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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 821 of 1098

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Page 821
  • अध्याय १९३ *
    ८९१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत्र स्नात्वा नरो राजन् धनवान् रूपवान् भवेत्।<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तीर्थं कनखलं महत्॥ ६९<br>गरुडेन तपस्तप्तं तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।<br>प्रख्यातं त्रिषु लोकेषु योगिनी तत्र तिष्ठति॥ ७०<br>क्रीडते योगिभिः सार्धं शिवेन सह नृत्यति।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् रुद्रलोके महीयते॥ ७१सिद्धि प्राप्त की थी। राजन्! वहाँ स्नान कर मानव धनवान् और रूपवान् हो जाता है। राजेन्द्र! इसके बाद महान् कनखलतीर्थकी यात्रा करे। नराधिप! उस तीर्थमें गरुडने तपस्या की थी। वह तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। वहाँ योगिनी रहती है, जो योगियोंके साथ क्रीडा और शिवके साथ नृत्य करती है। राजन्! वहाँ स्नान कर मनुष्य रुद्रलोकमें पूजित होता है॥ ६०–७१॥
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र हंसतीर्थमनुत्तमम्।<br>हंसास्तत्र विनिर्मुक्ता गता ऊर्ध्वं न संशयः॥ ७२<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र सिद्धो यत्र जनार्दनः।<br>वाराहं रूपमास्थाय अर्चितः परमेश्वरः॥ ७३<br>वराहतीर्थे नरः स्नात्वा द्वादश्यां तु विशेषतः।<br>विष्णुलोकमवाप्नोति नरकं न च पश्यति॥ ७४<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र चन्द्रतीर्थमनुत्तमम्।<br>पौर्णमास्यां विशेषेण स्नानं तत्र समाचरेत्॥ ७५<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र चन्द्रलोके महीयते।<br>दक्षिणेन तु द्वारेण कन्यातीर्थं तु विश्रुतम्॥ ७६<br>शुक्लपक्षे तृतीयायां स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>प्रणिपत्य तु चेशानं बलिस्तेन प्रसीदति॥ ७७<br>हरिश्चन्द्रपुरं दिव्यमन्तरिक्षे च दृश्यते।<br>शक्रध्वजे समावृत्ते सुप्ते नागरिकेजने॥ ७८<br>नर्मदा सलिलौघेन तरून् सम्प्लावयिष्यति।<br>अस्मिन् स्थाने निवासः स्याद्विष्णुः शंकरमब्रवीत्॥ ७९<br>द्वीपेश्‍वरे नरः स्नात्वा लभेद् बहु सुवर्णकम्।राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम हंसतीर्थमें जाय। वहाँ हंस-समूह पापसे विनिर्मुक्त होकर निःसंदेह स्वर्गको चले गये थे। राजेन्द्र! तत्पश्चात् वाराहतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये, जहाँ भगवान् जनार्दन सिद्ध हुए थे। वहाँ वाराहरूपधारी परमेश्वरकी पूजा हुई थी। उस वाराहतीर्थमें विशेषकर द्वादशी तिथिको स्नान कर मनुष्य विष्णुलोकको प्राप्त करता है और उसे नरकका दर्शन नहीं करना पड़ता। राजेन्द्र! तदुपरान्त श्रेष्ठ चन्द्रतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ विशेषकर पूर्णिमा तिथिको स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य चन्द्रलोकमें पूजित होता है। उसके दक्षिण द्वारपर विख्यात कन्यातीर्थ है। वहाँ शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको स्नान करना चाहिये। वहाँ शिवजीको प्रणाम करके उन्हें बलि प्रदान करनेसे वे प्रसन्न हो जाते हैं। वहाँ हरिशयनके समय इन्द्रध्वजके निकलनेपर अन्तरिक्षमें दिव्य हरिश्चन्द्रपुर दिखायी देता है। जब नर्मदा जलसमूहसे वृक्षोंको आप्लावित कर देगी, उस समय इस स्थानमें विष्णुका निवास होगा—ऐसा विष्णुने शंकरसे कहा है। द्वीपेश्वरतीर्थमें स्नान कर मनुष्य सुवर्णराशिको प्राप्त करता है॥ ७२–७९ ½॥
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र कन्यातीर्थे सुसंगमे॥ ८०<br>स्नातमात्रो नरस्तत्र देव्याः स्थानमवाप्नुयात्।<br>देवतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वतीर्थमनुत्तमम्॥ ८१<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र देवैः सह मोदते।<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र शिखितीर्थमनुत्तमम्॥ ८२<br>यत् तत्र दीयते दानं सर्वं कोटिगुणं भवेत्।<br>अपरपक्षे त्वमायां तु स्नानं तत्र समाचरेत्॥ ८३राजेन्द्र! इसके बाद कन्यातीर्थके सुन्दर संगमस्थानकी यात्रा करे। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य देवीके स्थानको प्राप्त करता है। तदनन्तर सभी तीर्थोंमें उत्तम देवतीर्थमें जाना चाहिये। राजेन्द्र! वहाँ स्नान कर मनुष्य देवताओंके साथ आनन्दका अनुभव करता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ शिखितीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ अमावस्या तिथिके तीसरे पहरमें स्नान करनेका विधान है। वहाँ जो कुछ भी दान दिया जाता है, वह सब, करोड़गुना हो जाता है।