About this granth
The Matsya Mahapurana (मत्स्य महापुराण) is one of the eighteen major Puranas, named after Vishnu's fish incarnation. In the traditional frame, the divine Fish narrates it to King Vaivasvata Manu and the seven sages during the great deluge; authorship is ascribed to Maharshi Veda Vyasa.
This is the illustrated Gita Press, Gorakhpur edition with a Hindi translation alongside the Sanskrit, running to about 1,098 pages; the imprint records the fourteenth reprint of Samvat 2076. Its chapters cover creation and the manvantaras, the lineage of Kashyapa, the life of King Prithu and the milking of the earth, the solar and lunar dynasties with the story of Ila, the lineages of the Pitris and the 108 names of the Goddess, and the well-known episode of Yayati, Devayani and Puru.
The Matsya Purana is especially valued for its detailed rules on shraddha (ordinary, ekoddishta and sapindikarana rites, proper times and tirthas), and also treats vows, gifts, pilgrimage and image-making, which makes it a frequent source for students of dharmashastra, history and Indian art.
| * अध्याय १८१ * | ७५३ |
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एक सौ इक्यासीवाँ अध्याय
अविमुक्तक्षेत्र (वाराणसी)-का माहात्म्य
| सूत उवाच<br>इमां पुण्योद्भवां स्निग्धां कथां पापप्रणाशिनीम्।<br>शृण्वन्तु ऋषयः सर्वे सुविशुद्धास्तपोधनाः॥ १<br>गणेश्वरपतिं दिव्यं रुद्रतुल्यपराक्रमम्।<br>सनत्कुमारो भगवानपृच्छन्नन्दिकेश्वरम्॥ २<br>ब्रूहि गुह्यं यथातत्त्वं यत्र नित्यं भवः स्थितः।<br>माहात्म्यं सर्वभूतानां परमात्मा महेश्वरः॥ ३<br>घोररूपं समास्थाय दुष्करं देवदानवैः।<br>आभूतसम्प्लवं यावत् स्थाणुभूतो महेश्वरः॥ ४ | सूतजी कहते हैं— परम विशुद्ध हृदयवाले तपस्वी ऋषियो! आप सब लोग इस उत्तम कथाको जो पापकी विनाशिनी और पुण्यको उत्पन्न करनेवाली है, सुनिये! एक बार भगवान् सनत्कुमारने रुद्रके ही समान पराक्रमी तथा गणेश्वरोंके स्वामी दिव्य नन्दिकेश्वरसे पूछा—'जो सभी जीवोंके परमात्मा महेश्वर तथा देवताओं एवं दानवोंद्वारा दुष्प्राप्य हैं, वे महात्मा शंकर घोर स्वरूपको धारण कर सृष्टिसे प्रलयपर्यन्त स्थाणुरूपमें जहाँ नित्य अवस्थित रहते हैं, उस गोपनीय (स्थान)-को आप रहस्यपूर्वक हमलोगोंको बतलाइये'॥ १—४॥ |
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| नन्दिकेश्वर उवाच<br>पुरा देवेन यत् प्रोक्तं पुराणं पुण्यमुत्तमम्।<br>तत्सर्वं सम्प्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य महेश्वरम्॥ ५<br>ततो देवेन तुष्टेन उमायाः प्रियकाम्यया।<br>कथितं भुवि विख्यातं यत्र नित्यं स्वयं स्थितः॥ ६<br>रुद्रस्यार्धासनगता मेरुशृङ्गे यशस्विनी।<br>महादेवं ततो देवी प्रणता परिपृच्छति॥ ७ | नन्दिकेश्वरने कहा— पूर्वकालमें महादेवने पुण्य प्रदान करनेवाले जिस श्रेष्ठ पुराणका वर्णन किया था, वह सब मैं महेश्वरको नमस्कार कर वर्णन कर रहा हूँ। किसी समय उमाको प्रसन्न करनेकी इच्छासे प्रसन्नमना महादेवने जिस स्थानपर वे सदा स्वयं विराजमान रहते हैं, उस विश्वविख्यात स्थानका वर्णन किया था। एक बार सुमेरुके शिखरपर रुद्रके आधे आसनपर विराजमान यशस्विनी देवी उमाने विनयभावसे महादेवजीसे प्रश्न किया॥ ५—७॥ |
| देव्युवाच<br>भगवन् देवदेवेश चन्द्रार्धकृतशेखर।<br>धर्मं प्रब्रूहि मर्त्यानां भुवि चैवोध्वैरेतसाम्॥ ८<br>जप्तं दत्तं हुतं चेष्टं तपस्तप्तं कृतं च यत्।<br>ध्यानाध्ययनसम्पन्नं कथं भवति चाक्षयम्॥ ९<br>जन्मान्तरसहस्रेण यत् पापं पूर्वसंचितम्।<br>कथं तत् क्षयमायाति तन्ममाचक्ष्व शङ्कर॥ १०<br>यस्मिन् व्यवस्थितो भक्त्या तुष्यसि त्वं महेश्वर।<br>व्रतानि नियमाश्चैव आचारो धर्म एव च॥ ११<br>सर्वसिद्धिकरं यत्र ह्यक्षयगतिदायकम्।<br>वक्तुमर्हसि तत् सर्वं परं कौतूहलं हि मे॥ १२ | देवीने पूछा— अर्धचन्द्रसे सुशोभित मस्तकवाले देवदेवेश्वर भगवन्! भूतलपर वर्तमान ऊर्ध्वरेता प्राणियोंके धर्मको विस्तारसे बतलाइये। साथ ही यह भी बतलाइये कि जप, दान, हवन, यज्ञ, तपस्या, शुभ कर्म, ध्यान और अध्ययन आदि किस प्रकार अक्षयभावको प्राप्त होते हैं? शंकर! हजारों पूर्वजन्मोंमें जो पाप सञ्चित हुए हैं, वे किस प्रकार नष्ट होते हैं? यह आप मुझे स्पष्ट बतलाइये। महेश्वर! जिस स्थानपर स्थित होकर आप भक्तिसे प्रसन्न होते हैं तथा व्रत, नियम, आचार और धर्म जहाँ सभी सिद्धियोंके प्रदाता बन जाते हैं एवं अनश्वर गति प्रदान करते हैं, ये सभी बातें आप बतलाइये; क्योंकि इसे जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी ही उत्कण्ठा है॥८—१२॥ |
७५४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| महेश्वर उवाच<br>शृणु देवि प्रवक्ष्यामि गुह्यानां गुह्यमुत्तमम्।<br>सर्वक्षेत्रेषु विख्यातमविमुक्तं प्रियं मम ॥ १३<br>अष्टषष्टिः पुरा प्रोक्ता स्थानानां स्थानमुत्तमम्।<br>यत्र साक्षात् स्वयं रुद्रः कृत्तिवासाः स्वयं स्थितः ॥ १४<br>यत्र संनिहितो नित्यमविमुक्ते निरन्तरम्।<br>तत्क्षेत्रं न मया मुक्तमविमुक्तं ततः स्मृतम् ॥ १५<br>अविमुक्ते परा सिद्धिरविमुक्ते परा गतिः।<br>जप्तं दत्तं हुतं चेष्टं तपस्तप्तं कृतं च यत् ॥ १६<br>ध्यानमध्ययनं दानं सर्वं भवति चाक्षयम्।<br>जन्मान्तरसहस्रेण यत् पापं पूर्वसंचितम् ॥ १७<br>अविमुक्तं प्रविष्टस्य तत् सर्वं व्रजति क्षयम्।<br>अविमुक्ताग्निना दग्धमग्नौ तूलमिवाहितम् ॥ १८<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वै वर्णसंकराः।<br>कृमिम्लेच्छाश्च ये चान्ये संकीर्णाः पापयोनयः ॥ १९<br>कीटाः पिपीलिकाश्चैव ये चान्ये मृगपक्षिणः।<br>कालेन निधनं प्राप्ता अविमुक्ते शृणु प्रिये ॥ २०<br>चन्द्रार्धमौलिनः सर्वे ललाटाक्षा वृषध्वजाः।<br>शिवे मम पुरे देवि जायन्ते तत्र मानवाः ॥ २१<br>अकामो वा सकामो वा ह्यपि तिर्यग्गतोऽपि वा।<br>अविमुक्ते त्यजन् प्राणान् मम लोके महीयते ॥ २२<br>अविमुक्तं यदा गच्छेत् कदाचित् कालपर्ययात्।<br>अश्मना चरणौ भित्त्वा तत्रैव निधनं व्रजेत् ॥ २३<br>अविमुक्तं गतो देवि न निर्गच्छेत् ततः पुनः।<br>सोऽपि मत्पदमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ २४ | महेश्वरने कहा— देवि! सुनो, मैं तुम्हें गुप्तसे भी गुप्त उत्तम विषय बतला रहा हूँ। सभी क्षेत्रोंमें प्रसिद्ध अविमुक्तक्षेत्र (वाराणसी) मुझे परम प्रिय है। पहले मैं अड़सठ श्रेष्ठ स्थानोंका वर्णन कर चुका हूँ, जहाँ गजचर्म धारण कर मैं साक्षात् रुद्रस्वरूपसे विराजमान रहता हूँ; परंतु अविमुक्तक्षेत्र (काशी)-में मैं नित्य-निरन्तर निवास करता हूँ। उस क्षेत्रको मैं कभी नहीं छोड़ता, इसीलिये इसे अविमुक्त कहा जाता है। उस अविमुक्त क्षेत्रमें परा सिद्धि और परमगति प्राप्त होती है। वहाँ किया गया जप, दान, हवन, यज्ञ, तप, शुभ कर्म, ध्यान, अध्ययन, दान आदि सभी अक्षय हो जाते हैं। अविमुक्त क्षेत्रमें प्रवेश करनेवाले व्यक्तिके हजारों पूर्व जन्मोंमें जो पाप संचित होते हैं वे सभी नष्ट हो जाते हैं। वे अविमुक्तारूपी अग्निमें उसी प्रकार जल जाते हैं जैसे अग्निमें समर्पित की हुई रूई। प्रिये! यदि अविमुक्त क्षेत्रमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर, कृमि, म्लेच्छ एवं अन्य निम्नस्तरके पापयोनिवाले कीट, चींटें, पशु, पक्षी आदि कालके वशीभूत हो मृत्युको प्राप्त होते हैं, (तो उनकी क्या गति होती है, उसे) सुनो। देवि! वे सभी मानव-शरीर धारणकर मस्तकपर अर्धचन्द्रसे सुशोभित, ललाटमें तृतीय नेत्रसे युक्त शिवस्वरूप होकर मेरे शिवपुरमें जन्म लेते हैं। चाहे सकाम हो या निष्काम अथवा तिर्यग्योनिगत ही क्यों न हो, यदि वह अविमुक्त क्षेत्रमें प्राणोंका त्याग करता है तो मेरे लोकमें पूजित होता है। देवि! यदि मनुष्य कालक्रमानुसार कभी अविमुक्त क्षेत्रमें पहुँच जाय तो वहाँ पत्थरसे अपने चरणोंको तोड़कर स्थित रहे और पुनः अविमुक्त क्षेत्रसे बाहर न जाय, वहीं मृत्युको प्राप्त हो जाय तो वह भी मेरे पदको प्राप्त होता है। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है॥ १३—२४॥ |
| वस्त्रापथं रुद्रकोटिं सिद्धेश्वरमहालयम्।<br>गोकर्णं रुद्रकर्णं च सुवर्णाक्षं तथैव च ॥ २५<br>अमरं च महाकालं तथा कायावरोहणम्।<br>एतानि हि पवित्राणि सांनिध्यात् संध्ययोर्द्वयोः ॥ २६<br>कालिञ्जरवनं चैव शंकुकर्णं स्थलेश्वरम्।<br>एतानि च पवित्राणि सांनिध्याद्धि मम प्रिये।<br>अविमुक्ते वरारोहे त्रिसंध्यं नात्र संशयः ॥ २७<br>हरिश्चन्द्रं परं गुह्यं गुह्यमाप्रातकेश्वरम्।<br>जालेश्वरं परं गुह्यं गुह्यं श्रीपर्वतं तथा ॥ २८ | प्रिये! वस्त्रापथ (जूनागढ़, गिरिनार), रुद्रकोटि, सिद्धेश्वर, महालय, गोकर्ण, रुद्रकर्ण तथा सुवर्णाक्ष, अमरकण्टक, महाकाल (उज्जैनी) और कायावरोहण (कारावार, गुजरात)—ये सभी स्थान प्रातः और संध्याकालमें मेरी संनिधिसे पवित्र माने जाते हैं। इसी प्रकार कालिंजरवन, शङ्कुकर्ण और स्थलेश्वर (थानेश्वर)—ये भी मेरी संनिधिके कारण ही पवित्र हैं। वरारोहे! अविमुक्त क्षेत्रमें मैं तीनों संध्याओंमें स्थित रहता हूँ—इसमें संदेह नहीं है। प्रिये! हरिश्चन्द्र, आप्रातकेश्वर, जालेश्वर, श्रीपर्वत, |
* अध्याय १८२ * | ७५५
| महालयं तथा गुह्यं कृमिचण्डेश्वरं शुभम्।<br>गुह्यातिगुह्यं केदारं महाभैरवमेव च॥ २९<br>अष्टावेतानि स्थानानि सांनिध्याद्विद्धि मम प्रिये।<br>अविमुक्ते वरारोहे त्रिसंध्यं नात्र संशयः॥ ३०<br>यानि स्थानानि श्रूयन्ते त्रिषु लोकेषु सुव्रते।<br>अविमुक्तस्य पादेषु नित्यं संनिहितानि वै॥ ३१<br>अथोत्तरां कथां दिव्यमविमुक्तस्य शोभने।<br>स्कन्दो वक्ष्यति माहात्म्यमृषीणां भावितात्मनाम्॥ ३२ | महालय तथा शुभदायक कृमिचण्डेश्वर, केदार और महाभैरव—ये आठ स्थान परम गुह्य हैं और मेरी संनिधिसे पवित्र माने जाते हैं। किंतु सुन्दरि! अविमुक्तक्षेत्रमें मैं तीनों संध्याओंमें निवास करता हूँ—इसमें संदेह नहीं है। सुव्रते! तीनों लोकोंमें जो भी पवित्र स्थान सुने जाते हैं, वे सभी अविमुक्त क्षेत्रके चरणोंमें सदा उपस्थित रहते हैं। शोभने! अविमुक्त क्षेत्रकी इसके बादकी दिव्य कथा और माहात्म्य स्कन्द आत्मद्रष्टा ऋषियोंसे कहेंगे॥ २५—३२॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽविमुक्तमाहात्म्ये एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अविमुक्त-माहात्म्य नामक एक सौ इक्यासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८१॥
एक सौ बयासीवाँ अध्याय
अविमुक्त-माहात्म्य
| सूत उवाच<br>कैलासपृष्ठमासीनं स्कन्दं ब्रह्मविदां वरम्।<br>पप्रच्छुरृषयः सर्वे सनकाद्यास्तपोधनाः॥ १<br>तथा राजर्षयः सर्वे ये भक्तास्तु महेश्वरे।<br>ब्रूहि त्वं स्कन्द भूर्लोके यत्र नित्यं भवः स्थितः॥ २<br><br>स्कन्द उवाच<br>महात्मा सर्वभूतात्मा देवदेवः सनातनः।<br>घोररूपं समास्थाय दुष्करं देवदानवैः॥ ३<br>आभूतसम्प्लवं यावत् स्थाणुभूतः स्थितः प्रभुः।<br>गुह्यानां परमं गुह्यमविमुक्तमिति स्मृतम्॥ ४<br>अविमुक्ते सदा सिद्धिर्यत्र नित्यं भवः स्थितः।<br>अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्यं यदुक्तं त्वीश्वरेण तु॥ ५<br>स्थानान्तरं पवित्रं च तीर्थमायतनं तथा।<br>श्मशानसंस्थितं वेश्म दिव्यमन्तर्हितं च यत्॥ ६<br>भूर्लोके नैव संयुक्तमन्तरिक्षे शिवालयम्।<br>अयुक्तास्तु न पश्यन्ति युक्ताः पश्यन्ति चेतसा॥ ७<br>ब्रह्मचर्यव्रतोपेताः सिद्धा वेदान्तकोविदाः।<br>आदेहपतनाद् यावत् तत् क्षेत्रं यो न मुञ्चति॥ ८ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! एक समय सनक आदि तपस्वी ब्रह्मर्षिगण, सकल राजर्षिवृन्द एवं महेश्वरके भक्तगणोंने कैलास पर्वतके शिखरपर बैठे हुए ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ स्कन्दसे पूछा—'स्कन्द! मृत्युलोकमें जहाँ भगवान् शंकर सदैव विराजमान रहते हैं, वह स्थान आप (हमें) बतलाइये॥ १-२॥<br><br>स्कन्दने कहा—सभी प्राणियोंके आत्मस्वरूप, महात्मा, सनातन, देवाधिदेव, सामर्थ्यशाली, महादेव देवता एवं दानवोंसे दुष्प्राप्य, घोररूप धारणकर प्रलयपर्यन्त जहाँ स्थिररूपसे निवास करते हैं, उसे अत्यन्त गुप्त अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है। जहाँ शिव सदा स्थित रहते हैं, उस अविमुक्तक्षेत्रमें सिद्धि सदा सुलभ है। इस स्थानका जो माहात्म्य भगवान् शङ्करने स्वयं कहा है, उसे सुनिये। यह स्थान परम पवित्र तीर्थ और देवालय है। महाश्मशानपर स्थित जो दिव्य एवं सुगुप्त मन्दिर है, उसका पृथ्वीलोकसे सम्बन्ध नहीं है। वह शिवका मन्दिर अन्तरिक्षमें है। योगी व्यक्ति ही ज्ञानद्वारा उसका साक्षात्कार कर पाते हैं, किंतु जो योगसे रहित हैं वे उसे नहीं देख पाते। जो ब्रह्मचारी, सिद्ध और वेदान्तको जाननेवाले मृत्युपर्यन्त उस स्थानका परित्याग नहीं करते, |
७५६ * मत्स्यपुराण *
| ब्रह्मचर्यव्रतैः सम्यक् सम्यगिष्टं मखैर्भवेत्।<br>अपापात्मा गतिः सर्वा या तूक्ता च क्रियावताम्॥ ९<br>यस्तत्र निवसेद् विप्रोऽसंयुक्तात्मासमाहितः।<br>त्रिकालमपि भुञ्जानो वायुभक्षसमो भवेत्॥ १०<br>निमेषमात्रमपि यो ह्यविमुक्ते तु भक्तिमान्।<br>ब्रह्मचर्यसमायुक्तः परमं प्राप्नुयात् तपः॥ ११<br>योऽत्र मासं वसेद् धीरो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः।<br>सम्यक् तेन व्रतं चीर्णं दिव्यं पाशुपतं महत्॥ १२<br>जन्ममृत्युभयं तीर्त्वा स याति परमां गतिम्।<br>नैःश्रेयसीं गतिं पुण्यां तथा योगगतिं व्रजेत्॥ १३<br>न हि योगगतिर्दिव्या जन्मान्तरशतैरपि।<br>प्राप्यते क्षेत्रमाहात्म्यात् प्रभावाच्छंकरस्य तु॥ १४ | उन्हें वह पवित्र गति प्राप्त होती है, जो ब्रह्मचर्यपूर्वक यज्ञोंद्वारा भलीभाँति अनुष्ठान करनेपर क्रियासम्पन्न व्यक्तियोंके लिये कही गयी है। जो विप्र समाधिसे रहित, योगसे शून्य एवं तीनों समय भोजन करते हुए भी वहाँ निवास करता है वह वायुभक्षीके समान माना जाता है। इस अविमुक्त क्षेत्रमें क्षणभर भी ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास करनेवाला भक्तिमान् व्यक्ति परम तपको प्राप्त करता है। जो धीर पुरुष अल्प भोजन करते हुए इन्द्रियोंको वशमें कर एक मासतक यहाँ निवास करता है, वह (मानो) महान् दिव्य पाशुपत-व्रतका अनुष्ठान कर लेता है। वह पुरुष जन्म और मृत्युके भयको पारकर परमगतिको प्राप्त करता है तथा पुण्यदायक मोक्ष एवं योगगतिका अधिकारी हो जाता है। जिस दिव्य योगगतिको सैकड़ों जन्मोंमें भी नहीं प्राप्त किया जा सकता, वह स्थानके माहात्म्य और शंकरके प्रभावसे यहाँ प्राप्त हो जाती है॥ ३—१४॥ |
| ब्रह्महा योऽभिगच्छेत्तु अविमुक्तं कदाचन।<br>तस्य क्षेत्रस्य माहात्म्याद् ब्रह्महत्या निवर्तते॥ १५<br>आदेहपतनाद् यावत् क्षेत्रं यो न विमुञ्चति।<br>न केवलं ब्रह्महत्या प्राक्कृतं च निवर्तते॥ १६<br>प्राप्य विश्वेश्वरं देवं न स भूयोऽभिजायते।<br>अनन्यमानसो भूत्वा योऽविमुक्तं न मुञ्चति॥ १७<br>तस्य देवः सदा तुष्टः सर्वान् कामान् प्रयच्छति।<br>द्वारं यत् सांख्ययोगानां स तत्र वसति प्रभुः॥ १८<br>सगणो हि भवो देवो भक्तानामनुकम्पया।<br>अविमुक्तं परं क्षेत्रमविमुक्ते परा गतिः॥ १९<br>अविमुक्ते परा सिद्धिर्विमुक्ते परं पदम्।<br>अविमुक्तं निषेवेत देवर्षिगणसेवितम्॥ २०<br>यदीच्छेन्मानवो धीमान् न पुनर्जायते क्वचित्।<br>मेरोः शक्तो गुणान् वक्तुं द्वीपानां च तथैव च॥ २१<br>समुद्राणां च सर्वेषां नाविमुक्तस्य शक्यते।<br>अन्तकाले मनुष्याणां छिद्यमानेषु मर्मसु॥ २२<br>वायुना प्रेर्यमाणानां स्मृतिर्नैवोपजायते।<br>अविमुक्ते ह्यन्तकाले भक्तानामीश्वरः स्वयम्॥ २३<br>कर्मभिः प्रेर्यमाणानां कर्णजापं प्रयच्छति।<br>मणिकर्ण्यां त्यजन् देहं गतिमिष्टां व्रजेन्नरः॥ २४ | ब्रह्महत्या करनेवाला व्यक्ति भी यदि किसी समय इस अविमुक्तक्षेत्रमें चला जाता है तो इस क्षेत्रके प्रभावसे उसकी ब्रह्महत्या निवृत्त हो जाती है। जो मृत्युपर्यन्त इस क्षेत्रका परित्याग नहीं करता, उसकी केवल ब्रह्महत्या ही नहीं, अपितु पहलेके किये हुए पाप भी नष्ट हो जाते हैं। वह भगवान् विश्वेश्वरको प्राप्तकर पुनः संसारमें जन्म नहीं ग्रहण करता। जो अनन्यचित्त हो अविमुक्त क्षेत्रका परित्याग नहीं करता, उसपर भगवान् शङ्कर सदा प्रसन्न रहते हैं और उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण कर देते हैं। जो सांख्य और योगका द्वारस्वरूप है उस स्थानपर भक्तोंपर अनुकम्पा करनेके लिये सर्वशक्तिसम्पन्न भगवान् शङ्कर गणोंके साथ निवास करते हैं। अविमुक्त क्षेत्र श्रेष्ठ स्थान है। अविमुक्तमें रहनेसे श्रेष्ठ गति प्राप्त होती है। अविमुक्तमें रहनेसे परम सिद्धि प्राप्त होती है और अविमुक्तमें रहनेसे श्रेष्ठ स्थान प्राप्त होता है। यदि बुद्धिमान् मनुष्य यह चाहता हो कि मेरा पुनर्जन्म न हो तो उसे देवर्षिगणोंसे सेवित अविमुक्त क्षेत्रमें निवास करना चाहिये। मेरु पर्वत, सभी द्वीपों तथा समुद्रोंके गुणोंका वर्णन किया जा सकता है, किंतु अविमुक्त क्षेत्रके गुणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता। मृत्युके समय वायुसे प्रेरित मनुष्योंके मर्मस्थानोंके छिन्न हो जानेपर स्मृति नहीं उत्पन्न होती, किंतु अविमुक्तमें अन्तसमय कर्मोंसे प्रेरित भक्तोंके कानमें स्वयं ईश्वर मन्त्रका जाप करते हैं। मनुष्य मणिकर्णिकामें शरीरका |
१८४- काशीकी महिमाका वर्णन
| * अध्याय १८३ * | ७५७ |
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| ईश्वरप्रेरितो याति दुष्प्रापामकृतात्मभिः।<br>अशाश्वतमिदं ज्ञात्वा मानुष्यं बहुकिल्बिषम्॥ २५<br><br>अविमुक्तं निषेवेत संसारभयमोचनम्।<br>योगक्षेमप्रदं दिव्यं बहुविघ्नविनाशनम्॥ २६<br><br>विघ्नैश्चालोड्यमानोऽपि योऽविमुक्तं न मुञ्चति।<br><br>स मुञ्चति जरां मृत्युं जन्म चैतदशाश्वतम्।<br>अविमुक्तप्रसादात् तु शिवसायुज्यमाप्नुयात्॥ २७ | त्याग करनेपर इष्टगतिको प्राप्त करता है। जो गति अविशुद्ध आत्माओंद्वारा दुष्प्राप्य है, उसे भी वह ईश्वरकी प्रेरणाद्वारा यहाँ प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य अनेक पापोंसे परिपूर्ण इस मानवयोनिको नश्वर समझकर संसार-भयसे छुटकारा देनेवाले, योगक्षेमके प्रदाता, अनेक विघ्नोंके विनाशक, दिव्य अविमुक्त (काशी)-में निवास करता है तथा अनेक विघ्नोंसे आलोड़ित होनेपर भी अविमुक्तको नहीं छोड़ता, वह वृद्धावस्था, मृत्यु और इस नश्वर जन्मसे छुटकारा पा लेता है तथा अविमुक्तके माहात्म्यसे शिवसायुज्यको प्राप्त करता है॥ १५—२७॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽविमुक्तमाहात्म्ये द्व्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अविमुक्तमाहात्म्य-वर्णनमें एक सौ बयासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८२॥
एक सौ तिरासीवाँ अध्याय
अविमुक्तमाहात्म्यके प्रसङ्गमें शिव-पार्वतीका प्रश्नोत्तर
| देव्युवाच<br>हिमवन्तं गिरिं त्यक्त्वा मन्दरं गन्धमादनम्।<br>कैलासं निषधं चैव मेरुपृष्ठं महाद्युति॥ १<br>रम्यं त्रिशिखरं चैव मानसं सुमहागिरिम्।<br>देवोद्यानानि रम्याणि नन्दनं वनमेव च॥ २<br>सुरस्थानानि मुख्यानि तीर्थान्यायतननि च।<br>तानि सर्वाणि संत्यज्य अविमुक्ते रतिः कथम्॥ ३<br>किमत्र सुमहत् पुण्यं परं गुह्यं वदस्व मे।<br>येन त्वं रमसे नित्यं भूतसम्पद्गणैर्वृतः॥ ४<br>क्षेत्रस्य प्रवरत्वं च ये च तत्र निवासिनः।<br>तेषामनुग्रहः कश्चित् तत्सर्वं ब्रूहि शङ्कर॥ ५<br><br>शंकर उवाच<br>अत्यद्भुतमिमं प्रश्नं यत्त्वं पृच्छसि भामिनि।<br>तत्सर्वं सम्प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु॥ ६<br>वाराणस्यां नदी पुण्या सिद्धगन्धर्वसेविता।<br>प्रविष्टा त्रिपथा गङ्गा तस्मिन् क्षेत्रे मम प्रिये॥ ७<br>ममैव प्रीतिरतुला कृत्तिवासे च सुन्दरि।<br>सर्वेषां चैव स्थानानां स्थानं तत्तु यथाधिकम्॥ ८ | **देवी पार्वतीने पूछा—**कल्याणकारी पतिदेव! हिमालयपर्वत, मन्दर, गन्धमादन, कैलास, निषध, देदीप्यमान सुमेरुपीठ, मनोहर त्रिशिखर पर्वत एवं अतिशय विशाल मानस पर्वत, रमणीय देव-उद्यान, नन्दनवन, देवस्थानों, मुख्य तीर्थों और मन्दिरों—इन सभी स्थानोंको छोड़कर आपका अविमुक्तक्षेत्रमें इतना अधिक प्रेम क्यों है? यहाँ अतिशय गोपनीय कौन-सा बहुत बड़ा पुण्य है, जिससे आप प्रमथोंके साथ यहाँ नित्य रमण करते हैं। उस क्षेत्रकी तथा वहाँके निवासियोंकी जो श्रेष्ठता है और उन लोगोंपर आपका जो अपूर्व अनुग्रह है—वे सभी बातें मुझे बतलाइये॥ १—५॥<br><br>**शिवजी बोले—**भामिनि! तुम जो प्रश्न कर रही हो यह अतिशय अद्भुत है। मैं वह सब स्पष्टरूपसे कह रहा हूँ, सुनो। प्रिये! सिद्धों और गन्धर्वोंसे सेवित त्रिपथगामिनी पुण्यशीला नदी श्रीगङ्गाजी मेरे उस क्षेत्र वाराणसीमें प्रविष्ट होती हैं। सुन्दरि! कृत्तिवासलिङ्गपर मेरा अपार प्रेम है, इसीलिये वह स्थान सभी स्थानोंसे |
| ७५८ | * मत्स्यपुराण * |
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| तेन कार्येण सुश्रोणि तस्मिन् स्थाने रतिर्मम।<br>तस्मिँल्लिङ्गे च सांनिध्यं मम देवि सुरेश्वरि॥ ९<br>क्षेत्रस्य च प्रवक्ष्यामि गुणान् गुणवतां वरे।<br>याञ्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः॥ १०<br>यदि पापो यदि शठो यदि वाधार्मिको नरः।<br>मुच्यते सर्वपापेभ्यो ह्यविमुक्तं व्रजेद् यदि॥ ११<br>प्रलये सर्वभूतानां लोके स्थावरजङ्गमे।<br>न हि त्यक्ष्यामि तत्स्थानं महागणशतैर्वृतः॥ १२<br>यत्र देवाः सगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसाः।<br>वक्त्रं मम महाभागे प्रविशन्ति युगक्षये॥ १३<br>तेषां साक्षादहं पूजां प्रतिगृह्णामि पार्वति।<br>सर्वगुह्योत्तमं स्थानं मम प्रियतमं शुभम्॥ १४<br>धन्याः प्रविष्टाः सुश्रोणि मम भक्ता द्विजातयः।<br>मद्भक्तिपरमा नित्यं ये मद्भक्तास्तु ते नराः॥ १५<br>तस्मिन् प्राणान् परित्यज्य गच्छन्ति परमां गतिम्।<br>सदा यजति रुद्रेण सदा दानं प्रयच्छति॥ १६<br>सदा तपस्वी भवति अविमुक्तस्थितो नरः।<br>यो मां पूजयते नित्यं तस्य तुष्याम्यहं प्रिये॥ १७<br>सर्वदानानि यो दद्यात् सर्वयज्ञेषु दीक्षितः।<br>सर्वतीर्थाभिषिक्तश्च स प्रपद्येत मामिह॥ १८<br>अविमुक्तं सदा देवि ये व्रजन्ति सुनिश्चितम्।<br>ते तिष्ठन्तीह सुश्रोणि मद्भक्ताश्च त्रिविष्टपे॥ १९<br>मत्प्रसादात् तु ते देवि दीव्यन्ति शुभलोचने।<br>दुर्धराश्चैव दुर्धर्षा भवन्ति विगतज्वराः॥ २०<br>अविमुक्तं शुभं प्राप्य मद्भक्ताः कृतनिश्चयाः।<br>विधूतपापा विमला भवन्ति विगतज्वराः॥ २१ | श्रेष्ठ है। सुश्रोणि! इसी कारण मेरा उस स्थानपर अधिक राग है तथा सुरेश्वरि! उस लिङ्गमें मेरा सदा निवास रहता है। सभी गुणवानोंमें श्रेष्ठ देवि! अब मैं क्षेत्रके गुणोंका वर्णन करता हूँ जिन्हें सुनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। पापी, दुष्ट अथवा अधार्मिक मनुष्य भी यदि अविमुक्त (काशी)-में चला जाय तो वह सभी पापोंसे छूट जाता है। सभी प्राणियोंके स्थावर एवं जंगमसे व्याप्त लोकके प्रलयकालमें भी मैं सैकड़ों विशिष्ट गणोंके साथ रहकर उस स्थानको नहीं छोड़ता। महाभागे! जहाँ देवता, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस—सभी युगके नाशके समय मेरे मुखमें प्रवेश कर जाते हैं। पार्वति! उनकी पूजाको मैं साक्षात्-रूपसे ग्रहण करता हूँ। यह शुभदायक अतिशय रहस्यमय स्थान मुझे परम प्रिय है। सुश्रोणि! वहाँ निवास करनेवाले मेरे भक्त द्विजातिगण धन्य हैं। सदा मेरी भक्तिमें तत्पर जो मेरे भक्त हैं वे वहाँ अपने शरीरका त्याग कर परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य अविमुक्त क्षेत्र (काशी)-में निवास करता है, वह सदा रुद्रसूक्तसे पूजा करता है, सदा दान देता है और सदा तपस्यामें रत रहता है। प्रिये! जो मेरी नित्य पूजा करता है उससे मैं प्रसन्न रहता हूँ। जो सभी प्रकारका दान करता है, सभी तरहके यज्ञोंमें दीक्षित होता है और सभी तीर्थोंके जलोंके अभिषेकसे सम्पन्न है वही यहाँ मुझे प्राप्त करता है। देवि! जो सदा सुनिश्चित रूपसे अविमुक्त क्षेत्रमें जाते रहते हैं तथा यहाँ निवास करते हैं वे स्वर्गमें भी मेरे भक्त बने रहते हैं। शुभलोचने देवि! मेरी कृपासे वे देदीप्यमान रहते हैं तथा किसीसे पराजित न होनेवाले, पराक्रमशाली और संतापरहित होते हैं। स्थिर निश्चयवाले मेरे भक्त शुभप्रद अविमुक्तको प्राप्तकर पापरहित, निर्मल और उद्वेगशून्य हो जाते हैं॥ ६—२१॥ |
| <center>पार्वत्युवाच</center><br>दक्षयज्ञस्त्वया देव मत्प्रियार्थे निषूदितः।<br>अविमुक्तगुणानां तु न तृप्तिरिह जायते॥ २२ | पार्वतीने कहा—देव! आपने मेरा प्रिय करनेके लिये दक्ष-यज्ञको विनष्ट किया था, किंतु अविमुक्तके गुणोंको सुननेसे मुझे यहाँ संतोष नहीं हो रहा है॥ २२॥ |
| <center>ईश्वर उवाच</center><br>क्रोधेन दक्षयज्ञस्तु त्वत्प्रियार्थे विनाशितः।<br>महाप्रिये महाभागे नाशितोऽयं वरानने॥ २३<br>अविमुक्ते यजन्ते तु मद्भक्ताः कृतनिश्चयाः।<br>न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि॥ २४ | ईश्वर बोले—महाभागे! तुम्हें प्रसन्न करनेके लिये मैंने क्रोधवश दक्ष-यज्ञका विनाश किया था; क्योंकि वरानने! तुम तो मेरी अतिशय प्रियतमा हो, इसीलिये उस यज्ञको नष्ट किया था। जो मेरे भक्त अविमुक्तक्षेत्रमें निश्चयपूर्वक यज्ञ करते हैं उनका सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी पुनः संसारमें आगमन नहीं होता॥ २३-२४॥ |
| * अध्याय १८३ * | ७५९ |
|---|---|
| देव्युवाच<br>दुर्लभास्तु गुणा देव अविमुक्ते तु कीर्तिताः।<br>सर्वांस्तान् मम तत्त्वेन कथयस्व महेश्वर॥ २५<br>कौतूहलं महादेव हृदिस्थं मम वर्तते।<br>तत्सर्वं मम तत्त्वेन आख्याहि परमेश्वर॥ २६ | **देवीने पूछा—**देव! आपने अविमुक्तक्षेत्रके जिन दुर्लभ गुणोंका वर्णन किया है, महेश्वर! आप उन सभी गुणोंका रहस्यपूर्वक मुझसे वर्णन कीजिये। महादेव! मेरे हृदयमें परम आश्चर्य हो रहा है, अतः परमेश्वर! उन सभी विषयोंको मुझे रहस्यपूर्वक बतलाइये॥ २५-२६॥ |
| ईश्वर उवाच<br>अक्षया ह्यामराश्चैव ह्यदेहाश्च भवन्ति ते।<br>मत्प्रसादाद् वरारोहे मामेव प्रविशन्ति वै॥ २७<br>ब्रूहि ब्रूहि विशालाक्षि किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि॥ २८ | **ईश्वर बोले—**सुन्दरि! जो अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करते हैं वे मेरी कृपासे विदेह, अक्षय और अमर हो जाते हैं तथा अन्तमें निश्चय ही मुझमें लीन हो जाते हैं। विशालनेत्रे! कहो, कहो, तुम और क्या सुनना चाहती हो?॥ २७-२८॥ |
| देव्युवाच<br>अविमुक्ते महाक्षेत्रे अहो पुण्यमहो गुणाः।<br>न तृप्तिमधिगच्छामि ब्रूहि देव पुनर्गुणान्॥ २९ | **देवीने पूछा—**देव! अविमुक्त नामक विशाल क्षेत्रका आश्चर्यजनक पुण्य है एवं आश्चर्यजनक गुण हैं, इनके सुननेसे मुझे तृप्ति नहीं हो रही है, अतः पुनः उन गुणोंका वर्णन कीजिये॥ २९॥ |
| ईश्वर उवाच<br>महेश्वरि वरारोहे शृणु तांस्तु मम प्रिये।<br>अविमुक्ते गुणा ये तु तथान्यानपि तच्छृणु॥ ३०<br>शाकपर्णाशिनो दान्ताः सम्प्रक्षाल्या मरीचिपाः।<br>दन्तोलूखलिनश्चान्ये अश्मकुट्टास्तथा परे॥ ३१<br>मासि मासि कुशाग्रेण जलमास्वादयन्ति वै।<br>वृक्षमूलनिकेताश्च शिलाशय्यास्तथा परे॥ ३२<br>आदित्यवपुषः सर्वे जितक्रोधा जितेन्द्रियाः।<br>एवं बहुविधैर्धर्मैरन्यत्र चरितव्रताः॥ ३३<br>त्रिकालमपि भुञ्जाना येऽविमुक्तनिवासिनः।<br>तपश्वरन्ति वान्यत्र कलां नार्हन्ति षोडशीम्।<br>येऽविमुक्ते वसन्तीह स्वर्गे प्रतिवसन्ति ते॥ ३४ | **ईश्वरने कहा—**महेश्वरि! तुम तो परम सुन्दरी एवं मेरी प्रिया हो, अतः अविमुक्तक्षेत्रमें जो गुण हैं, उन्हें तथा उनके अतिरिक्त अन्यान्य गुणोंको भी सुनो। जो शाक एवं पत्तोंपर जीवन-निर्वाह करनेवाले, संयमी, भलीभाँति स्नानसे निर्मल सूर्य-किरणोंका पान करनेवाले, दाँतरूपी ओखलीसे निर्वाह करनेवाले, पत्थरपर कूटकर भोजन करनेवाले, प्रतिमास कुशके अग्रभागसे जलका आस्वादन करनेवाले, वृक्षकी जड़में निवास करनेवाले, पत्थरपर शयन करनेवाले, आदित्यके समान तेजस्वी शरीरधारी, क्रोधविजयी और जितेन्द्रिय हैं, तथा इसी तरह अनेक प्रकारके धर्मोंसे अन्य स्थानोंमें व्रतका आचरण करनेवाले हैं अथवा तपस्यामें संलग्न हैं, वे सभी तीनों कालोंमें भोजन करनेवाले अविमुक्तनिवासी व्यक्तिकी सोलहवीं कलाकी बराबरी नहीं कर सकते। जो अविमुक्तक्षेत्रमें निवास कर रहे हैं, वे मानो स्वर्गमें ही निवास कर रहे हैं॥ ३०-३४॥ |
| मत्समः पुरुषो नास्ति त्वत्समा नास्ति योषिताम्।<br>अविमुक्तसमं क्षेत्रं न भूतं न भविष्यति॥ ३५<br>अविमुक्ते परो योगो ह्यविमुक्ते परा गतिः।<br>अविमुक्ते परो मोक्षः क्षेत्रं नैवास्ति तादृशम्॥ ३६<br>परं गुह्यं प्रवक्ष्यामि तत्त्वेन वरवर्णिनि।<br>अविमुक्ते महाक्षेत्रे यदुक्तं हि मया पुरा॥ ३७ | विश्वमें मेरे समान न कोई दूसरा पुरुष है, न तुम्हारे समान कोई स्त्री है और न अविमुक्तके समान कोई अन्य तीर्थस्थान हुआ है, न होगा। अविमुक्तमें परम योग, अविमुक्तमें श्रेष्ठ गति, अविमुक्तमें परम मोक्ष प्राप्त होता है, इसके समान अन्य कोई भी क्षेत्र नहीं है। शोभने! महाक्षेत्र अविमुक्तके विषयमें मैंने जो पूर्वमें कहा है, उस परम रहस्यको मैं यथार्थरूपसे कह रहा हूँ। |
७६० * मत्स्यपुराण *
| जन्मान्तरशतैर्देवि योगोऽयं यदि लभ्यते।<br>मोक्षः शतसहस्रेण जन्मना लभ्यते न वा॥ ३८<br>अविमुक्ते न संदेहो मद्भक्तः कृतनिश्चयः।<br>एकेन जन्मना सोऽपि योगं मोक्षं च विन्दति॥ ३९<br>अविमुक्ते नरा देवि ये व्रजन्ति सुनिश्चिताः।<br>ते विशन्ति परं स्थानं मोक्षं परमदुर्लभम्॥ ४०<br>पृथिव्यामीदृशं क्षेत्रं न भूतं न भविष्यति।<br>चतुर्मूर्तिः सदा धर्मस्तस्मिन् संनिहितः प्रिये।<br>चतुर्णामपि वर्णानां गतिस्तु परमा स्मृता॥ ४१ | देवि! करोड़ों जन्मोंके पश्चात् मोक्षकी प्राप्ति होती है या नहीं, इसमें भी संदेह है, परंतु यदि कहीं सैकड़ों जन्मोंके बाद ऐसा योग उपलब्ध हो जाय तो दृढ़ निश्चयवाला मेरा भक्त अविमुक्तक्षेत्रमें एक ही जन्ममें योग और मोक्षको प्राप्त कर लेता है। देवि! जो दृढ़ निश्चयसे सम्पन्न पुरुष अविमुक्तक्षेत्रमें जाते हैं वे परम दुर्लभ श्रेष्ठ मोक्षपदको प्राप्त करते हैं। प्रिये! पृथ्वीमें ऐसा क्षेत्र न हुआ है और न होगा। चार मूर्तिवालाधर्म इस क्षेत्रमें सदा निवास करता है। यहाँ चारों वर्णोंकी परम गति कही गयी है॥ ३५–४१॥ |
| देव्युवाच<br>श्रुता गुणास्ते क्षेत्रस्य इह चान्यत्र ये प्रभो।<br>वदस्व भुवि विप्रेन्द्राः कं वा यज्ञैर्यजन्ति ते॥ ४२ | देवीने पूछा—प्रभो! आपके क्षेत्रके लौकिक और पारलौकिक गुणोंको मैंने सुन लिया। अब यह बतलाइये कि पृथ्वीपर जो श्रेष्ठ विप्रवृन्द हैं वे यज्ञोंद्वारा किसका यजन करते हैं?॥ ४२॥ |
| ईश्वर उवाच<br>इज्यया चैव मन्त्रेण मामेव हि यजन्ति ये।<br>न तेषां भयमस्तीति भवं रुद्रं यजन्ति यत्॥ ४३<br>अमन्त्रो मन्त्रको देवि द्विविधो विधिरुच्यते।<br>सांख्यं चैवाथ योगश्च द्विविधो योग उच्यते॥ ४४<br>सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।<br>सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥ ४५<br>आत्मौपम्येन सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।<br>तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ ४६<br>निर्गुणः सगुणो वापि योगश्च कथितो भुवि।<br>सगुणश्चैव विज्ञेयो निर्गुणो मनसः परः॥ ४७<br>एतत् ते कथितं देवि यन्मां त्वं परिपृच्छसि॥ ४८ | ईश्वरने कहा—जो यज्ञ और मन्त्रद्वारा मेरा ही यजन करते हैं उन लोगोंको कोई भय नहीं रह जाता; क्योंकि वे भव और रुद्रकी आराधना करनेवाले हैं। देवि! मन्त्ररहित और मन्त्रसहित—दोनों प्रकारकी विधियाँ कही गयी हैं। इसी प्रकार सांख्य और योगके भेदसे योग भी दो प्रकारका कहा गया है। जो सजातीय, विजातीय एवं स्वगत भेदोंसे शून्य हो सबको एक मानकर सभी प्राणियोंमें स्थित मेरी आराधना करता है वह योगी सदा अपने स्वरूपमें रहता हुआ भी मुझमें ही स्थित रहता है। जो सर्वत्र सबको आत्मसदृश मुझमें अवस्थित देखता है, उससे न तो मैं वियुक्त होता हूँ और न वह मुझसे अलग होता है। भूतलपर निर्गुण और सगुण—दो प्रकारके योग कहे गये हैं। उनमें सगुण योग ही ज्ञानके द्वारा जाना जा सकता है, निर्गुण योग मनसे परे है। देवि! जो तुमने मुझसे पूछा है, वह मैंने तुम्हें बतला दिया॥ ४३–४८॥ |
| देव्युवाच<br>या भक्तिस्त्रिविधा प्रोक्ता भक्तानां बहुधा त्वया।<br>तामहं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः कथयस्व मे॥ ४९ | देवीने पूछा—आपने भक्तोंकी जो तीन प्रकारकी भक्ति अनेक बार कही है उसे मैं सुनना चाहती हूँ। आप उसका यथार्थरूपमें मुझसे वर्णन कीजिये॥ ४९॥ |
| ईश्वर उवाच<br>शृणु पार्वति देवेशि भक्तानां भक्तवत्सले।<br>प्राप्य सांख्यं च योगं च दुःखान्तं च नियच्छति॥ ५० | ईश्वर (शिव)-ने कहा—भक्तोंके प्रति वात्सल्य भाव रखनेवाली देवेश्वरी पार्वती! सुनो। जो सांख्य और योगको प्राप्तकर दुःखका सर्वथा विनाश कर लेता है, |
| * अध्याय १८३ * | ७६१ |
|---|---|
| सदा यः सेवते भिक्षां ततो भवति रञ्जितः।<br>रञ्जनात् तन्मयो भूत्वा लीयते स तु भक्तिमान्॥ ५१<br>शास्त्राणां तु वरारोहे बहुकारणदर्शिनः।<br>न मां पश्यन्ति ते देवि ज्ञानवाक्यविवादिनः॥ ५२<br>परमार्थज्ञानतृप्ता युक्ता जानन्ति योगिनः।<br>विद्यया विदितात्मानो योगस्य च द्विजातयः॥ ५३<br>प्रत्याहारेण शुद्धात्मा नान्यथा चिन्तयेच्च तत्।<br>तुष्टिं च परमां प्राप्य योगं मोक्षं परं तथा।<br>त्रिभिर्गुणैः समायुक्तो ज्ञानवान् पश्यतीह माम्॥ ५४<br>एतत् ते कथितं देवि किमन्यच्छ्रोतुर्महसि।<br>भूय एव वरारोहे कथयिष्यामि सुव्रते॥ ५५<br>गुह्यं पवित्रमथवा यच्चापि हृदि वर्त्तते।<br>तत् सर्वं कथयिष्यामि शृणुष्वैकमनाः प्रिये॥ ५६ | सदा भिक्षासे जीवन-यापन करता है और उसीसे प्रसन्न रहता है तथा इस प्रकार प्रसन्नताके कारण उसीमें तन्मय होकर लीन हो जाता है, वह भक्तिमान् कहलाता है। वरारोहे! जो शास्त्रोंके अनेकों कारणोंपर विचार करनेवाले हैं, वे ज्ञानवाक्योंमें विवाद करनेवाले लोग मेरा दर्शन नहीं कर पाते। देवि! जो परमार्थ-ज्ञानसम्पन्न योगी हैं तथा जो द्विजातिवृन्द योगके ज्ञानसे आत्मज्ञानको प्राप्त कर चुके हैं, वे ही मुझे जान पाते हैं। जिसका आत्मा प्रत्याहारके द्वारा विशुद्ध हो गया है, जो परम संतोष, उत्कृष्ट योग और मोक्षको पाकर अन्यथा विचार नहीं करते और तीनों गुणोंसे सम्पन्न हैं, ऐसे ज्ञानी इस अविमुक्तक्षेत्रमें मेरा साक्षात्कार कर पाते हैं। देवि! यह तो मैंने तुमसे कह दिया, अब तुम और क्या सुनना चाहती हो? उत्तम पातिव्रत धारण करनेवाली सुन्दरि! मैं पुनः उसका वर्णन करूँगा। प्रिये! जो गोपनीय, पावन अथवा हृदयमें वर्तमान है, वह सब मैं कहूँगा, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो॥ ५०-५६॥ |
| देव्युवाच<br>त्वद्रूपं कीदृशं देव युक्ताः पश्यन्ति योगिनः।<br>एतं मे संशयं ब्रूहि नमस्ते सुरसत्तम॥ ५७ | देवीने पूछा— देव! योगसिद्धिसम्पन्न योगिगण आपके कैसे स्वरूपका दर्शन करते हैं? देवश्रेष्ठ! मैं आपको नमस्कार करती हूँ, आप मेरे इस संदेहपर प्रकाश डालिये॥ ५७॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>अमूर्तं चैव मूर्तं च ज्योतीरूपं हि तत् स्मृतम्।<br>तस्योपलब्धिमन्विच्छन् यत्नः कार्यो विजानता॥ ५८<br>गुणैर्वियुक्तो भूतात्मा एवं वक्तुं न शक्यते।<br>शक्यते यदि वक्तुं वै दिव्यैर्वर्षशतैर्न वा॥ ५९ | श्रीभगवान्ने कहा— मेरा वह ज्योतिःस्वरूप अमूर्त और मूर्त—दो प्रकारका कहा गया है। विद्वान् पुरुषको उसे प्राप्त करनेकी अभिलाषासे प्रयत्न करना चाहिये। जो प्राणी गुणोंसे रहित है, वह इस प्रकार इसका वर्णन नहीं कर सकता। यदि करना चाहे तो सैकड़ों दिव्य वर्षोंमें कर सकता है या नहीं—इसमें भी संदेह है॥ ५८-५९॥ |
| देव्युवाच<br>किं प्रमाणं तु तत्क्षेत्रं समन्तात् सर्वतो दिशम्।<br>यत्र नित्यं स्थितो देवो महादेवो गणैर्युतः॥ ६० | देवीने पूछा— जहाँ देवाधिदेव महादेव अपने गणोंके साथ नित्य स्थित रहते हैं, वह क्षेत्र चारों ओर सभी दिशाओंमें कितनी दूरतक विस्तृत है?॥ ६०॥ |
| ईश्वर उवाच<br>द्वियोजनं तु तत् क्षेत्रं पूर्वपश्चिमतः स्मृतम्।<br>अर्धयोजनविस्तीर्णं तत् क्षेत्रं दक्षिणोत्तरम्॥ ६१<br>वरणाऽसी नदी यावत् तावच्छुक्लनदी तु वै।<br>भीष्मचण्डिकमारभ्य पर्वतेश्वरमन्तिके॥ ६२ | भगवान् शङ्करने कहा— वह क्षेत्र पूर्वसे पश्चिमतक दो योजन और दक्षिणसे उत्तरतक आधा योजन विस्तृत बतलाया जाता है। जहाँतक वरुणा और असी नदियाँ हैं, वहाँतक भीष्मचण्डिकसे लेकर पर्वतेश्वरके समीपतक शुक्लनदी है। |
१८५- वाराणसी-माहात्म्य
| ७६२ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गणा यत्रावतिष्ठन्ति सन्नियुक्ता विनायकाः।<br>कूष्माण्डगजतुण्डश्च जयन्तश्च मदोत्कटाः॥ ६३<br>सिंहव्याघ्रमुखाः केचिद् विकटाः कुब्जवामनाः।<br>यत्र नन्दी महाकालश्चण्डघण्टो महेश्वरः॥ ६४<br>दण्डचण्डेश्वरश्चैव घण्टाकर्णो महाबलः।<br>एते चान्ये च बहवो गणाश्चैव गणेश्वराः॥ ६५<br>महोदरा महाकाया वज्रशक्तिधरास्तथा।<br>रक्षन्ति सततं देवि ह्यविमुक्तं तपोवनम्।<br>द्वारे द्वारे च तिष्ठन्ति शूलमुद्गरपाणयः॥ ६६ | जहाँ कूष्माण्ड, गजतुण्ड, जयन्त, उत्कट पराक्रमी विनायकगण भलीभाँति नियुक्त होकर विराजमान रहते हैं। उनमें कुछ सिंह एवं बाघके-से मुखवाले, कुछ भयंकर, कुबड़े और वामन (बोने) हैं। जहाँ नन्दी, महाकाल, चण्डघण्ट, महेश्वर, दण्डचण्डेश्वर, महाबली घण्टाकर्ण—ये एवं अन्य अनेक गणसमूह और गणेश्वरवृन्द विद्यमान रहते हैं। देवि! ये सभी विशाल उदरवाले एवं विशालकाय हैं तथा हाथमें वज्र और शक्ति धारण करके इस अविमुक्त तपोवनकी सदा रक्षा करते हैं। ये सभी हाथमें शूल और मुद्गर धारण कर प्रत्येक द्वारपर स्थित रहते हैं॥ ६१—६६॥ |
| सुवर्णशृङ्गीं रौप्यखुरां चैलाजिनपयस्विनीम्।<br>वारणस्यां तु यो दद्यात् सवत्सां कांस्यभाजनाम्॥ ६७<br>गां दत्त्वा तु वरारोहे ब्राह्मणे वेदपारगे।<br>आसप्तमं कुलं तेन तारितं नात्र संशयः॥ ६८<br>यो दद्याद् ब्राह्मणे किञ्चित् तस्मिन् क्षेत्रे वरानने।<br>कनकं रजतं वस्त्रमन्नाद्यं बहुविस्तरम्॥ ६९<br>अक्षयं चाव्ययं चैव स्यातां तस्य सुलोचने।<br>शृणु तत्त्वेन तीर्थस्य विभूतिं व्युष्टिमेव च॥ ७०<br>तत्र स्नात्वा महाभागे भवन्ति नीरुजा नराः।<br>दशानामश्वमेधानां फलं प्राप्नोति मानवः॥ ७१<br>तदवाप्नोति धर्मात्मा तत्र स्नात्वा वरानने।<br>बहुस्वल्पे च यो दद्याद् ब्राह्मणे वेदपारगे॥ ७२<br>शुभां गतिमवाप्नोति अग्निवच्चैव दीप्यते।<br>वाराणसीजाह्नवीभ्यां संगमे लोकविश्रुते॥ ७३<br>दत्त्वान्नं च विधानेन न स भूयोऽभिजायते।<br>एतत् ते कथितं देवि तीर्थस्य फलमुत्तमम्॥ ७४ | वरारोहे! जो स्वर्णजटित सींगोंवाली, चाँदीसे युक्त खुरोंवाली, सुन्दर वस्त्र और मृगचर्मसे सुशोभित, दूध देनेवाली, कांस्यदोहनीसे युक्त सवत्सा गौका वाराणसीमें वेदपारङ्गत ब्राह्मणको दान करता है, वह अपनी सात पीढ़ियोंको तार देता है—इसमें संदेह नहीं है। वरानने! जो उस क्षेत्रमें थोड़ा अथवा अधिक मात्रामें सुवर्ण, रजत, वस्त्र, अन्न आदि ब्राह्मणको दान करता है, सुलोचने! उसका वह दान अक्षय एवं अविनाशी हो जाता है। महाभागे! इस तीर्थकी वास्तविक विभूति और विशिष्ट फलको सुनो। वहाँ स्नान कर मनुष्य रोगरहित हो जाते हैं। वरानने! दस अश्वमेध याग करनेसे मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, वह उस धर्मात्मा व्यक्तिको वहाँ स्नान करनेसे ही प्राप्त हो जाता है। जो वेदके पारङ्गत ब्राह्मणको अधिक या स्वल्प—जो भी अपनी शक्तिके अनुसार दान देता है, उस दानसे उसे शुभ गति प्राप्त होती है और वह अग्निके समान तेजस्वी हो जाता है। जो संसारमें प्रसिद्ध वरुणा-असी और गङ्गाके संगमपर विधानपूर्वक अन्नका दान देता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। देवि! मैंने इस तीर्थका यह उत्तम फल तुम्हें बतला दिया॥६७—७४॥ |
| पुनरन्यत् प्रवक्ष्यामि तीर्थस्य फलमुत्तमम्।<br>उपवासं तु यः कृत्वा विप्रान् संतर्पयेन्नरः।<br>सौत्रामणेश्च यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ७५<br>एकाहारस्तु यस्तिष्ठेन्मासं तत्र वरानने।<br>यावज्जीवकृतं पापं सहसा तस्य नश्यति॥ ७६ | अब मैं पुनः इस तीर्थका अन्य उत्तम फल बतला रहा हूँ। जो मनुष्य इस तीर्थमें उपवासपूर्वक विप्रोंको भलीभाँति तृप्त करता है, वह मानव सौत्रामणि नामक यज्ञका फल प्राप्त करता है। वरानने! जो वहाँ एक मासतक एक समय भोजन कर जीवन व्यतीत करता है, उसका जीवनपर्यन्त किया हुआ पाप अनायास ही नष्ट हो |
| * अध्याय १८३ * | ७६३ |
|---|---|
| अग्निप्रवेशं ये कुर्युुरविमुक्ते विधानतः ।<br>प्रविशन्ति मुखं ते मे निःसंदिग्धं वरानने ॥ ७७<br>कुर्वन्त्यनशनं ये तु मद्भक्ताः कृतनिश्चयाः ।<br>न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि ॥ ७८<br>अर्चयेद् यस्तु मां देवि अविमुक्ते तपोवने ।<br>तस्य धर्मं प्रवक्ष्यामि यदवाप्नोति मानवः ॥ ७९<br>दशाश्वमेधिकं पुण्यं लभते नात्र संशयः ।<br>दशसौवर्णिकं पुष्पं योऽविमुक्ते प्रयच्छति ॥ ८०<br>अग्निहोत्रफलं धूपे गन्धदाने तथा शृणु ।<br>भूमिदानेन तत्तुल्यं गन्धदानफलं स्मृतम् ॥ ८१<br>सम्मार्जने पञ्चशतं सहस्रमनुलेपने ।<br>मालया शतसाहस्रमनन्तं गीतवाद्यतः ॥ ८२ | जाता है। वरानने! जो इस अविमुक्तक्षेत्रमें विधानपूर्वक अग्निमें प्रवेश कर जाते हैं, वे निश्चय ही मेरे मुखमें प्रवेश करते हैं, जो मेरे भक्त यहाँ दृढ़ निश्चयपूर्वक निराहार रहते हैं उनका सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी पुनः संसारमें आगमन नहीं होता। देवि! जो इस अविमुक्त तपोवनमें मेरी पूजा करता है, उसका धर्म बतला रहा हूँ, जो उस मनुष्यको प्राप्त होता है। वह निःसंदेह दस अश्वमेध यागके फलको प्राप्त करता है। जो इस अविमुक्तमें दस सुवर्णनिर्मित पुष्पका दान करता है तथा वहाँ धूप दान करता है, उसे अग्निहोत्रका फल प्राप्त होता है। अब गन्धदानका फल सुनो। भूमिदानके समान ही गन्ध-दानका फल कहा गया है। भलीभाँति स्नान करनेपर पाँच सौ, चन्दन लगानेसे एक हजार, माला समर्पण करनेसे एक लाख और गाने-बजानेसे अनन्त अग्निहोत्रके फलकी प्राप्ति होती है॥ ७५–८२॥ |
| देव्युवाच<br>अत्यद्भुतमिदं देवं स्थानमेतत् प्रकीर्तितम् ।<br>रहस्यं श्रोतुमिच्छामि यदर्थं त्वं न मुञ्चसि ॥ ८३ | **देवीने पूछा—**देव! जैसा आपने बतलाया है, सचमुच ही यह स्थान अतिशय अद्भुत है। अब मैं उस रहस्यको सुनना चाहती हूँ, जिसके कारण आप इस स्थानको नहीं छोड़ते॥ ८३॥ |
| ईश्वर उवाच<br>आसीत् पूर्वं वरारोहे ब्रह्मणस्तु शिरो वरम् ।<br>पञ्चमं शृणु सुश्रोणि जातं काञ्चनसप्रभम् ॥ ८४<br>ज्वलत् तत् पञ्चमं शीर्षं जातं तस्य महात्मनः ।<br>तदेवमब्रवीद् देवि जन्म जानामि ते ह्यहम् ॥ ८५<br>ततः क्रोधपरीतेन संरक्तनयनेन च ।<br>वामाङ्गुष्ठनखाग्रेण च्छिन्नं तस्य शिरो मया ॥ ८६ | **ईश्वरने कहा—**सुन्दर कटिभागवाली वरारोहे! सुनो। प्राचीनकालमें ब्रह्माका सुवर्णके समान कान्तिमान् पाँचवाँ सुन्दर सिर उत्पन्न हुआ। देवि! उस महात्माके उत्पन्न हुए उस पाँचवें देदीप्यमान मुखने इस प्रकार कहा कि मैं तुम्हारा जन्म जानता हूँ। यह सुनकर मैं क्रोधसे परिव्याप्त हो गया और मेरी आँखें लाल हो गयीं। तब मैंने बायें अँगूठेके नखके अग्रभागसे उनके सिरको काट दिया॥ ८४–८६॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>यदा निरपराधस्य शिरश्छिन्नं त्वया मम ।<br>तस्माच्छापसमायुक्तः कपाली त्वं भविष्यसि ।<br>ब्रह्महत्याकुलो भूत्वा चर तीर्थानि भूतले ॥ ८७ | **ब्रह्मा बोले—**आपने बिना अपराधके ही मेरा सिर काट दिया है, अतः आप भी शापसे युक्त हो कपाली हो जायँगे। साथ ही आप ब्रह्महत्यासे व्याकुल होकर भूतलपर तीर्थोंमें भ्रमण कीजिये। |
| ततोऽहं गतवान् देवि हिमवन्तं शिलोच्चयम् ।<br>तत्र नारायणः श्रीमान् मया भिक्षां प्रयाचितः ॥ ८८<br>ततस्तेन स्वकं पार्श्वं नखाग्रेण विदारितम् ।<br>स्रवतो महती धारा तस्य रक्तस्य निःसृता ॥ ८९<br>प्रयाता सातिविस्तीर्णा योजनार्धशतं तदा ।<br>न सम्पूर्णं कपालं तु घोरमद्भुतदर्शनम् ॥ ९० | देवि! तब मैं हिमालय पर्वतपर चला गया और वहाँ मैंने श्रीमान् नारायणसे भिक्षाकी याचना की। इसके बाद उन्होंने नखके अग्रभागसे अपने पार्श्वभागको विदीर्ण कर दिया, तब उससे रक्तकी विपुल धारा प्रवाहित हुई। वह धारा बहती हुई पचास योजनतक परिव्याप्त हो गयी, किंतु भयंकर दीखनेवाला अद्भुत कपाल उससे नहीं भरा। |
७६४ * मत्स्यपुराण *
| दिव्यं वर्षसहस्रं तु सा च धारा प्रवाहिता।<br>प्रोवाच भगवान् विष्णुः कपालं कुत ईदृशम्॥ ९१<br>आश्चर्यभूतं देवेश संशयो हृदि वर्तते।<br>कुतश्च सम्भवो देव सर्वं मे ब्रूहि पृच्छतः॥ ९२ | इस प्रकार वह धारा हजार दिव्य वर्षोंतक अनवरत प्रवाहित होती रही। तब भगवान् विष्णुने पूछा कि 'ऐसा अद्भुत कपाल आपको कहाँसे प्राप्त हुआ है? देवेश! मेरे हृदयमें संदेह हो रहा है। देव! यह कहाँसे उत्पन्न हुआ? मुझ प्रश्नकर्ताको सभी बातें बतलाइये'॥ ८७—९२॥ |
|---|---|
| देवदेव उवाच<br>श्रूयतामस्य हे देव कपालस्य तु सम्भवः।<br>शतं वर्षसहस्त्राणां तपस्तप्त्वा सुदारुणम्॥ ९३<br>ब्रह्मासृजद् वपुर्दिव्यमद्भुतं लोमहर्षणम्।<br>तपसश्च प्रभावेण दिव्यं काञ्चनसंनिभम्॥ ९४<br>ज्वलत् तत् पञ्चमं शीर्षं जातं तस्य महात्मनः।<br>निकृत्तं तन्मया देव तदिदं पश्य दुर्जयम्॥ ९५<br>यत्र यत्र च गच्छामि कपालं तत्र गच्छति।<br>एवमुक्तस्ततो देवः प्रोवाच पुरुषोत्तमः॥ ९६ | **(तब) देवाधिदेव शंकर बोले—**देव! आप इस कपालकी उत्पत्तिका विवरण सुनिये। ब्रह्माने सौ हजार वर्षोंतक अतिशय घोर तपस्या कर दिव्य रोमाञ्चकारी अद्भुत शरीरकी रचना की। उन महात्मा ब्रह्माके शरीरमें तपस्याके प्रभावसे सुवर्णके समान देदीप्यमान पाँचवाँ सिर उत्पन्न हुआ। देव! मैंने उसे काट दिया। यह वही दुर्जय कपाल है। अब देखिये, मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ, वहाँ यह कपाल भी मेरे पीछे लगा रहता है। (इस प्रकार) ऐसा कहे जानेपर पुरुषोत्तमभगवान्ने तब कहा—॥ ९३—९६॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>गच्छ गच्छ स्वकं स्थानं ब्रह्माणस्त्वं प्रियं कुरु।<br>तस्मिन् स्थास्यति भद्रं ते कपालं तस्य तेजसा॥ ९७<br>ततः सर्वाणि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च।<br>गतोऽस्मि पृथुलश्रोणि न क्वचित् प्रत्यतिष्ठत॥ ९८<br>ततोऽहं समनुप्राप्तो ह्यविमुक्ते महाशये।<br>अवस्थितः स्वके स्थाने शापश्च विगतो मम॥ ९९<br>विष्णुप्रसादात् सुश्रोणि कपालं तत् सहस्रधा।<br>स्फुटितं बहुधा जातं स्वप्नलब्धं धनं यथा॥ १००<br>ब्रह्महत्यापहं तीर्थं क्षेत्रमेतन्मया कृतम्।<br>कपालमोचनं देवि देवानां प्रथितं भुवि॥ १०१<br>कालो भूत्वा जगत् सर्वं संहरामि सृजामि च।<br>ततस्तत् पतितं तत्र शापश्च विगतो मम॥ १०२<br>कपालमोचनं तीर्थमभूद्ब्रह्महत्याविनाशनम्।<br>मद्भक्तास्तत्र गच्छन्ति विष्णुभक्तास्तथैव च॥ १०३<br>तत्रस्थोऽस्मि जगत् सर्वं सुकरोमि सुरेश्वरि।<br>देवेशि सर्वगुह्यानां स्थानं प्रियतरं मम॥ १०४<br>ये भक्ता भास्करे देवि लोकनाथे दिवाकरे।<br>तत्रस्थो यस्त्यजेद् देहं मामेव प्रविशेत् तु सः॥ १०५ | **श्रीभगवान् बोले—**जाइये, आप अपने स्थानको लौट जाइये और ब्रह्माको प्रसन्न कीजिये। उनके तेजसे आपका यह श्रेष्ठ कपाल वहीं स्थित हो जायगा। पृथुल-श्रोणि! इसके बाद मैं सभी तीर्थों और पुण्य क्षेत्रोंमें गया, परंतु यह कहीं भी ठहर न सका। तत्पश्चात् मैं अतिशय प्रभावशाली अविमुक्तक्षेत्रमें पहुँचा। वह वहाँ अपने स्थानपर स्थित हो गया और मेरा शाप समाप्त हो गया।<br>सुश्रोणि! विष्णुकी कृपासे वह कपाल स्वप्नमें प्राप्त हुए धनके समान हजारों टुकड़ोंमें टूट-फूट गया। देवि! मैंने इस तीर्थको ब्रह्महत्याको दूर करनेवाला बना दिया। यह भूतलपर देवताओंके लिये कपालमोचनतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। मैं कालके रूपमें उत्पन्न होकर सम्पूर्ण विश्वका संहार और सृजन करता हूँ। इस प्रकार वह कपाल इस क्षेत्रमें गिरा और मेरा शाप नष्ट हुआ। इसी कारण यह कपालमोचनतीर्थ ब्रह्महत्याका विनाशक हुआ। सुरेश्वरि! मैं वहीं स्थित हूँ और सम्पूर्ण विश्वका कल्याण करता हूँ। देवेशि! सभी गुप्त स्थानोंमें यह अविमुक्तक्षेत्र मेरे लिये प्रियतर है। देवि! वहाँ मेरे भक्त, विष्णुभक्त और जो लोकनाथ प्रभाशाली सूर्यके भक्त हैं, वे सभी जाते हैं। जो वहाँ रहकर शरीरका त्याग करता है, वह मुझमें ही प्रविष्ट हो जाता है॥ ९७—१०५॥ |
| * अध्याय १८४ * | ७६५ |
|---|
| देव्युवाच | देवीने कहा—महाकान्तिशाली देव ! ब्रह्माद्वारा कथित यह विषय अत्यद्भुत है। त्रिपुरका विनाश करनेवाले शिवजीका यह प्रिय गुह्य स्थान है। अन्य जितने उत्तम तीर्थस्थान हैं, वे सभी उस स्थानकी सोलहवीं कलाकी समता नहीं कर सकते। जहाँ देवेश भगवान् शंकर निवास करते हैं तथा जिससे हजारों तीर्थोंसे श्रेष्ठ गङ्गाकी तुलना नहीं हो सकती, वह भी यहीं स्थित है। देवेश ! आप ही (ज्ञानात्मिका) भक्ति हैं और आप ही उत्तम गति हैं। देव ! आपने ब्रह्मा आदिकी जो सनातनी गति बतलायी है, जिसे भक्त एवं द्विजातिगण सुनते हैं, वह सब भी आपकी ही अनुकम्पा है ॥ १०६–१०९ ॥ |
| अत्यद्भुतमिदं देव यदुक्तं पद्मयोनिना।<br>त्रिपुरान्तकरस्थानं गुह्यमेतन्महाद्युते ॥ १०६<br>यान्यन्यानि सुतीर्थानि कलां नार्हन्ति षोडशीम्।<br>यत्र तिष्ठति देवेशो यत्र तिष्ठति शङ्करः ॥ १०७<br>गङ्गा तीर्थसहस्राणां तुल्या भवति वा न वा।<br>त्वमेव भक्तिर्देवेश त्वमेव गतिरुत्तमा ॥ १०८<br>ब्रह्मादीनां तु ते देव गतिरुक्ता सनातनी।<br>श्राव्यते यद् द्विजातीनां भक्तानामनुकम्पया ॥ १०९ | |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽविमुक्तमाहात्म्ये त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अविमुक्तमाहात्म्यमें एक सौ तिरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १८३ ॥
एक सौ चौरासीवाँ अध्याय
काशीकी महिमाका वर्णन
| महेश्वर उवाच | भगवान् शिवने कहा—अविमुक्त-निवासियोंके इस परम श्रेष्ठ स्थानको जानकर पुनः संसारमें जन्मकी आकाङ्क्षा न रखनेवाले अनेक सिद्धगणोंने इस स्थानमें निवास किया है। महादेवका यह अतिशय गुह्य स्थान श्रेष्ठ तीर्थ तथा तपोवनस्वरूप है। जो लोग उस उत्तम क्षेत्रमें जाते हैं, वे पुनः संसारमें जन्म नहीं ग्रहण करते। सत्पुरुषोंद्वारा परमानन्दको प्राप्त करनेके इच्छुक तथा ज्ञानमें निष्ठा रखनेवाले व्यक्तियोंकी जो गति बतलायी गयी है, वह अविमुक्तक्षेत्रमें मरनेवालेको प्राप्त होती है। इस अविमुक्तक्षेत्रमें भगवान् शंकरकी अनुपम और अनुत्तम प्रीति है, अतः यहाँ जानेसे असंख्य फल और अक्षय गतिकी प्राप्ति होती है। (महा) श्मशानके* नामसे प्रसिद्ध यह अविमुक्त परम गुह्य कहा गया है। भूतलपर जो मनुष्य इसका सेवन नहीं करते, वे वस्तुतः ठगे गये हैं। अविमुक्तक्षेत्रमें स्थित वायुद्वारा उड़ायी गयी पवित्र धूलके स्पर्शसे अतिशय दुष्कर्म करनेवाले व्यक्ति भी परम गतिको प्राप्त हो जाते हैं। जहाँ स्वयं भगवान् शंकर निवास करते हैं, उस अविमुक्तकी अनुपम महिमा होनेके कारण देवता, दानव और मनुष्य उसका वर्णन नहीं कर सकते। |
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| सेवितं बहुभिः सिद्धैरपुनर्भवकाङ्क्षिभिः।<br>विदित्वा तु परं क्षेत्रमविमुक्तनिवासिनाम् ॥ १<br>तद् गुह्यं देवदेवस्य तत् तीर्थं तत् तपोवनम्।<br>परं स्थानं तु ते यान्ति सम्भवन्ति न ते पुनः ॥ २<br>ज्ञाने विहितनिष्ठानां परमानन्दमिच्छताम्।<br>या गतिर्विहिता सद्भिः साविमुक्ते मृतस्य तु ॥ ३<br>भवस्य प्रीतिरतुला ह्यविमुक्ते ह्यनुत्तमा।<br>असंख्येयं फलं तत्र ह्यक्षया च गतिर्भवेत् ॥ ४<br>परं गुह्यं समाख्यातं श्मशानमिति संज्ञितम्।<br>अविमुक्तं न सेवन्ते वञ्चितास्ते नरा भुवि ॥ ५<br>अविमुक्ते स्थितैः पुण्यैः पांशुभिर्वायुनेरितैः।<br>अपि दुष्कृतकर्माणो यास्यन्ति परमां गतिम् ॥ ६<br>अविमुक्तगुणान् वक्तुं देवदानवमानवैः।<br>न शक्यतेऽप्रमेयत्वात् स्वयं यत्र भवः स्थितः ॥ ७ |
* काशीखण्ड एवं काशीरहस्यादिके अनुसार प्रलयकालमें सभी प्राणियोंके शमन करनेसे इसका नाम महाश्मशान है।
| ७६६ | * मत्स्यपुराण * |
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| अनाहिताग्निर्नो यष्टा नोऽशुचिस्तस्कुरोऽपि वा।<br>अविमुक्ते वसेद् यस्तु स वसेदीश्वरालये॥ ८<br>तत्र नापुण्यकृत् कश्चित् प्रसादादीश्वरस्य च।<br>अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि स्त्रिया वा पुरुषेण वा॥ ९<br>यत्किञ्चिदशुभं कर्म कृतं मानुषबुद्धिना।<br>अविमुक्ते प्रविष्टस्य तत्सर्वं भस्मसाद् भवेत्॥ १० | जो अग्निका आधान नहीं करता, यज्ञ नहीं करता, अपवित्र या चोर है, वह भी यदि अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करता है तो मानो महेश्वरके लोकमें ही निवास कर रहा है। महेश्वरकी कृपासे वहाँ कोई भी पापकर्म नहीं करता। स्त्री अथवा पुरुषद्वारा मानव-बुद्धिके अनुसार जान या अनजानमें भी जो कुछ दुष्कर्म किया होता है, वह सब अविमुक्तक्षेत्रमें प्रवेश करते ही भस्म हो जाता है॥ ८—१०॥ |
| सरितः सागराः शैलास्तीर्थान्यायतनानि च।<br>भूतप्रेतपिशाचाश्च गणा मातृगणास्तथा॥ ११<br>श्मशानिकपरीवाराः प्रियास्तस्य महात्मनः।<br>न ते मुञ्चन्ति भूतेशं तान् भवस्तु न मुञ्चति॥ १२<br>रमते च गणैः सार्धमविमुक्ते स्थितः प्रभुः।<br>दृष्टैतान् भीतकृपणान् पापदुष्कृतकारिणः॥ १३<br>अनुकम्पया तु देवस्य प्रयान्ति परमां गतिम्।<br>भक्तानुकम्पी भगवांस्तिर्यग्यौनिगतानपि॥ १४<br>नयत्येव वरं स्थानं यत्र यान्ति च याज्ञिकाः।<br>भार्गवाङ्गिरसः सिद्धा ऋषयश्च महाव्रताः॥ १५<br>अविमुक्ताग्निना दग्धा अग्नौ तूलमिवाहितम्।<br>न सा गतिः कुरुक्षेत्रे गङ्गाद्वारे च पुष्करे॥ १६<br>सा गतिर्विहिता पुंसामविमुक्तनिवासिनाम्।<br>तिर्यग्योनिगताः सत्त्वा येऽविमुक्ते कृतालयाः।<br>कालेन निधनं प्राप्तास्ते यान्ति परमां गतिम्॥ १७<br>मेरुमन्दरमात्रोऽपि राशिः पापस्य कर्मणः।<br>अविमुक्तं समासाद्य तत् सर्वं व्रजति क्षयम्॥ १८ | नदियाँ, सागर, पर्वत, तीर्थ, देवालय, भूत, प्रेत, पिशाच, शिवगण, मातृगण तथा श्मशान-निवासी—ये सभी उन महात्मा शिवको प्रिय हैं, अतः न तो वे भूतपति शिवको छोड़ते हैं और न शिव उनका परित्याग करते हैं। अविमुक्तमें स्थित वे प्रभु अपने प्रमथगणोंके साथ रमण करते हैं। भयसे त्रस्त, पापी, दुराचाररत अथवा तिर्यग्योनिमें ही क्यों न उत्पन्न हुए हों, वे सभी अविमुक्तको देखकर महादेवकी अनुकम्पासे परम गतिको प्राप्त हो जाते हैं। भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाले भगवान् शंकर उन सभीको ऐसे श्रेष्ठ स्थानपर पहुँचा देते हैं, जहाँ यज्ञ करनेवाले, भृगुवंशी, अंगिरागोत्री, सिद्ध तथा महाव्रती ऋषिगण जाते हैं। उनके पाप अग्निमें डाली गयी रूईके समान अविमुक्तकी अग्निसे नष्ट हो जाते हैं। अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करनेवाले पुरुषोंकी जो गति बतलायी गयी है, वह गति कुरुक्षेत्र, गङ्गाद्वार और पुष्कर तीर्थमें नहीं मिलती। तिर्यग्योनिमें उत्पन्न हुए जो जीव अविमुक्तमें निवास करते हैं, वे समयानुसार मृत्युको प्राप्त होनेपर परमगतिको प्राप्त करते हैं। चाहे मेरु या मन्दराचलके बराबर भी पापकर्मकी राशि क्यों न हो, वह सब-का-सब पाप अविमुक्तमें आते ही नष्ट हो जाता है॥ ११—१८॥ |
| श्मशानमिति विख्यातमविमुक्तं शिवालयम्।<br>तद् गुह्यं देवदेवस्य तत् तीर्थं तत् तपोवनम्॥ १९<br>तत्र ब्रह्मादयो देवा नारायणपुरोगमाः।<br>योगिनश्च तथा साध्या भगवन्तं सनातनम्॥ २०<br>उपासन्ते शिवं मुक्ता मद्भक्ता मत्परायणाः।<br>या गतिर्ज्ञानतपसां या गतिर्यज्ञयाजिनाम्॥ २१<br>अविमुक्ते मृतानां तु सा गतिर्विहिता शुभा।<br>संहर्तारश्च कर्तारस्तस्मिन् ब्रह्मादयः सुराः॥ २२ | शिवजीका यह निवासस्थान अविमुक्त श्मशानके नामसे विख्यात है। उन देवाधिदेवका वह परम गुप्त स्थान है, वह तीर्थ है और वह तपोवन है। वहाँ नारायणसहित ब्रह्मा आदि देवगण, योगिसमूह, साध्यगण तथा जीवन्मुक्त शिवपरायण शिवभक्त सनातन भगवान् शिवकी उपासनामें रत रहते हैं। ज्ञानसम्पन्न तपस्वियों तथा यज्ञोंका विधानपूर्वक अनुष्ठान करनेवालोंको जो गति प्राप्त होती है, वही शुभ गति अविमुक्तमें मरनेवालोंके लिये कही गयी है। जगत्की सृष्टि करनेवाले तथा जगत्का संहार करनेवाले ब्रह्मा |
- अध्याय १८४ * ७६७
| सम्राड्विराण्मया लोका जायन्ते ह्यपुनर्भवाः।<br>महर्जनस्तपश्चैव सत्यलोकस्तथैव च॥ २३<br>मनसः परमो योगो भूतभव्यभवस्य च।<br>ब्रह्मादिस्थावरान्तस्य योनिः सांख्यादिमोक्षयोः॥ २४<br>येऽविमुक्तं न मुञ्चन्ति नरास्ते नैव वञ्चिताः।<br>उत्तमं सर्वतीर्थानां स्थानानामुत्तमं च यत्॥ २५<br>क्षेत्राणामुत्तमं चैव श्मशानानां तथैव च।<br>तटाकानां च सर्वेषां कूपानां स्रोतसां तथा॥ २६<br>शैलानामुत्तमं चैतत् तडागानां तथोत्तमम्।<br>पुण्यकृद्भवभक्तैश्च ह्यविमुक्तं तु सेव्यते॥ २७ | आदि देवगण एवं सम्राट्, विराट् आदि मानवसमूह एवं महः, जन, तप और सत्यलोकमें निवास करनेवाले प्राणी अविमुक्तक्षेत्रमें आकर पुनर्जन्मसे छुटकारा पा जाते हैं। यह मनका तथा भूत, भविष्य और वर्तमानका, परम योग है और ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त सभी प्राणिसमूहका तथा सांख्य आदि मोक्षका उत्पत्तिस्थान है। जो मनुष्य इस अविमुक्तका परित्याग नहीं करते, वे वञ्चित नहीं हैं। यह अविमुक्तक्षेत्र सभी तीर्थों, स्थानों, क्षेत्रों, श्मशानों, सरोवरों, सभी कूपों, नालों, पर्वतों और जलाशयोंमें उत्तम है। पुण्यकर्मा शिव-भक्त अविमुक्तका ही सेवन करते हैं॥ १९–२७॥ |
| ब्रह्मणः परमं स्थानं ब्रह्मणाध्यासितं च यत्।<br>ब्रह्मणा सेवितं नित्यं ब्रह्मणा चैव रक्षितम्॥ २८<br>अत्रैव सप्तभुवनं काञ्चनो मेरुपर्वतः।<br>मनसः परमो योगः प्रीत्यर्थं ब्रह्मणः स तु॥ २९<br>ब्रह्मा तु तत्र भगवांस्त्रिसंध्यं चेश्वरे स्थितः।<br>पुण्यात् पुण्यतमं क्षेत्रं पुण्यकृद्भिर्निषेवितम्॥ ३०<br>आदित्योपासनं कृत्वा विप्राश्चामरतां गताः।<br>अन्येऽपि ये त्रयो वर्णा भवभक्त्या समाहिताः॥ ३१<br>अविमुक्ते तनुं त्यक्त्वा गच्छन्ति परमां गतिम्।<br>अष्टौ मासान् विहारस्य यतीनां संयतात्मनाम्॥ ३२<br>एकत्र चतुरो मासान् मासौ वा निवसेत् पुनः।<br>अविमुक्ते प्रविष्टानां विहारस्तु न विद्यते॥ ३३<br>न देहो भविता तत्र दृष्टं शास्त्रे पुरातने।<br>मोक्षो ह्यसंशयस्तत्र पञ्चत्वं तु गतस्य वै॥ ३४<br>स्त्रियः पतिव्रता याश्च भवभक्ताः समाहिताः।<br>अविमुक्ते विमुक्तास्ता यास्यन्ति परमां गतिम्॥ ३५<br>अन्या याः कामचारिण्यः स्त्रियो भोगपरायणाः।<br>कालेन निधनं प्राप्ता गच्छन्ति परमां गतिम्॥ ३६ | यह ब्रह्माका परमस्थान, ब्रह्माद्वारा अध्यासित, ब्रह्माद्वारा सदा सेवित और ब्रह्माद्वारा रक्षित है। ब्रह्माकी प्रसन्नताके लिये यहीं सातों भुवन और सुवर्णमय सुमेरु पर्वत है। यहीं मनका परम योग प्राप्त होता है। इस क्षेत्रमें भगवान् ब्रह्मा तीनों सन्ध्याओंमें शिवके ध्यानमें लीन रहते हैं। यह क्षेत्र पुण्यसे भी पुण्यतम है और पुण्यात्माओंद्वारा सेवित है। यहाँ आदित्यकी उपासना करके विप्रगण अमर हो गये हैं। जो अन्य तीनों वर्णोंके प्राणी हैं, वे भी शिव-भक्तिसे युक्त हो अविमुक्तक्षेत्रमें शरीरका परित्याग कर परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। संयत आत्मावाले यतियोंके लिये आठ मासोंका विहार विहित है। वे (चातुर्मासमें) एक स्थानमें केवल चार मास या दो मासतक निवास कर सकते हैं, किंतु अविमुक्तमें निवास करनेवाले यतियोंके लिये (यह) विहारका विधान नहीं है। (वे काशीमें सदा निवास कर सकते हैं।) प्राचीन शास्त्रमें ऐसा देखा गया है कि यहाँ मरनेवालेका पुनर्जन्म नहीं होता, वह निस्संदेह मोक्षको प्राप्त हो जाता है। जो पतिव्रता स्त्रियाँ शिवजीकी भक्तिमें लीन हैं, वे इस अविमुक्तमें शरीरका त्याग कर परमगतिको प्राप्त हो जाती हैं। इनसे अतिरिक्त जो कामपरायण एवं भोगमें आसक्त स्त्रियाँ हैं, वे इस क्षेत्रमें यथासमय मृत्युको प्राप्त होकर परम गतिको प्राप्त हो जाती हैं॥ २८–३६॥ |
| यत्र योगश्च मोक्षश्च प्राप्यते दुर्लभो नरैः।<br>अविमुक्तं समासाद्य नान्यद् गच्छेत् तपोवनम्॥ ३७ | जहाँ मनुष्य दुर्लभ योग और मोक्षको प्राप्त करते हैं, उस अविमुक्तक्षेत्रमें पहुँचकर किसी अन्य तपोवनमें जानेकी आवश्यकता नहीं है। |
१८६- नर्मदा-माहात्म्यका उपक्रम
७६८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सर्वात्मना तपः सेव्यं ब्राह्मणैर्नात्र संशयः।<br>अविमुक्ते वसेद् यस्तु मम तुल्यो भवेन्नरः॥ ३८<br><br>यतो मया न मुक्तं हि त्वविमुक्तं ततः स्मृतम्।<br>अविमुक्तं न सेवन्ते मूढा ये तमसावृताः॥ ३९<br><br>विण्मूत्ररेतसां मध्ये ते वसन्ति पुनः पुनः।<br>कामः क्रोधश्च लोभश्च दम्भः स्तम्भोऽतिमत्सरः॥ ४०<br><br>निद्रा तन्द्रा तथाऽऽलस्यं पैशुन्यमिति ते दश।<br>अविमुक्ते स्थिता विघ्नाः शक्रेण विहिताः स्वयम्॥ ४१<br><br>विनायकोपसर्गाश्च सततं मूर्ध्नि तिष्ठति।<br>पुण्यमेतद् भवेत् सर्वं भक्तानामनुकम्पया॥ ४२<br><br>परं गुह्यमिति ज्ञात्वा ततः शास्त्रानुदर्शनात्।<br>व्याहृतं देवदेवैस्तु मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः॥ ४३<br><br>मेदसा विप्लुता भूमिरविमुक्ते तु वर्जिता।<br>पूता सम्भवत् सर्वा महादेवेन रक्षिता॥ ४४<br><br>संस्कारस्तेन क्रियते भूमेरन्यत्र सूरिभिः।<br>ये भक्त्या वरदं देवमक्षरं परमं पदम्॥ ४५<br><br>देवदानवगन्धर्वयक्षरक्षोमहोरगाः ।<br>अविमुक्तमुपासन्ते तन्निष्ठास्तत्परायणाः॥ ४६<br><br>ते विशन्ति महादेवमाज्याहुतिरिवानलम्।<br>तं वै प्राप्य महादेवमीश्वराध्युषितं शुभम्॥ ४७<br><br>अविमुक्तं कृतार्थोऽस्मीत्यात्मानमुपलब्धते। | ब्राह्मणोंको यहाँ निःसन्देह सर्वभावसे तपस्यामें तत्पर रहना चाहिये। जो मनुष्य अविमुक्तमें निवास करता है, वह मेरे समान हो जाता है; क्योंकि मैं इस स्थानको कभी नहीं छोड़ता, इसीलिये यह अविमुक्त नामसे कहा जाता है। जो मोहग्रस्त पुरुष तमोगुणसे आवृत हो अविमुक्तमें निवास नहीं करते, वे मल-मूत्र-वीर्यके मध्यमें पुनः-पुनः निवास करते हैं। (अर्थात् उन्हें बारंबार जन्म लेना पड़ता है)। काम, क्रोध, लोभ, दम्भ, स्तम्भ, अतिशय मात्सर्य, निद्रा, तन्द्रा, आलस्य तथा पिशुनता—ये दस विघ्न जो स्वयं इन्द्रद्वारा विहित हैं, अविमुक्तमें स्थित रहते हैं। इनके अतिरिक्त विनायकोंके उपद्रव निरन्तर सिरपर सवार रहते हैं, किंतु ये सभी भक्तोंके प्रति भगवान्की अनुकम्पाके कारण पुण्यफल प्रदान करते हैं, क्योंकि श्रेष्ठ देवताओं और तत्त्वद्रष्टा मुनियोंके द्वारा शास्त्रकी आलोचनाके आधारपर इस स्थानको परम गुह्य कहा गया है। (प्राचीनकालमें मधु-कैटभकी) मज्जासे सम्पूर्ण पृथ्वी व्याप्त हो गयी थी, किंतु अविमुक्तकी भूमि उससे रहित थी। महादेवजीके द्वारा रक्षित यह सम्पूर्ण भूमि पवित्र ही बनी रही। इसीलिये (कल्पसूत्रोक्त-रीतिसे) मनीषिगण अन्यत्र भूमिका संस्कार करते हैं। जो देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और प्रधान नाग भगवान् भवमें निष्ठा रखते हुए उनकी भक्तिमें तत्पर हो अविमुक्तक्षेत्रमें आकर भक्तिपूर्वक वरप्रदान करनेवाले अविनाशी परमपदस्वरूप शंकरकी उपासना करते हैं, वे महादेवमें उसी प्रकार प्रवेश कर जाते हैं, जैसे घीकी आहुति अग्निमें प्रविष्ट होती है। वे उन महादेवको तथा ईश्वरद्वारा अधिकृत शुभमय अविमुक्तको पाकर अपनेको 'मैं कृतार्थ हूँ'—ऐसा अनुभव करते हैं॥ ३७–४७ १/२ ॥ |
| ऋषिदेवासुरगणैर्जपहोमपरायणैः ॥ ४८<br><br>यतिभिर्मोक्षकामैश्च ह्यविमुक्तं निषेव्यते।<br>नाविमुक्ते मृतः कश्चिन्नरकं याति किल्बिषी॥ ४९<br><br>ईश्वरानुगृहीता हि सर्वे यान्ति परां गतिम्।<br>द्वियोजनमथार्धं च तत् क्षेत्रं पूर्वपश्चिमम्॥ ५० | ऋषि, देव, असुर तथा जप-होमपरायण मुमुक्षु और यतिसमूह इस अविमुक्तमें निवास करते हैं। कोई भी पापी अविमुक्तक्षेत्रमें मरकर नरकमें नहीं जाता; क्योंकि ईश्वरके अनुग्रहसे वे सभी परमगतिको प्राप्त होते हैं। यह क्षेत्र पूर्वसे पश्चिमतक ढाई योजन और |
* अध्याय १८४ * ७६९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अर्धयोजनविस्तीर्णं दक्षिणोत्तरतः स्मृतम्।<br>वाराणसी तदीया च यावच्छुक्लनदी तु वै॥ ५१<br><br>एष क्षेत्रस्य विस्तारः प्रोक्तो देवेन धीमता।<br>लब्ध्वा योगं च मोक्षं च काङ्क्षन्तो ज्ञानमुत्तमम्॥ ५२<br><br>अविमुक्तं न मुञ्चन्ति तन्निष्ठास्तत्परायणाः।<br>तस्मिन् वसन्ति ये मर्त्या न ते शोच्याः कदाचन॥ ५३<br><br>योगक्षेत्रं तपःक्षेत्रं सिद्धगन्धर्वसेवितम्।<br>सरितः सागराः शैला नाविमुक्तसमा भुवि॥ ५४<br><br>भूर्लोके चान्तरिक्षे च दिवि तीर्थानि यानि च।<br>अतीत्य वर्तते चान्यदविमुक्तं प्रभावतः॥ ५५<br><br>ये तु ध्यानं समासाद्य मुक्तात्मानः समाहिताः।<br>संनियम्येन्द्रियग्रामं जपन्ति शतरुद्रियम्॥ ५६<br><br>अविमुक्ते स्थिता नित्यं कृतार्थास्ते द्विजातयः।<br>भवभक्तिं समासाद्य रमन्ते तु सुनिश्चितम्॥ ५७<br><br>संहृत्य शक्तितः कामान् विषयेभ्यो बहिः स्थिताः।<br>शक्तितः सर्वतो मुक्ताः शक्तितस्तपसि स्थिताः॥ ५८<br><br>करणानीह चात्मानमपुनर्भवभाविताः।<br>तं वै प्राप्य महात्मानमीश्वरं निर्भयाः स्थिताः॥ ५९<br><br>न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि।<br>अविमुक्ते तु गृह्यन्ते भवेन विभुना स्वयम्॥ ६० | दक्षिणसे उत्तरतक आधा योजन विस्तृत बतलाया जाता है। यह शिवपुरी वाराणसी शुक्लनदीतक बसी हुई है। बुद्धिमान् महादेवने इस क्षेत्रका यह विस्तार स्वयं बतलाया है। शिवमें निष्ठावान् और शिवपरायण भक्तगण योग और मोक्षको प्राप्तकर उत्तम ज्ञानकी प्राप्तिके लिये अविमुक्तक्षेत्रका परित्याग नहीं करते। जो मृत्युलोकवासी व्यक्ति इस क्षेत्रमें निवास करते हैं, वे कभी भी शोचनीय नहीं होते। यह अविमुक्तक्षेत्र योगक्षेत्र है, तपःक्षेत्र है तथा सिद्ध और गन्धर्वोंसे सेवित है। भूतलपर नदी, सागर और पर्वत—कोई भी अविमुक्तके समान नहीं है। भूलोक, अन्तरिक्ष और स्वर्गमें जितने तीर्थ हैं, उनका अविमुक्त अपने प्रभावसे अतिक्रमण कर विराजमान है। अविमुक्तमें नित्य निवास करनेवाले जो द्विजगण ध्यानयोगकी प्राप्तिसे मुक्तात्मा हो समाहित चित्तसे इन्द्रियोंको निरुद्धकर शतरुद्रीका जप करते हैं, वे कृतार्थ हो जाते हैं और भवकी भक्तिको प्राप्त कर निश्चितरूपसे रमण करते हैं। जो यथाशक्ति कामनाओंका परित्याग कर विषयवासनासे रहित, यथाशक्ति सब तरहसे मुक्त, यथाशक्ति तपस्यामें स्थित तथा अपनी इन्द्रियों और आत्माको वशमें कर चुके हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। वे उन महात्मा शिवको प्राप्तकर निर्भय विचरण करते हैं। सर्वव्यापी शिव अविमुक्तमें उन व्यक्तियोंको स्वयं ग्रहण कर लेते हैं, अतः सैकड़ों कोटि कल्पोंमें भी उनका पुनरागमन नहीं होता है॥४८-६०॥ |
| उत्पादितं महाक्षेत्रं सिद्ध्यन्ते यत्र मानवाः।<br>उद्देशमात्रं कथिता अविमुक्तगुणास्तथा॥ ६१<br><br>समुद्रस्येव रत्नानामविमुक्तस्य विस्तरम्।<br>मोहनं तदभक्तानां भक्तानां भक्तिवर्धनम्॥ ६२<br><br>मूढास्ते तु न पश्यन्ति श्मशानमिति मोहिताः।<br>हन्यमानोऽपि यो विद्वान् वसेद् विघ्नशतैरपि॥ ६३<br><br>स याति परमं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति।<br>जन्ममृत्युजरामुक्तः परं याति शिवालयम्॥ ६४<br><br>अपुनर्मरणानां हि सा गतिर्मोक्षकाङ्क्षिणाम्।<br>यां प्राप्य कृतकृत्यः स्यादिति मन्येत पण्डितः॥ ६५<br><br>न दानैर्न तपोभिर्वा न यज्ञैर्नापि विद्यया।<br>प्राप्यते गतिरिष्टा या ह्यविमुक्ते तु लभ्यते॥ ६६ | इस महाक्षेत्रको (स्वयं भगवान् शिवने) उत्पन्न किया है, जहाँ मानवोंको सभी सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं। मैंने अविमुक्तके गुणोंका संक्षेपसे वर्णन किया है। अविमुक्तक्षेत्रका विस्तार समुद्रके रत्नोंकी भाँति दुष्कर है। यह अभक्तोंको मोहित करनेवाला और भक्तोंकी भक्तिकी वृद्धि करनेवाला है। मोहग्रस्त मूढ व्यक्ति इसे श्मशान समझकर इसकी ओर नहीं देखते। जो विद्वान् सैकड़ों विघ्नोंसे बाधित होकर भी अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करता है, वह उस परमपदको प्राप्त होता है, जहाँ जाकर शोक नहीं करना पड़ता। वह जन्म-जरा-मरणसे रहित होकर शिवलोकको प्राप्त हो जाता है। मोक्षकी कामना करनेवाले पुनर्जन्मसे रहित व्यक्तियोंको जो गति प्राप्त होती है, उसी गतिको प्राप्तकर विद्वान् अपनेको कृतकृत्य मानता है। जो अभीष्ट गति दान, तप, यज्ञ और ज्ञानसे नहीं प्राप्त होती, वह अविमुक्तक्षेत्रमें सुलभ हो जाती है। |
७७० * मत्स्यपुराण *
| नानावर्णा विवर्णाश्च चण्डाला ये जुगुप्सिताः।<br>किल्बिषैः पूर्णदेहाश्च प्रकृष्टैः पातकैस्तथा॥ ६७<br>भेषजं परमं तेषामविमुक्तं विदुर्बुधाः।<br>जात्यन्तरसहस्रेषु ह्यविमुक्ते म्रियेत् तु यः॥ ६८<br>भक्तो विश्वेश्वरे देवे न स भूयोऽभिजायते।<br>यत्र चेष्टं हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्॥ ६९<br>सर्वमक्षयमेतस्मिन्नविमुक्ते न संशयः।<br>कालेनोपरता यान्ति भवे सायुज्यमक्षयम्॥ ७०<br>कृत्वा पापसहस्राणि पश्चात् संतापमेत्य वै।<br>योऽविमुक्ते वियुज्येत स याति परमां गतिम्॥ ७१<br>उत्तरं दक्षिणं चापि अयनं न विकल्पयेत्।<br>सर्वस्तेषां शुभः कालो ह्यविमुक्ते म्रियन्ति ये॥ ७२<br>न तत्र कालो मीमांस्यः शुभो वा यदि वाशुभः।<br>तस्य देवस्य माहात्म्यात् स्थानमद्भुतकर्मणः।<br>सर्वेषामेव नाथस्य सर्वेषां विभुना स्वयम्॥ ७३<br>श्रुत्वेदमृषयः सर्वे स्कन्देन कथितं पुरा।<br>अविमुक्ताश्रमं पुण्यं भावयेत्करणैः शुभैः॥ ७४ | जो चाण्डालयोनिमें उत्पन्न, अनेकों रंगोंवाले, कुरूप और निन्दित हैं, जिनका शरीर उत्कृष्ट पातकों एवं पापोंसे परिपूर्ण है, उनके लिये अविमुक्तक्षेत्र परम औषधके समान है—ऐसा पण्डितवर्ग मानते हैं। जो भगवान् विश्वेश्वरका भक्त हजारों जन्मोंके बाद अविमुक्तमें मृत्युको प्राप्त होता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। इस अविमुक्तक्षेत्रमें किया हुआ यज्ञ, दान, तप, होम आदि सभी कर्म अक्षय हो जाते हैं—इसमें संदेह नहीं है। ऐसे लोग समयानुसार मृत्युको प्राप्तकर अविनाशी शिवसायुज्यको प्राप्त करते हैं। जो हजारों पापोंका सम्पादन कर बादमें पश्चात्तापका अनुभव करता है, वह अविमुक्तक्षेत्रमें प्राणोंका त्याग करके परमगतिको प्राप्त होता है। इस विषयमें उत्तरायण एवं दक्षिणायनकी कल्पना नहीं करनी चाहिये। जो अविमुक्तमें प्राण-त्याग करते हैं, उनके लिये सभी समय शुभ है। उस समय शुभ या अशुभ कालका विचार नहीं करना चाहिये। सभीके नाथ, सर्वव्यापी, अद्भुतकर्मा स्वयं महादेवके माहात्म्यसे यह स्थान परम अद्भुत है। पूर्व समयमें सभी ऋषियोंने स्कन्दद्वारा कथित इस पवित्र वृत्तान्तको सुनकर यह निर्णय किया कि इस अविमुक्तक्षेत्रका विशुद्ध इन्द्रियोंद्वारा सेवन करना चाहिये॥ ६७—७४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽविमुक्तमाहात्म्यं नाम चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥१८४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अविमुक्तमाहात्म्य-वर्णन नामक एक सौ चौरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥१८४॥
एक सौ पचासीवाँ अध्याय
वाराणसी-माहात्म्य
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
|---|---|
| अविमुक्ते महापुण्ये चास्तिकाः शुभदर्शनाः।<br>विस्मयं परमं जग्मुर्हर्षगद्गदनिःस्वनाः॥ १ | ऋषियो! अतिशय पुण्यमय अविमुक्तक्षेत्रमें आस्तिक, शुभ दर्शनवाले एवं हर्षगद्गद वाणीसे युक्त उन ऋषियोंको (इस आश्चर्यजनक आख्यानको सुनकर) महान् आश्चर्य हुआ। तब उन्होंने प्रसन्नचित्त |
| ऊचुस्ते हृष्टमनसः स्कन्दं ब्रह्मविदां वरम्।<br>ब्रह्मण्यो देवपुत्रस्त्वं ब्राह्मणो ब्राह्मणप्रियः॥ २ | होकर ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ स्कन्दजीसे कहा—भगवन्! आप ब्राह्मण-भक्त, महादेवजीके पुत्र, ब्राह्मण, ब्राह्मणोंके प्रिय, |
| * अध्याय १८५ * | ७७१ |
|---|
| ब्रह्मिष्ठो ब्रह्मविद् ब्रह्मा ब्रह्मेन्द्रो ब्रह्मलोककृत्।<br>ब्रह्मकृद् ब्रह्मचारी त्वं ब्रह्मादिर्ब्रह्मवत्सलः॥ ३<br>ब्रह्मतुल्योद्भवकरो ब्रह्मतुल्यो नमोऽस्तु ते।<br>ऋषयो भावितात्मानः श्रुत्वेदं पावनं महत्॥ ४<br><br>तत्त्वं तु परमं ज्ञातं यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते।<br>स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामो भूर्लोकं शङ्करालयम्॥ ५<br><br>यत्रासौ सर्वभूतात्मा स्थाणुभूतः स्थितः प्रभुः।<br>सर्वलोकहितार्थाय तपस्युग्रे व्यवस्थितः॥ ६<br><br>संयोज्य योगेनात्मानं रौद्रीं तनुमुपाश्रितः।<br>गुह्यकैरात्मभूतस्तु आत्मतुल्यगुणैर्वृतः॥ ७ | ब्रह्ममें स्थित, ब्रह्मज्ञ, स्वयं ब्रह्मस्वरूप, ब्रह्मेन्द्र, ब्रह्मलोककर्ता, ब्रह्मकृत्, ब्रह्मचारी, ब्रह्मासे भी पुरातन, ब्रह्मवत्सल, ब्रह्माके समान सृष्टिकर्ता और ब्रह्मतुल्य हैं, आपको नमस्कार है। इस अतिशय पवित्र कथाको सुनकर हम ऋषिगण कृतार्थ हुए। हमने उस परम तत्त्वको जान लिया, जिसे जानकर अमरत्व (मोक्ष)-की प्राप्ति होती है। आपका कल्याण हो, अब हमलोग पृथ्वीलोकमें शिवजीके उस निवासस्थानपर जा रहे हैं, जहाँ सभी जीवोंके आत्मस्वरूप सामर्थ्यशाली शिव स्थाणुरूपमें स्थित हैं। वे वहाँ सभी प्राणियोंके कल्याणकी कामनासे उग्र तपस्यामें संलग्न हैं। वे अपनेको योगयुक्त कर रुद्रभावापन्न शरीरका आश्रयण किये हुए हैं और अपने समान गुणोंसे युक्त आत्मभूत गुह्यकोंसे घिरे हुए विराजमान हैं॥ १—७॥ |
| ततो ब्रह्मादिभिर्देवैः सिद्धैश्च परमर्षिभिः।<br>विज्ञप्तः परया भक्त्या त्वत्प्रसादाद् गणेश्वर॥ ८<br><br>वस्तुमिच्छाम नियतमविमुक्ते सुनिश्चिताः।<br>एवंगुणे तथा मर्त्या ह्यविमुक्ते वसन्ति ये॥ ९<br><br>धर्मशीला जितक्रोधा निर्ममा नियतेन्द्रियाः।<br>ध्यानयोगपराः सिद्धिं गच्छन्ति परमाव्ययाम्॥ १०<br><br>योगिनो योगसिद्धाश्च योगमोक्षप्रदं विभुम्।<br>उपासते भक्तियुक्ता गुह्यं देवं सनातनम्॥ ११<br><br>अविमुक्तं समासाद्य प्राप्तयोगान्महेश्वरात्।<br>सप्त ब्रह्मर्षयो नीता भवसायुज्यमागताः॥ १२<br><br>एतत्तु परमं क्षेत्रमविमुक्तं विदुर्बुधाः।<br>अप्रबुद्धा न पश्यन्ति भवमायाविमोहिताः॥ १३<br><br>तेनैव चाभ्यनुज्ञातास्तन्निष्ठास्तत्परायणाः।<br>अविमुक्ते तनुं त्यक्त्वा शान्ता योगगतिं गताः॥ १४ | गणेश्वर! अब हमलोग ब्रह्मादि देवों, महर्षियों और सिद्धोंसे आज्ञा लेकर परम भक्तिपूर्वक आपकी कृपासे अविमुक्तक्षेत्रमें नियमपूर्वक सुनिश्चितरूपसे निवास करना चाहते हैं। पूर्वकथित गुणोंसे सम्पन्न इस अविमुक्तमें जो धर्मशील, क्रोधजयी, आसक्तिरहित, जितेन्द्रिय और ध्यानयोगपरायण मनुष्य निवास करते हैं, वे अविनाशिनी परम सिद्धिको प्राप्त होते हैं। योगसिद्ध योगिगण भक्तिपूर्वक योग और मोक्षको देनेवाले, सर्वव्यापी, सनातन एवं गुह्य महादेवकी उपासना करते हैं। सात ब्रह्मर्षियोंने अविमुक्त-क्षेत्रमें आकर महेश्वरकी कृपासे योगको प्राप्तकर भवसायुज्यको प्राप्त किया है। ज्ञानिगण इस अविमुक्तको परम क्षेत्र मानते हैं, किंतु भवकी मायासे विमोहित अज्ञानीलोग इसे नहीं जानते। शिवनिष्ठ एवं शिवभक्तिपरायण ऋषिगण शिवजीकी आज्ञासे अविमुक्तमें शरीरका त्यागकर शान्तिपूर्वक योगकी गतिको प्राप्त हो गये॥ ८—१४॥ |
| स्थानं गुह्यं श्मशानानां सर्वेषामेतदुच्यते।<br>न हि योगादृते मोक्षः प्राप्यते भुवि मानवैः॥ १५<br><br>अविमुक्ते निवसतां योगो मोक्षश्च सिद्ध्यति।<br><br>एक एव प्रभावोऽस्ति क्षेत्रस्य परमेश्वरि।<br>अनेन जन्मनैवेह प्राप्यते गतिरुत्तमा॥ १६ | सभी श्मशानोंमें यह अविमुक्त गुह्य स्थान कहा गया है। मनुष्य संसारमें योगके बिना मोक्षको नहीं प्राप्त कर सकते, किंतु अविमुक्तमें निवास करनेवालोंके लिये योग और मोक्ष—दोनों ही सिद्ध हो जाते हैं। परमेश्वरि! इस अविमुक्तक्षेत्रका एक ही प्रभाव है कि इसी जन्ममें और यहीं उत्तम गतिको प्राप्त किया जा सकता है। |
१८७- नर्मदा-माहात्म्यके प्रसङ्गमें पुनः त्रिपुराख्यान
| ७७२ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अविमुक्ते निवसता व्यासेनामिततेजसा।<br>नैव लब्धा क्वचिद् भिक्षा भ्रममाणेन यत्नतः॥ १७<br>क्षुधाविष्टस्ततः क्रुद्धोऽचिन्तयच्छापमुत्तमम्।<br>दिनं दिनं प्रति व्यासः षण्मासं योऽवतिष्ठति॥ १८<br>कथं ममेदं नगरं भिक्षादोषाब्द्वतं त्विदम्।<br>विप्रो वा क्षत्रियो वापि ब्राह्मणी विधवापि वा॥ १९<br>संस्कृतासंस्कृता वापि परिपक्वाः कथं नु मे।<br>न प्रयच्छन्ति वै लोका ब्राह्मणाश्चर्यकारकम्॥ २०<br>एषां शापं प्रदास्यामि तीर्थस्य नगरस्य तु।<br>तीर्थं चातीर्थतां यातु नगरं शापयाम्यहम्॥ २१<br>मा भूत्त्रिपौरुषी विद्या मा भूत्त्रिपौरुषं धनम्।<br>मा भूत्त्रिपुरुषं सख्यं व्यासो वाराणसीं शपन्॥ २२<br>अविमुक्ते निवस्तां जनानां पुण्यकर्मणाम्।<br>विघ्नं सृजामि सर्वेषां येन सिद्धिर्न विद्यते॥ २३<br>व्यासचित्तं तदा ज्ञात्वा देवदेव उमापतिः।<br>भीतभीतस्तदा गौरीं तां प्रियां पर्यभाषत॥ २४<br>शृणु देवि वचो मह्यं यादृशं प्रत्युपस्थितम्।<br>कृष्णद्वैपायनः कोपाच्छापं दातुं समुद्यतः॥ २५ | किसी समय असीम प्रतापी व्यास अविमुक्तमें निवास करते हुए प्रयत्नपूर्वक घूमते रहनेपर भी कहीं भी भिक्षा नहीं पा सके। तब वे भूखसे पीड़ित होकर क्रोधपूर्वक भयंकर शाप देनेका विचार करने लगे। इस प्रकार एक-एक दिन करते व्यासके छः मास बीत गये, (तब वे सोचने लगे कि) क्या कारण है कि इस नगरमें मुझे भिक्षा नहीं मिल रही है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, ब्राह्मणी, विधवा, संस्कृता या असंस्कृता, वृद्धा कोई भी नारी या कोई भी प्राणी और ब्राह्मण मुझे भिक्षा नहीं दे रहा है—आश्चर्य है! अतः मैं यहाँके निवासी, तीर्थ और नगर—सभीको ऐसा शाप दे रहा हूँ कि यह तीर्थ अतीर्थ हो जाय। अब मैं नगरको शाप दे रहा हूँ—यहाँ तीन पीढ़ी तक लोगोंकी विद्या नहीं रहेगी, तीन पीढ़ी तक धन नहीं रहेगा और तीन पीढ़ी तक मित्रता स्थिर नहीं रहेगी। अविमुक्तमें निवास करनेवाले सभी मनुष्योंके पुण्यकर्मोंमें विघ्न उत्पन्न हो जायगा, जिससे उन्हें सिद्धि नहीं मिल सकेगी। उस समय देवदेव उमापति व्यासके हृदयको जानकर भयभीत हो गये। तब वे अपनी प्रिया गौरीसे बोले—‘देवि! इस नगरमें जैसी घटना घटित होनेवाली है, वह कह रहा हूँ, मेरी बात सुनो। श्रीकृष्णद्वैपायन क्रोधवश शाप देनेके लिये उद्यत हो गये हैं’॥ १७-२५॥ |
| देव्युवाच<br>किमर्थं शपते क्रुद्धो व्यासः केन प्रकोपितः।<br>किं कृतं भगवंस्तस्य येन शापं प्रयच्छति॥ २६ | देवीने पूछा— भगवन्! व्यासजी क्रुद्ध होकर शाप देनेके लिये क्यों उद्यत हैं? वे किसके द्वारा क्रुद्ध किये गये हैं? उनका क्या अप्रिय कर दिया गया, जिससे वे शाप दे रहे हैं?॥ २६॥ |
| देवदेव उवाच<br>अनेन सुतप्तस्तपं बहून वर्षगणान् प्रिये।<br>मौनिना ध्यानयुक्तेन द्वादशाब्दान् वरानने॥ २७<br>ततः क्षुधा सुसंजाता भिक्षामटितुमागतः।<br>नैवास्य केनचिद् भिक्षा ग्रासार्धमपि भामिनि॥ २८<br>एवं भगवतः काल आसीत् षाण्मासिको मुनेः।<br>ततः क्रोधापरीतात्मा शापं दास्यति सोऽधुना॥ २९<br>यावन्नैष शपेत्तावदुपायस्तत्र चिन्त्यताम्।<br>कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं प्रिये॥ ३०<br>कोऽस्य शापान्न बिभेति ह्यपि साक्षात् पितामहः।<br>अदैवं दैवतं कुर्याद् दैवं चाप्यपदैवतम्॥ ३१ | देवाधिदेव महादेवने कहा— प्रिये! व्यासजीने अनेक वर्षोंतक कठोर तपस्या की है। वरानने! ये मौन धारणकर ध्यानपरायण हो बारह वर्षोंतक तपस्यामें लीन रहे। तदनन्तर भूख लगनेपर ये भिक्षा माँगनेके लिये यहाँ आये हैं। किंतु भामिनि! किसीने इन्हें आधा ग्रास भी भिक्षा नहीं दी। इस प्रकार भगवान् व्यासमुनिके छः महीने बीत गये। इसी कारण इस समय ये क्रोधसे अभिभूत होकर शाप देनेको उद्यत हो गये हैं। प्रिये! कृष्णद्वैपायन व्यासको साक्षात् नारायण समझो, अतः जबतक ये शाप नहीं दे देते, तभीतक इस विषयमें कोई उपाय सोच लो। कौन है, जो इनके शापसे नहीं डरता, चाहे वह साक्षात् ब्रह्मा ही क्यों न हो! ये मनुष्यको देवता और देवताको मनुष्य |