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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० १४ ] चिकित्सास्थानम् ५६५

अ० १४ ] चिकित्सास्थानम् ५६५
रक्तशालिर्महाशालिः कलमो जाङ्गलः सितः ।
शारदः षष्टिकश्चैव स्यादन्नविधिरर्शसाम् ॥ ९६ ॥
इत्युक्तो भिन्नशकृतामर्शासां च विधिक्रमः ।
(१५) अन्नविधि—लाल चावल, महाचावल, कलम, जागल, सित,
शरद् ऋतु में पकने वाले धान्य और साठी के चावल अर्श रोगियों के लिये
हितकारी हैं ।
जिन अर्शरोगियो को पतला मल आता है, उनकी चिकित्सा-विधि
कह दी है ॥ ९६ ॥
येऽत्यर्थं गाढशकृतस्तेषां वक्ष्यामि भेषजम् ॥ ९७ ॥
सस्नेहैः शक्तुभिर्युक्तां प्रसन्नां लवणीकृताम् ।
दद्यान्मत्स्यण्डिका पूर्वं भक्षयित्वा सनागराम् ॥ ९८ ॥
जिन रोगियो का मल कठिन है, उनके लिये औषध कहते हैं—
(१६) रोगी का राब के साथ सोंठ खिलाकर पीछे से स्नेह बहुल
सक्तुओ से युक्त और सैन्धव नमक से नमकीन करके प्रसन्ना ( मद्य ) को
देना चाहिये ॥ ९७-९८ ॥
गुडं सनागरं पाठा फलाम्लं पाययेच्च तम् ।
गुडं घृतं यवक्षारं युक्त वाऽपि प्रयोजयेत् ॥ ९९ ॥
यवानीं नागरं पाठा दाडिमस्य रसं गुडम् ।
(१७) अनार आदि अम्ल फलो के रस मे गुड़, सोठ और पाठा का चूर्ण
मिला कर देना चाहिये । अथवा यवक्षार और घी के साथ गुड़ खिलाना
चाहिये । अथवा सोठ, गुड, पाठा को पानी मे घोल कर अनार के रस से खट्टा
बना कर देना चाहिये ॥ ९९- ॥
सतक्रलवणं दद्याद्वातवर्चोऽनुलोमनम् ॥ १०० ॥
(१८) अजवायन, पाठा और सोठ का चूर्ण करके अनार का रस, गुड़, छाछ
और नमक मे मिला कर देने से वायु और मल का अनुलोमन होता है ॥१००॥
दुःस्पर्शकेन बिल्वेन यवान्या नागरेण वा ।
एकैकेनापि संयुक्ता पाठा हन्त्यर्शसां रुजम् ॥ १०१ ॥
प्रागुक्तान् यमके भृष्टान् सक्तुभिश्चावचूर्णितान् ।
(१६) दुरालभा या बेलगिरी के साथ अथवा अजवायन या सोंठ के
साथ पाठा के चूर्ण को मिला कर देने से गाढे मल से उत्पन्न वेदना नष्ट
होती है ॥ १०१ ॥

५६६ चरकसंहिता [ अ० १४
करञ्जपल्लवान् दद्याद्वातवर्चोऽनुलोमनान् ॥ १०२ ॥
(२०) करञ्ज के कोमल पत्तों को जौ के सत्तु के साथ घी और तेल यमक
मे भून लेना चाहिये । इनके चूर्ण को भोजन से पूर्व देना चाहिये । इससे वायु
और मल का अनुलोमन होता है ॥ १०२ ॥
मदिरां वा सलवणा शीधुं सौवीरक तथा ।
गुडनागरसंयुक्त पिबेद्वा पौर्वभक्तिकम् ॥ १०३ ॥
(२१) भोजन से पूर्व प्रसन्ना को नमक से नमकीन बना कर पीये ।
अथवा सीधु को नमकीन करके या काजी को नमकीन करके पीये । अथवा गुड़
के साथ हरड़ को खाना चाहिये ॥ १०३ ॥
पिप्पलीनागरक्षारकारवीधान्यजीरकैः ।
फाणितेन च सयोज्य फलाम्ल सावयेद् घृतम् ॥ १०४ ॥
(२२) पिप्पली, मोठ, यवक्षार, कालीजीरी, धनिया, जीरा इन सबको
समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को फाणित (राब) और
घी मे मिला कर अनार के रस से खट्टा करके रोगी को देना चाहिये १ ।
[ जल्पकल्पतरु मे पिप्पल्यादि के कल्क से घृत सिद्ध करके देना चाहिये
ऐसा माना है ] ॥ १०४ ॥
पिप्पली पिप्पलीमूल चित्रको हस्तिपिप्पली ।
शृङ्गवेरं यवक्षारं तैः सिद्धं वा पिबेद् घृतम् ॥ १०५ ॥
(२३) पिप्पली, पिप्पलीमूल, चविका, चीता, सोठ, यवक्षार, मिलित २०
तोला, घृत १ सेर ओर जल ४ सेर लेकर पिप्पली आदि कल्क से घृत सिद्ध
करना चाहिये ॥ १०५ ॥
चव्यचित्रकसिद्धं वा गुडक्षारसमन्वितम् ।
पिप्पलीमूलसिद्धं वा सगुडक्षारनागरम् ॥ १०६ ॥
पिप्पलीपिप्पलीमूलदधिदाडिमधान्यकैः ।
सिद्धं सर्पिर्विधातव्य वातवर्चोविबन्धनुत् ॥ १०७ ॥
(२४) तीन घृत—(१) चव्य और चित्रक का कल्क २० ताला, पानी
४ सेर, घृत १ सेर लेकर घृत सिद्ध करन चाहिये । इसमे गुड़ और यवक्षार
१ यहा पर अपक्व ही घृत का प्रयोग है। जैसा कि वाग्भट में कहा है—
रूक्षकोष्ठश्चार्शसो नागरक्षारकृष्णाजाजीधान्यकारवीगर्भं फलाम्लं सफाणित सर्पिः
पिबेत् । अ० स० चि० १० ।