ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयत्ते समुद्रमर्णवं मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (५)
तुम्हारा जो मन जल से भरे हुए दूरवर्ती समुद्र के पास गया है, उसे हम वापस लौटाते हैं.
तुम इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (५)
यत्ते मरीची: प्रवतो मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (६)
तुम्हारा जो मन दूर तक चारों ओर जाने वाली सूर्यकिरणों के पास गया है, उसे हम
वापस लौटाते हैं. तुम इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (६)
यत्ते अपो यदोषधीर्मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (७)
तुम्हारा जो मन दूरवर्ती जल एवं ओषधियों में गया है, उसे हम वापस बुलाते हैं. तुम इस
संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (७)
यत्ते सूर्य यदुषसं मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (८)
तुम्हारा जो मन दूरवर्ती सूर्य एवं उषा के पास गया है, उसे हम वापस बुलाते हैं. तुम इस
संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (८)
यत्ते पर्वतान्बृहतो मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (९)
तुम्हारा जो मन दूरवर्ती पर्वतों तक गया है, उसे हम वापस बुलाते हैं. तुम इस संसार में
निवास करने के लिए जीते हो. (९)
यत्ते विश्वमिदं जगन्मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (१०)
तुम्हारा जो मन इस विश्व में दूर तक चला गया है, उसे हम वापस बुलाते हैं. तुम इस
संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (१०)
यत्ते परा: परावतो मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (११)
तुम्हारा जो मन अतिशय परवर्ती स्थानों में दूर तक चला गया है, उसे हम वापस बुलाते
हैं. तुम इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (११)
यत्ते भूतं च भव्यं च मनो जगाम दूरकम्, तत्त आ वर्तयामसीह क्षयाय जीवसे.. (१२)
हे सुबंधु! तुम्हारा जो मन किसी दूरवर्ती भू एवं भविष्य स्थान पर गया है, उसे हम
वापस बुलाते हैं. तुम इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (१२)
सूक्त—५९ देवता—निर्ऋति-असुनीति
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