प्राचीनकाल में किस प्रकार रहा होगा? (२)
क उ नु ते महिमनः समस्यास्मत्पूर्व ऋषयोऽन्तमापुः.
यन्मातरं च पितरं च साकमजनयथास्तन्व१ः स्वायाः.. (३)
हे इंद्र! क्या हमसे पहले ऋषियों ने तुम्हारी संपूर्ण महिमा का पार पाया था? तुमने
अपने माता-पितारूपी द्यावा-पृथिवी को अपने शरीर से उत्पन्न किया था. (३)
चत्वारि ते असुर्याणि नामादाभ्यानि महिषस्य सन्ति.
त्वमङ्ग तानि विश्वानि वित्से येभिः कर्माणि मघवञ्चकर्थ.. (४)
हे पूज्य इंद्र! तुम्हारे चार असुरनाशक और अपराजेय शरीर हैं. हे धनस्वामी इंद्र! तुम
इन सबको जानते हो, जिनके द्वारा वृत्रवधादि कर्म करते हो. (४)
त्वं विश्वा दधिषे केवलानि यान्याविर्या च गुहा वसूनि.
काममिन्मे मघवन्मा वि तारीस्त्वमाज्ञाता त्वमिन्द्रासि दाता.. (५)
हे इंद्र! तुम इन सब असाधारण संपत्तियों को जानते हो, जो प्रकट एवं छिपी हुई हैं. तुम
मेरी अभिलाषा पूरी करो. तुम्हीं आज्ञा करते हो और तुम्हीं देने वाले हो. (५)
यो अदधाज्ज्योतिषि ज्योतिरन्तर्यो असृजन्मधुना सं मधूनि.
अध प्रियं शूषमिन्द्राय मन्म ब्रह्मकृतो बृहदुक्थादवाचि.. (६)
जिन इंद्र ने सूर्य आदि तेजस्वी पदार्थों में ज्योति धारण की है एवं जिन्होंने मधु के द्वारा
सोमरस को मधुर बनाया, उन इंद्र के लिए विशाल उक्थमंत्रों के रचयिता ऋषियों ने
शक्तिदाता स्तोत्र बोला है. (६)
सूक्त—५५ देवता—इंद्र
दूरे तन्नाम गुह्यं पराचैर्यत्त्वा भीते अह्वयेतां वयोधै.
उदस्तभ्नाः पृथिवीं द्याम्भीके भ्रातुः पुत्रान्मघवन्तित्त्विषाणः.. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1652Permalink

हे इंद्र! तुम्हारा शरीर दूर है, इसलिए पराङ्मुख मनुष्यों के लिए वह अप्रकाशित है.
जिस समय डरे हुए द्यावा-पृथिवी तुम्हें अन्न के लिए बुलाते हैं, उस समय तुम धरती के ऊपर
आकाश को पकड़कर रखते हो एवं अपने भाई मेघ के जलों को दीप्त करते हो. (१)
महत्तन्नाम गुह्यं पुरुस्पृग्येन भूतं जनयो येन भव्यम्.
प्रत्नं जातं ज्योतिर्यदस्य प्रियं प्रियाः समविशन्त पञ्च.. (२)
हे इंद्र! तुम्हारा अन्यों के द्वारा अज्ञात एवं बहुतों द्वारा अभिलषित आकाशरूपी शरीर
अत्यंत विस्तृत है. उसी से तुमने भूत और भविष्यत् को उत्पन्न किया है. उसीसे तुम्हारा प्रिय
तत्त्व प्राचीन ज्योति अर्थात् आदित्य उत्पन्न हुआ. उसी के कारण पंचजन प्रसन्न हुए. (२)
आ रोदसी अपृणादोत मध्यं पञ्च देवाँ ऋतुशः सप्तसप्त.
चतुस्त्रिंशता पुरुधा वि चष्टे सरूपेण ज्योतिषा विव्रतेन.. (३)
इंद्र ने अपने शरीर से द्यावा-पृथिवी एवं अंतरिक्ष को पूर्ण किया है एवं पांच देवों, सात
तत्त्वों तथा चौंतीस देवगणों को अनेक प्रकार से देखते हैं. इंद्र यह कार्य समान रूप वाली
अपनी विस्तृत ज्योति की सहायता से करते हैं. (३)
यदुष औच्छः प्रथमा विभानामजनयो येन पुष्टस्य पुष्टम्.
यत्ते जामित्वमवरं परस्या महन्महत्या असुरत्वमेकम्.. (४)
हे उषा! तुमने नक्षत्र आदि तेजस्वी पदार्थों को सबसे पहले प्रकाश दिया. उसी तेज से
तुमने पुष्ट को अधिक पुष्ट बनाया. तुम उन्नत स्थिति वाली हो, तथापि तुम्हारी मित्रता हम
निम्न स्थिति वालों के साथ है. यही तुम्हारा एकमात्र महत्त्व और शक्तिपूर्णता है. (४)
विधुं दद्राणं समने बहूनां युवानं सन्तं पलितो जगार.
देवस्य पश्य काव्यं महित्वाद्या ममार स ह्यः समान.. (५)
युद्ध आदि अनेक कार्य करने वाले एवं युद्धों में बहुत से शत्रुओं को भगाने वाले युवा
पुरुष को इंद्र की आज्ञा से बुढ़ापा निगल लेता है. इंद्र देव का सामर्थ्य देखिए कि कल जो
ठीक से कार्य कर रहा था, वह आज मर गया है. (५)
शाक्मना शाको अरुणः सुपर्ण आ यो महः शूरः सनादनीळः.
यच्चिकेत्त सत्यमित्तन्न मोघं वसु स्पार्हमुत जेतोत दाता.. (६)
शक्तिसंपन्न व लाल रंग वाला एक पक्षी आ रहा है जो महान्, शूर, प्राचीन एवं बिना
घोंसले वाला है. वह जो करना चाहता है, वह अवश्य सत्य होता है एवं कभी असफल नहीं
होता. वह अभिलषणीय संपत्ति जीतता है एवं स्तोताओं को देता है. (६)
एभिर्देदे वृष्ण्या पौंस्यानि येभिर्धौक्षद्द्वृत्रहत्याय वज्री.
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1653Permalink

ये कर्मणः क्रियमाणस्य मह्न ऋतेकर्ममुदजायन्त देवाः.. (७)
वज्रधारी इंद्र ने इन मरुतों के साथ वर्षा करने वाली शक्ति प्राप्त की एवं वृत्र की हत्या
करके वर्षा द्वारा धरती को सींचा. महान् इंद्र द्वारा किए गए वर्षा कार्य में मरुद्गण स्वयं ही
सहायक बनते हैं. (७)
युजा कर्माणि जनयन्विश्वौजा अशस्तिहा विश्वमनास्तुराषाट्.
पीत्वी सोमस्य दिव आ वृधानः शूरो निर्युधाधमद्दस्यून्.. (८)
सर्वत्र व्याप्त शक्ति वाले, राक्षसनाशक, अत्यंत मनस्वी एवं शत्रुओं पर शीघ्र विजय
प्राप्त करने वाले इंद्र मरुतों की सहायता से सभी कार्य करते हैं. इंद्र ने स्वर्ग से आकर
सोमपान किया और अपना शरीर बढ़ाया. शूर इंद्र ने आयुधों से शत्रुओं को मारा. (८)
सूक्त—५६ देवता—विश्वेदेव
इदं त एकं पर ऊ त एकं तृतीयेन ज्योतिषा सं विशस्व.
संवेशने तन्व१ श्चारुरेधि प्रियो देवानां परमे जनित्रे.. (१)
ऋषि अपने मरे हुए पुत्र वाजी से कहते हैं:—
तुम्हारा एक अंश अग्नि, दूसरा वायु और तीसरा तेजस्वी आत्मा है. इन तीनों अंशों से
अग्नि, वायु और आत्मा में अपने शरीर के प्रवेश के समय कल्याणकारी रूप में बढ़ो तथा
देवों के परम-जनक सूर्य के लोक में प्रिय बनो. (१)
तनूष्टे वाजिन्तन्वं१ नयन्ती वाममस्मभ्यं धातु शर्म तुभ्यम्.
अहुतो महो धरुणाय देवान्दिवीव ज्योतिः स्वमा मिमीयाः.. (२)
हे वाजी! तुम्हारे शरीर को अपने में मिलाती हुई यह धरती तुम्हारे और हमारे दोनों के
लिए कल्याण करे. तुम अपने स्थान से पतित न होकर ज्योति धारण करने के लिए देवों और
स्वर्ग में स्थित सूर्य के साथ अपनी आत्मा को मिला दो. (२)
वाज्यसि वाजिनेना सुवेनीः सुवितः स्तोमं सुवितो दिवं गाः.
सुवितो धर्म प्रथमानु सत्या सुवितो देवान्त्सुवितोऽनु पत्म.. (३)
हे पुत्र! तुम अन्नरस से शक्तिशाली एवं सुंदर हो. तुम अपने स्तोत्र की प्रेरणा से
स्तोत्रसंबंधी देव के समीप स्वर्ग में जाओ. तुम अपने द्वारा संपादित, प्रमुख एवं सच्चे फल
वाले धर्म का अनुगमन करो. तुम इंद्रादि देवों और सूर्य का अनुगमन करो. (३)
महिम्न एषां पितरश्चनेशिर देवा देवेष्वदधुरपि क्रतुम्.
समविव्यचुरुत यान्यत्विषुरैषां तनूषु नि विविशुः पुनः.. (४)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1654Permalink

देवत्व को प्राप्त हमारे पितरों ने देवों की महिमा प्राप्त की एवं देवों के साथ यज्ञकार्य
पूर्ण किए. जो तेजस्वी वस्तुएं हैं, वे सब उनके साथ मिल गईं. पितर देवों के शरीर में प्रवेश
कर गए हैं. (४)
सहोभिर्विश्वं परि चक्रमू रजः पूर्वा धामान्यमिता मिमानाः.
तनूषु विश्वा भुवना नि येमिरे प्रासारयन्त पुरुध प्रजा अनु.. (५)
हमारे पितरों ने अपनी शक्तियों से सारे लोकों की परिक्रमा की है तथा उन स्थानों पर
गए हैं, जहां दूसरे नहीं जा पाते. उन्होंने अपने शरीर में सभी लोकों को नियमित किया है एवं
प्रजाओं पर अपना प्रभुत्व अनेक प्रकार से स्थापित किया है. (५)
द्विधा सूनवोऽसुरं स्वर्विदमास्थापयन्त तृतीयेन कर्मणा.
स्वां प्रजां पितरः पित्र्यं सह आवरेष्वदधुस्तन्तुमाततम्.. (६)
आदित्य के पुत्र देवों ने प्रजा उत्पत्तिरूप तीसरे कर्म द्वारा शक्तिशाली एवं स्वर्गज्ञाता
आदित्य को दो प्रकार से स्थापित किया था. हमारे पितरों ने अपनी संतान को उत्पन्न करके
उनके शरीर में पैतृक बल स्थापित किया. उन्होंने चिरस्थायी वंश स्थापित किया. (६)
नावा न क्षोदः प्रदिशः पृथिव्याः स्वस्तिभिरति दुर्गाणि विश्वा.
स्वां प्रजां बृहदुक्थो महित्वावरेष्वदधादा परेषु.. (७)
मनुष्य नाव से नदी पार करने के समान धरती की विभिन्न दिशाओं का अतिक्रमण
करते हैं. लोग कल्याण द्वारा जिस प्रकार सभी विपत्तियों के पार जाते हैं, उसी प्रकार
बृहदुक्थ ऋषि ने अपनी शक्ति से अपने पुत्र को समीपवर्ती एवं दूरवर्ती पदार्थों में स्थापित
किया. (७)
सूक्त—५७ देवता—मन
मा प्र गाम पथो वयं मा यज्ञादिन्द्र सोमिनः. मान्तः स्थुर्नों अरातयः.. (१)
हे इंद्र! हम सुपथ से विचलित न हों तथा सोमरस वाले यजमान के यज्ञ से दूर न रहें.
शत्रु हमारे बीच में न आवें. (१)
यो यज्ञस्य प्रसाधनस्तन्तुर्देवेष्वाततः. तमाहुतं नशीमहि.. (२)
जो अग्नि यज्ञ का विशेष साधन है एवं आहवनीय आदि रूप से देवों के समीप तक
विस्तृत है, उस सब ओर से बुलाए गए अग्नि को हम प्राप्त करें. (२)
मनो न्वा हुवामहे नाराशंसेन सोमेन. पितॄणां च मन्मभिः... (३)

Page 1655Permalink

पितरों के चमस में स्थित सोम के द्वारा हम मन को शीघ्र बुलाते हैं. हम पितरों के स्तोत्र
द्वारा मन को बुलाते हैं. (३)
आ त एतु मनः पुनः क्रत्वे दक्षाय जीवसे. ज्योक् च सूर्यं दृशे.. (४)
हे सुबंधु! तुम्हारा मन अभिचरणकर्त्ता के समीप से पुनः आवे. यह यज्ञकार्य करने एवं
बल प्रदर्शित करने के लिए आवे. तुम्हारा मन जीवित रहने एवं सूर्य के शीघ्र दर्शन करने हेतु
आवे. (४)
पुनर्नः पितरो मनो ददातु दैव्यो जनः. जीवं व्रातं सचेमहि... (५)
हमारे पितरों का समूह एवं देवगण सभी इंद्रियों को वापस कर दें. हम उन्हें प्राप्त करें.
(५)
वयं सोम व्रते तव मनस्तनूषु बिभ्रतः. प्रजावन्तः सचेमहि.. (६)
हे सोमदेव! हम तुम्हारे कर्म एवं शरीर में मन लगावें एवं संतानयुक्त होकर तुम्हारे काम
में लगें. (६)
सूक्त—५८ देवता—मृत सुबंधु का मन
यत्ते यमं वैवस्वतं मनो जगाम दूरकम्. तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (१)
विवस्वान् के पुत्र यम के पास, जो दूर रहते हैं, तुम्हारा जो मन गया है, उसे हम लौटाते
हैं. तुम इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (१)
यत्ते दिवं यत्पृथिवीं मनो जगाम दूरकम्. तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (२)
तुम्हारा जो मन दूर तक पृथ्वी या स्वर्ग के पास गया है, उसे हम लौटाते हैं. तुम इस
संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (२)
यत्ते भूमिं चतुर्भृष्टिं मनो जगाम दूरकम्. तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (३)
तुम्हारा जो मन चारों ओर ढाल वाली धरती पर दूर तक गया है, उसे हम लौटाते हैं. तुम
इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (३)
यत्ते चतस्रः प्रदिशो मनो जगाम दूरकम्. तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (४)
तुम्हारा जो मन चारों दिशाओं में दूर तक चला गया है, उसे हम वापस लौटाते हैं. तुम
इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (४)
eBook converter DEMO Watermarks*

Page 1656Permalink

यत्ते समुद्रमर्णवं मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (५)
तुम्हारा जो मन जल से भरे हुए दूरवर्ती समुद्र के पास गया है, उसे हम वापस लौटाते हैं.
तुम इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (५)
यत्ते मरीची: प्रवतो मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (६)
तुम्हारा जो मन दूर तक चारों ओर जाने वाली सूर्यकिरणों के पास गया है, उसे हम
वापस लौटाते हैं. तुम इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (६)
यत्ते अपो यदोषधीर्मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (७)
तुम्हारा जो मन दूरवर्ती जल एवं ओषधियों में गया है, उसे हम वापस बुलाते हैं. तुम इस
संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (७)
यत्ते सूर्य यदुषसं मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (८)
तुम्हारा जो मन दूरवर्ती सूर्य एवं उषा के पास गया है, उसे हम वापस बुलाते हैं. तुम इस
संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (८)
यत्ते पर्वतान्बृहतो मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (९)
तुम्हारा जो मन दूरवर्ती पर्वतों तक गया है, उसे हम वापस बुलाते हैं. तुम इस संसार में
निवास करने के लिए जीते हो. (९)
यत्ते विश्वमिदं जगन्मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (१०)
तुम्हारा जो मन इस विश्व में दूर तक चला गया है, उसे हम वापस बुलाते हैं. तुम इस
संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (१०)
यत्ते परा: परावतो मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (११)
तुम्हारा जो मन अतिशय परवर्ती स्थानों में दूर तक चला गया है, उसे हम वापस बुलाते
हैं. तुम इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (११)
यत्ते भूतं च भव्यं च मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (१२)
हे सुबंधु! तुम्हारा जो मन किसी दूरवर्ती भू एवं भविष्य स्थान पर गया है, उसे हम
वापस बुलाते हैं. तुम इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (१२)
सूक्त—५९ देवता—निर्ऋति-असुनीति
eBook converter DEMO Watermarks*

Page 1657Permalink

आदि
प्र तार्यायुः प्रतरं नवीयः स्थातारेव क्रतुमता रथस्य.
अध च्यवान उत्तवीत्यर्थं परातरं सु निर्ऋतिर्जिहीताम्.. (१)
जिस प्रकार सारथि वाले रथ पर चढ़ा हुआ व्यक्ति सुख प्राप्त करता है, उसी प्रकार
सुबंधु की यौवनयुक्त आयु बढ़े. ह्रासवाली आयु का आदमी अपनी मनपसंद आयु प्राप्त
करता है. तुम्हारा पाप नष्ट हो. (१)
सामन्नु राये निधिमन्वन्वं करामहे सु पुरुध श्रवांसि.
ता नो विश्वानि जरिता ममत्तु परातरं सु निर्ऋतिर्जिहीताम्.. (२)
हम परम आयुरूप धन पाने के लिए सामगान के साथ-साथ भक्षण योग्य अन्न एकत्र
करते हैं. निर्ऋति हमारे सभी अन्नों का भक्षण करें एवं दूर देश को चले जावें. (२)
अभी ष्वार्यः पौंस्यैर्भवेम द्यौर्न भूमिं गिरयो नाज्रान्,
ता नो विश्वानि जरिता चिकेत परातरं सु निर्ऋतिर्जिहीताम्.. (३)
हम बलों द्वारा अपने शत्रुओं को उसी प्रकार ठीक से हटावें, जिस प्रकार आकाश धरती
को पराजित करता है. पर्वत जिस प्रकार बादलों की गति रोक लेते हैं, उसी प्रकार हम शत्रुओं
की गति रोकें. निर्ऋति हमारी स्तुति सुनें और दूर चली जावें. (३)
मो षु णः सोम मृत्यवे परा दाः पश्येम नु सूर्यमुच्चरन्तम्.
द्युभिर्हितो जरिमा सू नो अस्तु परातरं सु निर्ऋतिर्जिहीताम्.. (४)
हे सोम! हमें मृत्यु के हाथों में मत दो. हम उदित होते हुए सूर्य को बहुत समय तक देखें.
दिवसों से प्रेरित हमारी वृद्धावस्था सुखकर हो. निर्ऋति हमारी स्तुति सुनकर दूर चली जावें.
(४)
असुनीते मनो अस्मासु धारय जीवातवे सु प्र तिरा न आयुः.
रारन्धि नः सूर्यस्य सन्दृशि घृतेन त्वं तन्वं वर्धयस्व.. (५)
हे असुनीतिदेवी! हम पर कृपा करो और जीवित रहने के लिए हमारी आयु भली प्रकार
बढ़ाओ. हमें सूर्य के चिरदर्शन के लिए स्थापित करो. तुम हमारे दिए हुए घी से अपना शरीर
बढ़ाओ. (५)
असुनीते पुनरस्मासु चक्षुः पुनः प्राणमिह नो धेहि भोगम्.
ज्योक् पश्येम सूर्यमुच्चरन्तमनुमते मृळया नः स्वस्ति.. (६)
हे असुनीतिदेवी! हमें पुनः चक्षु प्रदान करो. भोग करने के लिए हम में प्राण स्थापित
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1658Permalink

करो. हम उदित होते हुए सूर्य को बहुत समय तक देखें. हे अनुमति! अविनाश पाने के लिए
हमारी रक्षा करो. (६)
पुनर्नो असुं पृथिवी ददातु पुनर्द्यौर्देवी पुनरन्तरिक्षम्.
पुनर्नः सोमस्तन्वं ददातु पुनः पूषा पथ्यां३ या स्वस्तिः.. (७)
पृथ्वी हमें पुनः प्राण प्रदान करे. द्युलोक और अंतरिक्ष हमें पुनः प्राण दें. सोम हमें पुनः
शरीर प्रदान करें. पूषा हमें स्वस्तिकारक वाक्य दें. (७)
शं रोदसी सुबन्धवे यह्वी ऋतस्य मातरा.
भरतामप यद्रपो द्यौः पृथिवि क्ष्मा रपो मो षु ते किं चनाममत्.. (८)
महान् द्यावा-पृथिवी सुबंधु का कल्याण करें. उदक का निर्माण करने वाली द्यावा-
पृथिवी पाप को दूर करें. हे सुबंधु! द्यावा-पृथिवी के होते हुए कोई भी पाप तुम्हारी हिंसा न
कर सकें. (८)
अव द्वके अव त्रिका दिवश्चरन्ति भेषजा.
क्ष्मा चरिष्ण्वेककं भरतामप यद्रपो द्यौः पृथिवि क्ष्मा रपो मो षु ते किं चनाममत्..
(९)
स्वर्ग में जो दो या तीन ओषधियां विचरण करती हैं, उन में से एक जो धरती पर
विचरण करती है, वह सुबंधु की हिंसा दूर करे. हे सुबंधु! स्वर्ग एवं विस्तृत पृथ्वी तुम्हारे
अमंगल दूर करें एवं किसी प्रकार का अनिष्ट न करें. (९)
समिन्द्रेरय गामनड्वाहं य आवहदुशीनराण्या अनः.
भरतामप यद्रपो द्यौः पृथिवि क्ष्मा रपो मो षु ते किं चनाममत्.. (१०)
हे इंद्र! जो बैल उशीनर की पत्नी की गाड़ी ले गया था, उसे प्रेरित करो. हे सुबंधु! स्वर्ग
एवं विस्तृत पृथ्वी तुम्हारे अमंगल दूर करें एवं किसी प्रकार भी अनिष्ट न करें. (१०)
सूक्त—६० देवता—राजा असमाति आदि
आ जनं त्वेषसन्दृशं माहीनानामुपस्तुतम्. अगन्म बिभ्रतो नमः.. (१)
हम असमाति राजा के दीप्त एवं महान् पुरुषों द्वारा प्रशंसित जनपद में नमस्कार धारण
करते हुए गए. (१)
असमातिं नितोशनं त्वेषं निययिनं रथम्. भजेरथस्य सत्पतिम्.. (२)
हम शत्रुहंता, तेजस्वी, रथ के समान सबकी अभिलाषा पूर्ण करने वाले, भजेरथ को
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1659Permalink

पराजित करने वाले एवं सज्जनपालक राजा असमाति के देश में गए. (२)
यो जनान्महिषाँ इवातितस्थौ पवीरवान्. उतापवीरवान्युधा.. (३)
वे राजा असमाति हाथ में तलवार लें अथवा न लें, पर युद्ध में अपने शत्रुओं को इस
प्रकार पराजित कर देते हैं, जिस प्रकार सिंह भैंसों को मार डालता है. (३)
यस्येक्ष्वाकुरुप व्रते रेवान्मराय्येधते. दिवीव पञ्च कृष्टयः.. (४)
जिस जनपद में इक्ष्वाकु राजा धनी, शत्रुसंहारक एवं रक्षाकार्य में नियुक्त होकर बढ़ते हैं,
उस जनपद में रहने वाले पंचजन इस प्रकार सुखी होकर उन्नति करते हैं, जिस प्रकार स्वर्ग में
रहने वाले बढ़ते हैं. (४)
इन्द्र क्षत्रासमातिषु रथप्रोषेषु धारय. दिवीव सूर्यं दृशे.. (५)
हे इंद्र! जिस प्रकार तुमने सूर्य को सबके दर्शन के लिए आकाश में स्थित किया है, उसी
प्रकार वीरों को रथारूढ़ राजा असमाति का अनुगमन करने के लिए प्रेरित करो. (५)
अगस्त्यस्य नद्भ्यः सप्ती युनक्षि रोहिता.
पणींन्यक्रमीरभि विश्वाञ्राजन्नराधसः.. (६)
हे राजा असमाति! तुम अगस्त्य ऋषि को प्रसन्न करने वाले बांधवों के लिए धनप्राप्ति
हेतु लाल रंग के घोड़ों को रथ में जोड़ो. तुम यज्ञ न करने वाले एवं लोभी पणियों को भली
प्रकार हराओ. (६)
अयं मातायं पितायं जीवातुरागमत्. इदं तव प्रसर्पणं सुबन्धवेहि निरिहि.. (७)
हे सुबंधु! जो अग्नि आए हैं, वे ही तुम्हारे माता, पिता एवं जीवनदाता हैं. तुम्हारा शरीर
यही है. इस में स्थित होओ. (७)
यथा युगं वरत्रया नह्यन्ति धरुणाय कम्.
एवा दाधार ते मनो जीवतवे न मृत्यवेऽथो अरिष्टतातये.. (८)
जिस प्रकार रथ को धारण करने के लिए जुआ रस्सियों से बांधा जाता है, उसी प्रकार
अग्नि ने जीवित रहने, अविनाशी बनने एवं मृत्यु से दूर रहने के लिए तुम्हारे मन को धारण
कर लिया है. (८)
यथेयं पृथिवी मही दाधारेमान्वनस्पतीन्.
एवा दाधार ते मनो जीवतवे न मृत्यवेऽथो अरिष्टतातये.. (९)
जिस प्रकार यह विस्तृत पृथ्वी इन बड़े-बड़े वृक्षों को धारण करती है, उसी प्रकार अग्नि
ebook converter DEMO Watermarks*