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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1659 of 1855

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Page 1659

पराजित करने वाले एवं सज्जनपालक राजा असमाति के देश में गए. (२)
यो जनान्महिषाँ इवातितस्थौ पवीरवान्. उतापवीरवान्युधा.. (३)
वे राजा असमाति हाथ में तलवार लें अथवा न लें, पर युद्ध में अपने शत्रुओं को इस
प्रकार पराजित कर देते हैं, जिस प्रकार सिंह भैंसों को मार डालता है. (३)
यस्येक्ष्वाकुरुप व्रते रेवान्मराय्येधते. दिवीव पञ्च कृष्टयः.. (४)
जिस जनपद में इक्ष्वाकु राजा धनी, शत्रुसंहारक एवं रक्षाकार्य में नियुक्त होकर बढ़ते हैं,
उस जनपद में रहने वाले पंचजन इस प्रकार सुखी होकर उन्नति करते हैं, जिस प्रकार स्वर्ग में
रहने वाले बढ़ते हैं. (४)
इन्द्र क्षत्रासमातिषु रथप्रोषेषु धारय. दिवीव सूर्यं दृशे.. (५)
हे इंद्र! जिस प्रकार तुमने सूर्य को सबके दर्शन के लिए आकाश में स्थित किया है, उसी
प्रकार वीरों को रथारूढ़ राजा असमाति का अनुगमन करने के लिए प्रेरित करो. (५)
अगस्त्यस्य नद्भ्यः सप्ती युनक्षि रोहिता.
पणींन्यक्रमीरभि विश्वाञ्राजन्नराधसः.. (६)
हे राजा असमाति! तुम अगस्त्य ऋषि को प्रसन्न करने वाले बांधवों के लिए धनप्राप्ति
हेतु लाल रंग के घोड़ों को रथ में जोड़ो. तुम यज्ञ न करने वाले एवं लोभी पणियों को भली
प्रकार हराओ. (६)
अयं मातायं पितायं जीवातुरागमत्. इदं तव प्रसर्पणं सुबन्धवेहि निरिहि.. (७)
हे सुबंधु! जो अग्नि आए हैं, वे ही तुम्हारे माता, पिता एवं जीवनदाता हैं. तुम्हारा शरीर
यही है. इस में स्थित होओ. (७)
यथा युगं वरत्रया नह्यन्ति धरुणाय कम्.
एवा दाधार ते मनो जीवतवे न मृत्यवेऽथो अरिष्टतातये.. (८)
जिस प्रकार रथ को धारण करने के लिए जुआ रस्सियों से बांधा जाता है, उसी प्रकार
अग्नि ने जीवित रहने, अविनाशी बनने एवं मृत्यु से दूर रहने के लिए तुम्हारे मन को धारण
कर लिया है. (८)
यथेयं पृथिवी मही दाधारेमान्वनस्पतीन्.
एवा दाधार ते मनो जीवतवे न मृत्यवेऽथो अरिष्टतातये.. (९)
जिस प्रकार यह विस्तृत पृथ्वी इन बड़े-बड़े वृक्षों को धारण करती है, उसी प्रकार अग्नि
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