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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 780 of 1098

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Page 780

७७० * मत्स्यपुराण *

| नानावर्णा विवर्णाश्च चण्डाला ये जुगुप्सिताः।<br>किल्बिषैः पूर्णदेहाश्च प्रकृष्टैः पातकैस्तथा॥ ६७<br>भेषजं परमं तेषामविमुक्तं विदुर्बुधाः।<br>जात्यन्तरसहस्रेषु ह्यविमुक्ते म्रियेत् तु यः॥ ६८<br>भक्तो विश्वेश्वरे देवे न स भूयोऽभिजायते।<br>यत्र चेष्टं हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्॥ ६९<br>सर्वमक्षयमेतस्मिन्नविमुक्ते न संशयः।<br>कालेनोपरता यान्ति भवे सायुज्यमक्षयम्॥ ७०<br>कृत्वा पापसहस्राणि पश्चात् संतापमेत्य वै।<br>योऽविमुक्ते वियुज्येत स याति परमां गतिम्॥ ७१<br>उत्तरं दक्षिणं चापि अयनं न विकल्पयेत्।<br>सर्वस्तेषां शुभः कालो ह्यविमुक्ते म्रियन्ति ये॥ ७२<br>न तत्र कालो मीमांस्यः शुभो वा यदि वाशुभः।<br>तस्य देवस्य माहात्म्यात् स्थानमद्भुतकर्मणः।<br>सर्वेषामेव नाथस्य सर्वेषां विभुना स्वयम्॥ ७३<br>श्रुत्वेदमृषयः सर्वे स्कन्देन कथितं पुरा।<br>अविमुक्ताश्रमं पुण्यं भावयेत्करणैः शुभैः॥ ७४ | जो चाण्डालयोनिमें उत्पन्न, अनेकों रंगोंवाले, कुरूप और निन्दित हैं, जिनका शरीर उत्कृष्ट पातकों एवं पापोंसे परिपूर्ण है, उनके लिये अविमुक्तक्षेत्र परम औषधके समान है—ऐसा पण्डितवर्ग मानते हैं। जो भगवान् विश्वेश्वरका भक्त हजारों जन्मोंके बाद अविमुक्तमें मृत्युको प्राप्त होता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। इस अविमुक्तक्षेत्रमें किया हुआ यज्ञ, दान, तप, होम आदि सभी कर्म अक्षय हो जाते हैं—इसमें संदेह नहीं है। ऐसे लोग समयानुसार मृत्युको प्राप्तकर अविनाशी शिवसायुज्यको प्राप्त करते हैं। जो हजारों पापोंका सम्पादन कर बादमें पश्चात्तापका अनुभव करता है, वह अविमुक्तक्षेत्रमें प्राणोंका त्याग करके परमगतिको प्राप्त होता है। इस विषयमें उत्तरायण एवं दक्षिणायनकी कल्पना नहीं करनी चाहिये। जो अविमुक्तमें प्राण-त्याग करते हैं, उनके लिये सभी समय शुभ है। उस समय शुभ या अशुभ कालका विचार नहीं करना चाहिये। सभीके नाथ, सर्वव्यापी, अद्भुतकर्मा स्वयं महादेवके माहात्म्यसे यह स्थान परम अद्भुत है। पूर्व समयमें सभी ऋषियोंने स्कन्दद्वारा कथित इस पवित्र वृत्तान्तको सुनकर यह निर्णय किया कि इस अविमुक्तक्षेत्रका विशुद्ध इन्द्रियोंद्वारा सेवन करना चाहिये॥ ६७—७४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽविमुक्तमाहात्म्यं नाम चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥१८४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अविमुक्तमाहात्म्य-वर्णन नामक एक सौ चौरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥१८४॥


एक सौ पचासीवाँ अध्याय

वाराणसी-माहात्म्य

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
अविमुक्ते महापुण्ये चास्तिकाः शुभदर्शनाः।<br>विस्मयं परमं जग्मुर्हर्षगद्गदनिःस्वनाः॥ १ऋषियो! अतिशय पुण्यमय अविमुक्तक्षेत्रमें आस्तिक, शुभ दर्शनवाले एवं हर्षगद्गद वाणीसे युक्त उन ऋषियोंको (इस आश्चर्यजनक आख्यानको सुनकर) महान् आश्चर्य हुआ। तब उन्होंने प्रसन्नचित्त
ऊचुस्ते हृष्टमनसः स्कन्दं ब्रह्मविदां वरम्।<br>ब्रह्मण्यो देवपुत्रस्त्वं ब्राह्मणो ब्राह्मणप्रियः॥ २होकर ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ स्कन्दजीसे कहा—भगवन्! आप ब्राह्मण-भक्त, महादेवजीके पुत्र, ब्राह्मण, ब्राह्मणोंके प्रिय,