ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1642 of 1855
Read in contextक्या निंदा कर सकते हैं? (७)
अहं गुङ्गुभ्यो अतिथिग्वमिष्करमिषं न वृत्रतुरं विक्षु धारयम्.
यत्पर्णयघ्न उत वा करञ्जहे प्राहं महे वृत्रहत्ये अश्रुश्रवि.. (८)
मैंने गुंगु नामक जनपदों की रक्षा के लिए अतिथिग्व के पुत्र दिवोदास ऋषि को
विपत्तिनिवारक, शत्रुनाशक एवं प्रजाओं में अन्न के समान सेवनीय बनाकर स्थापित किया
था. मैं पर्णय और करंज नामक शत्रुओं के वध वाले युद्ध में बहुत प्रसिद्ध हुआ था. (८)
प्र मे नमी साप्य इषे भुजे भूद्गवामेषे सख्या कृणुत द्विता.
दिद्युं यदस्य समिथेषु मंहयमादिदेनं शंस्यमुक्थ्यं करम्.. (९)
मेरे स्तोता सबके आश्रय योग्य तथा अन्न व भोगों के दाता होते हैं. लोग गायों को
खोजने एवं मित्रता पाने के लिए दो प्रकार से मेरी स्तुति करते हैं. मैं जब अपने स्तोता की
विजय के लिए युद्धों में आयुध ग्रहण करता हूं, तब इसे प्रशंसा और स्तुति के योग्य बना देता
हूं. (९)
प्र नेमस्मिन्ददृशे सोमो अन्तर्गोपा नेममाविरस्था कृणोति.
स तिग्मशृङ्गं वृषभं युयुत्सन् द्रुहस्तस्थौ बहुले बद्धो अन्तः.. (१०)
दो युद्ध करने वालों में जो सोमयज्ञ करने वाला होता है, उसी की रक्षा करने वाला इंद्र
वज्र से उसे अपराजेय बनाता है. जो सोमयज्ञ नहीं करता, वह तीखे बाण बरसाने वाले के
साथ लड़ने को तैयार होता है, पर अंधकार में बंध जाता है. (१०)
आदित्यानां वसूनां रुद्रियाणां देवी देवानां न मिनामि धाम.
ते मा भद्राय शवसे ततक्षुरपराजितमस्तृतमषाळहम्.. (११)
मैं इंद्र, आदित्यों, वसुओं एवं रुद्रदेवों का स्थान नष्ट नहीं करता हूं. इन देवों ने मुझ
अपराजित, अहिंसित एवं न झुकने वाले इंद्र को कल्याण एवं अन्न के लिए बनाया था. (११)
सूक्त—४९ देवता—विकुंठा संबंधी इंद्र
अहं दां गृणते पूर्व्यं वस्वहं ब्रह्म कृणवं मह्यं वर्धनम्.
अहं भुवं यजमानस्य चोदितायज्वनः साक्षि विश्वस्मिन्भरे.. (१)
मैंने अपने स्तोता को अधिक धन दिया. मैंने अपनी वृद्धि करने वाले यज्ञों का अनुष्ठान
किया. मैं अपने यजमान को धन देता हूं तथा यज्ञ न करने वाले सभी को युद्ध में पराजित
करता हूं. (१)
मां धुरिन्द्रं नाम देवता दिवश्च ग्मश्चापां च जन्तवः.
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