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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1640 of 1855

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Page 1640

वृद्धियुक्त, शोभनबल वाला, शत्रुहंता, शत्रु नगरियों को तोड़ने वाला एवं सच्चे कर्मों वाला पुत्र
दो. तुम हमें वर्षक एवं विचित्र धन दो. (४)
अश्वावन्तं रथिनं वीरवन्तं सहस्रिणं शतिनं वाजमिन्द्र.
भद्राव्रातं विप्रवीरं स्वर्षांमस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः.. (५)
हे इंद्र! तुम हमें घोड़ों से युक्त, रथस्वामी, वीर पुरुषों वाला, सैकड़ों और हजारों
संपत्तियों वाला, कल्याणकारी सेवकों से घिरा हुआ, विप्रों व वीरों से युक्त एवं सबकी सेवा
करने वाला पुत्र दो. तुम हमें वर्षक एवं विचित्र धन दो. (५)
प्र सप्तगुमृतीतिं सुमेधां बृहस्पतिं मतिरच्छा जिगाति.
य आङ्गिरसो नमसोपसद्योऽस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः.. (६)
मैं सात गायों का स्वामी, सत्यकर्मों वाला, शोभन बुद्धियुक्त एवं विशाल मंत्रों का स्वामी
हूं. देवों की स्तुति मेरे पास आती है. अंगिरा गोत्र में उत्पन्न मैं नमस्कार के साथ देवों के पास
जाता हूं. हे इंद्र! तुम हमें वर्षक एवं विचित्र धन दो. (६)
वनीवानो मम दूतास इन्द्रं स्तोमाश्र्वरन्ति सुमतीरियानाः.
हृदिस्पृशो मनसा वच्यमाना अस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः.. (७)
मुझ सुंदर भावों वाले की दूत सदृश स्तुतियां हमारे प्रति इंद्र की अनुकूल बुद्धि की
याचना करती हुई इंद्र के पास जाती हैं. मैं श्रोताओं के मन को छूने वाली स्तुतियां सच्चे मन
से करता हूं. हे इंद्र! तुम हमें वर्षक एवं विचित्र धन दो. (७)
यत्त्वा यामि दद्धि तन्न इन्द्र बृहन्तं क्षयमसमं जनानाम्.
अभि तद् द्यावापृथिवी गृणीतामस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः.. (८)
हे इंद्र! मैं तुमसे जो मांगता हूं, वह तुम मुझे दो. मुझे ऐसा बड़ा घर दो, जो किसी के
पास नहीं है. द्यावा-पृथिवी हमें यह दें. तुम हमें वर्षक और विचित्र धन दो. (८)
सूक्त—४८ देवता—इंद्र
अहं भुवं वसुनः पूर्व्यस्पतिरहं धनानि सं जयामि शश्वतः.
मां हवन्ते पितरं न जन्तवोऽहं दाशुषे वि भजामि भोजनम्.. (१)
मैं ही धन का असाधारण स्वामी रहा हूं. मैं सदा धनों को जीतता रहा हूं. यजमान मुझे
ही बुलाते हैं. पुत्र जैसे पिता को अन्न देता है, वैसे ही मैं हव्यदाता यजमान को अन्न देता हूं.
(१)
अहमिन्द्रो रोधो वक्षो अथर्वणस्तिताय गा अजनयमहंरधि.
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