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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 616 में से

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पृष्ठ 221

पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०७
छाल, पाढल की छाल, खरेंटी, चारों पर्णिया ( शालिपर्णी, पृश्निपर्णी, मुद्ग-
पर्णी, माषपर्णी ), पिप्पली, गोखरू, दोनों छोटी बड़ी कटेरी, काकड़ासिङ्गी,
तामलकी ( भुई आंवला ), द्राक्षा, जीवन्ती, पुष्करमूल, अगरु, हरड बड़ी,
गिलोय, ऋद्धि, जीवक, ऋषभक, शठी ( कचूर ), नागरमोथा, पुनर्नवा, मेदा,
छोटी इलायची, लाल चन्दन, कमल गट्टा, विदारी, अडूसे की जड, काकोली,
काकनासा ( कौआ ठोढ़ी ), प्रत्येक एक एक पल, आवले ५०० इनको एक
द्रोण ( परिभाषा से दुगने ) जल में पकावे । पकाते समय आवलों को पाटली में
बाँध कर क्वाथ में छोड़ना चाहिये । जब ओषधियों का रस काथ मे आ जाये
और ओषधिया नीरस हो जायें तब पोटली को निकाल कर क्वाथ छान लेना
चाहिये । इन आवलों की गुठलियों को निकाल कर कपड़े में से आवलों को
हाथ से रगड़ कर छानना चाहिये । जिससे रेशे निकल जायें और नरम पिट्ठी
सी बन जाये । इस पिट्ठी को मिलित तैल एव घी के बारह पल में भून लेना
चाहिये । भूनना इतना चाहिये कि रंग लाल सा हो जाये । काथ में ५० पल
राब या दानेदार खाड मिलाकर लेह पकाना चाहिये । पकाने से पूर्व छानकर
आवले की पिट्ठी इसमें मिला दे । जब पाक तैयार हो जाय तो इसको उतार ले ।
ठण्डा होने पर छ. पल ( ४८ तोला ) मधु, वशलोचन ४ पल, पिप्पली दो पल,
दालचीनी, इलायची, तेजपात और नागकेसर मिलित १ पल मिला दे । पकाते
समय निरन्तर लकड़ी के कौंचे ( पल्टा ) से चलाता जावे ।
[ च्यवनप्राश का पाठ कई पुस्तकों में है । चिकित्सा-कलिका, योग रत्ना-
कर और शार्ङ्गधर में कुछ ओषधियों का भेद है । किसी में ३५, किसी मे
३८ और किसी मे ३६ हैं । क्वाथविधि मे भी कहीं चतुर्थांश शेष रखने की
विधि लिखी है, कहीं अष्टमांश की । ओषधियों का रस क्वाथ में आना चाहिये ।
साथ ही शार्ङ्गधर मे तैल के अन्दर आवले भूनने का विधान नहीं। वहा पर
केवल घी का ही प्रयोग किया है । ]
यह च्यवनप्राश उत्तम रसायन है । खासकर कास, श्वास, को नष्ट करता है ।
क्षीणक्षत, वृद्ध एव बालकों के अगों को बढ़ाता है । स्वरक्षय, उरोरोग, हृदय-
रोग, वात-रक्त, पिपासा, मूत्रस्थान, शुक्रस्थान के रोगों ( वीर्यदोष ) को नष्ट
करता है । इस च्यवनप्राश की मात्रा इतनी लेनी चाहिये जिससे भूख नष्ट
न हो । इसके प्रयोग से वृद्ध च्यवन ऋषि भी पुनः जवान बन गये थे । इस
रसायन के प्रयोग से मेधा, स्मृति, कान्ति, नीरोगता, आयु की दीर्घता, इन्द्रियों
की सबलता, मैथुन में समर्थता, देहाग्नि की वृद्धि, वर्ण की निर्मलता, वायु की