चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १५ ] चिकित्सास्थानम् ५६७
अ० १५ ] चिकित्सास्थानम् ५६७
व्यानेन रसधातुर्हि विक्षेपोचितकर्मणा ।
युगपत्सर्वतोऽजस्रं देहे विक्षिप्यते सदा ॥ ३६ ॥
विक्षेप करने वाला व्यान-वायु रस धातु को सम्पूर्ण शरीर मे सब ओर एक
साथ समस्त शरीर मे फैला देता है ॥ ३६ ॥
क्षिप्यमाणः खवैगुण्याद्रसः सज्जति यत्र सः ।
तस्मिन् विकारान् कुरुते विवर्षमिव १ तोयदः ॥ ३७ ॥
निरन्तर गति करता हुआ यह रस स्रोतो के विकारों के कारण जहा कहीं
भी रुक जाता है वही पर रोगो का उत्पन्न कर देना है । जिस प्रकार वायु द्वारा
वेग से जाते हुए बादल जहा कहीं भी रुक जाते है वहाँ पर बरसने लगते हैं ।
उसी प्रकार रस के रुकने से रोग उत्पन्न होते है । [ रस शब्द का अर्थ ही गति
वाला है, जो प्रतिदिन प्रतिक्षण चलता रहता है वह 'रस' कहाता है ] ॥३७॥
दोषाणामपि चैवं स्यात्तत्र देशे प्रकोपणम् ।
फैलने वाले दोषो का भी जहा पर इसी प्रकार से रुकाव (स्थान, संश्रय)
हो जाता है, वही पर प्रकोप (रोग) हो जाता है२ ।
इति भौतिकधात्वन्नपक्तॄणां कर्म भाषितम् ॥ ३८ ॥
यह भौतिक अग्नि, वात्वग्नि और अन्न पाचक अग्नि के कर्मों का उपदेश
कर दिया ॥ ३८ ॥
अन्नस्य पक्ता सर्वेषां पक्तॄणामधिपो ३ मतः ।
तन्मूलास्ते हि तद्वृद्धिक्षयवृद्धिक्षयात्मकाः ॥ ३६ ॥
तस्मात्तं विधिवद्युक्तैरन्नपानेन्धनैर्हितैः ।
पालयेत्प्रयतस्तस्य स्थितौ ह्यायुर्बलस्थितिः ॥ ४० ॥
यो हि भुक्ते विधि मुक्त्वा ग्रहणीदोषजान् गदान् ।
स लौल्याल्लभते शीघ्रं वक्ष्यन्तेऽतः परं तु ये ॥ ४१ ॥
द्व्यङ्गुले दक्षिणे पार्श्वे बस्तिद्वारस्य चाप्यधः ।
मूत्रस्रोतःपथाच्छुक्रं पुरुषस्य प्रवर्त्तते ॥
कृत्स्नदेहाश्रितं शुक्रं प्रसन्नमनसस्तथा ।
स्त्रीषु व्यायच्छतश्चापि हर्षात् तत्सम्प्रवर्त्तते ॥ सु० शा० ४ ॥
१. “करोति विकृतिं चात्र खे वर्षमिव” इति वा ।
२ सुश्रुत में—“कुपिताना हि दोषाणां शरीरे परिधावताम् ।
यत्र सगः स्ववैगुण्याद् व्याधिस्तत्रोपजायते ॥”
३. 'मधिको' इति पाठान्तरम् ।
५६८ चरकसंहिता [ अ० १५
इन तीनो प्रकार की अग्नियो में से प्रधान अग्नि१ अन्न का पाचक जाठ-
राग्नि ही है। इस जाठराग्नि पर ही शेष अग्नियां निर्भर है। इस जाठराग्नि के
बढ़ने पर ये बढते हैं और इसके घटने पर ये घट जाते है। इसलिये मनुष्य को
चाहिये कि प्रयत्नपूर्वक विधि से अति हितकारी अन्नपान रूपी इन्धन के द्वारा
इस जाठराग्नि की सदा रक्षा करे। क्योकि इसी अन्न-पाचक जाठराग्नि की स्थिति
पर बल और आयु की स्थिति निर्भर है। जो मनुष्य विधि का त्याग करके
आहार का सेवन करते हे, वे लोभवश ग्रहणी के दोष से उत्पन्न होने वाले
रोगो से पीड़ित होते है। [ ग्रहणी दोष से उत्पन्न होने वाले चार प्रकार के रोगा
का वर्णन आगे करेग ] ॥ ३६-४१ ॥
अभोजनादजीर्णातिभोजनाद्विषमाशनात् ।
असात्म्यगुरुशीतातिरूक्षसंदुष्टभोजनात् ॥ ४२ ॥
विरेकवमनस्नेहविभ्रमाद् व्याधिकर्शनात् ।
देशकालर्तुवैषम्याद् वेगानां च विधारणात् ॥ ४३ ॥
दुष्यत्यग्निः स दुष्टोऽन्नं न तत्पचति लघ्वपि ।
अपच्यमानं शुक्तत्वं यात्यन्नं विषतां च तत् ॥ ४४ ॥
अजीर्ण के सामान्य कारण—भोजन न करने से ( उपवास से ),
अजीर्ण मे ( प्रथम भोजन के जीर्ण न होने पर ) भोजन करने से, अति-
भोजन से, विषमाशन से ( बहुत थोड़ा या अकाल मे भोजन से ), असात्म्य
भोजन से, गुरु, शीत भोजन अथवा अति भोजन से, दूषित ( बासी या दूषित )
भोजन से, विरेचन, वमन अथवा स्नेह क विधिपूर्वक प्रयोग न करने से, किसी
रोग के कारण कृशता या निर्बलता हो जाने मे, देश, काल अथवा ऋतु की
विषमता से, मल, मूत्र आदि के उपस्थित वेगो को रोकने से अग्नि दूषित हो
जाती है। यह दूषित अग्नि थोडे से भी आहार का परिपाक नही करता । परि-
पाक न होने से अन्न शुक्त अर्थात् अम्लीभाव से युक्त हो जाता है तथा इसमें
विष के गुण आ जाते है। अर्थात् अपरिपक्व अन्न मृत्यु का भी कारण हो
सकता है२ ॥ ४२-४४ ॥
१ 'भौतिकाः पञ्च, धात्वग्नयः सप्त, अन्नपक्ता एकः । अग्नयः इति भूताग्नयः
पञ्च, धात्वग्नयः सप्त इति द्वादशाग्नयः ।' इति च चक्रः० ॥
२ अन्यत्र भी कहा है—
मूर्च्छा प्रलापो वमथुः प्रसेकः सदन भ्रमः ।
उपद्रवा भवन्त्येते मरणं चाप्यजीर्णतः ॥