चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ५ ] इन्द्रियस्थानम् १५३
अ० ५ ] इन्द्रियस्थानम् १५३
पञ्चमोऽध्यायः
अथातः पूर्वरूपीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'पूर्वरूपीय इन्द्रिय' नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे । जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
पूर्वरूपाण्यसाध्याना विकाराणां पृथक् पृथक् ।
भिन्नाभिन्नानि वक्ष्यामो भिषजां ज्ञानवृद्धये ॥ ३ ॥
पूर्वरूपाणि सर्वाणि ज्वरोक्तान्यतिमात्रया ।
यं विशन्ति विशत्येन मृत्युर्ज्वरपुरःसरः ॥ ४ ॥
अन्यान्यपि च रोगस्य पूर्वरूपाणि य नरम् ।
विशन्त्येतेन कल्पेन तस्यापि मरणं ध्रुवम् ॥ ५ ॥
वैद्यों के ज्ञान बढाने के लिये असाध्य रोगों के भिन्न भिन्न पूर्वरूप पृथक्
पृथक् रूप से कहेंगे । ज्वर में कहे हुए पूर्वरूप जिस ज्वर रोगी में सम्पूर्ण रूप
में या बहुत अधिक प्रमाण मे प्रविष्ट होते हैं, उसमें ज्वर साक्षात् मृत्यु रूप से
घुस जाता है । इसी प्रकार अन्य किसी भी रोग में पूर्वरूप सम्पूर्ण रूप से या
बहुत प्रमाण में रोगी में दिखाई दें, तो उसकी भी निश्चय मृत्यु होती है ॥३-५॥
पूर्वरूपैकदेशांस्तु वक्ष्यामोऽन्यान् सुदारुणान् ।
ये रोगाननुबध्नन्ति मृत्युर्यैरनुबध्यते ॥ ६ ॥
बलं च हीयते यस्य प्रतिश्यायश्च वर्धते ।
तस्य नारीप्रसक्तस्य शोषोऽन्तायोपजायते ॥ ७ ॥
श्वभिरुष्ट्रैः खरैर्वाऽपि याति यो दक्षिणां दिशम् ।
स्वप्ने यक्ष्माणमासाद्य जीवित स विमुञ्चति ॥ ८ ॥
इसके आगे रोगों के भयंकर पूर्वरूपों के एक अंश का वर्णन करते हैं, जो
रोगों के साथ दिखाई देते हैं तथा जिनके साथ मृत्यु का निश्चय सम्बन्ध है ।
( १ ) जिस क्षय रोगी का बल घट गया हो और प्रतिश्याय ( कफ ) बढ
रहा हो, ऐसी अवस्था में भी रोगी स्त्री-सग का व्यसनी हो तोक्षय रोग उसकी
मृत्यु के लिये होता है ।
( २ ) जो क्षयरोगी स्वप्न में कुत्ते, ऊट, गधे आदि पर चढ़ कर दक्षिण
दिशा में गमन करता हो वह रोगी कभी जीता नहीं बच सकता ॥६-८॥
प्रेतैः सह पिबेन्मद्य स्वप्ने यः कृष्यते शुना ।
सुघोरं ज्वरमासाद्य स जीवमवसृजते ॥ ९ ॥
१५४ चरकसंहिता [ अ० ५
( ३ ) जो रोगी नींद में प्रेतों के साथ मद्य पान करे और स्वप्न मे जिसको
कुत्ते घसीटते हो वह रोगी पुरुष घोर ज्वरी होकर जीता नहीं बच सकता ॥६॥
लाक्षारक्ताम्बराभं य पश्यत्यम्बरमन्तिकात् ।
स रक्तपित्तमासाद्य तेनैवान्ताय नीयते ॥ १० ॥
रक्तस्रग् रक्तसर्वाङ्गो रक्तवासा मुहुर्हसन् ।
यः स्वप्ने ह्रियते नार्या स रक्तं प्राप्य सीदति ॥ ११ ॥
( ४ ) जो रोगी समीप मे ही आकाश को लाख के रस या मेंहदी के रंग
में रंगे कपड़े के समान लाल देखे, वह रक्तपित्त रोग में ग्रस्त होकर उसी रोग
से मृत्यु को प्राप्त हो जाता है ।
( ५ ) जो रोगी स्वप्न में लाल माला पहिने, सब अगों को लाल देखे,
लाल कपड़ा पहिने, बार बार हसता हुआ, स्त्री से कहीं अन्यत्र ले जाया जाये,
वह पुरुष रक्त पित्त का रोगी हो कर मर जाता है ॥ १०-११ ॥
शूलाटोपान्त्रकूजञ्च दौर्बल्य चातिमात्रया ।
नखादिषु च वैवर्ण्य गुल्मेनान्तकरो ग्रहः ॥ १२ ॥
लता कण्टकिनी यस्य दारुणा हृदि जायते ।
स्वप्ने गुल्मस्तमन्ताय क्रूरो विशति मानवम् ॥ १३ ॥
( ६ ) जिस रोगी को शूल, आध्मान ( आफरा ), आतों का कूजना शब्द,
और बहुत अधिक दुर्बलता हो, तथा नख आदि जिसके श्वेत हो जाये उस
रोगी का गुल्म ही मृत्युकारी होता है ।
( ७ ) जिस रोगी के हृदय मे स्वप्न में काटेदार बेल उत्पन्न हो, उस रोगी
को गुल्म रोग मृत्युरूप से आता है ॥ १२-१३ ॥
कायेऽल्पमपि सस्पृष्टं सुभृश यस्य दीर्यते ।
क्षतानि च न रोहन्ति कुष्ठैर्मृत्युर्हिनस्ति तम् ॥ १४ ॥
नग्नस्याज्यावसिक्तस्य जुह्वतोऽग्निमनर्चिषम् ।
पद्मान्युरसि जायन्ते स्वप्ने कुष्ठैर्मरिष्यतः ॥ १५ ॥
( ८ ) जिस रोगी के शरीर पर थोड़ा सा स्पर्श किया हुआ बहुत अधिक
घाव कर देता है, तथा जिसके व्रण नहीं भरते, वह मनुष्य कुष्ठ रोग के कारण
मरता है ।
( ६ ) जो मनुष्य स्वप्न में नगा होकर, अंगों पर घी लगा कर बिना
ज्वाला के अग्नि में हवन करता वा जिसके हृदय में से कमल उत्पन्न होता है,
वह कुष्ठ रोग से मरता है ॥ १४-१५ ॥
अ० ५ ] इन्द्रियस्थानम् १५५
स्नातानुलिप्तगात्रेऽपि यस्मिन् गृध्नन्ति मक्षिकाः ।
स प्रमेहेण संस्पर्शं प्राप्य तेनैव हन्यते ॥ १६ ॥
स्नेहं बहुविधं स्वप्ने चण्डालैः सह यः पिवेत् ।
बध्यते स प्रमेहेण स्पृश्यतेऽन्ताय मानवः ॥ १७ ॥
(१०) जिस मनुष्य के स्नान करने और चन्दन का लेप करने पर भी
मक्खिया शरीर पर से नहीं उड़तीं वह प्रमेह का रोगी होकर उसी से मृत्यु को
प्राप्त होता है ।
(११) जो मनुष्य स्वप्न में नाना प्रकार के स्नेहों का चाण्डालों के साथ
पान करता है, वह प्रमेह के रोग से आक्रान्त होकर प्रमेह से मरता है ॥१६-१७॥
ध्यानायासौ तथोद्वेगो मोहश्चास्थानसंभवः ।
अरतिर्बलहानिश्च मृत्युरुन्मादपूर्वकः ॥ १८ ॥
आहारद्वेषिण पश्येल्लुप्तचित्तमुददितम् ।
विद्याद्धीरो मुमूर्षु तमुन्मादेनातिपातिना ॥ १९ ॥
क्रोधन त्रासबहुल सकृत्प्रहसिताननम् ।
मूर्च्छापिपासाबहुल हन्त्युन्मादः शरीरिणम् ॥ २० ॥
नृत्यन् रक्षोगणैः साध य. स्वप्नेऽम्भसि सीदति ।
स प्राप्य भृशमुन्माद याति लोकमितः परम् ॥ २१ ॥
(१२) जिसको ध्यान और श्रम, उद्वेग और मोह आदि बिना अवसर
के (समय के बिना जहा नहीं करने चाहिये वहा) हों, उदासीनता और
बलहानि हो जाये, उसकी मृत्यु उन्माद रोग से होती है ।
(१३) भोजन से द्वेष करनेवाला, जिसका चित्त नष्ट हो गया हो,
(अस्थिर चित्त), तथा ऊर्ध्व वात से पीडित हो, ऐसा रोगी उन्माद रोग
से मरता है ।
(१४) अत्यन्त क्रोधी, बहुत डरने वाला, एकदम सहसा हसने लगे,
अतिशय मूर्छा प्यासवाला रोगी उन्माद से मरता है ।
(१५) जो मनुष्य स्वप्न में राक्षसों के साथ नृत्य करता हुआ पानी में
डूब जाता है, वह तीव्र उन्माद रोग से मृत्यु को प्राप्त होता है ॥ १८-२१ ॥
असत्तत्त्वः पश्यति यो यः शृणोत्यसत. स्वरान् ।
बहून् बहुविधाञ्जाग्रत्सोऽपस्मारेण बध्यते ॥ २२ ॥
मत्तं नृत्यन्तमाविष्य प्रेतो हरति यं नरम् ।
स्वप्ने हरति तं मृत्युरपस्मारपुरःसरः ॥ २३ ॥
१५६ चरकसंहिता [ अ० ५
( १६ ) अन्धकार के बिना जो अन्धकार को देखता है और जागता
हुआ भी बिना शब्दों के जो अनेक शब्द सुनता है, यह रोगी अपस्मार से
मारा जाता है ।
( १७ ) स्वप्न में मत्त होकर, नाचता हुआ प्रेत जिस मनुष्य को शिर
नीचा करके हर लेते हैं उसकी मृत्यु अपस्मार से होती है ।। २२-२३ ।।
स्तभ्येते प्रतिबुद्धस्य हनू मन्ये तथाऽक्षिणी ।
यस्य तं बहिरायामो गृहीत्वा हन्त्यसंशयम् ।। २४ ।।
शष्कुलीरप्यपूपान् वा स्वप्ने खादति यो नर ।
स चेत्तांश्छर्दयति प्रतिबुद्धो न जीवति ।। २५ ।।
( १८ ) जिस रोगी के जागते समय हनु ( जबड़े ), मन्या, शिरा तथा
आखें स्तम्भित ( जड़ ) रह जायें, वह रोगी 'बहिरायाम' नाम (वात व्याधि से)
मरता है । [ इस रोग में प्राण बाहर के बाहर ही रह जाते हैं, भीतर प्रवेश
नहीं करते । ]
( १६ ) जो मनुष्य स्वप्न में पूरी, पूए आदि वस्तु खाये और जागने
पर उसी प्रकार का फिर वमन करे, वह नहीं जीता । वह अवश्य मृत्यु को
प्राप्त होता है ।। २४-२५ ।।
एतानि पूर्वरूपाणि यः सम्यगवबुध्यते ।
स एषामनुबन्धं च फलं च ज्ञातुमर्हति ।। २६ ।।
जो वैद्य इन पूर्वरूपों को भली प्रकार से समझता है, वह इनके अनुबन्ध
और फलों को भली प्रकार से कह सकता है ।। २६ ।।
य इमांश्चापरान् स्वप्नान् दारुणानुपलक्षयेत् ।
व्याधितानां विनाशाय क्लेशाय महतेऽपि वा ।। २७ ।।
यस्योत्तमाङ्गे जायन्ते वंशगुल्मलतादयः ।
वयांसि च विलीयन्ते स्वप्ने मौण्ड्यमियाच्च यः ।। २८ ।।
गृध्रोलूकश्वकाकाद्यैः स्वप्ने यः परिवार्यते ।
रक्षःप्रेत-पिशाच-स्त्री-चण्डाल-द्रविणान्धकैः ।। २९ ।।
वंश-वेत्र-लता-पाश-तृण-कण्टक-सकटे ।
प्रमुह्यति१ हि य स्वप्ने यो गच्छन् प्रपतत्यपि ।। ३० ।।
भूमौ पांशूपधानाया वल्मीके वाऽथ भस्मनि ।
श्मशानायतने श्वभ्रे स्वप्ने यः प्रविशत्यपि ।। ३१ ।।
१ 'स सज्जति हि य' इति च पाठः ।