About this granth
The Matsya Mahapurana (मत्स्य महापुराण) is one of the eighteen major Puranas, named after Vishnu's fish incarnation. In the traditional frame, the divine Fish narrates it to King Vaivasvata Manu and the seven sages during the great deluge; authorship is ascribed to Maharshi Veda Vyasa.
This is the illustrated Gita Press, Gorakhpur edition with a Hindi translation alongside the Sanskrit, running to about 1,098 pages; the imprint records the fourteenth reprint of Samvat 2076. Its chapters cover creation and the manvantaras, the lineage of Kashyapa, the life of King Prithu and the milking of the earth, the solar and lunar dynasties with the story of Ila, the lineages of the Pitris and the 108 names of the Goddess, and the well-known episode of Yayati, Devayani and Puru.
The Matsya Purana is especially valued for its detailed rules on shraddha (ordinary, ekoddishta and sapindikarana rites, proper times and tirthas), and also treats vows, gifts, pilgrimage and image-making, which makes it a frequent source for students of dharmashastra, history and Indian art.
| * अध्याय १९१ * | ८०१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| त्रैलोक्यविश्रुतं राजन् सोमतीर्थं महाफलम्।<br>यस्तु चान्द्रायणं कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप॥ ९६<br>सर्वपापविशुद्धात्मा सोमलोकं स गच्छति।<br>अग्निप्रवेशेऽथ जले अथवापि ह्यनाशके॥ ९७<br>सोमतीर्थे मृतो यस्तु नासौ मर्त्येऽभिजायते। | महान् फल देनेवाला यह सोमतीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। नराधिप! उस तीर्थमें जो चान्द्रायण-व्रत करता है, वह सभी पापोंसे विशुद्ध होकर सोमलोकको चला जाता है। जो अग्निमें प्रवेश कर, जलमें डूबकर या भोजनका परित्याग कर इस सोमतीर्थमें प्राणका त्याग करता है, वह पुनः मृत्युलोकमें जन्म नहीं ग्रहण करता॥ ९६–९७ १/२॥ |
| शुभतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्॥ ९८<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र गोलोके तु महीयते।<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र विष्णुतीर्थमनुत्तमम्॥ ९९<br>योधनीपुरमाख्यातं विष्णुस्थानमनुत्तमम्।<br>असुरा योधितास्तत्र वासुदेवेन कोटिशः॥ १००<br>तत्र तीर्थं समुत्पन्नं विष्णुः प्रीतो भवेदिह।<br>अहोरात्रोपवासेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ १०१<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तापसेश्वरमुत्तमम्।<br>हरिणी व्याधसंत्रस्ता पतिता यत्र सा मृगी॥ १०२<br>जले प्रक्षिप्तगात्रा तु अन्तरिक्षं गता च सा।<br>व्याधो विस्मितचित्तस्तु परं विस्मयमागतः॥ १०३<br>तेन तापेश्वरं तीर्थं न भूतं न भविष्यति।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र ब्रह्मतीर्थमनुत्तमम्॥ १०४<br>अमोहकमिति ख्यातं पितॄंश्चैवात्र तर्पयेत्।<br>पौर्णमास्याममायां तु श्राद्धं कुर्याद् यथाविधि॥ १०५<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् पितृपिण्डं तु दापयेत्।<br>गजरूपा शिला तत्र तोयमध्ये प्रतिष्ठिता॥ १०६<br>तस्यां तु दापयेत् पिण्डं वैशाख्यां तु विशेषतः।<br>तृप्यन्ति पितरस्तत्र यावत् तिष्ठति मेदिनी॥ १०७<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र सिद्धेश्वरमनुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् गणपत्यन्तिकं व्रजेत्॥ १०८ | तदनन्तर शुभतीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य गोलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् सर्वोत्तम विष्णूतीर्थकी यात्रा करे। विष्णुका यह सर्वश्रेष्ठ स्थान योधनीपुरके नामसे प्रसिद्ध है। यहाँ भगवान् वासुदेवने करोड़ों असुरोंसे युद्ध किया था, इसी कारण यह तीर्थस्थान बन गया। यहाँ जानेसे विष्णु प्रसन्न होते हैं। यहाँ एक दिन-रात उपवास करनेसे यह ब्रह्महत्याके पापको नष्ट कर देता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त श्रेष्ठ तापसेश्वर तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये, जहाँ व्याधके भयसे डरी हुई मृगी गिर पड़ी थी और जलमें शरीरका परित्याग कर अन्तरिक्षमें चली गयी थी। यह देखकर आश्चर्यचकित हुए व्याधको महान् विस्मय हुआ। इसी कारण इसका नाम तापेश्वरतीर्थ हुआ। इसके समान दूसरा तीर्थ न हुआ है, न होगा। राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ ब्रह्मतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। यह तीर्थ अमोहक नामसे भी प्रसिद्ध है। यहाँ पितरोंका तर्पण तथा पूर्णिमा और अमावास्याको यथाविधि श्राद्ध करना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान कर मनुष्यको पितरोंको पिण्ड देना चाहिये। वहाँ जलमें गजके आकारकी एक शिला प्रतिष्ठित है। उसी शिलापर विशेषतया वैशाखकी पूर्णिमाको पिण्ड देना चाहिये। ऐसा करनेसे जबतक पृथ्वी स्थित रहती है, तबतक पितृगण तृप्त बने रहते हैं। राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ सिद्धेश्वर तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य गणपति के समीप पहुँच जाता है॥ ९८–१०८॥ |
| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र लिङ्गो यत्र जनार्दनः।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र विष्णुलोके महीयते॥ १०९ | राजेन्द्र! तत्पश्चात् जनार्दन-लिङ्गकी यात्रा करे। राजेन्द्र! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य विष्णुलोकमें पूजित होता है। |
| नर्मदादक्षिणे कूले तीर्थं परमशोभनम्।<br>कामदेवः स्वयं तत्र तपोऽतप्यत वै महत्॥ ११० | नर्मदाके दक्षिण तटपर परम रमणीय कुसुमेश्वर तीर्थ है। वहाँ स्वयं कामदेवने कठोर तपस्या की थी। उसने एक |
८०२ * मत्स्यपुराण *
| दिव्यं वर्षसहस्रं तु शंकरं पर्युपासत।<br>समाधिभङ्गदग्धस्तु शंकरेण महात्मना॥ १११<br>श्वेतपर्वा यमश्चैव हुताशः शुक्रपर्वणि।<br>एते दग्धास्तु ते सर्वे कुसुमेश्वरसंस्थिताः॥ ११२<br>दिव्यवर्षसहस्रेण तुष्टस्तेषां महेश्वरः।<br>उमया सहितो रुद्रस्तुष्टस्तेषां वरप्रदः॥ ११३<br>मोक्षयित्वा तु तान् सर्वान् नर्मदातटमास्थितः।<br>ततस्तीर्थप्रभावेण पुनर्दैवत्वमागताः॥ ११४<br>ऊचुश्च परया भक्त्या देवदेवं वृषध्वजम्।<br>त्वत्प्रसादान्महादेव तीर्थं भवतु चोत्तमम्।<br>अर्धयोजनविस्तीर्णं क्षेत्रं दिक्षु समंततः॥ ११५<br>तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा चोपवासपरायणः।<br>कुसुमायुधरूपेण रुद्रलोके महीयते॥ ११६<br>वैश्वानरो यमश्चैव कामदेवस्तथा मरुत्।<br>तपस्तप्त्वा तु राजेन्द्र परां सिद्धिमवाप्नुयुः॥ ११७<br>अङ्कोलस्य समीपे तु नातिदूरे तु तस्य वै।<br>स्नानं दानं च तत्रैव भोजनं पिण्डपातनम्॥ ११८<br>अग्निप्रवेशेऽथ जले अथवा तु ह्यनाशके।<br>अनिवर्तिका गतिस्तस्य मृतस्यामुत्र जायते॥ ११९<br>त्र्यम्बकेण तु तोयेन यश्चरुं श्रपयेन्नरः।<br>अङ्कोलमूले दत्त्वा तु पिण्डं चैव यथाविधि॥ १२०<br>तृप्यन्ति पितरस्तस्य यावच्चन्द्रदिवाकरौ।<br>उत्तरे त्वयने प्राप्ते घृतस्नानं करोति यः॥ १२१<br>पुरुषो वाथ स्त्री वापि वसेदायतने शुचिः।<br>सिद्धेश्वरस्य देवस्य प्रातः पूजां प्रकल्पयेत्॥ १२२<br>स यां गतिमवाप्नोति न तां सर्वैर्महामखैः।<br>यदावतीर्णः कालेन रूपवान् सुभगो भवेत्॥ १२३<br>मर्त्ये भवति राजा च त्वासमुद्रान्तगोचरे।<br>क्षेत्रपालं न पश्येत् तु दण्डपाणिं महाबलम्॥ १२४<br>वृथा तस्य भवेद् यात्रा ह्यदृष्ट्वा कर्णकुण्डलम्।<br>एवं तीर्थफलं ज्ञात्वा सर्वे देवाः समागताः।<br>मुञ्चन्ति कुसुमौघैंस्तु तेन तत् कुसुमेश्वरम्॥ १२५ | हजार दिव्य वर्षोंतक शंकरकी सर्वभावसे उपासना की थी, किंतु महात्मा शंकरकी समाधिके भङ्ग होनेसे वह भस्म हो गया। इसी प्रकार कुसुमेश्वरमें स्थित श्वेतपर्वा, यम, हुताश और शुक्रपर्वा—ये सभी भी किसी समय जल गये थे। एक हजार दिव्य वर्षोंतक तपस्या करनेपर महेश्वर इनपर प्रसन्न हुए। इस प्रकार प्रसन्न हुए उमासहित रुद्रने इन्हें वर प्रदान किया। तब इन लोगोंको मोक्ष प्रदानकर वे नर्मदाके तटपर प्रतिष्ठित हो गये। तदनन्तर उस तीर्थके प्रभावसे उन लोगोंको पुनः देवत्व प्राप्त हो गया, तब उन्होंने अतिशय भक्तिके साथ देवाधिदेव वृषभध्वजसे कहा—'महादेव! आपकी कृपासे दिशाओंमें चारों ओर आधा योजन विस्तृत यह क्षेत्र उत्तम तीर्थ हो जाय।' उस तीर्थमें उपवासपूर्वक स्नानकर मनुष्य कामदेवके रूपमें रुद्रलोकमें पूजित होता है॥ १०९—११६॥<br><br>राजेन्द्र! यहाँ वैश्वानर, यम, कामदेव और मरुत्ने तपस्या कर परम सिद्धि प्राप्त की थी। उस तीर्थसे थोड़ी दूरपर अंकोलके समीप स्नान, दान, भोजन तथा पिण्डदान करना चाहिये। यहाँ अग्निमें जलकर, जलमें डूबकर या अनशन करके प्राण-त्याग करनेवालेको परलोकमें अपुनर्भवकी गति प्राप्त होती है। जो व्यक्ति त्र्यम्बकतीर्थके जलसे चरु पकाकर अङ्कोलके मूलमें विधिपूर्वक पिण्डदान करता है, उसके पितृगण चन्द्र और सूर्यकी स्थितिपर्यन्त तृप्त रहते हैं। उत्तरायण आनेपर चाहे पुरुष हो या स्त्री—जो कोई भी घृतसे स्नान करता है और पवित्र होकर उस आयतनमें निवास करता है तथा प्रातःकाल सिद्धेश्वरदेवकी पूजा करता है, वह जिस गतिको प्राप्त करता है, वह सभी यज्ञोंके करनेसे भी नहीं प्राप्त हो सकती। कालगतिसे पुनः जब वह मृत्युलोकमें जन्म ग्रहण करता है, तब सौभाग्यशाली एवं रूपसे सम्पन्न होकर समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका राजा होता है। जो यहाँ आकर महाबली दण्डपाणि क्षेत्रपालका दर्शन नहीं करता और कर्णकुण्डलको नहीं देखता, उसकी यात्रा व्यर्थ हो जाती है। इस प्रकार तीर्थके फलको जानकर सभी देवगण वहाँ उपस्थित होकर कुसुमोंकी वृष्टि करने लगे, इसीसे यह कुसुमेश्वर नामसे विख्यात हुआ॥ ११७—१२५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्य-वर्णनमें एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९१॥
| * अध्याय १९२ * | ८०३ |
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एक सौ बानबेवाँ अध्याय
शुक्लतीर्थका माहात्म्य
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मार्कण्डेय उवाच<br><br>भार्गवेशं ततो गच्छेद् भग्नो यत्र जनार्दनः।<br>असुरैस्तु महायुद्धे महाबलपराक्रमैः॥ १<br>हुंकारितास्तु देवेन दानवाः प्रलयं गताः।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २<br>शुक्लतीर्थस्य चोत्पत्तिं शृणु त्वं पाण्डुनन्दन।<br>हिमवच्छिखरे रम्ये नानाधातुविचित्रिते॥ ३<br>तरुणादित्यसंकाशे तप्तकाञ्चनप्रभे।<br>वज्रस्फटिकसोपाने चित्रपट्टशिलातले॥ ४<br>जाम्बूनदमये दिव्ये नानापुष्पोपशोभिते।<br>तत्रासीनं महादेवं सर्वज्ञं प्रभुमव्ययम्॥ ५<br>लोकानुग्रहकर्तारं गणवृन्दैः समावृतम्।<br>स्कन्दनन्दिमहाकालैर्वीरभद्रगणादिभिः ।<br>उमया सहितं देवं मार्कण्डिः पर्यपृच्छत॥ ६<br>देवदेव महादेव ब्रह्मविष्ण्विन्द्रसंस्तुत।<br>संसारभयभीतोऽहं सुखोपायं ब्रवीहि मे॥ ७<br>भगवन् भूतभव्येश सर्वपापप्रणाशनम्।<br>तीर्थानां परमं तीर्थं तद् वदस्व महेश्वर॥ ८ | मार्कण्डेयजीने पूछा— राजेन्द्र! तदनन्तर भार्गवेशतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ एक बार भगवान् जनार्दन महायुद्धमें महाबली असुरोंके साथ युद्ध करते-करते थक गये, फिर उन प्रभुके हुंकारसे ही दानवगण नष्ट हो गये थे। वहाँ स्नान करनेसे मानव सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। पाण्डुनन्दन! अब आप शुक्लतीर्थकी उत्पत्ति सुनिये। किसी समय विविध धातुओंसे रंग-बिरंगे हिमवान् पर्वतके मनोरम शिखरपर, जो मध्याह्नकालिक सूर्यके समान देदीप्यमान, तपाये हुए सोनेकी प्रभासे युक्त, हीरक और स्फटिककी सीढ़ियोंसे सुशोभित था, एक दिव्य सुवर्णमय तथा अनेक पुष्पोंसे विभूषित शिलातलपर सर्वज्ञ, सामर्थ्यशाली, अविनाशी, लोकोंपर अनुग्रह करनेवाले महादेव स्कन्द, नन्दी, महाकाल, वीरभद्र आदि गणों तथा अन्यान्य गणसमूहोंसे घिरे हुए उमाके साथ बैठे हुए थे। उसी समय मार्कण्डेयजीने उनसे पूछा—'ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्रसे वन्दित, देवाधिदेव महादेव! मैं संसार-भयसे भीत हूँ, मुझे सुखका साधन बतलाइये। ऐश्वर्यशाली महेश्वर! आप भूत और भविष्यके स्वामी हैं, अतः जो सभी पापोंका विनाशक एवं तीर्थोंमें श्रेष्ठ हो, वह तीर्थ मुझे बतलाइये॥ १—८॥ |
| ईश्वर उवाच<br><br>शृणु विप्र महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद।<br>स्नानाय गच्छ सुभगं ऋषिसङ्घैः समावृतः॥ ९<br>मन्वत्रिकश्यपाश्चैव याज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः।<br>यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती॥ १०<br>नारदो गौतमश्चैव सेवन्ते धर्मकाङ्क्षिणः।<br>गङ्गा कनखले पुण्या प्रयागं पुष्करं गयाम्॥ ११<br>कुरुक्षेत्रं महापुण्यं राहुग्रस्ते दिवाकरे।<br>दिवा वा यदि वा रात्रौ शुक्लतीर्थं महाफलम्॥ १२ | भगवान् शंकरने कहा— महाबुद्धिमान् विप्र! तुम तो सकलशास्त्रविशारद और सौभाग्यशाली हो, तुम मेरी बात सुनो और ऋषियोंके साथ स्नान करनेके लिये शुक्लतीर्थमें जाओ। मनु, अत्रि, कश्यप, याज्ञवल्क्य, उशना, अङ्गिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, नारद और गौतम—ये ऋषिगण धर्मकी अभिलाषासे युक्त हो उसी तीर्थका सेवन करते हैं। गङ्गा कनखलमें पुण्यको देनेवाली है, सूर्यग्रहणके समय प्रयाग, पुष्कर, गया और कुरुक्षेत्र विशिष्ट पुण्यदायक हो जाते हैं, किंतु शुक्लतीर्थ दिन या रात—सभी समय महान् पुण्यफल देनेवाला है। |
१९४- नर्मदातटवर्ती तीर्थोंका माहात्म्य
८०४ * मत्स्यपुराण *
| दर्शनात् स्पर्शनाच्चैव स्नानाद् दानात् तपो जपात् ।<br>होमाच्चैवोपवासाच्च शुक्लतीर्थं महाफलम् ॥ १३<br>शुक्लतीर्थं महापुण्यं नर्मदायां व्यवस्थितम् ।<br>चाणक्यो नाम राजर्षिः सिद्धिं तत्र समागतः ॥ १४<br>एतत् क्षेत्रं सुविपुलं योजनं वृत्तसंस्थितम् ।<br>शुक्लतीर्थं महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ १५<br>पादपाग्रेण दृष्टेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति ।<br>जगतीदर्शनाच्चैव भ्रूणहत्यां व्यपोहति ॥ १६<br>अहं तत्र ऋषिश्रेष्ठ तिष्ठामि ह्युमया सह ।<br>वैशाखे चैत्रमासे तु कृष्णपक्षे चतुर्दशी ॥ १७<br>कैलासाच्चापि निष्क्रम्य तत्र संनिहितो ह्यहम् । | यह शुक्लतीर्थ दर्शन, स्पर्श, स्नान, दान, तप, जप, हवन और उपवास करनेसे महान् फलदायक होता है। यह महान् पुण्यदायक शुक्लतीर्थ नर्मदामें अवस्थित है। चाणक्य नामक राजर्षिने यहीं सिद्धि प्राप्त की थी। यह विशाल क्षेत्र एक योजन परिमाणका गोलाकार है। यह शुक्लतीर्थ महापुण्यको प्रदान करनेवाला और सम्पूर्ण पापोंका नाशक है। यह यहाँ स्थित वृक्षके अग्रभागको देखनेसे ब्रह्महत्या और यहाँकी भूमिके दर्शन करनेसे भ्रूणहत्याके पापको नष्ट कर देता है। ऋषिश्रेष्ठ! मैं वहाँ उमाके साथ निवास करता हूँ। चैत्र तथा वैशाख-मासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको मैं कैलाससे भी आकर यहाँ उपस्थित रहता हूँ॥ ९—१७ ½ ॥ |
| दैत्यदानवगन्धर्वाः सिद्धविद्याधरास्तथा ॥ १८<br>गणाश्चाप्सरसो नागाः सर्वे देवाः समागताः ।<br>गगनस्थास्तु तिष्ठन्ति विमानैः सार्वकामिकैः ॥ १९<br>शुक्लतीर्थं तु राजेन्द्र ह्यागता धर्मकाङ्क्षिणः ।<br>रजकेन यथा वस्त्रं शुक्लं भवति वारिणा ॥ २०<br>आजन्मजनितं पापं शुक्लं तीर्थं व्यपोहति ।<br>स्नानं दानं महापुण्यं मार्कण्ड ऋषिसत्तम ॥ २१<br>शुक्लतीर्थात् परं तीर्थं न भूतं न भविष्यति ।<br>पूर्वे वयसि कर्माणि कृत्वा पापानि मानवः ॥ २२<br>अहोरात्रोपवासेन शुक्लतीर्थे व्यपोहति ।<br>तपसा ब्रह्मचर्येण यज्ञैर्दानेन वा पुनः ॥ २३<br>देवार्चनेन या पुष्टिर्न सा क्रतुशतैरपि ।<br>कार्तिकस्य तु मासस्य कृष्णपक्षे चतुर्दशी ॥ २४<br>घृतेन स्नापयेद् देवमुपोष्य परमेश्वरम् ।<br>एकविंशत्कुलोपेतो न च्यवेदेश्वरात् पदात् ॥ २५<br>शुक्लतीर्थं महापुण्यमृषिसिद्धनिषेवितम् ।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन्न पुनर्जन्मभाग् भवेत् ॥ २६<br>स्नात्वा वै शुक्लतीर्थे तु ह्यर्चयेद् वृषभध्वजम् ।<br>कपालपूरणं कृत्वा तुष्यत्यत्र महेश्वरः ॥ २७ | राजेन्द्र! दैत्य, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, गण, अप्सराएँ और नाग—ये सभी देवगण आकर सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले विमानोंपर आरूढ़ हो गगनमें स्थित रहते हैं। धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले ये सभी शुक्लतीर्थमें आते हैं; क्योंकि जैसे धोबी मलिन वस्त्रको जलसे धोकर उज्ज्वल कर देता है, उसी तरह शुक्लतीर्थ जन्मसे लेकर तबतकके किये गये पापोंको नष्ट कर देता है। ऋषिश्रेष्ठ मार्कण्डेय! यहाँका स्नान और दान महान् पुण्यफलको देनेवाले होते हैं। शुक्लतीर्थसे श्रेष्ठ तीर्थ न हुआ है और न होगा। मानव बचपनमें किये गये पाप-कर्मोंको शुक्लतीर्थमें एक दिन-रात उपवास करके नष्ट कर देता है। यहाँ तपस्या, ब्रह्मचर्य, यज्ञ, दान और देवार्चनसे जो पुष्टि प्राप्त होती है, वह (अन्यत्र किये गये) सैकड़ों यज्ञोंसे भी नहीं मिलती। यहाँ कार्तिकमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको उपवास कर परमेश्वर महादेवको घृतसे स्नान कराना चाहिये। ऐसा करनेसे वह अपने इक्कीस पीढ़ियोंतकके पूर्वजोंके साथ महादेवके स्थानसे च्युत नहीं होता। राजन्! ऋषियों और सिद्धोंद्वारा सेवित यह शुक्लतीर्थ महान् पुण्यदायक है। वहाँ स्नान करनेसे मानव पुनर्जन्मका भागी नहीं होता। शुक्लतीर्थमें स्नानकर वृषभध्वजकी पूजा करे और कपालको भर दे, ऐसा करनेसे महेश्वर प्रसन्न होते हैं॥ १८—२७॥ |
| * अध्याय १९२ * | ८०५ |
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| अर्धनारीश्वरं देवं पटे भक्त्या लिखापयेत्।<br>शङ्खतूर्यनिनादैश्च ब्रह्मघोषैश्च सद्द्विजैः॥ २८<br>जागरं कारयेत् तत्र नृत्यगीतादिमङ्गलैः।<br>प्रभाते शुक्लतीर्थे तु स्नानं वै देवतार्चनम्॥ २९<br>आचार्यान् भोजयेत् पश्चाच्छिवव्रतपरांञ्शुचीन्।<br>दक्षिणां च यथाशक्ति वित्तशाठ्यं विवर्जयेत्॥ ३०<br>प्रदक्षिणं ततः कृत्वा शनैर्देवान्तिकं व्रजेत्।<br>एवं वै कुरुते यस्तु तस्य पुण्यफलं शृणु॥ ३१<br>दिव्ययानं समारूढो गीयमानोऽप्सरोगणैः।<br>शिवतुल्यबलोपेतस्तिष्ठत्याभूतसम्प्लवम्॥ ३२<br>शुक्लतीर्थे तु या नारी ददाति कनकं शुभम्।<br>घृतेन स्नापयेद् देवं कुमारं चापि पूजयेत्॥ ३३<br>एवं या कुरुते भक्त्या तस्याः पुण्यफलं शृणु।<br>मोदते शर्वलोकस्था यावदिन्द्राश्चतुर्दश॥ ३४<br>पौर्णमास्यां चतुर्दश्यां संक्रान्तौ विषुवे तथा।<br>स्नात्वा तु सोपवासः सन् विजितात्मा समाहितः॥ ३५<br>दानं दद्याद् यथाशक्त्या प्रीयेतां हरिशंकरौ।<br>एवं तीर्थप्रभावेण सर्वं भवति चाक्षयम्॥ ३६<br>अनाथं दुर्गतं विप्रं नाथवन्तमथापि वा।<br>उद्वाहयति यस्तीर्थे तस्य पुण्यफलं शृणु॥ ३७<br>यावत्तद्रोमसंख्या च तत्प्रसूतिकुलेषु च।<br>तावद्वर्षसहस्त्राणि शिवलोके महीयते॥ ३८ | वस्त्रके ऊपर भक्तिके साथ अर्धनारीश्वर महादेवका चित्र लिखवाये और शङ्ख-तुरहीके शब्दों एवं उत्तम ब्राह्मणोंके द्वारा वैदिक मन्त्रोंके उच्चारणके साथ-साथ नृत्य, गीत आदि मङ्गल-कार्य करते हुए वहाँ रातमें जागरण कराये। प्रातःकाल शुक्लतीर्थमें स्नान करके देवताकी पूजा करे। तत्पश्चात् शिवव्रत-परायण पवित्र आचार्योंको भोजन कराये और कृपणता छोड़कर उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा दे। इसके बाद उनकी प्रदक्षिणा कर धीरेसे देवताके समीप जाय। जो ऐसा करता है, उसे प्राप्त होनेवाला पुण्यफल सुनिये। वह शिवके समान बलशाली हो अप्सराओंद्वारा गाया जाता हुआ दिव्य विमानपर बैठकर प्रलयपर्यन्त स्थित रहता है। जो स्त्री शुक्लतीर्थमें शुभकारक सुवर्णका दान करती है और महादेवको घृतसे स्नान कराकर कुमार (स्कन्द)-की भी पूजा करती है, भक्तिपूर्वक ऐसा करनेवाली स्त्रीको जो पुण्यफल प्राप्त होता है, उसे सुनिये। वह रुद्रलोकमें स्थित रहकर चौदह इन्द्रोंके कार्यकालतक आनन्दका उपभोग करती है। जो पूर्णिमा एवं चतुर्दशी तिथि, संक्रान्तिके दिन और विषुवयोगमें वहाँ स्नान करके मनको वशमें कर समाहित चित्तसे उपवासके साथ 'विष्णु और शंकर—दोनों प्रसन्न हों' इस भावनासे यथाशक्ति दान देता है, उसका वह सब तीर्थके प्रभावसे अक्षय हो जाता है। जो मानव उस तीर्थमें अनाथ, दुर्गतिग्रस्त अथवा सनाथ विप्रका भी विवाह कराता है उसे प्राप्त होनेवाला पुण्यफल सुनिये। वह उस ब्राह्मणके तथा उसकी वंशपरम्परामें उत्पन्न हुए लोगोंके शरीरमें जितने रोओंकी संख्या है, उतने हजार वर्षोंतक शिवलोकमें पूजित होता है॥ २८—३८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्यमें एक सौ वानवेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९२॥
| ८०६ | * मत्स्यपुराण * |
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एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय
नर्मदा-माहात्म्य-प्रसङ्गमें कपिलादि विविध तीर्थोंका माहात्म्य, भृगुतीर्थका माहात्म्य, भृगुमुनिकी तपस्या, शिव-पार्वतीका उनके समक्ष प्रकट होना, भृगुद्वारा उनकी स्तुति और शिवजीद्वारा भृगुको वर-प्रदान
| मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजीने कहा— |
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| ततस्त्वनरकं गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र नरकं च न पश्यति॥ १<br>तस्य तीर्थस्य माहात्म्यं शृणु त्वं पाण्डुनन्दन।<br>तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र यस्यास्थीनि विनिक्षिपेत्॥ २<br>विलयं यान्ति पापानि रूपवाञ्जायते नरः।<br>गोतीर्थं तु ततो गत्वा सर्वपापात् प्रमुच्यते॥ ३<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र कपिलातीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र गत्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत्॥ ४<br>ज्येष्ठमासे तु सम्प्राप्ते चतुर्दश्यां विशेषतः।<br>तत्रोपोष्या नरो भक्त्या कपिलां यः प्रयच्छति॥ ५<br>घृतेन दीपं प्रज्वाल्य घृतेन स्नापयेच्छिवम्।<br>सघृतं श्रीफलं जग्ध्वा दत्त्वा चान्ते प्रदक्षिणम्॥ ६<br>घण्टाभरणसंयुक्तां कपिलां यः प्रयच्छति।<br>शिवतुल्यबलो भूत्वा नैवासौ जायते पुनः॥ ७<br>अङ्गारकदिने प्राप्ते चतुर्थ्यां तु विशेषतः।<br>पूजयेत् तु शिवं भक्त्या ब्राह्मणेभ्यश्च भोजनम्॥ ८<br>अङ्गारकनवम्यां तु अमायां च विशेषतः।<br>स्नापयेत् तत्र यत्नेन रूपवान् सुभगो भवेत्॥ ९<br>घृतेन स्नापयेल्लिङ्गं पूजयेद् भक्तितो द्विजान्।<br>पुष्पकेण विमानेन सहस्रैः परिवारितः॥ १०<br>शैवं पदमवाप्नोति यत्र चाभिमतं भवेत्।<br>अक्षयं मोदते कालं यथा रुद्रस्तथैव सः॥ ११<br>यदा तु कर्मसंयोगान्मर्त्यलोकमुपागतः।<br>राजा भवति धर्मिष्ठो रूपवाञ्जायते कुले॥ १२<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र ऋषितीर्थमनुत्तमम्।<br>तृणबिन्दुर्नार्म ऋषिः शापदग्धो व्यवस्थितः॥ १३<br>तत्तीर्थस्य प्रभावेण शापमुक्तोऽभवद् द्विजः। | राजन्! तदनन्तर अनरक नामक तीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मानवको नरकका दर्शन नहीं होता। पाण्डुनन्दन! अब आप उस तीर्थका माहात्म्य सुनिये। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जिसकी हड्डियाँ डाल दी जाती हैं, उसके पापसमूह नष्ट हो जाते हैं और वह पुनः रूपवान् होकर जन्म ग्रहण करता है। तत्पश्चात् गोतीर्थमें जाकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त श्रेष्ठ कपिलातीर्थकी यात्रा करे। राजन्! जो मनुष्य ज्येष्ठ-मासमें विशेषकर चतुर्दशी तिथिको वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान और उपवासकर कपिला गौका दान करता है, उसे एक हजार गोदानका फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य वहाँ घीसे दीपक जलाकर घीसे शिवको स्नान कराता है और घृतके साथ बेलको स्वयं खाता है एवं दान देता है तथा अन्तमें प्रदक्षिणा करके घण्टा और अलंकारसे विभूषित कपिला गौका दान करता है, वह शिवके तुल्य बलवान् होता है और उसका पुनर्जन्म नहीं होता। मंगलवारको विशेषकर चतुर्थी तिथिको शिवकी भक्तिपूर्वक पूजा करके ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। मंगलवारकी नवमी एवं विशेषतया अमावस्या तिथिको यत्नपूर्वक शिवको स्नान करानेसे मनुष्य रूपवान् और भाग्यवान् होता है। जो घृतसे शिवलिङ्गको स्नान कराकर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंकी पूजा करता है, वह हजारों विमानोंसे घिरे हुए पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो शिवलोकको जाता है और यहाँ अभिलषित वस्तुओंको प्राप्त करता है तथा रुद्रके समान ही अक्षय कालतक वहाँ आनन्दका उपभोग करता है। जब कभी कर्मवश वह मृत्युलोकमें आता है तो कुलीन वंशमें जन्म ग्रहण करता है और रूपवान् धर्मात्मा राजा होता है। राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ ऋषितीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। यहाँ तृणबिन्दु नामक ऋषि शापसे दग्ध होकर स्थित थे, किंतु इस तीर्थके प्रभावसे वे द्विज शापसे मुक्त हो गये॥ १—१३॥ |
| * अध्याय १९३ * | ८०७ |
|---|---|
| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र गङ्गेश्वरमनुत्तमम् ॥ १४<br>श्रावणे मासि सम्प्राप्ते कृष्णपक्षे चतुर्दशी ।<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र रुद्रलोके महीयते ॥ १५<br>पितॄणां तर्पणं कृत्वा मुच्यते च ऋणत्रयात् ।<br>गङ्गेश्वरसमीपे तु गङ्गावदनमुत्तमम् ॥ १६<br>अकामो वा सकामो वा तत्र स्नात्वा तु मानवः ।<br>आजन्मजनितैः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः ॥ १७<br>तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा व्रजेद् वै यत्र शंकरः ।<br>सर्वदा पर्वदिवसे स्नानं तत्र समाचरेत् ॥ १८<br>पितॄणां तर्पणं कृत्वा ह्यश्वमेधफलं लभेत् ।<br>प्रयागे यत्फलं दृष्टं शंकरेण महात्मना ॥ १९<br>तदेव निखिलं दृष्टं गङ्गावदनसंगमे ।<br>तस्यैव पश्चिमे स्थाने समीपे नातिदूरतः ॥ २०<br>दशाश्वमेधजननं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।<br>उपोष्य रजनीमेकां मासि भाद्रपदे तथा ॥ २१<br>अमायां च नरः स्नात्वा व्रजते यत्र शंकरः ।<br>सर्वदा पर्वदिवसे स्नानं तत्र समाचरेत् ॥ २२<br>पितॄणां तर्पणं कृत्वा चाश्वमेधफलं लभेत् ।<br>दशाश्वमेधात् पश्चिमतॊ भृगुर्ब्राह्मणसत्तमः ॥ २३<br>दिव्यं वर्षं सहस्रं तु ईश्वरं पर्युपासत ।<br>वल्मीकवेष्टितश्चासौ पक्षिणां च निकेतनः ॥ २४<br>आश्चर्यं सुमहज्जातमुमायाः शंकरस्य च ।<br>गौरी पप्रच्छ देवेशं कोऽयमेवं तु संस्थितः ।<br>देवो वा दानवो वाथ कथयस्व महेश्वर ॥ २५ | राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ गङ्गेश्वरतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ श्रवणमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको स्नानमात्र कर लेनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें पूजित होता है तथा पितरोंका तर्पण कर देव, पितर और ऋषि—इन तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाता है। गङ्गेश्वरतीर्थके समीपमें गङ्गावदन नामक श्रेष्ठ तीर्थ है। वहाँ कामनापूर्वक या निष्काम होकर स्नान कर मनुष्य अपने जन्मभरके किये हुए पापोंसे छुटकारा पा जाता है, इसमें संदेह नहीं है। उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्यको जहाँ शंकर हैं, वहीं जाना चाहिये और वहाँ सर्वदा पर्वदिनपर स्नान करना चाहिये। वहाँ पितरोंका तर्पण करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। प्रयागमें स्नान करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह सम्पूर्ण फल गङ्गावदनसङ्गममें महात्मा शंकरके दर्शनसे प्राप्त हो जाता है। उसीके पश्चिम दिशामें संनिकट ही दशाश्वमेधजनन नामक तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। भाद्रपदमासकी अमावास्या तिथिको वहाँ एक रात उपवासकर स्नान करनेके पश्चात् शंकरके निकट जाना चाहिये और वहाँ सर्वदा पर्वके अवसरपर स्नान करना चाहिये। वहाँ पितरोंका तर्पण करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। दशाश्वमेधसे पश्चिम दिशामें ब्राह्मणश्रेष्ठ भृगुने एक हजार दिव्य वर्षोंतक शिवजीकी उपासना की थी। उनका शरीर बिमवटसे परिवेष्टित हो गया था, जिससे वे पक्षियोंके निवासस्थान बन गये थे। यह देखकर उमा और शंकरको महान् आश्चर्य उत्पन्न हुआ। तब पार्वतीके शंकरजीसे पूछा—'महेश्वर! यह कौन इस प्रकार समाधिस्थ है? यह देव है अथवा दानव? यह मुझे बतलाइये॥ १४—२५॥ |
| महेश्वर उवाच<br>भृगुर्नाम द्विजश्रेष्ठ ऋषीणां प्रवरो मुनिः ।<br>मां ध्यायते समाधिस्थो वरं प्रार्थयते प्रिये ॥ २६<br><br>ततः प्रहसिता देवी ईश्वरं प्रत्यभाषत ।<br><br>धूमवत्तच्छिखा जाता ततोऽद्यापि न तुष्यसे ।<br>दुराराध्योऽसि तेन त्वं नात्र कार्या विचारणा ॥ २७ | **महेश्वर बोले—**प्रिये! ये द्विजश्रेष्ठ भृगु हैं, जो ऋषियोंमें श्रेष्ठ मुनि हैं। ये समाधिस्थ होकर मेरा ध्यान कर रहे हैं और वर प्राप्त करना चाहते हैं। यह सुनकर पार्वतीदेवी हँस पड़ीं और महेश्वरसे बोलीं—'भगवन्! इस तपस्वीकी शिखा धुएँके समान हो गयी, फिर भी आप अभी भी संतुष्ट नहीं हो रहे हैं। इससे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आप महान् कष्टसे आराधित-प्रसन्न होते हैं, इस विषयमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है॥२६-२७॥ |
| महेश्वर उवाच<br>न जानासि महादेवि ह्ययं क्रोधेन वेष्टितः ।<br>दर्शयामि यथातथ्यं प्रत्ययं ते करोम्यहम् ॥ २८ | **महेश्वरने कहा—**महादेवि! तुम नहीं जानती हो, ये मुनि क्रोधसे परिपूर्ण हैं। मैं तुम्हें अभी सत्य स्थिति |
१९५- गोत्रप्रवर-निरूपण-प्रसङ्गमें भृगुवंशकी परम्पराका विवरण
८०८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततः स्मृतोऽथ देवेन धर्मरूपो वृषस्तदा।<br>स्मरणात्तस्य देवस्य वृषः शीघ्रमुपस्थितः।<br>वदंस्तु मानुषीं वाचमादेशो दीयतां प्रभो॥ २९ | दिखाकर विश्वस्त कर रहा हूँ। तत्पश्चात् शिवजीने उस समय धर्मरूपी वृषभका स्मरण किया। उन देवके स्मरण करते ही वह वृष शीघ्र ही उपस्थित हो गया और मनुष्यकी वाणीमें बोला—'प्रभो! आदेश दीजिये'॥ २८-२९॥ |
| महेश्वर उवाच<br>वल्मीकं त्वं खनस्वैनं विप्रं भूमौ निपातय।<br>योगस्थस्तु ततो ध्यायन् भृगुस्तेन निपातितः॥ ३०<br>तत्क्षणात् क्रोधसंतप्तो हस्तमुत्क्षिप्य सोऽशपत्।<br>एवं सम्भाषमाणस्तु कुत्र गच्छसि भो वृष।<br>अद्याहं सम्प्रकोपेण प्रलयं त्वां नये वृष॥ ३१<br>धर्षितस्तु तदा विप्रश्चान्तरिक्षं गतो वृषम्।<br>आकाशे प्रेक्षते विप्र एतदद्भुतमुत्तमम्॥ ३२<br>तत्र प्रहसितो रुद्र ऋषिरग्रे व्यवस्थितः।<br>तृतीयलोचनं दृष्ट्वा वैलक्ष्यात् पतितो भुवि।<br>प्रणम्य दण्डवद् भूमौ तुष्टाव परमेश्वरम्॥ ३३ | महेश्वरने कहा—तुम इस विमवटको खोद डालो और विप्रको भूमिपर गिरा दो। तब वृषने ध्यान करते हुए योगस्थ भृगुको भूमिपर गिरा दिया। उसी क्षण क्रोधसे जले-भुने भृगु हाथ उठाकर शाप देते हुए इस प्रकार बोले—'भो वृष! तुम कहाँ जा रहे हो? वृष! अभी मैं क्रोधके बलसे तुम्हारा संहार कर डालता हूँ।' तब वह वृषभ उस विप्रको परास्तकर आकाशमें चला गया। उसे आकाशमें देखते हुए भृगु सोचने लगे—'यह तो महान् आश्चर्य है।' इतनेमें ही वहाँ भगवान् रुद्र हँसते हुए ऋषिके सम्मुख उपस्थित हो गये। तब तृतीय नेत्रधारी रुद्रको देखकर भृगु व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़े और दण्डके समान भूमिपर लेटकर प्रणाम कर भगवान् शंकरकी स्तुति करने लगे॥ ३०-३३॥ |
| प्रणिपत्य भूतनाथं भवोद्भवं त्वामहं दिव्यरूपम्।<br>भवातीतो भुवनपते प्रभो तु विज्ञापये किञ्चित्॥ ३४<br><br>तद्गुणनिकरान् वक्तुं कः शक्तो भवति मानुषो नाम।<br>वासुकिरपि हि कदाचिद् वदनसहस्रं भवेद् यस्य॥ ३५<br><br>भक्त्या तथापि शंकर भुवनपते त्वत्स्तुतौ मुखरः।<br>वदतः क्षमस्व भगवन् प्रसीद मे तव चरणपतितस्य॥ ३६<br><br>सत्त्वं रजस्तमस्त्वं स्थित्युत्पत्त्योर्विनाशने देव।<br>त्वां मुक्त्वा भुवनपते भुवनेश्वर नैव दैवतं किञ्चित्॥ ३७<br><br>यमनियमयज्ञदानवेदाभ्यासाश्च धारणा योगः।<br>त्वद्भक्तेः सर्वमिदं नार्हति हि कलासहस्त्रांशम्॥ ३८<br><br>उच्छिष्टरससायनखड्गाञ्जनपादुकाविवरसिद्धिर्वा।<br>चिह्नं भवव्रतानां दृश्यति चेह जन्मनि प्रकटम्॥ ३९ | त्रिभुवनके स्वामी प्रभो! आप प्राणिवर्गके स्वामी, संसारके उद्भवस्थान, दिव्य रूपधारी और जन्म-मरणसे परे हैं, मैं आपको प्रणाम करके कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। यद्यपि कदाचित् किसी मानवको वासुकि समान हजार मुख हो जाय तो भी ऐसा कोई भी मनुष्य आपके गुणसमूहोंका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हो सकता, तथापि भुवनपते शंकर! मैं भक्तिपूर्वक आपकी स्तुति करनेके लिये उद्यत हूँ। भगवन्! अपने चरणोंमें पड़े हुए मुझपर प्रसन्न हो जाइये और बोलते समय घटित हुई त्रुटियोंके लिये मुझे क्षमा कीजिये। देव! विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और लयमें आप ही सत्त्व, रज और तमस्वरूप हैं। भुवनपते! आपको छोड़कर अन्य कोई देवता नहीं है। भुवनेश्वर! यम, नियम, यज्ञ, दान, वेदाभ्यास, धारणा और योग—ये सभी आपकी भक्तिकी एक कलाके हजारवें अंशकी समता नहीं कर सकते। उच्छिष्ट, रस-रसायन, खड्ग, अञ्जन, पादुका और विवरसिद्धि—ये सभी महादेवकी आराधना करनेवालोंके चिह्न हैं, जो इस जन्ममें व्यक्त-रूपसे देखे जाते हैं॥ ३४-३९॥ |
| शाठ्येन नमति यद्यपि ददासि त्वं भूतिमिच्छतो देव।<br>भक्तिर्भवभेदकरी मोक्षाय विनिर्मिता नाथ॥ ४० | देव! यद्यपि भक्त शठतापूर्वक नमस्कार करता है, तथापि आप उसे इच्छानुसार ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। नाथ! आपने मोक्ष प्रदान करनेके लिये संसारको नष्ट करनेवाली |
- अध्याय १९३ * | ८०९
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| परदारपरस्वरतं परपरिभवदुःखशोकसंतप्तम्।<br>परवदनवीक्षणपरं परमेश्वर मां परित्राहि॥ ४१<br><br>मिथ्याभिमानदग्धं क्षणभङ्गुरदेहविलसितं क्रूरम्।<br>कुपथ्याभिमुखं पतितं त्वं मां पापात् परित्राहि॥ ४२<br><br>दीने द्विजगणसार्थे बन्धुजनेनैव दूषिता ह्याशा।<br>तृष्णा तथापि शंकर किं मूढं मां विडम्बयति॥ ४३<br><br>तृष्णां हरस्व शीघ्रं लक्ष्मीं प्रदत्स्व यावदासिनीं नित्यम्।<br>छिन्धि मदमोहपाशान्नुत्तारय मां महादेव॥ ४४<br><br>करुणाभ्युदयं नाम स्तोत्रमिदं सर्वसिद्धिदं दिव्यम्।<br>यः पठति भक्तियुक्तस्तस्य तुष्येद् भृगोर्यथा च शिवः॥ ४५ | भक्तिका निर्माण किया है। परमेश्वर! मैं परायी स्त्री और पराये धनमें रत रहनेवाला, दूसरे द्वारा किये गये अनादरसे उत्पन्न हुए दुःख और शोकसे सन्तप्त और परमुखापेक्षी हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये। मैं मिथ्या अभिमानसे सन्तप्त, क्षणभङ्गुर शरीरके विलासमें रत, निष्ठुर, कुमार्गगामी और पतित हूँ, आप इस पापसे मेरी रक्षा कीजिये। यद्यपि द्विजगणोंके साथ-साथ मैं दीन हूँ और बन्धुजनोंने ही मेरी आशाको दूषित कर दिया है, तथापि शंकर! तृष्णा मुझ मोहग्रस्तकी विडम्बना क्यों कर रही है? महादेव! आप इस तृष्णाको शीघ्र दूर कर दें, नित्य चिरस्थायिनी लक्ष्मी प्रदान करें, मद और मोहके पाशको काट दें और मेरा उद्धार करें। यह 'करुणाभ्युदय' नामक दिव्य स्तोत्र सभी सिद्धियोंको देनेवाला है, जो भक्तिपूर्वक इसका पाठ करता है, उसपर भृगु (पर प्रसन्न होने)-के समान ही शिवजी प्रसन्न होते हैं॥ ४०—४५॥ |
| अहं तुष्टोऽस्मि ते वत्स प्रार्थयस्वेप्सितं वरम्।<br>उमया सहितो देवो वरं तस्य ह्यादापयत्॥ ४६ | भगवान् शंकरने कहा—वत्स! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, तुम अभीष्ट वर माँग लो। इस प्रकार उमासहित महादेवजी भृगुको वरदान देनेके लिये उद्यत हुए॥ ४६॥ |
| भृगुरुवाच<br>यदि तुष्टोऽसि देवेश यदि देयो वरो मम।<br>रुद्रवेदी भवेदेवमेतत् सम्पादयस्व मे॥ ४७ | भृगु बोले—देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर देना चाहते हैं तो मुझे यह वरदान दीजिये कि यह स्थान रुद्रवेदीके नामसे प्रसिद्ध हो जाय॥ ४७॥ |
| ईश्वर उवाच<br>एवं भवतु विप्रेन्द्र क्रोधस्त्वां न भविष्यति।<br>न पितापुत्रयोश्चैव त्वैकमत्यं भविष्यति॥ ४८<br><br>तदाप्रभृति ब्रह्माद्याः सर्वे देवाः सकिन्नराः।<br>उपासते भृगोस्तीर्थं तुष्टो यत्र महेश्वरः॥ ४९<br><br>दर्शनात् तस्य तीर्थस्य सद्यः पापात् प्रमुच्यते।<br>अवशाः स्ववशा वापि म्रियन्ते यत्र जन्तवः॥ ५०<br><br>गुह्यातिगुह्या सुगतिस्तेषां निःसंशयं भवेत्।<br>एतत् क्षेत्रं सुविपुलं सर्वपापप्रणाशनम्॥ ५१<br><br>तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः।<br>उपानहौ च छत्रं च व्यमन्त्रं च काञ्चनम्॥ ५२<br><br>भोजनं च यथाशक्त्या ह्यक्षयं च तथा भवेत्।<br>सूर्योपरागे यो दद्याद् दानं चैव यथेच्छया॥ ५३ | शिवजीने कहा—विप्रश्रेष्ठ! ऐसा ही होगा और अब तुम्हें क्रोध नहीं होगा। साथ ही तुम पिता और पुत्रमें सहमति नहीं होगी। तभीसे किन्नरोंसहित ब्रह्मा आदि सभी देवगण, जहाँ महेश्वर संतुष्ट हुए थे, उस भृगुतीर्थकी उपासना करते हैं। उस तीर्थका दर्शन करनेसे मनुष्य तत्काल ही पापसे मुक्त हो जाता है। स्वाधीन या पराधीन होकर भी जो प्राणी यहाँ मरते हैं, उन्हें निःसंदेह गुह्यातिगुह्य उत्तम गति प्राप्त होती है। यह अत्यन्त विस्तृत क्षेत्र सभी पापोंका विनाशक है। यहाँ स्नान करके मानव स्वर्गको प्राप्त होते हैं तथा जो वहाँ मरते हैं, उनका पुनः संसारमें आगमन नहीं होता। वहाँ यथाशक्ति जूता, छाता, अन्न, सोना और खाद्य पदार्थका दान देना चाहिये; क्योंकि वह अक्षय हो जाता है। जो मनुष्य सूर्यग्रहणके समय वहाँ इच्छानुसार जो कुछ दान |
८९० * मत्स्यपुराण *
| दीयमानं तु तद् दानमक्षयं तस्य तद् भवेत्।<br>चन्द्रसूर्योपरागेषु यत्फलं त्वमरकण्टके॥ ५४<br>तदेव निखिलं पुण्यं भृगुतीर्थे न संशयः।<br>क्षरन्ति सर्वदानानि यज्ञदानतपःक्रियाः॥ ५५<br>न क्षरेत् तु तपस्तप्तं भृगुतीर्थे युधिष्ठिर।<br>यस्य वै तपसोग्रेण तुष्टेनैव तु शम्भुना॥ ५६<br>सांनिध्यं तत्र कथितं भृगुतीर्थे नराधिप।<br>प्रख्यातं त्रिषु लोकेषु यत्र तुष्टो महेश्वरः॥ ५७<br>एवं तु वदतो देवीं भृगुतीर्थमनुत्तमम्।<br>न जानन्ति नरा मूढा विष्णुमायाविमोहिताः॥ ५८<br>नर्मदायां स्थितं दिव्यं भृगुतीर्थं नराधिप।<br>भृगुतीर्थस्य माहात्म्यं यः शृणोति नरः क्वचित्॥ ५९<br>विमुक्तः सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति। | देता है, उसका वह दिया हुआ दान अक्षय हो जाता है। चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय अमरकण्टकमें जो फल प्राप्त होता है, वही सम्पूर्ण पुण्य निःसंदेह भृगुतीर्थमें सुलभ हो जाता है। युधिष्ठिर! सभी प्रकारके दान तथा यज्ञ, तप और कर्म—ये सभी नष्ट हो जाते हैं, किंतु भृगुतीर्थमें किया गया तप नष्ट नहीं होता। नराधिप! उस भृगुकी उग्र तपस्यासे संतुष्ट हुए शम्भुने उस भृगुतीर्थमें अपनी नित्य उपस्थिति बतलायी है, इसलिये वह भृगुतीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है; क्योंकि वहाँ महेश्वर संतुष्ट हुए थे। नराधिप! इस प्रकार महेश्वरने पार्वतीसे श्रेष्ठ भृगुतीर्थके विषयमें कहा है, किंतु विष्णुकी मायासे मोहित हुए मूढ़ मनुष्य नर्मदामें स्थित इस दिव्य भृगुतीर्थको नहीं जानते। जो मनुष्य कहीं भी भृगुतीर्थका माहात्म्य सुनता है, वह सभी पापोंसे विमुक्त होकर रुद्रलोकको जाता है॥ ४८—५९ १/२ ॥ |
| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र गौतमेश्वरमुत्तमम्॥ ६०<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन्नुपवासपरायणः।<br>काञ्चनेन विमानेन ब्रह्मलोके महीयते॥ ६१ | राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ गौतमेश्वर तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ स्नानकर उपवास करनेवाला मनुष्य सुवर्णमय विमानसे ब्रह्मलोकमें जाकर पूजित होता है। |
| धौतपापं ततो गच्छेत् क्षेत्रं यत्र वृषेण तु।<br>नर्मदायां कृतं राजन् सर्वपातकनाशनम्॥ ६२<br>तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा ब्रह्महत्यां विमुञ्चति।<br>तस्मिंस्तीर्थे तु राजेन्द्र प्राणत्यागं करोति यः॥ ६३<br>चतुर्भुजस्त्रिनेत्रश्च शिवतुल्यबलो भवेत्।<br>वसेत् कल्पायुतं साग्रं शिवतुल्यपराक्रमः॥ ६४<br>कालेन महता प्राप्तः पृथिव्यामेकराड् भवेत्। | राजन्! तदनन्तर धौतपाप नामक क्षेत्रकी यात्रा करनी चाहिये। स्वयं नन्दीने नर्मदामें इस क्षेत्रका निर्माण किया था, जो सभी पातकोंका नाशक है। उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य ब्रह्महत्यासे विमुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जो प्राण-त्याग करता है, वह चार भुजा और तीन नेत्रोंसे युक्त हो शिवके समान बलशाली हो जाता है और शिवके समान पराक्रमी होकर दस सहस्र कल्पोंसे भी अधिक कालतक स्वर्गमें निवास करता है। बहुत कालके बाद पृथ्वीपर आनेपर वह एकच्छत्र राजा होता है। |
| ततो गच्छेच्च राजेन्द्र ऐरण्डीतीर्थमुत्तमम्॥ ६५<br>प्रयागे यत् फलं दृष्टं मार्कण्डेयेन भाषितम्।<br>तत् फलं लभते राजन् स्नातमात्रो हि मानवः॥ ६६ | राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ ऐरण्डीतीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! मार्कण्डेयजीके द्वारा प्रयागमें जो पुण्य बतलाया गया है, वही पुण्य वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्यको सुलभ हो जाता है। |
| मासि भाद्रपदे चैव शुक्लपक्षे चतुर्दशी।<br>उपोष्या रजनीमेकां तस्मिन् स्नानं समाचरेत्।<br>यमदूतैर्न बाध्येत रुद्रलोकं स गच्छति॥ ६७ | जो भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्दशी तिथिको एक रात उपवास कर वहाँ स्नान करता है, उसे यमदूत पीड़ित नहीं करते और वह रुद्रलोकको जाता है। |
| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र सिद्धो यत्र जनार्दनः।<br>हिरण्यद्वीपविख्यातं सर्वपापप्रणाशनम्॥ ६८ | राजेन्द्र! तदुपरान्त सभी पापोंको नष्ट करनेवाले हिरण्यद्वीप नामसे विख्यात तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ भगवान् जनार्दनने |
१९६- प्रवरानुकीर्तनमें महर्षि अङ्गिराके वंशका वर्णन
- अध्याय १९३ *
८९१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्र स्नात्वा नरो राजन् धनवान् रूपवान् भवेत्।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तीर्थं कनखलं महत्॥ ६९<br>गरुडेन तपस्तप्तं तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>प्रख्यातं त्रिषु लोकेषु योगिनी तत्र तिष्ठति॥ ७०<br>क्रीडते योगिभिः सार्धं शिवेन सह नृत्यति।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् रुद्रलोके महीयते॥ ७१ | सिद्धि प्राप्त की थी। राजन्! वहाँ स्नान कर मानव धनवान् और रूपवान् हो जाता है। राजेन्द्र! इसके बाद महान् कनखलतीर्थकी यात्रा करे। नराधिप! उस तीर्थमें गरुडने तपस्या की थी। वह तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। वहाँ योगिनी रहती है, जो योगियोंके साथ क्रीडा और शिवके साथ नृत्य करती है। राजन्! वहाँ स्नान कर मनुष्य रुद्रलोकमें पूजित होता है॥ ६०–७१॥ |
| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र हंसतीर्थमनुत्तमम्।<br>हंसास्तत्र विनिर्मुक्ता गता ऊर्ध्वं न संशयः॥ ७२<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र सिद्धो यत्र जनार्दनः।<br>वाराहं रूपमास्थाय अर्चितः परमेश्वरः॥ ७३<br>वराहतीर्थे नरः स्नात्वा द्वादश्यां तु विशेषतः।<br>विष्णुलोकमवाप्नोति नरकं न च पश्यति॥ ७४<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र चन्द्रतीर्थमनुत्तमम्।<br>पौर्णमास्यां विशेषेण स्नानं तत्र समाचरेत्॥ ७५<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र चन्द्रलोके महीयते।<br>दक्षिणेन तु द्वारेण कन्यातीर्थं तु विश्रुतम्॥ ७६<br>शुक्लपक्षे तृतीयायां स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>प्रणिपत्य तु चेशानं बलिस्तेन प्रसीदति॥ ७७<br>हरिश्चन्द्रपुरं दिव्यमन्तरिक्षे च दृश्यते।<br>शक्रध्वजे समावृत्ते सुप्ते नागरिकेजने॥ ७८<br>नर्मदा सलिलौघेन तरून् सम्प्लावयिष्यति।<br>अस्मिन् स्थाने निवासः स्याद्विष्णुः शंकरमब्रवीत्॥ ७९<br>द्वीपेश्वरे नरः स्नात्वा लभेद् बहु सुवर्णकम्। | राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम हंसतीर्थमें जाय। वहाँ हंस-समूह पापसे विनिर्मुक्त होकर निःसंदेह स्वर्गको चले गये थे। राजेन्द्र! तत्पश्चात् वाराहतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये, जहाँ भगवान् जनार्दन सिद्ध हुए थे। वहाँ वाराहरूपधारी परमेश्वरकी पूजा हुई थी। उस वाराहतीर्थमें विशेषकर द्वादशी तिथिको स्नान कर मनुष्य विष्णुलोकको प्राप्त करता है और उसे नरकका दर्शन नहीं करना पड़ता। राजेन्द्र! तदुपरान्त श्रेष्ठ चन्द्रतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ विशेषकर पूर्णिमा तिथिको स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य चन्द्रलोकमें पूजित होता है। उसके दक्षिण द्वारपर विख्यात कन्यातीर्थ है। वहाँ शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको स्नान करना चाहिये। वहाँ शिवजीको प्रणाम करके उन्हें बलि प्रदान करनेसे वे प्रसन्न हो जाते हैं। वहाँ हरिशयनके समय इन्द्रध्वजके निकलनेपर अन्तरिक्षमें दिव्य हरिश्चन्द्रपुर दिखायी देता है। जब नर्मदा जलसमूहसे वृक्षोंको आप्लावित कर देगी, उस समय इस स्थानमें विष्णुका निवास होगा—ऐसा विष्णुने शंकरसे कहा है। द्वीपेश्वरतीर्थमें स्नान कर मनुष्य सुवर्णराशिको प्राप्त करता है॥ ७२–७९ ½॥ |
| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र कन्यातीर्थे सुसंगमे॥ ८०<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र देव्याः स्थानमवाप्नुयात्।<br>देवतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वतीर्थमनुत्तमम्॥ ८१<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र देवैः सह मोदते।<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र शिखितीर्थमनुत्तमम्॥ ८२<br>यत् तत्र दीयते दानं सर्वं कोटिगुणं भवेत्।<br>अपरपक्षे त्वमायां तु स्नानं तत्र समाचरेत्॥ ८३ | राजेन्द्र! इसके बाद कन्यातीर्थके सुन्दर संगमस्थानकी यात्रा करे। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य देवीके स्थानको प्राप्त करता है। तदनन्तर सभी तीर्थोंमें उत्तम देवतीर्थमें जाना चाहिये। राजेन्द्र! वहाँ स्नान कर मनुष्य देवताओंके साथ आनन्दका अनुभव करता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ शिखितीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ अमावस्या तिथिके तीसरे पहरमें स्नान करनेका विधान है। वहाँ जो कुछ भी दान दिया जाता है, वह सब, करोड़गुना हो जाता है। |
| ८१२ | * मत्स्यपुराण * |
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| ब्राह्मणं भोजयेदेकं कोटिर्भवति भोजिता।<br>भृगुतीर्थे तु राजेन्द्र तीर्थकोटिर्व्यवस्थिता॥ ८४<br>अकामो वा सकामो वा तत्र स्नानं समाचरेत् ।<br>अश्वमेधमवाप्नोति दैवतैः सह मोदते ॥ ८५<br>तत्र सिद्धिं परां प्राप्तो भृगुस्तु मुनिपुङ्गवः ।<br>अवतारः कृतस्तत्र शंकरेण महात्मना ॥ ८६ | वहाँ एक ब्राह्मणको भोजन करानेपर करोड़ ब्राह्मणोंके भोजन करानेका फल होता है। राजेन्द्र! भृगुतीर्थमें करोड़ों तीर्थोंकी स्थिति है। वहाँ निष्काम या सकाम होकर भी स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्यको अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है और वह देवताओंके साथ आनन्दका अनुभव करता है। वहाँ मुनिश्रेष्ठ भृगुने परम सिद्धि प्राप्त की थी और महात्मा शंकर अवतीर्ण हुए थे॥ ८०–८६॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नर्मदामाहात्म्य-वर्णन नामक एक सौ तिरानवेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९३॥
एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय
नर्मदातटवर्ती तीर्थोंका माहात्म्य
| मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजीने कहा— |
|---|---|
| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र ह्यङ्कुशेश्वरमुत्तमम्।<br>दर्शनात् तस्य देवस्य मुच्यते सर्वपातकैः॥ १<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र नर्मदेश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् स्वर्गलोके महीयते॥ २<br>अश्वतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>सुभगो दर्शनीयश्च भोगवाञ्जायते नरः॥ ३<br>पैतामहं ततो गच्छेद् ब्रह्मणा निर्मितं पुरा।<br>तत्र स्नात्वा नरो भक्त्या पितृपिण्डं तु दापयेत्॥ ४<br>तिलदर्भविमिश्रं तु ह्युदकं तत्र दापयेत्।<br>तस्य तीर्थप्रभावेण सर्वं भवति चाक्षयम्॥ ५<br>सावित्रीतीर्थमासाद्य यस्तु स्नानं समाचरेत्।<br>विधूय सर्वपापानि ब्रह्मलोके महीयते॥ ६<br>मनोहरं ततो गच्छेत् तीर्थं परमशोभनम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् पितृलोके महीयते॥ ७<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र मानसं तीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् रुद्रलोके महीयते॥ ८<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र कुञ्जतीर्थमनुत्तमम्।<br>विख्यातं त्रिषु लोकेषु सर्वपापप्रणाशनम्॥ ९<br>यान् यान् कामयते कामान् पशुपुत्रधनानि च।<br>प्राप्नुयात् तानि सर्वाणि तत्र स्नात्वा नराधिप॥ १० | राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ अङ्कुशेश्वरतीर्थकी यात्रा करे, जहाँ उन देवके दर्शन-मात्रसे मनुष्य सभी पापोंसे छुटकारा पा जाता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ नर्मदेश्वरतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। राजन्! वहाँ स्नानकर मनुष्य स्वर्गलोकमें पूजित होता है। तदुपारन्त अश्वतीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। ऐसा करनेसे मनुष्य सौभाग्यशाली, दर्शनीय और रूपवान् हो जाता है। इसके बाद प्राचीनकालमें ब्रह्माद्वारा निर्मित पैतामहतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ स्नानकर भक्तिपूर्वक पितरोंको पिण्डदान करे तथा तिल और कुशसे युक्त तर्पण करे; क्योंकि उस तीर्थके प्रभावसे वहाँ किया गया यह सब अक्षय हो जाता है। जो सावित्रीतीर्थमें जाकर स्नान करता है, वह अपने सभी पापोंको धोकर ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। राजन्! तदनन्तर अतिशय रमणीय मनोहर-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ स्नानकर मनुष्य पितृलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ मानसतीर्थमें जाय। राजन्! वहाँ स्नानकर मनुष्य रुद्रलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! तदुपारन्त श्रेष्ठ कुञ्जतीर्थकी यात्रा करे। तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध यह तीर्थ सभी पापोंका नाशक है। नराधिप! मनुष्य, पशु, पुत्र, धन आदि जिन-जिन वस्तुओंकी कामना करता है, वह सब उसे वहाँ स्नान करनेसे प्राप्त हो जाता है॥ १–१०॥ |
- अध्याय १९४ *
८१३
| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र त्रिदशज्योतिविश्रुतम्।<br>यत्र ता ऋषिकन्यास्तु तपोऽतप्यन्त सुव्रताः ॥ ११<br><br>भर्ता भवतु सर्वासामीश्वरः प्रभुरव्ययः।<br>प्रीतस्तासां महादेवो दण्डरूपधरो हरः ॥ १२<br><br>विकृताननबीभत्सुर्व्रती तीर्थमुपागतः।<br>तत्र कन्या महाराज वरयत् परमेश्वरः ॥ १३<br><br>कन्या ऋषेर्वरयतः कन्यादानं प्रदीयताम्।<br>तीर्थं तत्र महाराज ऋषिकन्येति विश्रुतम् ॥ १४<br><br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् सर्वपापैः प्रमुच्यते।<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र स्वर्णविन्दु त्विति स्मृतम् ॥ १५<br><br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् दुर्गतिं न च पश्यति।<br>अप्सरेशं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत् ॥ १६<br><br>क्रीडते नागलोकस्थोऽप्सरोभिः सह मोदते।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र नरके तीर्थमुत्तमम् ॥ १७<br><br>तत्र स्नात्वार्चयेद् देवं नरकं च न पश्यति। | राजेन्द्र ! इसके बाद प्रसिद्ध त्रिदशज्योतितीर्थकी यात्रा करनी चाहिये, जहाँ उत्तम व्रत धारण करनेवाली उन ऋषि-कन्याओंने तपस्या की थी। उनकी अभिलाषा थी कि अविनाशी एवं सामर्थ्यशाली महेश्वर हम सभीके पति हों। तब उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर संहारकारी महादेव, जिनका मुख विकृत और शरीर घृणास्पद था तथा जो उत्तम व्रतमें लीन थे, दण्ड धारणकर उस तीर्थमें आये। महाराज! वहाँ शंकरजीने उन कन्याओंका वरण किया। महाराज! वहाँ शंकरजीने ऋषिकन्याओंका वरण किया था, अतः वह स्थान ऋषिकन्या नामसे विख्यात तीर्थ हुआ। यहाँ कन्यादान करना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! तदनन्तर स्वर्णबिन्दु नामक प्रसिद्ध तीर्थमें जाय। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्यको दुर्गति नहीं देखनी पड़ती। तत्पश्चात् अप्सरेशतीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नान करनेवाला नागलोकमें अप्सराओंके साथ आनन्दका अनुभव करता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त नरक नामक श्रेष्ठ तीर्थकी यात्रा करे। वहाँ स्नानकर महादेवजीकी पूजा करे तो नरक नहीं देखना पड़ता ॥ ११-१७ १/२ ॥ |
| भारभूतिं ततो गच्छेदुपवासपरो जनः ॥ १८<br><br>एतत् तीर्थं समासाद्य चावतारं तु शाम्भवम्।<br>अर्चयित्वा विरूपाक्षं रुद्रलोके महीयते ॥ १९<br><br>अस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा भारभूतौ महात्मनः।<br>यत्र तत्र मृतस्यापि ध्रुवं गाणेश्वरी गतिः ॥ २०<br><br>कार्तिकस्य तु मासस्य ह्यर्चयित्वा महेश्वरम्।<br>अश्वमेधाद् दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ २१<br><br>दीपकानां शतं तत्र घृतपूर्णं तु दापयेत्।<br>विमानैः सूर्यसंकाशैर्व्रजते यत्र शंकरः ॥ २२<br><br>वृषभं यः प्रयच्छेत् तु शङ्खकुन्देन्दुसप्रभम्।<br>वृषयुक्तेन यानेन रुद्रलोकं स गच्छति ॥ २३<br><br>धेनुमेकां तु यो दद्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>पायसं मधुसंयुक्तं भक्ष्याणि विविधानि च ॥ २४ | इसके बाद भारभूतितीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। इस तीर्थमें आकर मनुष्य उपवासपूर्वक शम्भूके अवतार विरूपाक्षकी अर्चना करके रुद्रलोकमें पूजित होता है। महात्मा शंकरके इस भारभूतितीर्थमें स्नानकर मनुष्य जहाँ-कहीं भी मरता है तो उसे निश्चय ही गणोंके अध्यक्षकी गति प्राप्त होती है। कार्तिकमासमें यहाँ महेश्वरकी पूजा करनेसे अश्वमेधयज्ञसे दसगुना फल प्राप्त होता है—ऐसा विद्वानोंने कहा है। जो वहाँ घृतपूर्ण सौ दीपक जलाता है, वह सूर्यके समान देदीप्यमान विमानोंसे शंकरजीके निकट चला जाता है। जो वहाँ शङ्ख, कुन्द-पुष्प एवं चन्द्रमाके समान उज्ज्वल रंगके वृषभका दान करता है, वह वृषयुक्त विमानसे रुद्रलोकको जाता है। नराधिप! उस तीर्थमें जो एक धेनुका दान देता है और यथाशक्ति मधुसंयुक्त खीर एवं विविध भोज्य पदार्थ ब्राह्मणोंको खिलाता है, |
८९४ * मत्स्यपुराण *
| यथाशक्त्या च राजेन्द्र ब्राह्मणान् भोजयेत् ततः।<br>तस्य तीर्थप्रभावेण सर्वं कोटिगुणं भवेत्॥ २५<br>नर्मदाया जलं पीत्वा ह्यर्चयित्वा वृषध्वजम्।<br>दुर्गतिं च न पश्यन्ति तस्य तीर्थप्रभावतः॥ २६<br>एतत् तीर्थं समासाद्य यस्तु प्राणान् विमुञ्चति।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो व्रजेद् वै यत्र शंकरः।<br>जलप्रवेशं यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप॥ २७<br>हंसयुक्तेन यानेन रुद्रलोकं स गच्छति।<br>यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च हिमवांश्च महोदधिः॥ २८<br>गङ्गाद्याः सरितो यावत् तावत् स्वर्गे महीयते।<br>अनाशकं तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप॥ २९<br>गर्भवासे तु राजेन्द्र न पुनर्जायते पुमान्।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र आषाढीतीर्थमुत्तमम्॥ ३० | राजेन्द्र! उसका वह सभी कर्म उस तीर्थके प्रभावसे करोड़गुना हो जाता है। जो लोग नर्मदाका जल पीकर शिवजीकी पूजा करते हैं, उन्हें उस तीर्थके प्रभावसे दुर्गति नहीं देखनी पड़ती। जो इस तीर्थमें आकर प्राणोंका त्याग करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर शंकरजीके समीप चला जाता है। नराधिप! उस तीर्थमें जो जलमें प्रवेश (करके प्राण-त्याग) करता है, वह हंसयुक्त विमानसे रुद्रलोकको जाता है तथा जबतक चन्द्रमा, सूर्य, हिमालय, महासागर और गङ्गा आदि नदियाँ हैं, तबतक स्वर्गमें पूजित होता है। नराधिप! जो पुरुष उस तीर्थमें अनशन करता है, राजेन्द्र! वह पुनः गर्भमें वास नहीं करता॥१८—२९ ½॥ |
| तत्र स्नात्वा नरो राजन्निन्द्रस्यार्धासनं लभेत्।<br>स्त्रियास्तीर्थं ततो गच्छेत्सर्वपापप्रणाशनम्॥ ३१<br>तत्रापि स्नातमात्रस्य ध्रुवं गाणेश्वरी गतिः।<br>ऐरण्डीनर्मदयोश्च संगमं लोकविश्रुतम्॥ ३२<br>तच्च तीर्थं महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्।<br>उपवासपरो भूत्वा नित्यव्रतपरायणः॥ ३३<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र मुच्यते ब्रह्महत्यया।<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र नर्मदोदधिसंगमम्॥ ३४<br>जामदग्न्यमिति ख्यातं सिद्धो यत्र जनार्दनः।<br>यत्रेष्ट्वा बहुभिर्यज्ञैरिन्द्रो देवाधिपोऽभवत्॥ ३५<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र नर्मदोदधिसंगमे।<br>त्रिगुणं चाश्वमेधस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ३६<br>पश्चिमस्योदधेः संधौ स्वर्गद्वारविघट्टनम्।<br>तत्र देवाः सगन्धर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः॥ ३७<br>आराधयन्ति देवेशं त्रिसंध्यं विमलेश्वरम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् रुद्रलोके महीयते॥ ३८<br>विमलेशात् परं तीर्थं न भूतं न भविष्यति।<br>तत्रोपवासं कृत्वा ये पश्यन्ति विमलेश्वरम्॥ ३९<br>सप्तजन्मकृतं पापं हित्वा यान्ति शिवालयम्। | राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ आषाढ़ीतीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य इन्द्रके आधे आसनको प्राप्त कर लेता है। तत्पश्चात् सभी पापोंके विनाशक स्त्री-तीर्थमें जाय। वहाँ भी स्नानमात्रसे निश्चय ही गाणेश्वरी गति प्राप्त होती है। ऐरण्डी और नर्मदाका संगम लोकप्रसिद्ध तीर्थ है, वह अतिशय पुण्यदायक तथा सभी पापोंका विनाश करनेवाला है। राजेन्द्र! वहाँ उपवास और नित्य व्रतोंका सम्पादन करते हुए स्नान करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त नर्मदा और समुद्रके संगमपर जाना चाहिये, जो जामदग्न्य नामसे प्रसिद्ध है। इसी तीर्थमें जनार्दनको सिद्धि प्राप्त हुई थी तथा इन्द्र अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान कर देवताओंके अधीश्वर हुए। राजेन्द्र! उस नर्मदा और सागरके सङ्गममें स्नान कर मनुष्य अश्वमेधयज्ञसे तिगुना फल प्राप्त करता है। पश्चिम समुद्रके संधि-स्थानपर स्वर्गद्वारविघट्टन तीर्थ है, वहाँ देवता, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध और चारण तीनों संध्याओंमें विमलेश्वर महादेवकी आराधना करते हैं। राजन्! वहाँ स्नानकर मानव रुद्रलोकमें पूजित होता है। विमलेश्वरसे बढ़कर तीर्थ न हुआ है और न होगा। उस तीर्थमें उपवास कर जो विमलेश्वरका दर्शन करते हैं, वे सात जन्मोंके पापोंसे मुक्त होकर शिवपुरीमें जाते हैं॥३०—३९ ½॥ |
१९७- महर्षि अत्रिके वंशका वर्णन
| * अध्याय १९४ * | ८१५ |
|---|
| ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र कौशिकीतीर्थमुत्तमम् ॥ ४०<br><br>तत्र स्नात्वा नरो राजन्नुपवासपरायणः ।<br>उपोष्य रजनीमेकां नियतो नियताशनः ॥ ४१<br><br>एतत्तीर्थप्रभावेण मुच्यते ब्रह्महत्यया ।<br>सर्वतीर्थाभिषेकं तु यः पश्येत् सागरेश्वरम् ॥ ४२<br><br>योजनाभ्यन्तरे तिष्ठन्नावर्ते संस्थितः शिवः ।<br>तं दृष्ट्वा सर्वतीर्थानि दृष्टान्येव न संशयः ॥ ४३<br><br>सर्वपापविनिर्मुक्तो यत्र रुद्रः स गच्छति ।<br>नर्मदासंगमं यावद् यावच्चामरकण्टकम् ॥ ४४<br><br>अत्रान्तरे महाराज तीर्थकोट्यो दश स्मृताः ।<br>तीर्थात्तीर्थान्तरं यत्र ऋषिकोटिनिषेवितम् ॥ ४५<br><br>साग्निहोत्रैस्तु विद्वद्भिः सर्वैर्ध्यानपरायणैः ।<br>सेविनानेन राजेन्द्र त्वीप्सितार्थप्रदायिका ॥ ४६<br><br>यस्त्विदं वै पठेन्नित्यं शृणुयाद् वापि भावतः ।<br>तस्य तीर्थानि सर्वाणि ह्यभिषिञ्चन्ति पाण्डव ॥ ४७<br><br>नर्मदा च सदा प्रीता भवेद् वै नात्र संशयः ।<br>प्रीतस्तस्य भवेद् रुद्रो मार्कण्डेयो महामुनिः ॥ ४८<br><br>वन्ध्या चैव लभेत् पुत्रान् दुर्भगा सुभगा भवेत् ।<br>कन्या लभेत भर्तारं यश्च वाञ्छेत् तु यत्फलम् ।<br>तदेव लभते सर्वं नात्र कार्या विचारणा ॥ ४९<br><br>ब्राह्मणो वेदमाप्नोति क्षत्रियो विजयी भवेत् ।<br>वैश्यस्तु लभते लाभं शूद्रः प्राप्नोति सद्गतिम् ॥ ५०<br><br>मूर्खस्तु लभते विद्यां त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः ।<br>नरकं च न पश्येत् तु वियोगं च न गच्छति ॥ ५१ | राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ कौशिकीतीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ उपवासपूर्वक स्नान करने और नियमित भोजन करके एक रात निवास करनेसे मनुष्य इस तीर्थके प्रभावसे ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जाता है। जो सागरेश्वरका दर्शन करता है, उसे सभी तीर्थोंके अभिषेकका फल प्राप्त हो जाता है। वहाँसे एक योजनके भीतर वर्तुलस्थानमें शिवजी संस्थित हैं, अतः उनका दर्शन कर लेनेसे सभी तीर्थोंका दर्शन हो जाता है—इसमें संशय नहीं है। वह मानव सभी पापोंसे मुक्त होकर जहाँ रुद्र रहते हैं, वहाँ चला जाता है। महाराज! नर्मदा-सङ्गमसे लेकर अमरकण्टकके मध्यमें दस करोड तीर्थ बतलाये जाते हैं। वहाँ एक तीर्थसे दूसरे तीर्थके मध्यमें करोड़ों ऋषिगण निवास करते हैं। राजेन्द्र! सभी ध्यानपरायण अग्निहोत्री विद्वानोंद्वारा सेवित यह तीर्थ-परम्परा अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली है। पाण्डव! जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इन तीर्थोंका पाठ करता है या श्रवण करता है, उसे सभी तीर्थोंमें अभिषेक करनेका फल प्राप्त होता है और उसपर नर्मदा सदा प्रसन्न होती है—इसमें संदेह नहीं है। साथ ही उसपर महामुनि मार्कण्डेय एवं रुद्र प्रसन्न होते हैं। (इस तीर्थके प्रभावसे) वन्ध्याको पुत्रकी प्राप्ति होती है, अभागिनी सौभाग्यवती हो जाती है, कन्या पतिको प्राप्त करती है तथा अन्य जो कोई जिस फलको चाहता है, उसे वह सब फल प्राप्त हो जाता है—इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। ब्राह्मण वेदका ज्ञान प्राप्त करता है, क्षत्रिय विजयी होता है, वैश्य धन प्राप्त करता है और शूद्रको अच्छी गति प्राप्त होती है तथा मूर्ख विद्याको प्राप्त करता है। जो मनुष्य तीनों संध्याओंमें इसका पाठ करता है उसे न तो नरकका दर्शन होता है और न प्रियजनोंका वियोग ही प्राप्त होता है॥ ४०–५१ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्यं नाम चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नर्मदामाहात्म्य-वर्णन नामक एक सौ चौरानवेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९४॥
१९८- प्रवरानुकीर्तनमें महर्षि विश्वामित्रके वंशका वर्णन
| ८१६ | * मत्स्यपुराण * |
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एक सौ पञ्चानबेवाँ अध्याय
गोत्रप्रवर-निरूपण*-प्रसङ्गमें भृगुवंशकी परम्पराका विवरण
| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इस प्रकार ओंकारका |
| इत्याकर्ण्य स राजेन्द्र ओंकारस्याभिवर्णनम्। | वर्णन सुननेके पश्चात् राजेन्द्र मनुने उस जलार्णवमें |
| ततः पप्रच्छ देवेशं मत्स्यरूपं जलार्णवे॥ १ | स्थित मत्स्यरूपी देवेश विष्णुसे पुनः (इस प्रकार) प्रश्न किया॥ १॥ |
| मनुरुवाच | **मनुजीने पूछा—**प्रभो! ऋषियोंके नाम, गोत्र, वंश, |
| ऋषीणां नाम गोत्राणि वंशावतरणं तथा। | अवतार तथा प्रवरोंकी समता और विषमता—इन |
| प्रवराणां तथा साम्यमसाम्यं विस्तराद् वद॥ २ | विषयोंका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। स्वायम्भुव- |
| महादेवेन ऋषयः शप्ताः स्वायम्भुवान्तरे। | मन्वन्तरमें महादेवजीने ऋषियोंको शाप दिया था, अतः |
| तेषां वैवस्वते प्राप्ते सम्भवं मम कीर्तय॥ ३ | वैवस्वतमन्वन्तरमें उनकी पुनः उत्पत्ति कैसे हुई? यह मुझे बतलाइये। साथ ही दक्ष प्रजापतिकी संतानोंसे |
| दाक्षायणीनां च तथा प्रजाः कीर्तय मे प्रभो। | उत्पन्न प्रजाओंका, ऋषियोंके वंशका तथा भृगुवंशके |
| ऋणीणां च तथा वंशं भृगुवंशविवर्धनम्॥ ४ | विस्तारका वर्णन कीजिये॥ २—४॥ |
| मत्स्य उवाच | **मत्स्यभगवान् बोले—**राजन्! अब मैं पूर्वकालमें |
| मन्वन्तरेऽस्मिन् सम्प्राप्ते पूर्वं वैवस्वते तथा। | वैवस्वत-मन्वन्तरके प्राप्त होनेपर जो परमेष्ठी ब्रह्मा थे, |
| चरित्रं कथ्यते राजन् ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥ ५ | उनका चरित्र बतला रहा हूँ। महादेवजीके शापसे अपने |
| महादेवस्य शापेन त्यक्त्वा देहं स्वयं तथा। | शरीरका परित्याग कर ऋषिगण महात्मा ब्रह्माद्वारा अग्निसे |
| ऋषयश्च समुद्भूता हुते शुक्रे महात्मना॥ ६ | उत्पन्न हुए। उसी अग्निसे परम तेजस्वी तपोनिधि भृगु |
| देवानां मातरो दृष्ट्वा देवपत्न्यस्तथैव च। | उत्पन्न हुए। अङ्गारोंसे अङ्गिरा, शिखाओंसे अत्रि और |
| स्कन्नं शुक्रं महाराज ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥ ७ | किरणोंसे महातपस्वी मरीचि उत्पन्न हुए। केशोंसे कपिश |
| तज्जुहाव ततो ब्रह्मा ततो जाता हुताशनात्। | रंगवाले महातपस्वी पुलस्त्य प्रकट हुए। तत्पश्चात् |
| ततो जातो महातेजा भृगुश्च तपसां निधिः॥ ८ | लम्बे केशोंसे महातपस्वी पुलहने जन्म लिया। अग्निकी |
| अङ्गारैष्ष्वङ्गिरा जातो ह्यर्चिभ्योऽत्रिस्तथैव च। | दीप्तिसे तपोनिधि वसिष्ठ उत्पन्न हुए। महर्षि भृगुने |
| मरीचिभ्यो मरीचिस्तु ततो जातो महातपाः॥ ९ | पुलोमा ऋषिकी दिव्य पुत्रीको भार्यारूपमें ग्रहण किया। |
| केशैस्तु कपिशो जातः पुलस्त्यश्च महातपाः। | |
| केशैः प्रलम्बैः पुलहस्ततो जातो महातपाः॥ १० | |
| वसुमध्यात् समुत्पन्नो वसिष्ठस्तु तपोधनः। | |
| भृगुः पुलोम्नस्तु सुतां दिव्यां भार्यामविन्दत॥ ११ | |
* गोत्र-प्रवर-निर्णयपर कई स्वतन्त्र निबन्ध हैं। पर वे सभी इन्हीं (१९५—२०३) अध्यायोंपर आदृत हैं। वैसे ऋक्संहिता (७। १८। ६—८। ३। ९ तक) तथा स्कन्दपुराण माहेश्वर खं० एवं ब्रह्मखण्डमें भी इसपर विस्तृत विचार है।
१९९- गोत्रप्रवर-कीर्तनमें महर्षि कश्यपके वंशका वर्णन
| * अध्याय १९५ * | ८१७ |
|---|---|
| तस्यामस्य सुता जाता देवा द्वादश याज्ञिकाः।<br>भुवनो भौवनश्चैव सुजन्यः सुजनस्तथा॥ १२<br>ऋतुर्वसुश्च मूर्धा च त्याज्यश्च वसुदश्च ह।<br>प्रभवश्चाव्ययश्चैव दक्षोऽथ द्वादशस्तथा॥ १३<br>इत्येते भृगवो नाम देवा द्वादश कीर्तिताः।<br>पौलोम्यां जनयद् विप्रान् देवानां तु कनीयसः॥ १४<br>च्यवनं तु महाभागमाप्नुवानं तथैव च।<br>आप्नुवानात्मजश्चौर्वो जमदग्निस्तदात्मजः॥ १५<br>और्वो गोत्रकरस्तेषां भार्गवाणां महात्मनाम्।<br>तत्र गोत्रकरान् वक्ष्ये भृगोर्वै दीप्ततेजसः॥ १६<br>भृगुश्च च्यवनश्चैव आप्नुवानस्तथैव च।<br>और्वश्च जमदग्निश्च वात्स्यो दण्डिर्नडायनः॥ १७<br>वैगायनो वीतिहव्यः पैलश्चात्र शौनकः।<br>शौनकायनजीवन्विरायेदः कार्षिणिस्तथा॥ १८<br>वैहीनरिर्विरूपाक्षो रौहित्यायनिरेव च।<br>वैश्वानरिस्तथा नीलो लुब्धः सावर्णिकश्च सः॥ १९<br>विष्णुः पौरोऽपि बालाकिरैलिकोऽनन्तभागिनः।<br>मृगमार्गेयमार्केण्डजविनो नीतिनस्तथा॥ २०<br>मण्डमाण्डव्यमाण्डूकफेनपाः स्तनितस्तथा।<br>स्थलपिण्डः शिखावर्णः शार्कराक्षिस्तथैव च॥ २१<br>जालधिः सौधिकः क्षुभ्यः कुत्सोऽन्यो मौद्गलायनः।<br>माङ्कायनो देवपतिः पाण्डुरोचिः सगालवः॥ २२<br>सांस्कृत्यश्चातकिः सर्पिर्यज्ञपिण्डायनस्तथा।<br>गार्ग्यायणो गायनश्च ऋषिर्गार्हायणस्तथा॥ २३<br>गोष्ठायनो वाह्रायनो वैशम्पायन एव च।<br>वैकणिर्निः शार्ङ्गरवो याज्ञेयिर्भ्राष्ट्रकायणिः॥ २४<br>लालाटिर्नाकुलिश्चैव लौक्षिण्योपरिमण्डलौ।<br>आलुकिः सौचकिः कौत्सस्तथान्यः पैङ्गलायनिः॥ २५<br>सात्यायनिर्मलयनिः कौटिलिः कौचहस्तिकः।<br>सौहः सोक्तिः सकौवाक्षिः कौसिश्चान्द्रमसिस्तथा॥ २६<br>नैकजिह्वो जिह्वकश्च व्याधाज्यो लौहवैरिणः।<br>शारद्वतिकनेतिष्यौ लोलाक्षिश्चलकुण्डलः॥ २७<br>वागायनिश्चानुमतिः पूर्णिमागतिकोऽसकृत्।<br>सामान्येन यथा तेषां पञ्चैते प्रवरा मताः॥ २८<br>भृगुश्च च्यवनश्चैव आप्नुवानस्तथैव च।<br>और्वश्च जमदग्निश्च पञ्चैते प्रवरा मताः॥ २९ | उस पत्नीसे उनके यज्ञ करनेवाले बारह देवतुल्य पुत्र उत्पन्न हुए। उनके नाम हैं—भुवन, भौवन, सुजन्य, सुजन, क्रतु, वसु, मूर्धा, त्याज्य, वसुद, प्रभव, अव्यय तथा बारहवें दक्ष। इस प्रकार ये बारह 'देवभृगु' नामसे विख्यात हैं। इसके बाद भृगुने पौलोमीके गर्भसे देवताओंसे कुछ निम्नकोटिके ब्राह्मणोंको उत्पन्न किया। उनके नाम हैं—महाभाग्यशाली च्यवन और आप्नुवान। आप्नुवानके पुत्र और्व हैं। और्वके पुत्र जमदग्नि हुए॥५—१५॥<br><br>और्व उन महात्मा भार्गवोंके गोत्र-प्रवर्तक हुए। अब मैं दीप्त तेजस्वी भृगुके गोत्र-प्रवर्तकोंका वर्णन कर रहा हूँ—भृगु, च्यवन, आप्नुवान, और्व, जमदग्नि, वात्स्य, दण्डि, नडायन, वैगायन, वीतिहव्य, पैल, शौनक, शौनकायन, जीवन्ति, आयेद, कार्षिणि, वैहिनरि, विरूपाक्ष, रौहित्यायनि, वैश्वानरि, नील, लुब्ध, सावर्णिक, विष्णु, पौर, बालाकि, ऐलिक, अनन्तभागिन, मृग, मार्गेय, मार्केण्ड, जबिन, नीतिन, मण्ड, माण्डव्य, माण्डूक, फेनप,, स्तनित, स्थलपिण्ड, शिखावर्ण, शार्कराक्षि, जालधि, सौधिक, क्षुभ्य, कुत्स, मौद्लायन, माङ्कायन, देवपति, पाण्डुरोचि, गालव, सांकृत्य, चातकि, सर्पि, यज्ञपिण्डायन, गार्ग्यायण, गायन, गार्हायण, गोष्ठायन, बाह्रायन, वैशम्पायन, वैकर्णिनि, शार्ङ्गरव, याज्ञेयि, भ्राष्ट्रकायणि, लालाटि, नाकुलि, लौक्षिण्य, उपरिमण्डल, आलुकि, सौचकि, कौत्स, पँगलायनि, सात्यायनि, मलयनि, कौटिलि, कौचहस्तिक, सौह, सोक्ति, सकौवाक्षि, कौसि, चान्द्रमसि, नैकजिह्व, जिह्वक, व्याधाज्य, लौहवैरिण, शारद्वतिक, नेतिष्य, लोलाक्षि, चलकुण्डल, वागायनि, आनुमति, पूर्णिमागतिक और असकृत्। साधारणरूपसे इन ऋषियोंमें ये पाँच प्रवर कहे जाते हैं—भृगु, च्यवन, आप्नुवान, और्व और जामदग्नि॥१६—२९॥ |
८९८ * मत्स्यपुराण *
| अतः परं प्रवक्ष्यामि शृणु त्वन्यान् भृगूद्वहान्।<br>जमदग्निर्बिदश्चैव पौलस्त्यो बैजभृत् तथा॥ ३०<br>ऋषिश्चोभयजातश्च कायनिः शाकटायनः।<br>और्वेया मारुताश्चैव सर्वेषां प्रवराः शुभाः॥ ३१ | इसके बाद भृगुवंशमें उत्पन्न अन्य ऋषियोंका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। जमदग्नि, बिद, पौलस्त्य, बैजभृत, उभयजात, कायनि, शाकटायन, और्वेय और मारुत। इनके तीन शुभ प्रवर हैं— |
| भृगुश्च च्यवनश्चैव आप्नुवानस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ३२ | भृगु, च्यवन और आप्नुवान। इन ऋषियोंमें परस्पर विवाहका निषेध है। |
| भृगुदासो मार्गपथो ग्राम्यायणिकटायनी।<br>आपस्तम्बिस्तथा बिल्विर्नैकशिः कपिरेव च॥ ३३<br>आष्टिषेणो गार्दभिश्च कार्दमायनिरेव च।<br>आश्वायनिस्तथा रूपिः पञ्चार्षेयाः प्रकीर्तिताः॥ ३४<br>भृगुश्च च्यवनश्चैव आप्नुवानस्तथैव च।<br>आष्टिषेणस्तथारूपिः प्रवराः पञ्च कीर्तिताः॥ ३५ | भृगुदास, मार्गपथ, ग्राम्यायणि,कटायनि, आपस्तम्बि, बिल्वि, नैकशि, कपि, आष्टिषेण, गार्दभि, कार्दमायनि, आश्वायनि तथा रूपि। इनके प्रवर ये पाँच हैं—भृगु, च्यवन, आप्नुवान, आष्टिषेण तथा रूपि। |
| परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>यस्को वा वीतिहव्यो वा मथितस्तु तथा दमः॥ ३६ | इन पाँच प्रवरवालोंमें भी विवाहकर्म निषिद्ध है। यस्क, वीतिहव्य, मथित, |
| जैवन्तायनिर्मौञ्जश्च पिलिश्चैव चलिस्तथा।<br>भागिलो भागवित्तिश्च कौशापिस्त्वथ काश्यपिः॥ ३७<br>बालपिः श्रमदागेपिः सौरस्तिथिस्तथैव च।<br>गार्गीयस्त्वथ जाबालिस्तथा पौष्णायनो ह्यृषिः॥ ३८<br>रामोदश्च तथैतेषामार्षेयाः प्रवरा मताः।<br>भृगुश्च वीतिहव्यश्च तथा रैवसवैवसौ॥ ३९ | दम, जैवन्तायनि, मौञ्ज, पिलि, चलि, भागिल, भागवित्ति, कौशापि, काश्यपि, बालपि, श्रमदागेपि, सौर, तिथि, गार्गीय, जाबालि, पौष्णायन और रामोद। इन वंशोंमें ये प्रवर हैं—भृगु, वीतिहव्य, रेवस और वैवस। इनमें भी परस्पर विवाह नहीं होते। |
| परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>शालायनिः शाकटाक्षो मैत्रेयः खाण्डवस्तथा॥ ४०<br>द्रौणायनो रौक्मायणिरापिशिश्चापिकायनिः।<br>हंसजिह्वस्तथैतेषां मार्षेयाः प्रवरा मताः॥ ४१ | शालायनि, शाकटाक्ष, मैत्रेय, खाण्डव, द्रौणायन, रौक्मायणि, आपिशि, आपिकायनि और हंसजिह्व। इनके प्रवर इन ऋषियोंके हैं— |
| भृगुश्चैवाथ वध्र्यश्वो दिवोदासस्तथैव च।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ४२ | भृगु, वध्र्यश्व और दिवोदास। इनमें भी परस्पर विवाह निषिद्ध है। |
| एकायनो यज्ञपतिर्मत्स्यगन्धस्तथैव च।<br>प्रत्यहश्च तथा सौरिश्चौक्षिश्चैवं कार्दमायनिः॥ ४३<br>तथा गृत्समदो राजन् सनकश्च महर्षिः।<br>प्रवरास्तु तथोक्तानामार्षेयाः परिकीर्तिताः॥ ४४ | राजन्! एकायन, यज्ञपति, मत्स्यगन्ध, प्रत्यह, सौरि, ओक्षि, कार्दमायनि, गृत्समद और महर्षि सनक। इन वंशोंके दो ऋषियोंके प्रवर हैं— |
| भृगुर्गृत्समदश्चैव आर्षेवेतौ प्रकीर्तितौ।<br>परस्परमवैवाह्या इत्येते परिकीर्तिताः॥ ४५ | भृगु तथा गृत्समद। इन वंशोंमें भी परस्पर विवाह निषिद्ध है। |
२००- गोत्रप्रवर-कीर्तनमें महर्षि वसिष्ठकी शाखाका कथन
* अध्याय १९६ * ८१९
| एते तवोक्ता भृगुवंशजाता<br>महानुभावा नृप गोत्रकाराः।<br>एषां तु नाम्ना परिकीर्तितेन<br>पापं समग्रं विजहाति जन्तुः॥ ४६ | राजन्! इस प्रकार मैंने आपसे भृगुवंशमें उत्पन्न महानुभाव गोत्रप्रवर्तक ऋषियोंका वर्णन कर दिया। इनके नामोंका कीर्तन करनेसे प्राणी सभी पापोंसे छुटकारा पा जाता है॥ ३०—४६॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे भृगुवंशप्रवरकीर्तनं नाम पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें भृगुवंशप्रवरवर्णन नामक एक सौ पञ्चानवेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९५॥
एक सौ छानबेवाँ अध्याय
प्रवरानुकीर्तनमें महर्षि अङ्गिराके वंशका वर्णन
| मत्स्य उवाच | |
|---|---|
| मरीचितनया राजन् सुरूपा नाम विश्रुता।<br>भार्या चाङ्गिरसो देवास्तस्याः पुत्रा दश स्मृताः॥ १<br>आत्मायुर्दमनो दक्षः सदः प्राणस्तथैव च।<br>हविष्मांश्च गविष्ठश्च ऋतः सत्यश्च ते दश॥ २<br>एते चाङ्गिरसो नाम देवा वै सोमपायिनः।<br>सुरूपा जनयामास ऋषीन् सर्वेश्वरानिमान्॥ ३<br>बृहस्पतिं गौतमं च संवर्तमृषिमुत्तमम्।<br>उतथ्यं वामदेवं च अजस्यमृषिंजं तथा॥ ४<br>इत्येते ऋषयः सर्वे गोत्रकाराः प्रकीर्तिताः।<br>तेषां गोत्रसमुत्पन्नान् गोत्रकारान् निबोध मे॥ ५<br>उतथ्यो गौतमश्चैव तौलेयोऽभिजितस्तथा।<br>सार्धनेमिः सलौगाक्षिः क्षीरः कौष्टिकिरेव च॥ ६<br>राहुकर्णिः सौपुरिश्च कैरातिः सामलोमकिः।<br>पौषाजितिर्भार्गवतो हृषिश्चैरीडवस्तथा॥ ७<br>कारोटकः सजीवी च उपबिन्दुसुरैषिणौ।<br>वाहिनीपतिवैशाली क्रोष्टा चैवारुणायनिः॥ ८<br>सोमोऽत्रायनिकासोरुकौशल्याः पार्थिवस्तथा।<br>रौहिण्यायनिरेवाग्नी मूलपः पाण्डुरेव च॥ ९<br>क्षपाविश्वकरोऽरिश्च पारिकारारिरेव च।<br>आर्षेयाः प्रवराश्चैव तेषां च प्रवराञ्शृणु॥ १०<br>अङ्गिराः सुवचोतथ्य उशिजश्च महर्षिः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ११ | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**राजन्! महर्षि मरीचिकी कन्या सुरूपा नामसे विख्यात थी। वह महर्षि अङ्गिराकी पत्नी थी। उसके दस देव-तुल्य पुत्र थे। उनके नाम हैं—आत्मा, आयु, दमन, दक्ष, सद, प्राण, हविष्मान्, गविष्ठ, ऋत और सत्य। ये दस अङ्गिराके पुत्र सोमरसके पान करनेवाले देवता माने गये हैं। सुरूपाने इन सर्वेश्वर ऋषियोंको उत्पन्न किया था। बृहस्पति, गौतम, ऋषिश्रेष्ठ संवर्त, उतथ्य, वामदेव, अजस्य तथा ऋषिज—ये सभी ऋषि गोत्रप्रवर्तक कहे गये हैं। अब इनके गोत्रोंमें उत्पन्न हुए गोत्रप्रवर्तकोंको मैं बतला रहा हूँ, सुनिये। उतथ्य, गौतम, तौलेय, अभिजित, सार्धनेमि, सलौगाक्षि, क्षीर, कौष्ठिकि, राहुकर्णि, सौपुरि, कैराति, सामलोमकि, पौषाजिति, भार्गवत, चैरीडव, कारोटक, सजीवी, उपबिन्दु, सुरैषिण, वाहिनीपति, वैशाली, क्रोष्टा, आरुणायनि, सोम, अत्रायनि, कासोरु, कौशल्य, पार्थिव, रौहिण्यायनि, रेवाग्नि, मूलप, पाण्डु, क्षपा, विश्वकर, अरि और पारिकारारि—ये सभी श्रेष्ठ ऋषि गोत्रप्रवर्तक हैं। अब इनके प्रवरोंको सुनिये—अङ्गिरा सुवचोतथ्य तथा महर्षि उशिज। इन ऋषियोंके वंशवाले आपसमें विवाह नहीं करते थे॥ १—११॥ |
८२० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत मूल (श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आत्रेयायणिंसौवेष्ट्यावग्निवेश्यः शिलास्थलिः।<br>बालिशायनिश्चैकेपी वाराहिर्बाष्कलिस्तथा॥ १२<br>सौटिश्च तृणकर्णिश्च प्रावहिश्वाश्वलायनिः।<br>वाराहिर्बर्हिसादी च शिखाग्रीविस्तथैव च॥ १३<br>कारकिश्च महाकापिस्तथा चोडुपतिः प्रभुः।<br>कौचकिर्धमितश्चैव पुष्पान्वेषिस्तथैव च॥ १४<br>सोमतन्विर्बृहत्तन्विः सालडिर्बालडिस्तथा।<br>देवरािर्देवस्थानिर्हारिकर्णिः सरिद्रुविः॥ १५<br>प्रावेपिः साद्यसुग्रीविस्तथा गोमेदगन्धिकः।<br>मत्स्याच्छाद्यो मूलहरः फलाहारस्तथैव च॥ १६<br>गाङ्गोदधिः कौरुपतिः कौरुक्षेत्रिस्तथैव च।<br>नायकिर्जैत्यद्रौणिश्च जैह्लायनिरेव च॥ १७<br>आपस्तम्बिर्मौञ्जवृष्टिर्मार्ष्टिपिङ्गलिरेव च।<br>पैलश्चैव महातेजाः शालङ्कायनिरेव च॥ १८<br>द्व्याख्येयो मारुतश्चैषां सर्वेषां प्रवरो नृप।<br>अङ्गिराः प्रथमस्तेषां द्वितीयश्च बृहस्पतिः॥ १९<br>तृतीयश्च भरद्वाजः प्रवराः परिकीर्तिताः।<br>परस्परमवैवाह्या इत्येते परिकीर्तिताः॥ २० | आत्रेयायणि, सौवेष्ट्य, अग्निवेश्य, शिलास्थलि, बालिशायनि, चैकेपी, वाराहि, बाष्कलि, सौटि, तृणकर्णि, प्रावहि, आश्वलायनि, वाराहि, बर्हिसादी, शिखाग्रीवि, कारकि, महाकापि, उडुपति, कौचकि, धमित, पुष्पान्वेषि, सोमतन्वि, बृहत्तन्वि, सालडि, बालडि, देवरािर, देवस्थानि, हारिकर्णि, सरिद्रुवि, प्रावेपि, साद्यसुग्रीवि, गोमेदगन्धिक, मत्स्याच्छाद्य, मूलहर, फलाहार, गाङ्गोदधि, कौरुपति, कौरुक्षेत्रि, नायकि, जैत्यद्रौणि, जैह्लायनि, आपस्तम्बि, मौञ्जवृष्टि, मार्ष्टिपिङ्गलि, महातेजस्वी पैल, शालङ्कायनि, द्व्याख्येय तथा मारुत। नृप! इन ऋषियोंके प्रवर प्रथम अङ्गिरा, दूसरे बृहस्पति तथा तीसरे भरद्वाज कहे गये हैं। इन गोत्रवालोंमें भी परस्पर विवाह-कर्म नहीं होते॥ १२—२०॥ |
| काणवायनाः कोपचयास्तथा वात्स्यतरायणाः।<br>भ्राष्ट्रकृद् राष्ट्रपिण्डी च लैन्द्राणिः सायकायनिः॥ २१<br>क्रोष्टाक्षी बहुवीती च तालकृन्मधुरावहः।<br>लावकृद् गालविद् गाथी मार्कटिः पौलिकायनिः॥ २२<br>स्कन्दसश्च तथा चक्री गार्ग्यः श्यामायनिस्तथा।<br>बलाकिः साहरिश्चैव पञ्चार्षेयाः प्रकीर्तिताः॥ २३<br>अङ्गिराश्च महातेजा देवाचार्यो बृहस्पतिः।<br>भरद्वाजस्तथा गर्गः सैत्यश्च भगवानृषिः॥ २४<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>कपीतरः स्वस्तितरो दाक्षिः शक्तिः पतञ्जलिः॥ २५<br>भूयसिर्जलसंधिश्च विन्दुर्मादिः कुसीदकिः।<br>ऊर्वस्तु राजकेशी च वौषडिः शंसपिस्तथा॥ २६<br>शालिश्च कलशीकण्ठ ऋषिः कारीरयस्तथा।<br>काट्यो धान्यायनिश्चैव भावास्यायनिरेव च॥ २७<br>भरद्वाजिः सौबुधिश्च लघ्वी देवमतिस्तथा।<br>त्र्यार्षेयोऽभिमतश्चैषां प्रवरो भूमिपोत्तम॥ २८ | काण्वायन, कोपचय, वात्स्यतरायण, भ्राष्ट्रकृत, राष्ट्रपिण्डी, लैन्द्राणि, सायकायनि, क्रोष्टाक्षी, बहुवीती, तालकृत, मधुरावह, लावकृत, गालवित्, गाथी, मार्कटि, पौलकायनि, स्कन्दस, चक्री, गार्ग्य, श्यामायनि, बलाकि तथा साहरि। इनके भी निम्नलिखित पाँच ऋषि प्रवर कहे गये हैं—महातेजस्वी अङ्गिरा, देवाचार्य बृहस्पति, भरद्वाज, गर्ग तथा ऐश्वर्यशाली महर्षि सैत्य। इनके वंशवालोंमें भी परस्पर विवाह नहीं होता। कपीतर, स्वस्तितर, दाक्षि, शक्ति, पतञ्जलि, भूयसि, जलसन्धि, विन्दु, मादि, कुसीदकि, ऊर्व, राजकेशी, वौषडि, शंसपि, शालि, कलशीकण्ठ, कारीरय, काट्य, धान्यायनि, भावास्यायनि, भरद्वाजि, सौबुधि, लघ्वी तथा देवमति। राजसत्तम! इन ऋषियोंके तीन |