चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ५ ] इन्द्रियस्थानम् १५३
पञ्चमोऽध्यायः
अथातः पूर्वरूपीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'पूर्वरूपीय इन्द्रिय' नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे । जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
पूर्वरूपाण्यसाध्याना विकाराणां पृथक् पृथक् ।
भिन्नाभिन्नानि वक्ष्यामो भिषजां ज्ञानवृद्धये ॥ ३ ॥
पूर्वरूपाणि सर्वाणि ज्वरोक्तान्यतिमात्रया ।
यं विशन्ति विशत्येन मृत्युर्ज्वरपुरःसरः ॥ ४ ॥
अन्यान्यपि च रोगस्य पूर्वरूपाणि य नरम् ।
विशन्त्येतेन कल्पेन तस्यापि मरणं ध्रुवम् ॥ ५ ॥
वैद्यों के ज्ञान बढाने के लिये असाध्य रोगों के भिन्न भिन्न पूर्वरूप पृथक्
पृथक् रूप से कहेंगे । ज्वर में कहे हुए पूर्वरूप जिस ज्वर रोगी में सम्पूर्ण रूप
में या बहुत अधिक प्रमाण मे प्रविष्ट होते हैं, उसमें ज्वर साक्षात् मृत्यु रूप से
घुस जाता है । इसी प्रकार अन्य किसी भी रोग में पूर्वरूप सम्पूर्ण रूप से या
बहुत प्रमाण में रोगी में दिखाई दें, तो उसकी भी निश्चय मृत्यु होती है ॥३-५॥
पूर्वरूपैकदेशांस्तु वक्ष्यामोऽन्यान् सुदारुणान् ।
ये रोगाननुबध्नन्ति मृत्युर्यैरनुबध्यते ॥ ६ ॥
बलं च हीयते यस्य प्रतिश्यायश्च वर्धते ।
तस्य नारीप्रसक्तस्य शोषोऽन्तायोपजायते ॥ ७ ॥
श्वभिरुष्ट्रैः खरैर्वाऽपि याति यो दक्षिणां दिशम् ।
स्वप्ने यक्ष्माणमासाद्य जीवित स विमुञ्चति ॥ ८ ॥
इसके आगे रोगों के भयंकर पूर्वरूपों के एक अंश का वर्णन करते हैं, जो
रोगों के साथ दिखाई देते हैं तथा जिनके साथ मृत्यु का निश्चय सम्बन्ध है ।
( १ ) जिस क्षय रोगी का बल घट गया हो और प्रतिश्याय ( कफ ) बढ
रहा हो, ऐसी अवस्था में भी रोगी स्त्री-सग का व्यसनी हो तोक्षय रोग उसकी
मृत्यु के लिये होता है ।
( २ ) जो क्षयरोगी स्वप्न में कुत्ते, ऊट, गधे आदि पर चढ़ कर दक्षिण
दिशा में गमन करता हो वह रोगी कभी जीता नहीं बच सकता ॥६-८॥
प्रेतैः सह पिबेन्मद्य स्वप्ने यः कृष्यते शुना ।
सुघोरं ज्वरमासाद्य स जीवमवसृजते ॥ ९ ॥