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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 819 of 1098

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Page 819
  • अध्याय १९३ * | ८०९
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| परदारपरस्वरतं परपरिभवदुःखशोकसंतप्तम्।<br>परवदनवीक्षणपरं परमेश्वर मां परित्राहि॥ ४१<br><br>मिथ्याभिमानदग्धं क्षणभङ्गुरदेहविलसितं क्रूरम्।<br>कुपथ्याभिमुखं पतितं त्वं मां पापात् परित्राहि॥ ४२<br><br>दीने द्विजगणसार्थे बन्धुजनेनैव दूषिता ह्याशा।<br>तृष्णा तथापि शंकर किं मूढं मां विडम्बयति॥ ४३<br><br>तृष्णां हरस्व शीघ्रं लक्ष्मीं प्रदत्स्व यावदासिनीं नित्यम्।<br>छिन्धि मदमोहपाशान्नुत्तारय मां महादेव॥ ४४<br><br>करुणाभ्युदयं नाम स्तोत्रमिदं सर्वसिद्धिदं दिव्यम्।<br>यः पठति भक्तियुक्तस्तस्य तुष्येद् भृगोर्यथा च शिवः॥ ४५ | भक्तिका निर्माण किया है। परमेश्वर! मैं परायी स्त्री और पराये धनमें रत रहनेवाला, दूसरे द्वारा किये गये अनादरसे उत्पन्न हुए दुःख और शोकसे सन्तप्त और परमुखापेक्षी हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये। मैं मिथ्या अभिमानसे सन्तप्त, क्षणभङ्गुर शरीरके विलासमें रत, निष्ठुर, कुमार्गगामी और पतित हूँ, आप इस पापसे मेरी रक्षा कीजिये। यद्यपि द्विजगणोंके साथ-साथ मैं दीन हूँ और बन्धुजनोंने ही मेरी आशाको दूषित कर दिया है, तथापि शंकर! तृष्णा मुझ मोहग्रस्तकी विडम्बना क्यों कर रही है? महादेव! आप इस तृष्णाको शीघ्र दूर कर दें, नित्य चिरस्थायिनी लक्ष्मी प्रदान करें, मद और मोहके पाशको काट दें और मेरा उद्धार करें। यह 'करुणाभ्युदय' नामक दिव्य स्तोत्र सभी सिद्धियोंको देनेवाला है, जो भक्तिपूर्वक इसका पाठ करता है, उसपर भृगु (पर प्रसन्न होने)-के समान ही शिवजी प्रसन्न होते हैं॥ ४०—४५॥ |
| अहं तुष्टोऽस्मि ते वत्स प्रार्थयस्वेप्सितं वरम्।<br>उमया सहितो देवो वरं तस्य ह्यादापयत्॥ ४६ | भगवान् शंकरने कहा—वत्स! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, तुम अभीष्ट वर माँग लो। इस प्रकार उमासहित महादेवजी भृगुको वरदान देनेके लिये उद्यत हुए॥ ४६॥ |
| भृगुरुवाच<br>यदि तुष्टोऽसि देवेश यदि देयो वरो मम।<br>रुद्रवेदी भवेदेवमेतत् सम्पादयस्व मे॥ ४७ | भृगु बोले—देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर देना चाहते हैं तो मुझे यह वरदान दीजिये कि यह स्थान रुद्रवेदीके नामसे प्रसिद्ध हो जाय॥ ४७॥ |
| ईश्वर उवाच<br>एवं भवतु विप्रेन्द्र क्रोधस्त्वां न भविष्यति।<br>न पितापुत्रयोश्चैव त्वैकमत्यं भविष्यति॥ ४८<br><br>तदाप्रभृति ब्रह्माद्याः सर्वे देवाः सकिन्नराः।<br>उपासते भृगोस्तीर्थं तुष्टो यत्र महेश्वरः॥ ४९<br><br>दर्शनात् तस्य तीर्थस्य सद्यः पापात् प्रमुच्यते।<br>अवशाः स्ववशा वापि म्रियन्ते यत्र जन्तवः॥ ५०<br><br>गुह्यातिगुह्या सुगतिस्तेषां निःसंशयं भवेत्।<br>एतत् क्षेत्रं सुविपुलं सर्वपापप्रणाशनम्॥ ५१<br><br>तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः।<br>उपानहौ च छत्रं च व्यमन्त्रं च काञ्चनम्॥ ५२<br><br>भोजनं च यथाशक्त्या ह्यक्षयं च तथा भवेत्।<br>सूर्योपरागे यो दद्याद् दानं चैव यथेच्छया॥ ५३ | शिवजीने कहा—विप्रश्रेष्ठ! ऐसा ही होगा और अब तुम्हें क्रोध नहीं होगा। साथ ही तुम पिता और पुत्रमें सहमति नहीं होगी। तभीसे किन्नरोंसहित ब्रह्मा आदि सभी देवगण, जहाँ महेश्वर संतुष्ट हुए थे, उस भृगुतीर्थकी उपासना करते हैं। उस तीर्थका दर्शन करनेसे मनुष्य तत्काल ही पापसे मुक्त हो जाता है। स्वाधीन या पराधीन होकर भी जो प्राणी यहाँ मरते हैं, उन्हें निःसंदेह गुह्यातिगुह्य उत्तम गति प्राप्त होती है। यह अत्यन्त विस्तृत क्षेत्र सभी पापोंका विनाशक है। यहाँ स्नान करके मानव स्वर्गको प्राप्त होते हैं तथा जो वहाँ मरते हैं, उनका पुनः संसारमें आगमन नहीं होता। वहाँ यथाशक्ति जूता, छाता, अन्न, सोना और खाद्य पदार्थका दान देना चाहिये; क्योंकि वह अक्षय हो जाता है। जो मनुष्य सूर्यग्रहणके समय वहाँ इच्छानुसार जो कुछ दान |