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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 776 of 1098

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Page 776
७६६* मत्स्यपुराण *

| अनाहिताग्निर्नो यष्टा नोऽशुचिस्तस्कुरोऽपि वा।<br>अविमुक्ते वसेद् यस्तु स वसेदीश्वरालये॥ ८<br>तत्र नापुण्यकृत् कश्चित् प्रसादादीश्वरस्य च।<br>अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि स्त्रिया वा पुरुषेण वा॥ ९<br>यत्किञ्चिदशुभं कर्म कृतं मानुषबुद्धिना।<br>अविमुक्ते प्रविष्टस्य तत्सर्वं भस्मसाद् भवेत्॥ १० | जो अग्निका आधान नहीं करता, यज्ञ नहीं करता, अपवित्र या चोर है, वह भी यदि अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करता है तो मानो महेश्वरके लोकमें ही निवास कर रहा है। महेश्वरकी कृपासे वहाँ कोई भी पापकर्म नहीं करता। स्त्री अथवा पुरुषद्वारा मानव-बुद्धिके अनुसार जान या अनजानमें भी जो कुछ दुष्कर्म किया होता है, वह सब अविमुक्तक्षेत्रमें प्रवेश करते ही भस्म हो जाता है॥ ८—१०॥ |
| सरितः सागराः शैलास्तीर्थान्यायतनानि च।<br>भूतप्रेतपिशाचाश्च गणा मातृगणास्तथा॥ ११<br>श्मशानिकपरीवाराः प्रियास्तस्य महात्मनः।<br>न ते मुञ्चन्ति भूतेशं तान् भवस्तु न मुञ्चति॥ १२<br>रमते च गणैः सार्धमविमुक्ते स्थितः प्रभुः।<br>दृष्टैतान् भीतकृपणान् पापदुष्कृतकारिणः॥ १३<br>अनुकम्पया तु देवस्य प्रयान्ति परमां गतिम्।<br>भक्तानुकम्पी भगवांस्तिर्यग्यौनिगतानपि॥ १४<br>नयत्येव वरं स्थानं यत्र यान्ति च याज्ञिकाः।<br>भार्गवाङ्गिरसः सिद्धा ऋषयश्च महाव्रताः॥ १५<br>अविमुक्ताग्निना दग्धा अग्नौ तूलमिवाहितम्।<br>न सा गतिः कुरुक्षेत्रे गङ्गाद्वारे च पुष्करे॥ १६<br>सा गतिर्विहिता पुंसामविमुक्तनिवासिनाम्।<br>तिर्यग्योनिगताः सत्त्वा येऽविमुक्ते कृतालयाः।<br>कालेन निधनं प्राप्तास्ते यान्ति परमां गतिम्॥ १७<br>मेरुमन्दरमात्रोऽपि राशिः पापस्य कर्मणः।<br>अविमुक्तं समासाद्य तत् सर्वं व्रजति क्षयम्॥ १८ | नदियाँ, सागर, पर्वत, तीर्थ, देवालय, भूत, प्रेत, पिशाच, शिवगण, मातृगण तथा श्मशान-निवासी—ये सभी उन महात्मा शिवको प्रिय हैं, अतः न तो वे भूतपति शिवको छोड़ते हैं और न शिव उनका परित्याग करते हैं। अविमुक्तमें स्थित वे प्रभु अपने प्रमथगणोंके साथ रमण करते हैं। भयसे त्रस्त, पापी, दुराचाररत अथवा तिर्यग्योनिमें ही क्यों न उत्पन्न हुए हों, वे सभी अविमुक्तको देखकर महादेवकी अनुकम्पासे परम गतिको प्राप्त हो जाते हैं। भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाले भगवान् शंकर उन सभीको ऐसे श्रेष्ठ स्थानपर पहुँचा देते हैं, जहाँ यज्ञ करनेवाले, भृगुवंशी, अंगिरागोत्री, सिद्ध तथा महाव्रती ऋषिगण जाते हैं। उनके पाप अग्निमें डाली गयी रूईके समान अविमुक्तकी अग्निसे नष्ट हो जाते हैं। अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करनेवाले पुरुषोंकी जो गति बतलायी गयी है, वह गति कुरुक्षेत्र, गङ्गाद्वार और पुष्कर तीर्थमें नहीं मिलती। तिर्यग्योनिमें उत्पन्न हुए जो जीव अविमुक्तमें निवास करते हैं, वे समयानुसार मृत्युको प्राप्त होनेपर परमगतिको प्राप्त करते हैं। चाहे मेरु या मन्दराचलके बराबर भी पापकर्मकी राशि क्यों न हो, वह सब-का-सब पाप अविमुक्तमें आते ही नष्ट हो जाता है॥ ११—१८॥ |
| श्मशानमिति विख्यातमविमुक्तं शिवालयम्।<br>तद् गुह्यं देवदेवस्य तत् तीर्थं तत् तपोवनम्॥ १९<br>तत्र ब्रह्मादयो देवा नारायणपुरोगमाः।<br>योगिनश्च तथा साध्या भगवन्तं सनातनम्॥ २०<br>उपासन्ते शिवं मुक्ता मद्भक्ता मत्परायणाः।<br>या गतिर्ज्ञानतपसां या गतिर्यज्ञयाजिनाम्॥ २१<br>अविमुक्ते मृतानां तु सा गतिर्विहिता शुभा।<br>संहर्तारश्च कर्तारस्तस्मिन् ब्रह्मादयः सुराः॥ २२ | शिवजीका यह निवासस्थान अविमुक्त श्मशानके नामसे विख्यात है। उन देवाधिदेवका वह परम गुप्त स्थान है, वह तीर्थ है और वह तपोवन है। वहाँ नारायणसहित ब्रह्मा आदि देवगण, योगिसमूह, साध्यगण तथा जीवन्मुक्त शिवपरायण शिवभक्त सनातन भगवान् शिवकी उपासनामें रत रहते हैं। ज्ञानसम्पन्न तपस्वियों तथा यज्ञोंका विधानपूर्वक अनुष्ठान करनेवालोंको जो गति प्राप्त होती है, वही शुभ गति अविमुक्तमें मरनेवालोंके लिये कही गयी है। जगत्की सृष्टि करनेवाले तथा जगत्का संहार करनेवाले ब्रह्मा |

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