ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपितरों के चमस में स्थित सोम के द्वारा हम मन को शीघ्र बुलाते हैं. हम पितरों के स्तोत्र
द्वारा मन को बुलाते हैं. (३)
आ त एतु मनः पुनः क्रत्वे दक्षाय जीवसे. ज्योक् च सूर्यं दृशे.. (४)
हे सुबंधु! तुम्हारा मन अभिचरणकर्त्ता के समीप से पुनः आवे. यह यज्ञकार्य करने एवं
बल प्रदर्शित करने के लिए आवे. तुम्हारा मन जीवित रहने एवं सूर्य के शीघ्र दर्शन करने हेतु
आवे. (४)
पुनर्नः पितरो मनो ददातु दैव्यो जनः. जीवं व्रातं सचेमहि... (५)
हमारे पितरों का समूह एवं देवगण सभी इंद्रियों को वापस कर दें. हम उन्हें प्राप्त करें.
(५)
वयं सोम व्रते तव मनस्तनूषु बिभ्रतः. प्रजावन्तः सचेमहि.. (६)
हे सोमदेव! हम तुम्हारे कर्म एवं शरीर में मन लगावें एवं संतानयुक्त होकर तुम्हारे काम
में लगें. (६)
सूक्त—५८ देवता—मृत सुबंधु का मन
यत्ते यमं वैवस्वतं मनो जगाम दूरकम्. तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (१)
विवस्वान् के पुत्र यम के पास, जो दूर रहते हैं, तुम्हारा जो मन गया है, उसे हम लौटाते
हैं. तुम इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (१)
यत्ते दिवं यत्पृथिवीं मनो जगाम दूरकम्. तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (२)
तुम्हारा जो मन दूर तक पृथ्वी या स्वर्ग के पास गया है, उसे हम लौटाते हैं. तुम इस
संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (२)
यत्ते भूमिं चतुर्भृष्टिं मनो जगाम दूरकम्. तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (३)
तुम्हारा जो मन चारों ओर ढाल वाली धरती पर दूर तक गया है, उसे हम लौटाते हैं. तुम
इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (३)
यत्ते चतस्रः प्रदिशो मनो जगाम दूरकम्. तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (४)
तुम्हारा जो मन चारों दिशाओं में दूर तक चला गया है, उसे हम वापस लौटाते हैं. तुम
इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (४)
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